राजनीति से ऊपर उठकर वीरों के सम्मान का खुलकर स्वागत करने की आवश्यकता

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए जारी घोषणापत्र में बीजेपी ने वीर सावरकर को भारत रत्न दिलाने का वादा किया है। इस घोषणा के बाद ही देश में सावरकर को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। एक पक्ष इसका स्वागत कर रहा है तो दूसरा पक्ष इसका विरोध कर रहा है। सावरकर को लेकर राजनीतिक दृष्टि से अपने – अपने अलग मत हो सकते हैं, अलग धारणाएं हो सकती हैं। लेकिन सिर्फ वैचारिक मतभेद या राजनीतिक लाभ – हानि के आधार पर सावरकर की देशभक्ति, समर्पण, त्याग और असाधारण योगदानों को कमतर साबित नहीं किया जा सकता है। विरोध करने से पहले सावरकर को जानना, पढ़ना और समझना आवश्यक है।

भ्रामक बातों का शिकार होकर दुराग्रह की धारणा बना लेना सही नहीं है। आज कांग्रेस जिस तरह सावरकर का विरोध कर रही है वह स्वयं अपने नेता और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विचारों को तकलीफ पहुंचा रही है। 1966 में इंदिरा गांधी ने सावरकर के बलिदान, देशभक्ति और साहस को सलाम किया था। 1970 में इंदिरा गांधी ने सावरकर के सम्मान में डाक टिकट जारी किया था। यही नहीं महात्मा गांधी भी सावरकर की प्रशंसा करते थे। गांधी जी ने सावरकर को वीर और भारत का बहादुर पुत्र कहा था। सावरकर आजीवन क्रांतिकारी थे। ऐसे बहुत कम देखने को मिलता है कि जितनी ज्वाला तन में हो उतना ही उफान मन में भी हो, जिसके कलम में चिंगारी हो और उसके कार्यों में भी क्रांति की अग्नि धधकती हो। वीर सावरकर ऐसे महान सपूत थे जिनकी कविता भी क्रांति मचाती थी और वह स्वयं भी क्रांतिकारी थे। उनमें तेज भी था, तप भी था और त्याग भी था। 27 फरवरी 1966 को द टाइम्स ऑफ इंडिया ने वीर सावरकर के निधन के बाद अपने संपादकीय में लिखा था – “विनायक दामोदर सावरकर अपनी अंतिम सांस तक क्रांतिकारी थे। इतिहास हमेशा उन्हें एक विलक्षण भारतीय के रूप में सलामी देगा। एक ऐसा व्यक्ति जिसका इतने उतार चढ़ाव के बाद भी देश के प्रति अटूट विश्वास बना रहा। उनका जीवन एक महागाथा की तरह है। उनकी कथनी और करनी में समानता थी।

भारतीय सीमाओं की सुरक्षा के प्रति उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। उनकी निर्भीक आत्मा आनेवाली पीढ़ियों को हमेशा झकझोरती रहेगी।” वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक में हुआ था। वे अपने माता- पिता की चार संतानों में से एक थे। उनके पिता दामोदर पंत शिक्षित व्यक्ति थे। वे अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे। लेकिन वे अपने बच्चों को अंग्रेजी के साथ – साथ रामायण, महाभारत, महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी आदि महापुरूषो के प्रसंग भी सुनाया करते थे। सावरकर का बचपन भी इन्हीं बौद्धिक वातावरण में बीता। सावरकर अल्प आयु से ही निर्भीक होने के साथ – साथ बौद्धिक रूप से भी संपन्न थे। उनकी पहली कविता मात्र दस वर्ष की आयु में प्रकाशित हुई थी। वे अग्रणी क्रांतिदूत थे।

एक सच्चे देश भक्त के साथ – साथ एक सच्चा राष्ट्र उपासक भी थे। राष्ट्रीय एकता और अखंडता की भावना उनके रोम – रोम में भरी थी। उनके अदम्य साहस और समर्पण की भावना से अंग्रेजी शासन हिल गया था। सावरकर पहले भारतीय थे जिन्होंने विदेशी कपड़ो की होली जलाई थी। सावरकर को किसी भी कीमत पर अंग्रेजी दासता स्वीकार नहीं थी। वे हमेशा अंग्रेजों का प्रतिकार करते रहे। उन्होंने इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ लेने से मना कर दिया था। फलस्वरूप उन्हें वकालत करने से रोक दिया गया। 24 साल की आयु में सावरकर ने इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस नामक पुस्तक की रचना कर ब्रिटिश शासन को झकझोर दिया था। अंग्रेजी सरकार ने इस किताब को प्रकाशित होने से पहले ही बैन कर दिया।

सावकर एक मात्र ऐसे भारतीय थे जिन्हें एक ही जीवन में दो बार आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी थी। काले पानी की कठोर सजा के दौरान सावरकर को अनेक यातनाएं दी गयी। अंडमान जेल में उन्हें छ: महीने तक अंधेरी कोठरी में रखा गया। एक -एक महीने के लिए तीन बार एकांतवास की सजा सुनाई गयी। सात – सात दिनों तक दो बार हथकड़ियां पहनाकर दीवारों के साथ लटकाया गया। इतना ही नहीं सावरकर को चार महीने तक जंजीरों से बांध कर रखा गया। सावरकर जेल में रहते हुए भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। वह जेल की दिवारों पर कोयले से कविता लिखा करते थे और फिर उन कविताओं को याद करते थे। जेल से रिहा होने के बाद सावरकर ने उन कविताओं को पुन: लिखा था।

यह भी अजीब विडंबना है कि इतनी कठोर यातना सहने वाले योद्धा के साथ तथाकथित इतिहासकारों ने न्याय नहीं किया। किसी ने कुछ लिखा भी तो उसे तोड़ मरोड़ कर पेश किया। सावरकर आजीवन भारत और भारतीयों को एक सूत्र में बांधने के लिए प्रयास करते रहे। वह किसी भीऊंच-नीच जात- पंथ के भेदभाव से मुक्त थे। भारत की एकता और अखंडता के प्रति उनकी असीम श्रद्धा थी। यही कारण है कि उन्होंने धर्म के आधार पर विभाजन को अस्वीकार कर दिया था। उनका मत था कि संपूर्ण भारत एक है और इस भूखंड पर रहने वाले सभी एक है। वे किसी भी रोपित प्रचार -प्रसार से घृणा करते थे। वे आजीवन भाईचारे और भारत को एक करने के लिए संघर्ष करते रहे। आज सिर्फ वैचारिक मतभेद या राजनीतिक द्वेष की वजह से देश के वीर सपूतों को बांटना, उनकी आलोचना करना ठीक नहीं है। अगर कोई सरकार देश के लिए सबकुछ न्यौछावर कर देने वाले वीरों के बारे में कुछ सोचती है, उनका सम्मान करना चाहती है तो उसका स्वागत करना चाहिए।

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