छात्रसंघ चुनाव

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छात्र संघ चुनाव नहीं हुआ तो कैसे सामने आएगा युवा नेतृत्व? भोपाल। मनुष्य और समाज दोनों परस्पर पूरक हैं और छात्र इसका अभिन्न अंग हैं। एक के बिना दूसरे का स्थायित्व सम्भव नहीं है। छात्र शक्ति, समाज को सुधारने और उसे मजबूत करने वाली घटकों में से एक है। कॉलेज में होने वाले चुनावों को लोकतंत्र की बुनियादी पाठशाला के रूप में मान्यता प्राप्त है क्योंकि छात्र संघ चुनावों से ही युवा नेतृत्व, युवा प्रतिभा निखर कर आती है। मध्यप्रदेश में जिस तरह से छात्र संघ चुनाव को लेकर प्रक्रिया साधारण सी चल रही है तो क्या हम ये मानकर चले लोकतंत्र की बुनियादी पाठशाला छात्र संघ राजनीति को प्रदेश सरकार कुचलती नजर आ रही है। प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी ने छात्र संघ चुनाव प्रत्यक्ष प्रणाली से कराए जाने की पुष्टि की है। उच्च शिक्षा विभाग के अकादमिक कैलेंडर के अनुसार अगस्त या सितम्बर में छात्र संघ चुनाव होने थे। किन्तु अक्टूबर समाप्त होने को है अभी तक उच्च शिक्षा विभाग से छात्र संघ चुनाव की कोई अधिसूचना जारी नही की गई हैं। देश प्रदेश की राजनीति में कई ऐसे नाम है जो छात्र राजनीति के चलते ही राजनीति में एक ऊंचे मुकाम पर पहुंच पाएं हैं जिसमें अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद, सीताराम येचुरी, शिवराज सिंह चौहान, रमन सिंह, नीतेश कुमार, शरद यादव, गोपीनाथ मुंडे, अजय माकन, रामविलास पासवान, सचिन पायलेट, कैलाश विजयवर्गीय, रणदीप सुरजेवाला सहित कई अन्य बड़े नाम शामिल है। यह सभी नेता छात्र राजनीति से आये है इनके पास कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में संघर्ष का बीज आधार मौजूद हैं। छात्र नेता प्रफुल्ल महंत असम राज्य के मुख्यमंत्री बने। जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया जैसे नेताओं ने छात्र आंदोलनों का नेतृत्व किया। आज देश की राजनीति में इस पाठशाला के मेधावी छात्र विभिन्न क्षेत्रों में अपना योगदान दे रहे हैं। छात्र संघ नेतृत्व की पाठशाला है जिसके माध्यम से लोकतंत्र की मजबूत जमीन का निर्माण होता है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आज दुनिया का सबसे बड़ा छात्र संगठन हैं। कई बड़े नेता यहां से निकल मुख्यधारा की राजनीति में स्थापित हुए इसके बाद भी पिछले 30 सालों में भाजपा शासित राज्यो में छात्रसंघों की मौलिक बहाली पर कोई कार्य नहीं हुआ। कांग्रेस के सभी 60 साल के बड़े नेता एनएसयूआई की देन है। यहां भी छात्रसंघ चुनावों की अनदेखी की जा रही है। हम गर्व के साथ कहते हैं कि भारत को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का गौरव प्राप्त है लेकिन लोकतंत्र की पहली सीढ़ी को ही हम बाधित करने पर तुले हुए हैं। इसमें कोई दो मत नहीं कि छात्र संघ लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करता है क्योंकि इससे जनता का राजनीतिक प्रशिक्षण सुनिश्चित होता है और नेतृत्व क्षमता विकसित होती है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि कई शिक्षण संस्थानों में छात्र संघ चुनावों में अपराधीकरण की प्रवृत्ति व्याप्त है। यह सचमुच चिंता का विषय है लेकिन रोग को दूर करने की वजाय रोगी को मारना, ये कैसा न्याय है? यहां सवाल उठता है कि क्या लोकसभा और विधानसभा चुनाव में हिंसा नहीं होती? तो फिर छात्र संघ चुनाव पर ही क्यों रोक लगाई जाती हैं? कारण साफ हैं कि छात्र समुदाय स्वभाव से ही सत्ता और व्यवस्था विरोधी होता है। यदि छात्र एकजुट हो गए तो सरकार और प्रशासन की मनमानी कैसे चलेगी? भारत में छात्र आंदोलनों का एक गौरवमयी इतिहास है। छात्रों ने हमेशा समाज-परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गौरतलब है कि स्वतंत्रता आंदोलन में छात्रों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। महात्मा गांधी के आह्वान पर लाखों छात्रों ने अपने कैरियर को दांव पर लगाते हुए स्कूल और कॉलेज का बहिष्कार किया। स्वतंत्रता के पूर्व और स्वतंत्रता के बाद भारत में जितने भी परिवर्तनकारी सामाजिक आंदोलन हुए, उनमें छात्रों की भूमिका बहुत अहम रही है। इसलिए कहा जाता है कि युवा देश की रीढ़ हैं, जिसके कंधे पर देश का भविष्य टिका होता है। छात्र संघ चुनावों की जिस तरह से अनदेखी की जा रही हैं उससे सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि किसी उभरते चेहरे को जगह नहीं तो फिर नया नेतृत्व कहां से आएगा?

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