परम पिता परमेश्वर की मुख्य शक्तियाँ

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डा. राधेश्याम द्विवेदी हम बचपन से भगवान और देव-देवियों की प्रार्थना करते आ रहे हैं, उनकी भक्ति करते आ रहे हैं और इसी तरह अलग-अलग तरीके से भगवान एवं धर्म से जुड़े हुए हैं। जब हम इस विशाल ब्रह्मांड को देखते हैं तब एक अद्भुत शक्ति का अनुभव करते हैं जो सभी को संतुलित रखती… Read more »

ईश्वर का अस्तित्व आदि व अन्त से रहित है’

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मनमोहन कुमार आर्य हम संसार में देखते हैं कि प्रत्येक पदार्थ का आदि अर्थात् आरम्भ होता है और कुछ व अधिक काल बाद उसका अन्त वा समाप्ति हो जाती है। आदि शब्द जन्म के लिए भी प्रयुक्त होता है और अन्त शब्द को मृत्यु के रुप में भी जाना जाता है। विश्व का अधिकांश भाग… Read more »

ईश्वर, समाज में अन्याय व नास्तिकता

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मनमोहन कुमार आर्य ईश्वर किसे कहते हैं? एक दशर्नकार ने इसका उत्तर दिया है कि जिससे यह सृष्टि बनी है, जो इसका पालन करता है तथा जो इस सृष्टि की अवधि पूरी होने पर प्रलय करता है, उसे ईश्वर कहते हैं। इस उत्तर के अनुसार ब्रह्माण्ड में एक सच्चिदानन्दस्वरुप, सर्वव्यापक, निराकार, सर्वज्ञ ईश्वर नामी चेतन… Read more »

ऋषि दयानन्द के दो मुख्य मन्तव्य और उनके अनुसार मनुष्य का कर्तव्य

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मनमोहन कुमार आर्य ऋषि दयानन्द ने अपने विश्व विख्यात ग्रन्थ ‘सत्यार्थप्रकाश’ के अन्त में ‘स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश’ के अन्तर्गत अपने निजी मन्तव्यों का प्रकाश किया है। अपना निजी मन्तव्य बताते हुए वह लिखते हैं कि ‘मैं अपना मन्तव्य उसी को जानता हूं कि जो तीन काल में सबको एक सा मानने योग्य है। मेरा कोई नवीन… Read more »

 ‘जाने चले जाते हैं कहां दुनियां से जाने वाले’ का वैदिक समाधान

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जाने चले जाते हैं कहां? दुनियां से जाने वाले’ प्रश्न का उत्तर केवल वैदिक साहित्य में ही सुलभ होता है। ऐसा ही एक प्रश्न यह भी हो सकता है ‘जाने चले आते हैं कहांसे दुनियां में आने वाले।’ इन दो प्रश्नों में से एक प्रश्न का उत्तर मिल जाये तो दूसरे का उत्तर स्वतः मिल जायेगा।

सभी मनुष्यों के करणीय पाचं सार्वभौमिक कर्तव्य

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मनुष्य का जन्म माता-पिता व सृष्टिकर्ता ईश्वर के द्वारा होता है। ईश्वर द्वारा ही सृष्टि की रचना सहित माता-पिता व सन्तान का जन्म दिये जाने से ईश्वर प्रथम स्थान पर व माता-पिता उसके बाद आते हैं। आचार्य बालक व मनुष्य को संस्कारित कर विद्या व ज्ञान से आलोकित करते हैं। अतः अपने आचार्यों के प्रति भी मनुष्यों का कर्तव्य है कि वह अपने सभी आचार्यों के प्रति श्रद्धा का भाव रखंे और उनकी अधिक से अधिक सेवा व सहायता करें।

ऋषि दयानन्द के जीवन के अन्तिम प्रेरक शिक्षाप्रद क्षण

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स्वामी दयानन्द जी का जीवन आदर्श मनुष्य, महापुरुष व महात्मा का जीवन था। उन्होने अपने पुरुषार्थ से ऋषित्व प्राप्त किया और अपने अनुयायियों के ऋषित्व प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया। एक ऋषि का जीवन कैसा होता है और ऋषि की मृत्यु किस प्रकार होती है, ऋषि दयानन्द का जीवनचरित उसका प्रमाणिक दस्तावेज हैं जिसका अध्ययन व मनन कर सभी अपने जीवन व मृत्यु का तदनुकूल वरण व अनुकरण कर सकते हैं। हम आशा करते हैं कि पूर्व अध्ययन किये हुए ऋषि भक्तों को इसे पढ़कर मृत्यु वरण के संस्कार प्राप्त होंगे। इसी के साथ यह चर्चा समाप्त करते हैं। ओ३म् शम्।

स्वास्तिक शास्वत और विश्वव्यापी सनातन प्रतीक

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अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्न अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। ‘सु’ का अर्थ अच्छा, ‘अस’ का अर्थ ‘सत्ता’ या ‘अस्तित्व’ और ‘क’ का अर्थ ‘कर्त्ता’ या करने वाले से है। इस प्रकार ‘स्वस्तिक’ शब्द का अर्थ हुआ ‘अच्छा’ या ‘मंगल’ करने वाला। ‘अमरकोश’ में भी ‘स्वस्तिक’ का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं – ‘स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध’ अर्थात् ‘सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।’

आपके लिए सोना धारण करना/पहनना कितना लाभकारी या नुकसानकारी होगा

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आइये आज सबसे पहले हम जानते है की सोना पहनना कितना शुभ है । वे जातक जिन्हें विवाह के अनेक वर्षों पश्चात् भी यदि संतान नहीं हो रही है तो उसे अनामिका ऊंगली में सोने की अंगूठी पहनने से लाभ होता है। एकाग्रता बढ़ाने के लिए तर्जनी यानि इंडैक्‍स फिंगर में सोने की अंगूठी पहनने… Read more »

मंगलिक कार्य आरम्भ होने का दिन है ‘‘देवोत्थान एकादशी’’

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प्रबोधिनी एकादशी अथवा देवोत्थान एकादशी के दिन भीष्म पंचक व्रत भी शुरू होता है, जो कि देवोत्थान एकादशी से शुरू होकर पांचवें दिन पूर्णिमा तक चलता है। इसलिए इसे इसे भीष्म पंचक कहा जाता है। कार्तिक स्नान करने वाली स्त्रियाँ या पुरूष बिना आहार के रहकर यह व्रत पूरे विधि विधान से करते हैं। इस व्रत के पीछे मान्यता है कि युधिष्ठर के कहने पर भीष्म पितामह ने पाँच दिनो तक (देवोत्थान एकादशी से लेकर पांचवें दिन पूर्णिमा तक) राज धर्म, वर्णधर्म मोक्षधर्म आदि पर उपदेश दिया था।