जन्म-मृत्यु मंत्री की चिंता…..

एल.आर. गाँधी

आखिर मासूम नवजात बच्चों की अंतिम चीत्कार ,देश के ‘जन्म-मृत्यु’ मंत्री जनाब गुलाम नबी आज़ाद साहेब को सुनाई दे ही गयी …. देती भी क्यों न …देश के उनके अपने विशेष प्रदेश ‘कश्मीर’ के बच्चे जो ठहरे. हुआ यों कि कश्मीर के जी.बी पन्त हस्पताल में मात्र एक रात में ही चार नवजात बच्चे अकाल मृत्यु के मुंह में समा गए. लोगों ने शव सड़क पर रख कर जाम लगा दिया और आक्रोश प्रकट किया. आज़ाद साहेब की यका यक आँख खुली और घटना को दुर्भाग्य पूर्ण और शर्मनाक बताया. जनवरी से अब तक श्रीनगर में ३६७ नवजात बच्चे अकाल मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं . हस्पताल सुपरडेंट डा: मुश्ताक की माने तो ये बच्चे दूर दराज़ के इलाकों से नाज़ुक हालत में हस्पताल लाये गए थे.

गत वर्ष फरवरी माह में आंध्र के कुर्नूर हस्पताल से जब ४८ घंटे में ११ नवजात बच्चों की मृत्यु की खबर आई तो हमारे ‘जन्म-मृत्यु’ मंत्री जी ने बड़े इत्मीनान से फ़रमाया था ‘ चिंता की कोई बात नहीं’ ममता के अमार सोनार बांग्ला में नवजात शिशु मृत्यु दर बेलगाम बढती जा रही है … मालदा जिल्ला के अस्पताल में ३६ घंटे में ११ बच्चे मारे गए, कोलकता हस्पताल में १३, वर्दमान अस्पताल में ५ , मुर्शिदाबाद में ४८ घंटे में ९ बच्चे मारे गए. मुख्य चिकित्सा अधिकारी शाहजहाँ सिराज की माने तो अस्पताल में लाये गए बच्चे ग्रामीण क्लीनिकों से कुपोषण, कमवजन -दो दिन से ३ माह आयु के थे. मालदा हस्पताल में २० बेड हैं जब कि भर्ति १२० बच्चे किये जाते हैं. १ जनवरी से २७ जनवरी तक ११० शिशु अकाल मृत्यु के ग्रास बन गए.

मगर हमारे ‘जन्म मृत्यु’ मंत्री के लिए चिंता की कोई बात नहीं थी. किस किस की चिंता करें निरंतर बढती आबादी के समक्ष ‘आज़ाद’ साहेब’ की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएँ बौनी पड़ गई हैं. मगर वोट बैंक और तुष्टिकरण के मरीज़ ‘सेकुलर- शैतानों’ को कोई चिंता नहीं. पिछले साल केरल सरकार ने बढती आबादी पर अंकुश लगाने के लिए एक पेनल का गठन किया जिसके अध्यक्ष एक सेवा प्राप्त नयायाधीश को बनाया गया … पेनल के सुझावों पर अमल करते हुए केरल सरकार ने जब २ से अधिक बच्चे पैदा करने पर ३ माह कैद और दस हज़ार रूपए जुर्माने का कानून पास करने का फैसला किया तो प्रान्त के मौलवी और पादरियों ने विरोध किया और आज़ाद साहेब फ़ौरन केरला सरकार को धमकाने पहुँच गए ..और जनकल्याण के इस क़ानून को रोक दिया गया . केरल सरकार के इस क़ानून के पीछे मुख्य चिंता महिलाओं के स्वास्थ्य और कल्याण की थी. मध्ययुगीन मज़हबी सोच महिलाओं से अधिक से अधीन बच्चे पैदा करने की रही है . ज़ाहिर है इससे महिलाओं को महज़ बच्चे पैदा करने की मशीन मान लिया जाता है और निरंतर बच्चे पैदा करने से महिलायों को स्वास्थ्य और मानसिक-शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ती है…. एक मियां जी ने तो घोषणा ही कर दी कि छटा बच्चा पैदा करने वाले को वह दस हज़ार रूपए इनाम देंगे.

ज़ाहिर है जब एक हस्पताल में २० बिस्तरों पर १२० नवजात बच्चों से डाक्टर और सिमित सरकारी सुविधाएं जूझेंगीं तो सभी को तो फिर ‘अल्लाह-मियां’ ही बचाएँ !!!!!!! अब आज़ाद साहेब दिल्ली से श्रीनगर अपनी आँखों से स्थिति का जायजा लेने पहुँच रहे हैं. .. चिंतित भी हैं और शर्मसार भी ….. आज़ाद साहेब …देश में प्रति मिनट ५१ बच्चे पैदा होते हैं…चिंतित और शर्मसार होने से कुछ नहीं होने वाला …. जब तक चीन की तर्ज़ पर यहाँ भी प्रति मिनट ५१ की इस प्रति मिनट दर को उल्टा कर १५ नहीं कर दिया जाता.

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