ऋषि दयानन्द जी का संन्यासियों को उनके कर्तव्यबोध विषयक उपदेश

Posted On by & filed under धर्म-अध्यात्म

जो वेदान्त अर्थात् परमेश्वर प्रतिपादक वेदमन्त्रों के अर्थज्ञान और आचार में अच्छे प्रकार निश्चित संन्यासयोग से शुद्धान्तःकरणयुक्त संन्यासी होते हैं, वे परमेश्वर में मुक्ति सुख को प्राप्त होके भोग के पश्चात्, जब मुक्ति में सुख की अवधि पूरी हो जाती है, तब वहां से छूट कर संसार में आते हैं। मुक्ति के बिना दुःख का नाश नहीं होता। जो देहधारी हैं वह सुख दुःख की प्राप्ति से पृथक् कभी नहीं रह सकता और जो शरीररहित जीवात्मा मुक्ति में सर्वव्यापक परमेश्वर के साथ शुद्ध होकर रहता है, तब उसको सांसारिक सुख दुःख प्राप्त नहीं होता। इसलिए लोक में प्रतिष्ठा वा लाभ, धन से भोग वा मान्य तथा पुत्रादि के मोह से अलग होके संन्यासी लोग भिक्षुक होकर रात दिन मोक्ष के साधनों में तत्पर रहते हैं। प्रजापति अर्थात् परमेश्वर की प्राप्ति के अर्थ इष्टि अर्थात् यज्ञ करके उसमें यज्ञोपवीत शिक्षादि चिन्हों को छोड़ आह्वनीयादि पांच अग्नियों को प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान इन पांच प्राणों में आरोपण करके ब्राह्मण ब्रह्मवित् घर से निकल कर संन्यासी हो जावे। जो सब भूत प्राणिमात्र को अभयदान देकर धर्मादि विद्याओं का उपदेश करने वाला संन्यासी होता है उसे प्रकाशमय अर्थात् मुक्ति का आनन्दस्वरूप लोक प्राप्त होता है।

एक नये अध्याय की शुरुआत

Posted On by & filed under धर्म-अध्यात्म

मुनि श्री ऋषभ के आचार्य पदारोहण दिवस ( 7 मई, 2017 )पर विशेष – ललित गर्ग – भारत अपनी अध्यात्म प्रधान संस्कृति से विश्रुत था किन्तु आज उसने ‘जगद्गुरु’ होने की पहचान खो दी है। खोयी हुई पहचान को पुनः प्राप्त करने एवं अध्यात्म केे तेजस्वी स्वरूप को पाने के लिये अनेक संत-मनीषी अपनी साधना,… Read more »

माता बगलामुखी जयंती

Posted On by & filed under कला-संस्कृति, धर्म-अध्यात्म

आज माता बगलामुखी व्रत 3 मई 2017 को है। बगला शब्द संस्कृत भाषा के वल्गा का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है दुलहन है अत: मां के अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण ही इन्हें यह नाम प्राप्त है। देवी बगलामुखी तंत्र की देवी है. तंत्र साधना में सिद्धि प्राप्त करने के लिए पहले… Read more »

पूजनीय प्रभो हमारे……भाग-11

Posted On by & filed under धर्म-अध्यात्म

 राकेश कुमार आर्य  छोड़ देवें छल-कपट को मानसिक बल दीजिए गतांक से आगे…. वास्तव में जब हम व्यक्ति को मानसिक बल की प्रार्थना में लीन पाते हैं या स्वयं ईश्वर से अपने लिए मानसिक बल मांगते हैं तो इसका अभिप्राय होता है दृढ़ इच्छाशक्ति की प्रार्थना करना या विचारशक्ति को प्रबल करने की ईश्वर… Read more »

शिव अवतार में महायोगी गोरखनाथ

Posted On by & filed under कला-संस्कृति, धर्म-अध्यात्म

गुरु गोरखनाथ जी ने पूरे भारत का भ्रमण किया और अनेकों ग्रन्थों की रचना की। गोरखनाथ जी का मन्दिर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर नगर मे स्थित है। गोरखनाथ के नाम पर इस जिले का नाम गोरखपुर पड़ा है। गुरु गोरखनाथ जी के नाम से ही नेपाल के गोरखाओं ने नाम पाया। नेपाल में एक जिला है गोरखा, का नाम गोरखा भी इन्हीं के नाम से पड़ा। माना जाता है कि गुरु गोरखनाथ सबसे पहले यही दिखे थें। गोरखा जिला में एक गुफा है जहाँ गोरखनाथ का पग चिन्ह है और उनकी एक मूर्ति भी है। यहाँ हर साल वैशाख पूर्णिमा को एक उत्सव मनाया जाता है जिसे रोट महोत्सव कहते है और यहाँ मेला भी लगता है।

ईश्वर-जीवात्मा का परस्पर संबंध और ईश्वर के प्रति मनुष्य का कर्तव्य

Posted On by & filed under धर्म-अध्यात्म

मनुष्य को शुभ कर्म करने के लिए शिक्षा व ज्ञान चाहिये। यह उसे ईश्वर ने प्रदान किया हुआ है। वह ज्ञान वेद है जो सृष्टि के आदि में दिया गया था। इस ज्ञान का प्रचार व प्रसार एवं रक्षा सृष्टि की आदि से सभी ऋषि मुनि व सच्चे ब्राह्मण करते आये हैं। आज भी हमारे कर्तव्याकर्तव्य का द्योतक वा मार्गदर्शक वेद व वैदिक साहित्य ही है। मनुष्य व अन्य प्राणधारी जो भोजन आदि करते हैं वह सब भी सृष्टि में ईश्वर द्वारा प्रदान करायें गये हैं। इसी प्रकार अन्य सभी पदार्थों पर विचार कर भी निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। इससे ज्ञात होता है कि सभी मनुष्य व प्राणी ईश्वर के ऋणी हैं। जीव ईश्वर का ऋण चुकायंे, इसका ईश्वर से कोई आदेश नहीं है। इतना अवश्य है कि प्रत्येक मनुष्य सच्चा मनुष्य बने। वह ईश्वर भक्त हो, देश भक्त, मातृ-पितृ भक्त हो, गुरु व आचार्य भक्त हो, ज्ञान अर्जित कर शुभ कर्म करने वाला हो, शाकाहारी हो, सभी प्राणियों से प्रेम करने वाला व उनका रक्षक हो आदि। ईश्वर सभी मनुष्यों को ऐसा ही देखना चाहता है। यह वेदों में मनुष्यों के लिए ईश्वर प्रदत्त शिक्षा है। यदि मनुष्य ऐसा नहीं करेगा तो वह उसका अशुभ कर्म होने के कारण ईश्वरीय व्यवस्था से दण्डनीय हो सकता है।

श्रेय मार्ग में प्रवृत्ति व प्रेय मार्ग में निवृत्ति ही मनुष्य का कर्तव्य

Posted On by & filed under धर्म-अध्यात्म

बहुत कम लोगों की प्रवृत्ति श्रेय मार्ग में होती है जबकि प्रेय व सांसारिक मार्ग, धन व सम्पत्ति प्रधान जीवन में सभी मनुष्यों की प्रवृत्ति होती है। जहां प्रवृत्ति होनी चाहिये वहां नहीं है ओर जहा नहीं होनी चाहिये, वहां प्रवृत्ति होती है। यही मनुष्य जीवन में दुःख का प्रमुख कारण है। श्रेय मार्ग ईश्वर की प्राप्ति सहित जीवात्मा को शुद्ध व पवित्र बनाने व उसे सदैव वैसा ही रखने को कहते हैं। जीवात्मा शुद्ध और पवित्र कैसे बनता है और ईश्वर को कैसे प्राप्त किया जाता है इसके लिए सरल भाषा में पढ़ना हो तो सत्यार्थ प्रकाश को पढ़कर जाना जा सकता है। योग दर्शन को या इसके विद्वानों द्वारा किये गये सरल सुबोध भाष्यों को भी पढ़कर जीवात्मा की उन्नति के साधनों को जाना व समझा जा सकता है।

स्वामी शंकराचार्य जी के महान कार्य

Posted On by & filed under धर्म-अध्यात्म

आदि शंकराचार्य जी का जन्म केरल प्रदेश के कलाडी गांव में आज से लगभग 2526 वर्ष पूर्व सन् 509 (बीसीई) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। अल्पायु में ही आपके पिता का देहान्त हो गया था। आपका पालन पोषण आपकी माता जी ने किया। हमें लगता है कि उन दिनों ब्राह्मणों का एकमात्र कार्य वेद आदि शास्त्रों का अध्ययन करना ही होता था। गुरु से अध्ययन करते हुए संवाद, वार्तालाप व विवेच्य विषयों पर परस्पर व दूसरों से शास्त्रार्थ हुआ करते थे। इससे बौद्धिक योग्यता बढ़ने के कारण सत्य के ज्ञान वा निर्णय में सहायता मिलती थी। स्वामी शंकराचार्य जी की मृत्यु 32 वर्ष की आयु में सन् 477 (बीसीई) में हुई। तीव्र बुद्धि के धनी स्वामी शंकराचार्य जी ने अपना शास्त्रीय अध्ययन अल्प समय में ही पूरा कर लिया था। स्वामी जी के समय देश में बौद्धमत व जैनमत का विशेष प्रभाव था। इन मतों व इनके आचार्यों ने वैदिक धर्म का त्याग कर दिया था।

मनुष्य जीवन का उद्देश्य

Posted On by & filed under धर्म-अध्यात्म

क्या मनुष्य जीवन का उद्देश्य आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर धनोपार्जन कर सुख व सुविधाओं से युक्त जीवन जीना मात्र ही है?’ –मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून। आज का हमारा उपर्युक्त विषय पाठकों को कुछ अटपटा सा लग सकता है। हमें लगता है कि यह विषय विचारणीय है और आज देश व संसार में जो आपाधापी मची… Read more »

वेद ज्ञान का अप्रचार और लोगों की उसके प्रति अनभिज्ञता

Posted On by & filed under धर्म-अध्यात्म

मत-मतान्तरों की उत्पत्ति का प्रमुख कारण वेद ज्ञान का अप्रचार और लोगों की उसके प्रति अनभिज्ञता मनमोहन कुमार आर्य संसार के सभी देशों के लोग किसी न किसी मत, पन्थ व सम्प्रदाय को मानते हैं। अंग्रेजी में इन्हें religion कहते हैं। धर्म संस्कृत का शब्द है जो केवल वैदिक मान्यताओं व सिद्धान्तों तथा उसके पालन… Read more »