लेखक परिचय

आशुतोष

आशुतोष

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहे आशुतोषजी स्‍वतंत्र पत्रकार के नाते विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर सम-सामयिक विषयों पर लिखते रहते हैं। आप हिंदुस्‍थान समाचार एजेंसी से भी जुडे रहे हैं। सांस्‍कृतिक राष्ट्रवाद को प्रखर बनाने हेतु आप इसके बौद्धिक आंदोलन आयाम को गति प्रदान करने में जुटे हुए हैं।

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-आशुतोष

फोन की घंटी बजी। दूसरी ओर हिन्दी के एक बड़े साहित्यकार थे। पहले वाक्य में उन्होंने मेरे हाल ही में लिखे गये एक लेख की प्रशंसा की। मेरे लिए यह प्रशंसा किसी पुरस्कार से कम न थी। लेकिन दूसरे ही वाक्य में मेरा उत्साह भंग हो चुका था।

उन्होंने प्रश्न किया-‘यह जनसैलाब कौन सी भाषा का शब्द है’। मैं समझ गया कि आगे की बात किस ओर बढ़ने वाली है। संस्कृत के ‘जन’ शब्द को फारसी के ‘सैलाब’ के साथ जोड़ कर इस शब्द का जन्म हुआ है। सरल बनाने के नाम पर भाषा भ्रष्ट करने को आतुर अनेक विद्वान इसे सामान्य रूप से प्रयोग करते हैं, लेकिन तुम भी इससे प्रभावित हो, यह जानकर कष्ट हुआ। उन्होंने चोट की ‘जनसैलाब शब्द का आविष्कार मैंने नहीं किया। यह सामान्य रूप से प्रयोग होने वाला शब्द बन चुका है। यह अर्थ देने वाला कोई शब्द हिन्दी में अगर है तो मुझे उसकी जानकारी नहीं है’-मैंने कहा। तुम्हारी शब्दसामर्थ्य कम है यह किसका दोष है। यदि दोष है तो उसे सुधारने का प्रयास करो। तुम्हारे अज्ञान की पीड़ा को भाषा क्यों सहन करे। तुम्हारी जानकारी के लिए, इसके स्थान पर जनमेदिनी, जनज्वार या जनपारावार शब्द का उपयोग भी किया जा सकता था।

‘ओह! यह शब्द बहुत कठिन हैं, पाठक के लिए इन्हें समझना मुश्किल है’।

‘जो पाठक सैलाब समझ सकता है वह ज्वार क्यों नहीं समझेगा’। वे बोले।

आप बड़े साहित्यकार हैं इसलिए इन कठिन साहित्यिक शब्दों के पीछे पड़े हैं। आज-कल की पत्राकारिता में यह भाषा नहीं चलती है। पत्राकारिता के संस्थानों में भी पढ़ाया जाता है कि भाषा ऐसी हो जो सबकी समझ में आये। इसके लिए हिन्दी शब्दों के प्रयोग का दुराग्रह त्यागकर वैकल्पिक उर्दू-फारसी ही नहीं बल्कि अंग्रेजी शब्दों का भी प्रयोग करने में कोई दोष नहीं। एक बड़े हिन्दी दैनिक के आज के ही अंक में प्रथम पृष्ठ पर चिपके ताजमहल के चित्र के नीचे आपने नहीं पढ़ा-‘ताज के धावल हुस्न को निहारता टूरिस्ट’। सवाल भाषा का नहीं ‘कम्युनिकेशन’ का है।

इसका अर्थ है कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत में संवाद होता ही नहीं था। सिंधु तट पर तीर्थयात्री कन्याकुमारी पहुंच कर भी अपनी बात लोगों को समझा सकता था। शंकराचार्य धुर दक्षिण से चलकर काशी के ब्राह्मणों को अपनी बात समझा सकते हैं लेकिन आज के पत्रकार को स्थानीय पाठक को भी अपनी बात समझाने के लिए विदेशी शब्दों का सहारा चाहिए।

आप साहित्यकारों की समस्या यही है। तुरंत शंकराचार्य के युग में पहुंच जाते हैं। आज का सामना करने के बजाय इतिहास में जीने से क्या हासिल होगा। अब दुनिया आगे बढ़ चुकी है। टेक्नॉलॉजी ने दुनियां को एक गांव में बदल दिया है। अंग्रेजी अब सारी दुनिया की भाषा बन चुकी है। अगर उसके शब्द हमारी भाषा में भी हैं तो इसमें गलत क्या है। नई जनरेशन आपकी साहित्यिक भाषा नहीं जानती, पढ़ती भी नहीं। उसे एक ऐसी भाषा चाहिए जिसे हर कोई समझ सके। वही अखबार की भाषा है।

इसीलिए आज समाचार पत्रों की हालत यह हो गई है कि उसके पाठक कम हैं और दर्शक अधिक। देश में सबसे अधिक पाठकों का दावा करने वाले अंग्रेजी समाचार पत्र को मेरा पीएचडी बेटा भी दस मिनट में पढ़ डालता है और मेरा अनपढ़ नौकर रामू भी उसके पृष्ठों को दस मिनट तक निहारता रहता है।

आप बेकार ही अंग्रेजी के पीछे पड़े हैं। आज हर नौजवान अंग्रेजी में बात करना चाहता है, सीखना चाहता है। ज्यादातर तो इन अंग्रेजी अखबारों को पढ़ कर ही अपनी अंग्रेजी ‘इंप्रूव’ करते हैं।

‘लेकिन वह इससे कैसे सीख सकेंगे, जब अंग्रेजी पत्रकार भी तुम हिन्दी पत्रकारों की तरह ही अन्य भाषाओं के शब्दों के बिना ‘कम्यूनिकेशन’ पूरा नहीं कर पा रहे हैं। यह ‘मॉडस ऑपरेन्डी’, ‘लोकस स्टैंडाई’ और ‘करीकुलम वाइटे’ तो अंग्रेजी शब्द नहीं हैं। फिर वे इन्हें क्यों बार-बार प्रयोग करते हैं।’ उनका गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था।

‘यह शब्द तो अब हिन्दी पत्रकारिता में भी आ चुके हैं। लोग इन्हें अपना भी रहे हैं। नये शब्दों को जोड़ने से हिन्दी की शब्दावली भी बढ़ेगी और उसकी स्वीकार्यता भी’। मैंने कहा।

‘हिन्दी किसी स्वीकार्यता की मुहताज नहीं है। यह शताब्दियों से भारत में अभिव्यक्ति का माधयम रही है। आज भी है, आगे भी रहेगी। इसकी वैज्ञानिकता के आगे तुम्हारी उर्दू कहीं नहीं ठहरती। अंग्रेजी भी नहीं। मिलावटी भाषा तो बिल्कुल भी नहीं।’ वे और उग्र होते हुए बोले।

‘आप फिर वहीं पहुंच गये। बात हिन्दी के सैद्धांतिक समर्थन की नहीं है। बात है कम्युनिकेशन की, जो अंग्रेजी के शब्द डाले बिना मुश्किल है। आज नर्सरी स्कूल में जाने वाले बच्चे भी अंग्रेजी की पोयम कितने कान्फीडेंस से सुनाते हैं। अगर उन्हें आपके जमाने के पहाड़े सुनाने को कह दिया जाये तो वे बगलें झांकने लगेंगे। जिन्हें हिन्दी की गिनती नहीं आती उन्हें अगर आप जनज्वार जैसे शब्द पढ़ायेंगे तो वे क्या समझेंगे।’ मैंने भी हार न मानने की कसम खा ली थी।

‘क्यों! अगर वे अंग्रेजी का समाचार पत्र पढ़कर अंग्रेजी सीख सकते हैं तो हिन्दी का समाचार पत्र पढ़कर हिन्दी क्यों नहीं। क्या तुमने उन नब्बे प्रतिशत भारतीयों के बारे में कभी सोचा है जिनका सामना आज तक अंग्रेजी की वर्णमाला से नहीं हुआ। वे हिन्दी अथवा अपनी मातृभाषा में ही संवाद करते हैं और पूरे भारत का तीर्थाटन बड़ी सहजता से कर लेते हैं’।

‘अगर तुम्हें और तुम्हारे पत्रकार शिरोमणियों को लगता है कि अंग्रेजों के शब्द डाले बिना भाषा की संप्रेषणीयता खतरे में पड़ जायेगी तो यह भ्रम है। हिन्दी समाचार पत्र को तुम लोगों ने आज ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है कि बिना अंग्रेजी में स्नातक किये हिन्दी के समाचार पत्र को समझ पाना कठिन हो गया है। तुम पाठक को अंग्रेजी से जोड़ नहीं रहे हो बल्कि समाचारों से दूर कर रहे हो’।

मेरे लम्बे मौन ने उन्हें संयत होने का अवसर दिया। अब उनका स्वर ऐसे अभिभावक का लग रहा था जो अपनी संतान के आचरण पर सचमुच दुखी हो। समझाने के स्वर में उन्होंने कहा-‘किसी समाज से उसकी भाषा छीन लेना और विदेशी शब्दों को निगलने के लिए विवश करना किसी औपनिवेशिक तंत्र की कार्यप्रणाली तो हो सकती है, स्वतंत्र सार्वभौम राष्ट्र की नहीं। इस तरह से तुम इस देश के नागरिकों को समाचारों से नही बल्कि सरोकारों से दूर कर रहे हो। इस तरह तुम बाजार का विश्वास तो पा लोगे लेकिन देश के साथ विश्वासघात करके’।

‘भारत की कालगणना वर्षों में नहीं, युगों में मापी जाती है। उसे लम्बी यात्रा करनी है जो उधार की बैसाखियों भरोसे नहीं की जा सकती। उसे अपने पांवों पर ही आगे बढ़ने दो। अगर तुम्हारे यह टोटके बहुत दूर तक साथ नहीं दे सकते तो इन्हें यहीं छोड़ दो। एक बार लगेगा कि कांप रहे हैं लेकिन मन का विश्वास पक्का हो तो पांव तो आगे बढ़ेंगे हीं। हिन्दी दिवस नहीं, हिन्दी की शताब्दियां भावी इतिहास लिखने को उद्यृत हैं’।

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2 Comments on "हिन्दी की शताब्दियां"

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राजीव रंजन
Guest
संवाद शैली में उत्‍तम आलेख है। वास्‍तव में, हिंदी में दूसरी भाषा के शब्‍दों का अनावश्‍यक प्रयोग, लिखने वाले की अयोग्‍यता को ही चिन्हित करता है। इस अयोग्‍यता को छिपाने के लिए ‘कम्‍यूनिकेशन’ का कुतर्क प्रस्‍तुत किया जाता है। किसी भी भाषा में दूसरी भाषा के शब्‍दों का प्रयोग ‘मिलावट’ है और मिलावट कभी भी अच्‍छी नहीं मानी जाती, उससे हमेशा हानि होती है। इसका दुष्‍परिणाम भी हमारे सामने है। आज की पीढ़ी के ज्‍यादातर लोग न तो अच्‍छी हिंदी जानते हैं, न अच्‍छी अंग्रेजी और न ही अच्‍छी उर्दू। किसी भाषा का प्रदुषित होना, उस संस्‍कृति का प्रदूषित होना… Read more »
रामेन्द्र मिश्रा
Guest

आशुतोष जी इस सुन्दर और जानकारी भरे लेख के लिए आपको बधाई न देकर धन्यवाद कहूँगा !
कल हिंदी दिवस है और आज के कुछ घटनाक्रमों के बाद आपके इस लेख ने बहुत कुछ विचारने पर करने पर विवश कर दिया है !

लेकिन हा जो भी हो हिंदी के लिए कोई समस्या नहीं है क्योंकि अभी भी हिंदी जनमानस की भाषा है ! हा उसमे थोडा घालमेल हुआ है लेकिन वो विचारनिए तो है लेकिन चिंतानिये नहीं !

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