लेखक परिचय

अमिताभ त्रिपाठी

अमिताभ त्रिपाठी

एक स्‍वतंत्र पत्रकार, जो देश, समाज व धर्म के लिए पूर्णत: समर्पित है।

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अमिताभ त्रिपाठी

अभी कुछ दिन पूर्व ही अपने दो सप्ताह के उत्तर प्रदेश के प्रवास से वापस आया । प्रवास के दौरान मैंने अनेक स्तर पर सामान्य जनता और भाजपा के सामान्य कार्यकर्ताओं से यह जानने का प्रयास किया कि उनकी दृष्टि में देश की राजनीतिक दशा कैसी है? मुझे तो यह जानकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि जनता राजनीतिक रूप से कितनी परिपक्व है लेकिन उन लोगों को अवश्य हो सकता है जो अब भी जनता को राजनीतिक रूप से अविवेकी ही मानते हैं और मानते हैं कि बडे संगठन या फिर तथाकथित बडे नेता की छद्म छवि से जनता प्रभावित हो जाती है। उत्तर प्रदेश में जहाँ कि अभी कुछ दिनों पूर्व ही चुनाव हुए हैं और भारी बहुमत से एक सरकार चुनकर आयी है वह तेजी से अपनी लोकप्रियता खोती जा रही है। भारी भरकम वादों और अपेक्षाओं के बोझ तले दब रही इस सरकार ने उत्तर प्रदेश में नयी राजनीतिक सम्भावनाओं के द्वार खोल दिये हैं।

यह जानकर अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि कुछ ही माह पूर्व जिस भाजपा को मुँह छिपाने की जगह नहीं मिल रही थी उसके बारे में उत्तर प्रदेश में लोग फिर से चर्चा करने लगे हैं। अब आगामी लोकसभा चुनावों के संदर्भ में बात होती है और फिलहाल कांग्रेस को एक चुकी हुई शक्ति मान लिया गया है। देश वर्तमान स्थिति के सन्दर्भ में मजबूत नेता और मजबूत एजेंडे की हनक के साथ जो भी राष्ट्रीय दल अपनी उपस्थिति अभी से जनता के मध्य दर्ज करा लेगा वही 2014 में बाजी मार ले जायेगा।

कांग्रेस की स्थिति को देखते हुए तो यह दूर दूर तक नहीं दिखता कि वह राहुल गाँधी को आगे कर चुनाव लडने जा रही है। कांग्रेस के साथ निकटता रखने वाले मेरे कुछ मित्रों का मानना है कि कांग्रेस धीरे धीरे कुछ दिनों के लिये विपक्ष में बैठने का मन बना रही है और राहुल गाँधी को लेकर उनकी तैयारी अगले लोकसभा के लिये तो नहीं होगी।

ऐसी स्थिति में दूसरी राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण भाजपा का यह दायित्व बनता है कि वह देश को बेहतर विकल्प दे। इस प्रक्रिया में जैसी सक्रियता और कुशलता उसे दिखानी चाहिये उससे वह कोसों दूर है। जिस प्रकार नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाये जाने को लेकर एक कदम आगे तो तीन कदम पीछे की नीति पार्टी अपना रही है वह घातक है । नरेंद्र मोदी को लेकर मूल रूप से दो प्रश्न उठते हैं कि इससे राजग एकजुट नहीं रह सकेगा और उनकी कार्यशैली को लेकर संगठन में आशंका है। ये दोनों ही प्रश्न बचकाने और प्रायोजित हैं। राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत बनाये रखने के लिये संगठन को अपने अनुसार दाँव पेंच के दायरे में बनाये रखना कौन सी नयी बात है। आज जिन अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में कसीदे काढे जा रहे हैं क्या उन्हें खुश रखने के लिये संगठन ने लोगों की बलि नहीं ली थी। पुरानी बात को कुरेदना उचित और प्रासंगिक भी नहीं है लेकिन कितने ही लोग अब भी अटल जी के साथ समन्वय स्थापित न कर पाने के कारण आजीवन वनवास भुगत रहे हैं। ऐसे में नरेंद्र मोदी की कार्यशैली को आधार बनाना केवल एक बहाना है। इसी प्रकार राजग के टूटने की आशंका भी निराधार है । राजग में आज यदि जनता दल यूनाइटेड को छोड दिया जाये तो शेष सभी घटक भाजपा के स्वाभाविक और विचारधारागत मित्र हैं और हमें नहीं भूलना चाहिये कि 1996 में जब पहली बार श्री अटल बिहारी वाजपेयी को सबसे बडे दल के रूप में सरकार बनाने के लिये आमन्त्रित किया गया था तो यही स्वाभाविक मित्र साथ थे लेकिन 1992 के बाबरी ध्वंस के आरोपी सदस्यों के साथ ही 1998 में राजग सदस्य 300 से भी अधिक हो गये। ऐसा क्यों हुआ ?क्योंकि भाजपा की अपनी शक्ति इतनी हो गयी कि उसके बिना सरकार बन पाना असम्भव था। आज पुनः वही स्थिति सामने है कि यदि भाजपा अपने बल पर 175 से अधिक का आँकडा छू लेती है तो घटक दलों में धर्मनिरपेक्षता के अनेक ठेकेदार पंक्तिबद्ध होकर समर्थनपत्र लेकर खडे नजर आयेंगे।

आज राजग के बिखराव की बात करके नरेंद्र मोदी का मार्ग अवरुद्ध करने का घटनाक्रम राजग सरकार के उन दिनों को याद दिलाता है कि जब श्री जार्ज फर्नांडीस को आगे कर तत्कालीन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री हिंदुत्व के किसी भी मुद्दे पर आगे बढने से इंकार कर देते थे कि इससे राजग बिखर जायेगा। आज वही स्थिति फिर से सामने है जब कुछ लोग अपनी निजी मह्त्वाकाँक्षा के चलते राजग के बिखराव की दूर की कौडी चल रहे हैं।

आज देश की जो स्थिति है उसने सर्वत्र निराशा का वातावरण खडा कर दिया है। आर्थिक स्थिति से लेकर विदेश नीति और विश्व में भारत की स्थिति पर बुरा असर पड रहा है। वर्तमान वैश्विक स्थिति को देखते हुए सदियों के बाद भारत के पास अपनी सभ्यतागत भूमिका का निर्वाह करने का अवसर प्राप्त हुआ है और यदि इस अवसर को हमने हाथ से जाने दिया तो पिछली अनेक पीढियों का बलिदान औत त्याग व्यर्थ हो जायेगा। यह बात कम से कम उन लोगों को तो समझनी ही चाहिये जिन्होंने भारतमाता को वैभवशाली बनाने के स्वप्न को लेकर ही अपनी अनेक पीढियाँ व्यतीत की हैं ।

यदि चुनावी ग़णित के हिसाब से भी देखें तो नरेंद्र मोदी को आगे करने से भाजपा को कोई क्षति नहीं होने वाली है। पिछले कुछ वर्षों के लोकसभा और विधानसभा चुनावों की परिपाटी को देखा जाये तो हर बार विश्लेषक यही आकलन लगाते हैं कि त्रिशंकु विधानसभा या लोकसभा होगी , छोटी पार्टियों का बोलबाला होगा आदि आदि पर हर बार परिणाम यही आता है कि जनता किसी न किसी दल को स्पष्ट बहुमत देती है। तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव परिणाम इसका प्रमाण हैं और इससे पूर्व 2009 में लोकसभा चुनावों में कांग्रेसको मिली अप्रत्याशित सफलता । शर्त केवल एक है कि जनता के पास एक चेहरा और एजेंडा होना चाहिये। भाजपा इन दोनों ही मोर्चों पर बुरी तरह असमंजस में घिरी दिखाई देती है और उसका कारण कहीं न कहीं संगठनों में समन्वय का अभाव और व्यक्तित्वों का टकराव है और इसका सबसे बडा कारण विचार के प्रति निष्ठा में आयी कमी है। समस्त विचार परिवार किसी एक तत्व के प्रति निष्ठावान नहीं रह गया है जिसके चलते सूक्ष्म से उठकर स्थूल पर अधिक ध्यान चला गया है।

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व में विचार परिवार विचार से अधिक प्रबंधन को लेकर चिंतित अधिक दिखता है यही कारण है कि भाजपा पर नियंत्रण स्थापित करने की ललक का आभास सामान्य जनमानस को जाने लगा है। यदि तत्व के प्रति निष्ठावान कार्यकर्ताओं की रचना जारी रहेगी तो भाजपा भी ठीक रहेगी अन्यथा शीर्ष पद पर कोई भी हो इसका अधिक लाभ नहीं होने वाला। संघ भले ही यह कहता हो कि भाजपा के आंतरिक मामलों में उसकी भूमिका नहीं है परंतु पिछले कुछ वर्षों में यह भूमिका अधिक बढी है जिसका दोहरा दुष्परिणाम हुआ है। संघ के कार्यकर्ता राजनीतिक प्रशिक्षण से नहीं आते इस कारण वे राजनीतिक रूप से उतने सफल नहीं हो पाते लेकिन अपनी सक्रियता से भाजपा को एक राजनीतिक ईकाई के रूप में क्षति पहुँचा जाते हैं।

संघ को देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए भाजपा को एक स्वतंत्र राजनीतिक दल के रूप में पैरों पर खडा होने का अभ्यास करने देना चाहिये तथा स्वयं को विचार के स्तर पर मार्गदर्शक की भूमिका में अधिक रखना चाहिये। भाजपा देश की वर्तमान स्थिति को सुधार सकती है यदि श्री अटल बिहारी वाजपेयी और श्री लालकृष्ण आडवाणी की तर्ज पर अब नरेंद्र मोदी और अरूण जेटली के मध्य शक्तियों का बँटवारा हो जाये क्योंकि यह साझेदारी अधिक लम्बी और टिकाऊ हो सकती है जो कि देश को नयी ऊर्जा भी दे सकती है।

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6 Comments on "क्यों हिचक रही है भाजपा?"

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dr dhanakar thakur
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मैं अपनी टिपण्णी ” सच्चा हिन्दू कट्टरवादी और साम्प्रदायिक नहीं होता ” पर दृढ हूँ पर उसे कायर, दबू, दोसरों की मार खानेवाला, आत्मविस्मृत समाज की तरह भी नहीं देखा जाना चाहिए और इसकी जैसी व्याख्या बंधुवर तिवारीजी ने की है उसमे और मेरी सोच में कुछ फर्क है यह सच है की हिंदुत्वा का वांग्मय काफी विशाल है पर जो लोग ‘ सीने पर हिंदुत्व का तमगा लगाए हुए हैं या सत्ता पाने का साधन बनाये हुए हैं’ उनमे भी अनेक भांति के लोग हैं. यदि कोई हिंदुत्व के कट्टरपन का विरोधी यह कहे की छत्रपति शिवाजी या महारण… Read more »
श्रीराम तिवारी
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डॉ धनाकर ठाकुर की टिपण्णी ” सच्चा हिन्दू कट्टरवादी और साम्प्रदायिक नहीं होता ” यही सच है और इस सचाई का विस्तार ये है कि सिर्फ वे ही लोग हिन्दू नहीं हैं जो सीने पर हिंदुत्व का तमगा लगाए हुए हैं या सत्ता पाने का साधन बनाये हुए हैं. हिन्दू तो वे भी हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी के लिए जन्म से लेकर मरण तक जूझना पड़ता है. हिन्दू वे भी हैं जो भाजपा और आर एस एस या तथाकथित संघ परिवार से कोसों दूर हैं. उन हिन्दुओं में जो कांग्रेस के साथ हैं मार्क्सवादियों के साथ हैं,क्षेत्रीय पार्टियों… Read more »
Anil Gupta
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वर्षों पूर्व १९८० में जनता पार्टी का प्रयोग लगभग असफल हो गया था, जनता पार्टी ‘दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर टूट चुकी थी. उस समय संघ के वरिष्ठ प्रचारक स्वर्गीय श्री कौशल किशोर जी पूर्व जनसंघ और विभाजित जनता पार्टी के जनसंघ घटक में संघ का चेहरा थे.जनता पार्टी में संघ के कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के बारे में जब आलोचना हुई तो स्व.कौशल जी ने वापस संघ में लौटने की इच्छा व्यक्त की और वापस संघ में लौ गए.एक पुराने वरिष्ट प्रचारक से, जो अनुशंघिक संगठन में कार्य कर रहे थे, इस विषय में पूछने पर उन्होंने बताया की संघ… Read more »
श्रीराम तिवारी
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त्रिपाठी जी के साहसपूर्ण आलेख की कद्र की जानी चाहिए वर्ना आज के इस महाबेइमानी पूर्ण राजनैतिक दौर में एक जिम्मेदार पार्टी का जिम्मेदार नेता अपनी अंदरूनी कलह को इस तरह उघाड़ने की हिमाकत नहीं कर सकता. उनका आशय भी गलत नहीं है’ कि’ हम जो अन्दर से हैं वही बाहर से भी दिखना चाहए’ इसी राह पर आगे बढ़ते रहोगे तो सत्ता भले ही न मिले किन्तु विचार धारा का झंडा तो कम से कम बुलंद रहेगा न! ‘शुभस्य शीघ्रम’

डॉ. मधुसूदन
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संघ की एक स्वयं सेवक से जो अपेक्षाएं होती है, उन अपेक्षाओं में और एक सफल राजनेता से जनता की जो अपेक्षाएं होती है उनमें बड़ा ही अंतर होने से —सफल भाजपा राजनेता संघकी अपेक्षाएं पूरी करेगा तो जनता की अपेक्षाओं में और चुनाव में मार खाएगा|
इसी विधान में हमारी असफलता का कारण छिपा है|
राजनेता को अपनी उपलब्धियों को चिल्ला चिल्ला कर बताना पड़ता है|
पर एक स्वयं सेवक अपनी उपलब्धियां गाएगा, तो अहंकारी समझा जाएगा|
बस यही बड़ा कारण है, हमारी असफलता का |

dr dhanakar thakur
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मैं असहमत हूँ की “शर्त केवल एक है कि जनता के पास एक चेहरा और एजेंडा होना चाहिये।” मुझे ऐसा लगता है की जनता बहुत नेताओं को छह सकती है पर जब एक के चुनने की बात हो तो उसे सबों को स्वीकारने में कोई विद्रूपता नहीं दिखनी चाहिए. रही बात नरेन्द्र मोदी की तो प्रथमतः वे बहुत छोटे प्रान्त से आते हैं दूसरा उनका आक्रामक हिन्दुत्ववादी चेहरा न तो संघ के मूल सिद्धांतों से मेल खाता है न ही उनकी कार्यशैली. उनको अखिल भारतीय स्टार के कार्य का अनुभव भी नहीं है . यदि ईमानदारी से काम किया जय… Read more »
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