लेखक परिचय

परमजीत कौर कलेर

परमजीत कौर कलेर

मैं प्रोडूयसर के तौर पर 4 रीयल न्यूज में काम कर रही हूं । फीचर लिखती हूं । प्रसार भारती दिल्ली के वूमेन सैक्शन के लिए भी लिखती हूं ।आकाशवाणी पटियाला में रिकार्ड हुए प्रोग्राम वेहड़ा शगना दा, तीआं तीज दीआं विभिन्न विषयों पर फीचर लिख सकती हूं। लिखने का है शौक पंजाब के मैगजीन समुदरों पार , चढ़दीकला पटियाला, पटियाला भास्कर, माईल स्टोन मैगजीन में प्रकाशित हुए हैं फीचर

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भाई – बहन के बचपन के वो दिन भी क्या होते है कभी भाई रूठ जाता है तो कभी बहना …कभी बहन भाई को मनाती है तो कभी भाई बहन को …इस मीठी और तीखी नोक झोंक में होता है अपना ही मजा…दोनों का एक दूसरे के बिना नहीं होता गुजारा …और फिर सारे गिले शिकवे मिटाकर खेलने लगते है…ये तो था भाई बहन के बचपन का प्यार…मगर ये प्यार हमेशा बरकरार रहता है इसमें कभी दूरियां नहीं आती …भाई तो अपनी बहन को हमेशा हंसते और खिलते देखना चाहता है …वहीं बहन भी चाहती है कि उसके भईया को सुख समृद्धि मिले और वे हमेशा खुशहाल जीवन जिए…यही नहीं बहन अपनी उम्र भी अपने भाई को लग जाने की आशीर्वाद मांगती है…त्यौहार भी इन रिश्तों को मजबूत और आत्मीयता प्रदान करते हैं …दीवाली के तीसरे दिन आता है भैया दूज…हिन्दुओं का ये प्रमुख त्यौहार है … ये कार्तिक शुक्ल पक्ष की व्दितीय तिथि को मनाया जाता है…भाई बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक है भैया दूज । जिसे हिन्दु समाज में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है ….इस दिन बहनें अपने भाई की लम्बी आयु और सुख समृद्धि की कामना करती है…तो वही भाई अपनी बहन को खुश रखने के लिए और शगुन के रूप में उन्हें उपहार देते है…

भाई – बहन का पवित्र रिश्ता जो जुड़ा है…आपसी स्नेह और विश्वास पर…भाई तो बहन के लिए हर गम झेलने के लिए तैयार रहता है…तो बहन भी अपने भाई के लिए भगवान से हर सुख आराम की दुआ तो मांगती ही है और साथ ही अपनी उम्र भी अपने भाई लग जाने की दुआ मांगती हैं…बहन भाई के इसी पवित्र रिश्ते का प्रतीक है भैया दूज…

बहन भाई को बीर कहकर की बुलाती है बीर का अर्थ है बहादुर…सूरमा…पहले जब युद्ध के दौरान बहनों के भाई युद्ध में जाते थे बहनें अपने भाईयों को तिलक लगाकर युद्ध के मैदान में भेजती थीं और अपनी उम्र भाई को लग जाने का आशीर्वाद देती थी…भाई को बहन की इज्जत का रखवाला यानि रक्षक माना जाता है…एक बहन के सात भाई थे सबसे छोटा भाई उसे बड़ा प्यार करता था…भैया दूज के दिन जब तक वो अपनी बहन से टीका नहीं लगवा लेता था …वो कुछ भी खाता पीता नहीं था…एक दिन उसकी पत्नी ने कहा कि अगर तुम्हारी बहन की शादी दूर हो गई तो तुम क्या करोंगे तो इस पर वो बोला कि वो अपनी बहन की शादी दूर करेगा ही नहीं…उसने अपने माता पिता से कहकर अपनी बहन की शादी नज़दीक के गांव में करा दी…मगर इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे उसे बहनोई जो मिला वो अपने ससुराल वालों को पसंद नहीं करता था ,यही नहीं उन्होंने अपनी पत्नी को कह रखा था कि तुम्हारे मायके वाले मेरे घर नहीं आ सकते… ये सोच सोच कर बेचारी का रो रो कर बुरा हाल हो गया…और अपने पति का संदेश मायके भेज दिया…अब भईया दूज का त्यौहार भी आ गया लेकिन भाई का मन नहीं माना…और वे नहा धोकर बहन के घर टीका लगाने बहन के ससुराल पहुंच गया…जैसे ही वो अपनी बहन के घर पहुंचा तो उसके बहनोई ने उसे सात तालों में बंद कर दिया और खुद काम करने चला गया। बहन का ये भाई वेश बदलना जानता था …वे कुत्ते का छोटा पिल्ला बनकर नाली के रास्ते अपनी बहन के पास पहुंचा…बहन रो रो कर हल्दी पीस रही थी और मन ही मन सोचती है कि वो हल्दी तो पीस रही है क्या वो अपने भईया को टीका लगा पाएंगी …तभी कुत्ते का पिल्ला पहुंचता है …बहन दुखी तो होती है गुस्से में आकर हल्दी से सने हाथ को कुत्ते को मार देती है …कुत्ते का पिल्ला अपने मुंह से सोने का सिक्का फेंक कर नाली के रास्ते चला जाता है…बहनोई आ कर ताला खोलता है तो देखता है कि भाई के माथे पर पांच टीके लगे होते हैं वो अपनी पत्नी को पूछता है कि तुमने अपने भाई को पांच टीके क्यों लगाए …वो हैरान हुई कहती है कि मैने तो अपने भाई को देखा तक नहीं…एक टीका तो दूर की बात और आप पांच टीके लगाने की बात कर रहे हो …हां, वो कुत्ते के पिल्ले वाली बात दुहराती है ये बात सुनकर बहनोई को भूल का अहसास हो जाता है…और उसने माफी मांगते हुए कहा कि मुझे दुख है कि मैं भाई -बहन के सच्चे प्यार में रूकावट बना…मगर सच्चा प्यार कभी नहीं टूटता…इस तरह भाई-बहन के दिन फिरे और वैसे ही सबके …प्राचीन कला से चली आ रही इस प्रथा को आज भी धूमधाम से मनाया जाता है ।

हिन्दु समाज मे मनाए जाने वाले इस त्यौहार को पूरे देश भर मे अपने अपने अंदाज में मनाया जाता है पंजाब में भैया दूज को टीका भाई दूज और यम व्दितीया के नाम से भी जाना जाता है …शास्त्रों के अनुसार तो भैयादूज को यम व्दितीया कहा जाता है ..यम व्दितीया को मृत्यु के देवता की पूजा की जाती है …इस दिन बहनें अपने भाईयों को अपने घर में बुलाती हैं और भोजन कराती हैं …ब्रज में तो बहनें यमुना में स्नान करती हैं जिसका बड़ा महत्व है …भाई की खुशहाली , कल्याण और वृद्धि के लिए बहनें मांगलिक विधान भी करती है…यमुना तट पर तो भाई -बहन का इक्ट्ठे भोजन करना कल्याणकारी माना गया है। पौराणिक कथा के अनुसार तो इस दिन यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने जाते हैं…इसी प्राचीन कथा के अनुसार भाई अपनी बहनों से मिलते हैं और बहनें अपने भाई की सम्मान पूर्वक पूजा करती हैं …ये त्यौहार बहन भाई के आपसी सद्भावना और प्रेम का पर्व है जो एक दूसरे से निष्कपट प्रेम का प्रतीक है । एक बार कार्तिक शुक्ल की व्दितीय को यमराज अपनी बहन यमुना के घर में अचानक जाते है तो बहन अपने भाई का बड़ा आदर सत्कार करती है …तरह तरह के पकवान बनाकर खिलाती है और साथ माथे पर तिलक लगाती है जिससे यमराज अपनी बहन से बहुत खुश होते हैं उन्होंने यमुना को भेंट तो देते ही हैं साथ ही वो यमुना से मन वांछित वर मांगने को कहते हैं …मनवाछित फल की बात सुनकर यमुना ने कहा भैया अगर आप मुझे कुछ देना चाहते है तो …आज के दिन हर वर्ष आप मेरे पास आया करोगे । यमुना की प्रार्थना यमराज ने स्वीकार कर लीतभी से बहन भाई का ये त्यौहार मनाया जाता आ रहा है।

पूरे भारतवर्ष में मनाए जाने वाले इस त्यौहार को अलग-2 नामों से जाना जाता है …इसे भाई कोटा, भाई बीज , टीका भाईदूज और भाऊबीज के नाम से जाना जाता है …पूजा की थाली में सुपारी , फल , रोली, धूप , मिठाईयां रखकर इस में दीप जलाती हैं …इस दिन यमव्दितीया की कथा भी सुनी जाती है…यमुना अपने प्रिय भाई को बार बार अपने घर आने का सन्देश भेजती है मगर हर बार निराशा पाती है आखिर में यमुना का एक अनुरोध सफल होता है…और यमराज अपनी बहन के घर जा पहुंचते हैं अपने भाई को अपने व्दार पर देखकर यमुना की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता…उसने अपनी बहन का बड़ा आदर सत्कार किया…अपने भाई को टीका लगाया और अपने हाथों से बना हुआ भोजन खिलाया …यमुना भाई के आने से सब कुछ पा चुकी थी…।भाई का मुंह मीठा कराने के लिए माखन मिश्री खिलाती हैं…संध्या के समय बहनें यमराज के नाम से चौमुख दीया जलाकर घर से बाहर रखती हैं…अगर इस समय आसमान में चील उड़ती दिख जाए तो बड़ा ही शुभ माना जाता है…और ऐसा माना जाता है कि बहनें भाई की आयु के लिए दुआ मांग रही हैं उसे यमराज ने कुबूल कर लिया है ।

भैया दूज वाले दिन चाहे बहन ससुराल में ही क्यों न हो…भाई अपनी बहन से तिलक लगवाने पहुंचता है …वो अपने रास्ते में आने वाली मुसीबतों की भी कोई परवाह नहीं करता …बहन के टीका की कथा में निर्धन भैया दूज के लिए बहन के घर जाता है … रास्ते में उसे भले ही शेर , नदी , पर्वत रोकते हैं कि तुम्हारी मां ने तुम्हारे जन्म की कामना कर चढ़ावा चढ़ाने की मन्नत मांगी थी उसे वो आज तक पूरा नहीं कर सकी…ये सभी उसकी बलि की मांग करते हैं … ये निर्धन युवक इन रास्तों में आने वाली मुसीबतों से घबराता नही वो इन सभी से गुजारिश करता है कि वो अपनी बहन से टीका लगवा कर आ जाए तो वो बेशक उसकी बलि ले लें ।भाई इन मुसीबतों से दो चार होकर जब अपनी बहन के पास पहुंचता है तो बहन की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता…बहन ने अपने भाई का स्वागत बड़ी तनदेही से किया और तिलक लगाकर …भाई को भोजन खिलाया और साथ ही यम देवता से अपने भाई लम्बी आयु की कामना के लिए वरदान मांगा…भाई जब वापिस जाने लगता है तो भाई के रास्ते में नदी, पहाड़ तो आते है मगर कोई भी उसके लिए रूकावट नही बनते …क्यों कि उसकी बहन इन सभी की पूजा कर इन्हे सन्तुष्ट कर देती है ।

भैया दूज का ये पर्व बहन का भाई के प्रति त्याग का प्रतीक है …तो भाई भी अपनी बहन के लिए हर दुख सहन तो करता है और उसकी रक्षा करने के लिए हमेशा तैयार रहता है । सभी बहन भाई इसी तरह खुश रहें और उनके प्यार में ये मिठास हमेशा बरकरार रहे … और वो इसी तरह मिल जुल कर प्यार के ये पर्व मनाते रहें …हमारी खास पेशकश में इतना ही हमें दीजिए इजाजत …नमस्कार ।

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