मनुष्य जीवन का उद्देश्य

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क्या मनुष्य जीवन का उद्देश्य आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर धनोपार्जन कर सुख व सुविधाओं से युक्त जीवन जीना मात्र ही है?’ –मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून। आज का हमारा उपर्युक्त विषय पाठकों को कुछ अटपटा सा लग सकता है। हमें लगता है कि यह विषय विचारणीय है और आज देश व संसार में जो आपाधापी मची… Read more »

वेद ज्ञान का अप्रचार और लोगों की उसके प्रति अनभिज्ञता

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मत-मतान्तरों की उत्पत्ति का प्रमुख कारण वेद ज्ञान का अप्रचार और लोगों की उसके प्रति अनभिज्ञता मनमोहन कुमार आर्य संसार के सभी देशों के लोग किसी न किसी मत, पन्थ व सम्प्रदाय को मानते हैं। अंग्रेजी में इन्हें religion कहते हैं। धर्म संस्कृत का शब्द है जो केवल वैदिक मान्यताओं व सिद्धान्तों तथा उसके पालन… Read more »

वेदालोचन (वेदों के अध्ययन) से रहित संस्कृत शिक्षा पूर्ण लाभ न देने वाली व हानिकारक

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संस्कृत भाषा का अध्ययन, उसके द्वारा वेदालोचन और वेद विहित योगाभ्यास को करके ही बालक मूलशंकर ऋषि दयानन्द बने। आज भी ऋषि दयानन्द का यशोगान चहुं दिशाओं में हो रहा है। यदि वह ऐसा न करते तो अपने टंकारा गांव के अन्य लोगों की भांति आज उन्हें कोई जानता भी नहीं। अतः अपना परम कर्तव्य मानकर संस्कृत भाषा का अध्ययन करते हुए वेदों का स्वाध्याय वा वेदालोचन मनुष्य का आवश्यक कर्तव्य है। महर्षि दयानन्द के बाद उनके संस्कृताध्ययन व वेदालोचन के उद्देश्य से ही उनके अनुयायी स्वामी श्रद्धानन्द ने गुरुकुल कागड़ी खोला था। उनसे भी पूर्व पं. गुरुदत्त विद्यार्थी जी ने लाहौर में अष्टाध्यायी का अध्ययम कराने के लिए पाठशाला खोली थी जहां अधिक आयु के लोग पढ़ते थे।

पूजनीय प्रभो हमारे……भाग-10

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राकेश कुमार आर्य  छोड़ देवें छल-कपट को मानसिक बल दीजिए गतांक से आगे…. ओ३म्! येनेदम् भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतम मृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु।। (यजु. 34-4) अर्थ-‘जिस अमर मन ने ये तीनों काल भूत, वर्तमान और भविष्यत अपने वश में किये हुए हैं, जिसके द्वारा सात होताओं (यज्ञकत्र्ताओं) वाला यज्ञ किया… Read more »

जानिए घर की किस दिशा में दीपक लगाने से पूरी होती हैं आपकी मनोकामना/विश—

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आखिर क्यों भारतीय संस्कृति की परम्पराओं में दीपक का इतना महत्व हैं ? किसी भी देश की संस्कृति उसकी आत्मा होती है। भारतीय संस्कृति की गरिमा अपार है। इस संस्कृति में आदिकाल से ऐसी परम्पराएँ चली आ रही हैं, जिनके पीछे तात्त्विक महत्त्व एवं वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है। हिंदू धर्म में किसी भी शुभ… Read more »

सर्वोपरि महान ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश

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विद्या अविद्या सहित मनुष्यों के यथार्थ धर्म का प्रकाशक सर्वोपरि महान ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश मनमोहन कुमार आर्य चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद सृष्टि की आदि में उत्पन्न ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है जो ईश्वर ने चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा की आत्माओं में प्रेरणा द्वारा प्रकट वा स्थापित किया था। इन चार ऋषियों ने… Read more »

एक अनूठा त्यौहार है अक्षय तृतीया

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अक्षय तृतीया का पावन पवित्र त्यौहार निश्चित रूप से धर्माराधना, त्याग, तपस्या आदि से पोषित ऐसे अक्षय बीजों को बोने का दिन है जिनसे समयान्तर पर प्राप्त होने वाली फसल न सिर्फ सामाजिक उत्साह को शतगुणित करने वाली होगी वरन अध्यात्म की ऐसी अविरल धारा को गतिमान करने वाली भी होगी जिससे सम्पूर्ण मानवता सिर्फ कुछ वर्षों तक नहीं पीढ़ियों तक स्नात होती रहेगी। अक्षय तृतीया के पवित्र दिन पर हम सब संकल्पित बनें कि जो कुछ प्राप्त है उसे अक्षुण्ण रखते हुए इस अक्षय भंडार को शतगुणित करते रहें। यह त्यौहार हमारे लिए एक सीख बने, प्रेरणा बने और हम अपने आपको सर्वोतमुखी समृद्धि की दिशा में निरंतर गतिमान कर सकें। अच्छे संस्कारों का ग्रहण और गहरापन हमारे संस्कृति बने

ख़ालसा पंथ का उदय तथा श्री गुरु गोबिन्द सिंघ जी के दिशा-निर्देश

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30 मार्च सन् 1699 को वैषाखी के दिन श्री गुरू गोबिन्द सिंघ जी ने आन्नदुपर (पंजाब) में, सभी सिक्खों को एकत्र कर एक विशाल सम्मेलन का आयोजन किया। प्रातः भजन-कीर्तन के पश्चात् उस ऐतिहासिक दिवस पर, श्रद्धालुओं के अपार जन-समूह के सम्मुख हाथ में नग्न तलवार लिए श्री गुरू गोबिन्द सिंघ जी ने उच्च स्वर… Read more »

पूजनीय प्रभो हमारे……भाग-9

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पर संसार के लोगों में और विद्वान लोगों में एक बात सांझा होती है कि संसार के साधारण लोग भी जिस सुख-समृद्घि की प्राप्ति करना चाहते हैं उनके लिए वह भी यज्ञयागादि और ज्ञान चर्चाएं करते हैं और विद्वान लोग भी अपने स्तर पर ऐसी ही कार्य प्रणाली को अपनाते हैं। इन सबका उद्देश्य होता है-अपने-अपने उद्देश्यों की प्राप्ति, अपनी-अपनी आकांक्षाओं की प्राप्ति।

वेदभाष्यकार एवं वैदिक विद्वान पं. हरिश्चन्द्र विद्यालंकार का संक्षिप्त परिचय

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पं. हरिश्चन्द्र विद्यालंकार जी के जिन ग्रन्थों का उल्लेख उपर्युक्त सूची में है, आज उनमें से कोई एक ग्रन्थ भी कहीं से उपलब्ध नहीं होता। आर्यसमाज की सभाओं को लेखक के ग्रन्थों के संरक्षण की ओर ध्यान देना चाहिये। यदि इन सबकी पीडीएफ बनाकर किसी साइट पर डाल दी जाये तो पाठकों को सुविधा होने के साथ ग्रन्थों का संरक्षण स्वतः ही हो जायेगा। आशा है कि हमारे नेतागण इस पर ध्यान देंगे।