सत्यार्थप्रकाश आदि समस्त ग्रन्थ मनुष्यों को सद्ज्ञान देकर उन्हें ईश्वर का सच्चा भक्त बनाकर मोक्षगामी बनाते हैं

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ऋषि दयानन्द रचित सत्यार्थप्रकाश आदि समस्त ग्रन्थ मनुष्यों को सद्ज्ञान देकर उन्हें ईश्वर का सच्चा भक्त बनाकर मोक्षगामी बनाते हैं मनमोहन कुमार आर्य ऋषि दयानन्द (1825-1883) सच्चे ऋषि, योगी, वेदों के पारदर्शी विद्वान, ईश्वर भक्त, वेद भक्त, देश भक्त, सच्चे व सुपात्र समाज सुधारक, वेदोद्धारक, वैदिक धर्म व संस्कृति के अपूर्व प्रचारक आदि अनेकानेक गुणों… Read more »

आर्यसमाज अन्य सभी से भिन्न विद्या प्रधान सर्वोत्तम धार्मिक व सामाजिक संस्था है

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मनमोहन कुमार आर्य आर्यसमाज विद्या प्रधान एक धार्मिक एवं सामाजिक संगठन है। यह ऐसी संस्था है जो कि किसी भी विषय की उपेक्षा नहीं करती और सत्य ज्ञान को ही महत्व देती है। इसकी यह भी विशेषता है कि यह सत्य व असत्य के निर्णयार्थ ज्ञान व विज्ञान सहित चिन्तन, मनन व विचार एवं ध्यान… Read more »

श्रावण महीना 2017 की शुरुआत सोमवार से होगी….

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इस वर्ष 10 जुलाई 2017 से श्रावण मास शुरू हो रहा है. इस मौके पर मध्य प्रदेश के उज्जैन में बने ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर के दर्शन करने के लिए लाखों की संख्या में यहां श्रद्धालु आते हैं | मध्यप्रदेश में उज्जैन के प्रसिद्घ ज्योतिर्लिंग महाकाल में 16 जुलाई से श्रावण महोत्सव मनाया जाएगा. श्रावण महोत्सव 16, 23, 30 जुलाई और 6, 13, 20 अगस्त को आयोजित होगा.

जानिए इस वर्ष 2017 के सावन महीना में शिव की पूजा कैसे करें…

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—  शिवलिंग पर सिन्दूर , हल्दी , लाल रंग के फूल , केतकी और केवड़े के फूल आदि या स्त्री सौंदर्य से सम्बंधित सामान ना चढ़ाएँ। क्योंकि
शिवलिंग पुरुषत्व का प्रतीक है। जलधारी पर ये चढ़ाये जा सकते है क्योकि जलधारी माता पार्वती और स्त्रीत्व का प्रतीक होती है।
—  शिव लिंग की पूरी परिक्रमा नहीं की जाती है। आधी परिक्रमा ही लगाएं।

ऋषि दयानन्द ने संसार को ईश्वर के सच्चे स्वरूप और उसकी उपासना से परिचित कराया

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  मनमोहन कुमार आर्य हम मनुष्य हैं और हमारा यह मनुष्य जन्म ईश्वर के नियमों के अनुसार प्रारब्ध के कर्मों के भोग व नये कर्मों को करके विवेक प्राप्ति व जीवन उन्नति के लिए हुआ है। मनुष्य का आत्मा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, ज्ञानादि गुणयुक्त, अल्पज्ञ और नित्य है। आत्मा अनादि, नित्य, अजर, अमर, एकदेशी,… Read more »

आज का मनुष्य अपने जन्मदाता और स्वयं के ज्ञान से अनभिज्ञ

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-मनमोहन कुमार आर्य क्या हम अपने आप और अपने जन्मदाता को जानते हैं। हमें लगता है कि संसार के 99 प्रतिशत लोग न तो अपने आप को जानते हैं न अपने जन्म दाता को ही जानते हैं। इस न जानने का मुख्य कारण अविद्या है। विद्या उसे कहते हैं कि जिससे पदार्थों का यथार्थ ज्ञान… Read more »

मेरा धर्मग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश

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  मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसे किसी भाषा का ज्ञान नहीं होता है, अन्य विषयों के ज्ञान होने का तो प्रश्न ही नही होता। सबसे पहले वह अपनी माता से उसकी भाषा, मातृभाषा, को सीखता है जिसे आरम्भिक जीवन के दो से पांच वर्ष तो नयूनतम लग ही जाते हैं। इसके बाद वह भाषा ज्ञान को व्याकरण की सहायता से जानकर उस पर धीरे धीरे अधिकार करना आरम्भ करता है। भाषा सीख लेने पर वह व्यक्ति उस भाषा की किसी भी पुस्तक को जानकर उसका अध्ययन कर सकता है। संसार में मिथ्या ज्ञान व सद्ज्ञान दोनों प्रकार के ग्रन्थ विद्यमान हैं। मिथ्या ज्ञान की पुस्तकें, भले ही वह धार्मिक हां या अन्य, उसे असत्य व जीवन के लक्ष्य से दूर कर अशुभ कर्म वा पाप की ओर ले जाती हैं।

इंसानियत का पैगाम देता एक निराला संत : आचार्य श्रीमद् नित्यानन्द सूरीजी

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आचार्य नित्यानंद सूरीश्वरजी ने वर्ष 2013 का चातुर्मास जम्मू में किया। जम्मू कश्मीर की असामन्य स्थितियों एवं हिंसा की परिस्थितियों में इस चातुर्मास के द्वारा शांति, अहिंसा एवं साम्प्रदायिक सौहार्द का अपूर्व वातावरण निर्मित हुआ। इसी चातुर्मास के दौरान अमरनाथ यात्रा को लेकर संकट की स्थितियां खड़ी हुई एवं यात्रा को बाधित होना पड़ा। इन स्थितियों में आचार्यजी के प्रयासों से यात्रा भी प्रारंभ हुई एवं शांति का वातावरण भी निर्मित हुआ। जम्मू कश्मीर सरकार ने उनके इस उल्लेखनीय भूमिका के लिए उन्हें समारोहपूर्वक प्रांतीय सरकार का महात्मा गांधी शांति पुरस्कार प्रदत्त किया गया।

 आत्म-विशुद्धि एवं कृत-कर्माें की समीक्षा का पर्व

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वर्तमान रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है, उनमें विष्णु, वराह, कूर्म, नृसिंह, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण, वामन, बुद्ध, कल्की हैं। जगन्नाथ मंदिर की पूजा, आचार-व्यवहार, रीति-नीति और व्यवस्थाओं नेे शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन धर्मावलम्बियों को भी प्रभावित किया है। रथ का रूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है। वह चलते समय शब्द करता है। उसमें धूप और अगरबत्ती की सुगंध होती है।

ऋषि दयानन्द जीवन के प्रमुख महान कार्य

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ऋषि दयानन्द का पहला प्रमुख कार्य तो उनका गुरु विरजानन्द जी से आर्ष शिक्षा को प्राप्त करना था जिससे वह वेदों के यथार्थ स्वरूप सहित वेद मन्त्रों के यथार्थ अर्थ जान सके। यदि यह न हुआ होता तो फिर ऋषि दयानन्द, दयानन्द व स्वामी दयानन्द ही रहते जैसे कि आज अनेकानेक साधु संन्यासी व विद्वान हैं। कोई उनको जानता भी न। गुरु विरजानन्द जी की शिक्षा ने उन्हें संसार के सभी विद्वानों से अलग किया जिसका कारण उनकी प्रत्येक मान्यता का आधार वेद सहित सत्य व तर्क पर आधारित होने के साथ उनका सृष्टि क्रम के अनुकूल होना भी है।