आपके लिए सोना धारण करना/पहनना कितना लाभकारी या नुकसानकारी होगा

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आइये आज सबसे पहले हम जानते है की सोना पहनना कितना शुभ है । वे जातक जिन्हें विवाह के अनेक वर्षों पश्चात् भी यदि संतान नहीं हो रही है तो उसे अनामिका ऊंगली में सोने की अंगूठी पहनने से लाभ होता है। एकाग्रता बढ़ाने के लिए तर्जनी यानि इंडैक्‍स फिंगर में सोने की अंगूठी पहनने… Read more »

मंगलिक कार्य आरम्भ होने का दिन है ‘‘देवोत्थान एकादशी’’

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प्रबोधिनी एकादशी अथवा देवोत्थान एकादशी के दिन भीष्म पंचक व्रत भी शुरू होता है, जो कि देवोत्थान एकादशी से शुरू होकर पांचवें दिन पूर्णिमा तक चलता है। इसलिए इसे इसे भीष्म पंचक कहा जाता है। कार्तिक स्नान करने वाली स्त्रियाँ या पुरूष बिना आहार के रहकर यह व्रत पूरे विधि विधान से करते हैं। इस व्रत के पीछे मान्यता है कि युधिष्ठर के कहने पर भीष्म पितामह ने पाँच दिनो तक (देवोत्थान एकादशी से लेकर पांचवें दिन पूर्णिमा तक) राज धर्म, वर्णधर्म मोक्षधर्म आदि पर उपदेश दिया था।

गुरुनानक देव : भारतीय धर्म और संस्कृति के पुरोधा

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गुरुनानकजी का धर्म जड़ नहीं, सतत जागृति और चैतन्य की अभिक्रिया है। जागृत चेतना का निर्मल प्रवाह है। उनकी शिक्षाएं एवं धार्मिक उपदेश अनंत ऊर्जा के स्रोत हैं। शोषण, अन्याय, अलगाव और संवेदनशून्यता पर टिकी आज की समाज व्यवस्था को बदलने वाला शक्तिस्रोत वही है। धर्म के धनात्मक एवं गतिशील तत्व ही सभी धर्म क्रांतियों के नाभि केन्द्र रहे हैं। वे ही व्यक्ति और समाज के समन्वित विकास की रीढ़ है।

छठ पर्व इतिहास और महत्व

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छठ त्यौहार का धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी बहुत महत्व माना गया है। षष्ठी तिथि (छठ) एक विशेष खगौलीय अवसर होता है। इस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं। उसके संभावित कुप्रभावों से रक्षा करने का सामर्थ्य इस परंपरा में रहा है। छठ व्रत नियम तथा निष्ठा से किया जाता है।भक्ति-भाव से किए गए इस व्रत द्वारा नि:संतान को संतान सुख प्राप्त होता है।

आर्यसमाज के प्रति आकर्षित करने का अभिनव सफल प्रयोग

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स्वामी श्रद्धानन्द जी का जालन्धर की सडको पर भजन गाकर लोगों को आर्यसमाज के प्रति आकर्षित करने का अभिनव सफल प्रयोग मनमोहन कुमार आर्य यह प्रेरणादायक घटना हम स्वामी श्रद्धानन्द जी की आत्म कथा ‘कल्याण मार्ग का पथिक’ से दे रहे हैं जिसे वयोवृद्ध मूर्धन्य आर्य विद्वान डा. भवानीलाल भारतीय जी ने ‘बिखरे मोती’ नाम… Read more »

कुमारिल आचार्य द्वारा नास्तिक मतों के खण्डनार्थ स्वामी शंकाराचार्य जी के लिए सड़क बाधंना

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जो कार्य कुमारिल आचार्य और स्वामी शंकराचार्य जी ने अपने अपने समय में किया, लगभग वही और उससे भी कहीं अधिक कठिन व जटिल कार्य स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्यसमाज बनाकर उन्नीसवीं शताब्दी में सफलतापूर्वक किया। संसार से अज्ञान व अविद्या हटा कर धर्म व संस्कृति को सत्य और विद्या की आधारशिला पर स्थापित करने का अपूर्व और महनीय कार्य उन्होंने किया है।

 मानवता का रक्षक व पोषक होने से गोवर्धन पर्व एक महान पर्व

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वर्तमान परिस्थितियों में गोरक्षकों, पशुप्रेमियों और मानवतावादियों को गोवर्धन पर्व के दिन गोरक्षा करने, गोहत्या न होने देने, गोपालन करने, गोदुग्ध का ही सेवन करने व गोहत्या के विरोध में प्राणपण से प्रचार करने का प्रण व संकल्प लेना चाहिये। इसी में इस पर्व की सार्थकता है और ऐसा करके ही विश्व में मनुष्यता स्थापित होगी और विश्व सुरक्षित रह सकेगा। हम यह भी अनुभव करते है कि गोरक्षा करना प्रत्येक गोभक्त का जन्म सिद्ध मौलिक अधिकार है।

हनुमान जयंती:- पर सभी भक्तों के संकट हरते हनुमान जी

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आज की तारीख में राजधानी लखनऊ में लगने वाला बड़ा मंगल का मेला जहां गली गली में लोकप्रिय हो रहा है। वहीं यहीं का असर है कि यह मेला अब लखनऊ के सटे बाराबंकी में भी लगने लगा है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने एक बार कहा भी था कि ,”श्री महावीर जी मन के समान वेग वाले हैं । अतः मेरी हार्दिक इच्छा है कि उनका दर्शन लोगों को गली -गली में हो। मुहल्ले -मुहल्लें में हनुमान जी की मूर्ति स्थापित करके लोगों को दिखलायी जायें। स्थान- स्थान पर अखाड़ें हों जहां उनकी मूर्तियां स्थापित हो जायें।

ऋषि दयानन्द का बलिदान सत्य की विजय व असत्य की पराजय

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30 अक्तूबर, 1883 दीपावली के दिन ऋषि दयानन्द ने अपने देह का भले ही त्याग कर दिया परन्तु उनकी आत्मा आज भी ईश्वर के सान्निध्य में रहकर ईश्वरीय आनन्द वा मोक्ष का अनुभव कर रही है। सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, ऋग्वेदभाष्य, यजुर्वेदभाष्य,, संस्कारविधि, आर्याभिविनय और अपने अन्य ग्रन्थों के कारण आज भी वह अपने अनुयायियों के मध्य विद्यमान हैं और अपने ग्रन्थों व जीवन चरित तथा पत्रव्यवहार आदि के द्वारा उनका मार्गदर्शन करते हैं। उनके मानव सर्वहितकारी कार्यों से सारा संसार लाभान्वित हुआ है।

अंकोरवाट मन्दिर: विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक

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ख्मेर शास्त्रीय शैली से प्रभावित स्थापत्य वाले इस मंदिर का निर्माण कार्य सूर्यवर्मन द्वितीय ने प्रारम्भ किया परन्तु वे इसे पूर्ण नहीं कर सके। मंदिर का कार्य उनके भानजे एवं उत्तराधिकारी धरणीन्द्रवर्मन के शासनकाल में सम्पूर्ण हुआ। मिश्र एवं मेक्सिको के स्टेप पिरामिडों की तरह यह सीढ़ी पर उठता गया है। इसका मूल शिखर लगभग 64 मीटर ऊँचा है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी आठों शिखर 54 मीटर उँचे हैं। मंदिर साढ़े तीन किलोमीटर लम्बी पत्थर की दिवार से घिरा हुआ था, उसके बाहर 30 मीटर खुली भूमि और फिर बाहर 190 मीटर चौडी खाई है।