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श्रीराम तिवारी की कविता : हारे को हरिनाम है …

श्रीराम तिवारी की कविता : हारे को हरिनाम है … अब न देश-विदेश है, वैश्वीकरण ही शेष है। नियति नहीं निर्देश है, वैचारिक अतिशेष है।। जाति-धरम-समाज की जड़ें अभी भी शेष हैं। महाकाल के आँगन में, सामंती अवशेष है।। नए दौर की मांग पर, तंत्र व्यवस्था नीतियाँ। सभ्यताएं जूझती, मिटती नहीं कुरीतियाँ।। कहने को तो चाहत है, धर्म-अर्थ या काम की। मानवता के जीवन पथ में, ...

December 10th, 2010 | लेखक : श्रीराम तिवारी | 69 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem, हरिनाम

कविता / आ अब लौट चलें …….

कविता / आ अब लौट चलें ……. अगम रास्ता-रात अँधेरी, आ अब लौट चलें. सहज स्वरूप पै परत मोह कि, तृष्णा मूंग दले. जिस पथ बाजे मन-रण-भेरी, शोषण बाण चलें. नहीं तहां शांति समता अनुशासन ,स्वारथ गगन जले. विपथ्गमन कर जीवन बीता, अब क्या हाथ मले. कपटी क्रूर कुचली घेरे, मत जा सांझ ढले. अगम रास्ता रात घनेरी आ अब लौट चलें. कदाचित ...

December 4th, 2010 | लेखक : श्रीराम तिवारी | 154 views | 4 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem, कविता

कविता/ करीब से देखा मैंने…..

कविता/ करीब से देखा मैंने….. चीख पुकार का वो मौत का मंज़र, उस मनहूस रात को करीब से देखा मैंने ... न जाने कितने गुनहगारों को लील गयी वो अपने ही हाथों से मौत को फिसलते हुए, करीब से देखा मैंने... धरती कों प्यासा छोड़ गयी वो भूख से तडपते हुओ को करीब से देखा मैंने ... शहर ...

December 3rd, 2010 | लेखक : ललित कुमार कुचालिया | 103 views | 2 Comments »
Posted in Category: कविता, प्रवक्ता न्यूज़ | Tags: Bhopal Gas Tragedy, भोपाल गैस त्रासदी

कविता / दुखदैन्य हारिणी

कविता / दुखदैन्य हारिणी दुखदैन्य हारिणी के दुख को अब हम सबको हरना होगा, चिंताहरिणी की चिंता पर अब कुछ चिंतन करना होगा। कोई भविष्य में दिव्य नीर को भूतकाल की संज्ञा दे, इससे पहले ही पतित पावनी का जल पावन करना होगा। जय गंगा मईया का स्वर जब मुख से उच्चारित करते हो, क्यों नही तभी ...

December 2nd, 2010 | लेखक : प्रवक्‍ता ब्यूरो | 26 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem, कविता

कविता/ यह कैसा लोकतंत्र ?

कविता/ यह कैसा लोकतंत्र ? -राजीव दुबे मानवीय संवेदनाओं पर होता नित निर्मम प्रहार, सीधे चलता जन निर्बल माना जाता, रौंदा जाता जनमत प्रतिदिन..., यह कैसा लोकतंत्र – यह कैसा शासन ? सत्ता के आगारों में शासक चुप क्यों बैठा, जनता हर रोज नए सवालों संग आती है - क्या आक्रोश चाहिए इतना कि उठ जाये ज्वाला, पिघलेगा पाषाण ...

November 21st, 2010 | लेखक : राजीव दुबे | 148 views | 2 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem on loktantra:Rajiv Dubey, लोकतंत्र

कविता: क्या करें हम ?

कविता: क्या करें हम ? ढह गई इमारत दब गए – मर गए नाचीज़ लोग झल्लाहट छा गई दिल्ली के दरबार में उफ्फ, ये गरीब, करते बरबाद गुलाबी सर्दी हमारी ! कह दिया – धमका दिया जनता को और अगले ही दिन हो गए बेघरबार हजारों कुछ और ढह सकने वाली इमारतों से । अब लेगें चैन की साँस पीछा छूटा इन मुओं से खुले ...

November 18th, 2010 | लेखक : राजीव दुबे | 126 views | 2 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: WHAT TO DO, कविता, राजीव दुबे

दो लघु कविताएं : सोउंगा न अब

दो लघु कविताएं : सोउंगा न अब सोउंगा न अब गहराता जा रहा था मन, मन में लिए लग्न, आंखों में चमक, पथ सूझ नहीं रहा था तब, क्योंकि, छप्पर था तंग । शांत है मन,लग्न वही, चमक वही , पथ दिख रहा है स्पष्ट, अब नहीं कोई कष्ट । फिर भी... रात हो या दिन, है मन में, वही उमंग, वही लग्न, वही चमक, जो जगाना नहीं चाहते थे मुझे, उनको ...

November 14th, 2010 | लेखक : पन्नालाल शर्मा | 54 views | 1 Comment »
Posted in Category: कविता | Tags: small story, पन्नालाल शर्मा, लघु कविता, लोग मेरे गांव के, सोउंगा न अब

आज का अध्यापक

आज का अध्यापक आज का अध्यापक शीक्षा का व्यवसायी कर्ण करता जा रहा है । आज का अध्यापक पेट भरने के लीए अध्यापक बनता जा रहा है अध्यापक का पद नहीं मिला तो क्या हुआ । सीपाही के पद के लीए ही फारम भरता जा रहा है आज का अध्यापक शीक्षा का व्यवसायी कर्ण करता जा रहा ...

November 11th, 2010 | लेखक : संजय कुमार फरवाहा | 290 views | 6 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Teacher, अध्यापक

प्रदूषण के डर से, ना निकला घर से

प्रदूषण के डर से, ना निकला घर से प्रदूषण के डर से , ना निकला घर से ; पटाखों की लड़ियाँ , और फुलझड़ियाँ , सुहाने गगन में , कहर बन के बरसे ; प्रदूषण के डर से , ना निकला घर से ; हर मोड़ पर है मधुशाला , हर हाथ में मस्ती का प्याला ; कैसे बचाऊँ तुम्हें , इस जहर से ; प्रदूषण के डर से , ना ...

November 10th, 2010 | लेखक : अशोक बजाज | 124 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Pollution, प्रदूषण

बैठ कुऐं की मुंडेर पे

बैठ कुऐं की मुंडेर पे सहेली आ बैठ मेरे पास मनं की दो बातें कर लूँ फीर भर के घड़ा पानी का अपने घर को चल दूँ सहेली आ बैठ मेरे पास मनं की दो बातें कर लूँ फीर भर के घड़ा पानी का अपने घर को चल दूँ सुबह से सोच रही थी कब , भरने पानी मैं जाऊं बैठ मुंडेर पे कुऐं की सहेली को मनं ...

November 8th, 2010 | लेखक : संजय कुमार फरवाहा | 128 views | 3 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Sit, बैठ

कविता: आ भैया तुझे तिलक लगाऊ

कविता: आ भैया तुझे तिलक लगाऊ भाई दूज का पावन पर्व मैं मनाऊं सनेह भरी अभिव्यक्ति देकर तेरी खुशहाली के मंगल गीत मैं गाऊ आ भैया तुझे तिलक लगाऊं कितना पावन दिन यह आया जिसने भाई बहन को फिर से मिलाया मनं मैं बहती स्नेह की गंगा ख़ुशी के अश्रुँ को मैं कैसे छुपाऊं आ भैया तुझे तिलक लगाऊ भाई दूज ...

November 6th, 2010 | लेखक : प्रवक्‍ता ब्यूरो | 62 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: bhai dooj, भैया दूज

कविता: जब तिमिर बढ़ने लगे तो

कविता: जब तिमिर बढ़ने लगे तो जब तिमिर बढ़ने लगे तो दीप को जलना पड़ेगा दैत्य हुंकारें अगर तो देव को हँसना पड़ेगा दीप है मिट्टी का लेकिन हौसला इस्पात-सा हमको भी इसके अनोखे रूप में ढलना पड़ेगा रौशनी के गीत गायें हम सभी मिल कर यहाँ प्यार की गंगा बहाने प्यार से बहना पड़ेगा सूर्य-चन्दा हैं सभी के रौशनी सबके लिये इनकी ...

November 4th, 2010 | लेखक : गिरीश पंकज | 198 views | 9 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: Diwali, दीपावली

कविता : चलो अरुंधती राय बन जाएँ

कविता : चलो अरुंधती राय बन जाएँ -शिखा वार्ष्‍णेय भूखे नंगों का देश है भारत, खोखली महाशक्ति है , कश्मीर से अलग हो जाना चाहिए उसे .और भी ना जाने क्या क्या विष वमन...पर क्या ये विष वमन अपने ही नागरिक द्वारा भारत के अलावा कोई और देश बर्दाश्त करता ? क्या भारत जैसे लोकतंत्र को गाली देने ...

November 4th, 2010 | लेखक : शिखा वार्ष्‍णेय | 288 views | 13 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: kashmir, अरुधंती राय, कश्‍मीर

एंड्रीनी रिच की चार कविताएं

एंड्रीनी रिच की चार कविताएं 1. जीत भीतरी तहों में कुछ पसर रहा है, हमसे अनकहा त्वचा के अंदर भी उसकी उपस्थिति अघोषित है जीवन के समस्त रूप-प्रत्यय नाटकीय स्वार्थों की सघन झाड़ियों में उलझे मशीनी देवताओं से संवाद नहीं करना चाहते, स्पष्टत: कटे-छँटे शरणार्थी प्राचीन या अनित्य ग्रामों से हमारे अवसरवादी चाहनाओं में फँसे पगलाकर ढूँढ़ रहे हैं एक मेजबान एक जीवनरक्षक ...

November 2nd, 2010 | लेखक : प्रवक्‍ता ब्यूरो | 23 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem, एंड्रीनी रिच

मधुसूदनजी की कविता: मास्‍को में बारिश, मुंबई में छाता

मधुसूदनजी की कविता: मास्‍को में बारिश, मुंबई में छाता बिन बादल, बिन बरसात, बिना धूप, सर पर छाता! एक लाल मित्र मुम्बई में मिले। पूछा, भाई छाता क्यों, पकडे हो? बारिश तो है नहीं? तो बोले, वाह जी, मुम्बई में बारिश हो, या ना हो, क्या फर्क? मास्को में तो, बारिश हो रही है। १० साल बाद। जब मास्को से भी कम्युनिज़्म निष्कासित है। अब भी वे मित्र, बिन बारिश छाता ले घूम रहे हैं। हमने ...

November 2nd, 2010 | लेखक : प्रो. मधुसूदन | 618 views | 5 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: communism, कम्‍युनिज्‍म, वामपंथ

राजीव दुबे की कविता : प्रश्नों के बढ़ते दायरे

राजीव दुबे की कविता : प्रश्नों के बढ़ते दायरे प्रश्नों के दायरे बढ़ रहे हैं, और आवाजें फुसफुसाहटों से कोहराम में बदल रही हैं। ‘कलावती’ का नाम लेकर संसद में तालियाँ तो बज़ गईं, और ‘कलावती’ को कुछ रुपये भी मिल गये होंगे - सहायता के नाम पर। अब उसी ‘कलावती’ और उस जैसों के हजारों करोड़ लुट गए दिल्ली की निगरानी ...

November 2nd, 2010 | लेखक : राजीव दुबे | 165 views | 5 Comments »
Posted in Category: कविता, राजनीति | Tags: poem, कविता

कविता: व्‍यस्‍तता

कविता: व्‍यस्‍तता व्‍यस्‍तता आज हम हर पल व्‍यस्‍तता का बहाना बना रहे हैं व्‍यस्‍तता की आड़ लेकर अपनों से ही बहुत दूर हुऐ जा रहे हैं जरा सोचिए, दिल से सोचिए कहीं हम रिश्तों के नाम पर औपचारिकता तो नहीं निभा रहे हैं आज हम हर पल व्‍यस्‍तता का बहाना बना रहे हैं पहले जब कोई दुःख में ...

October 30th, 2010 | लेखक : प्रवक्‍ता ब्यूरो | 136 views | 4 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem, व्‍यस्‍तता

उलूक दर्शन

उलूक दर्शन उलूक दर्शन उल्लुओं की भाषा के जानकारों ने बताया है कि आजकल उल्लू अपनी हर सभा में चीख – चीख कर कह रहे हैं – “अगर घोड़ों ने सभ्यता के विकास के शुरुआती दौर में आदमी को अपने ऊपर चढ़कर अपना शोषण न करने दिया होता तो यह पूंजीवादी युग कभी नहीं आता । ...

October 28th, 2010 | लेखक : राजीव दुबे | 173 views | 6 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem

कविता/रामजन्‍मभूमि

कविता/रामजन्‍मभूमि सुलग रहे है शोले रामजन्म स्थल पर भभक रही है ज्वाला अयोध्या के नाम पर नतमस्तक है जिन चरणों पर पूरा देश उस राम की सम्पूर्ण वंदना अभी रह गयी है शेष जाग उठो अब मां भारती के संतान करने को तैयार हो जाओ फिर भोले सा विषपान ना जागे तो हो जायेगी मातृभूमि कलंकित फिर ...

October 27th, 2010 | लेखक : अमल कुमार श्रीवास्‍तव | 131 views | No Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem, कविता

कविता : एक मुलाकात बापू से

कविता : एक मुलाकात बापू से एक दिन, मन था कुछ खिन्न मैं बाग के कोने में बैठा था उदास तभी सामने दिखाई दिये महात्मा गांधी श्री मोहनदास मैं चकरा कर बोला ''हैलो डैड , हाउ आर यू'' उत्तर मिला ''मै तो ठीक हूं पर कौन है तू ? लोग मुझे बापू कहते थे तू डैड कह रहा है हिन्दुस्तानी है या इंगलैंड में ...

October 26th, 2010 | लेखक : प्रवक्‍ता ब्यूरो | 185 views | 6 Comments »
Posted in Category: कविता | Tags: poem, बापू

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