चीन की आक्रामक नीति भारत के लिये खतरा

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– ललित गर्ग-

चीन की आक्रामक नीति भारत के लिये गंभीर खतरा है, लेकिन विश्व शांति एवं संतुलित विश्व-व्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा है, अशांति का कारण है। दुनिया के अधिकांश देश अब चीन की इस मंशा से वाकिफ हैं। भारत चीन के साथ सौहार्दपूर्ण संबंधों की लगातार कोशिश करता है, लेकिन तनाव लगातार बढ़ता ही जा रहा है, इस तनाव की जड़ सीमा विवाद तो है ही, लेकिन उसका अहंकार, सत्ता की महत्वाकांक्षा, स्वार्थ एवं स्वयं को शक्तिशाली-शांतिप्रिय दिखाने की इच्छा भी बड़े कारण हैं। इनसे भी बड़ी मुश्किल यह खड़ी हो गई है कि वह अक्सर ही ऐसे लिखित समझौतों को ताक पर रखकर षडयंत्रपूर्ण हरकतों को अंजाम देने में जरा नहीं हिचकिचा रहा जो भारत को उकसाने वाली होती हैं। ऐसी ही एक हरकत चीनी वेबसाइट पर हाल में ही प्रकाशित आठ हजार शब्दों के एक लेख में 1962 के भारत-चीन युद्ध का संशोधित इतिहास अंतरराष्ट्रीय प्रेक्षकों का ध्यान खींच रहा है जिसमें यह सिद्ध करने की कोशिश की गई है कि वह चीन का आक्रमण नहीं बल्कि भारत द्वारा किए गए हमले के जवाब में की गई कार्रवाई भर था। जाहिर है, यह चीन के उस दुष्प्रचार अभियान का हिस्सा है, जिसके तहत वह खुद को ऐसे शांतिप्रिय देश के रूप में पेश करता है, जिसने कभी किसी पर हमला नहीं किया और न ही किसी के क्षेत्र में घुसपैठ की।
चीन की ओर से भारत के खिलाफ पेश की जा रही लगातार चुनौतियों के लिये सर्तक एवं सावधान रहने की अपेक्षा है। चीन की हर हरकत पर लगाम लगाना जरूरी है और उसके लिये विश्व की शक्तियों को सही तथ्यों से अवगत करते हुए चीन की आक्रामकता एवं विस्तारवादी गतिविधियों के प्रति सावधान करने की भी अपेक्षा है। भारत हमेशा से विश्व शांति का पक्षधर रहा है। मानवता गुलामी में न बंध जाए, भूगोलों की अपनी स्वतंत्रता कायम रहे, इसके लिये भारत द्वारा चीन की आक्रामकता की पोल दुनिया के सामने खोलना जरूरी है। म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यही सफल एवं सार्थक कोशिश की है। उन्होंने कहा कि चीन के द्वारा सीमा समझौतों का उल्लंघन करने के बाद उसके साथ भारत के संबंध ‘बहुत कठिन दौर’ से गुजर रहे हैं। जयशंकर ने रेखांकित किया कि ‘सीमा की स्थिति संबंधों की स्थिति का निर्धारण करेगी।’
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चीन के रवैए को लेकर जो चिंता और नाराजगी जताई है, वह बेवजह नहीं हैं, उसकी गंभीरता को समझने की जरूरत है। पिछले दो वर्षों में तो चीन ने सारी हदें पार कर दीं। सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए नए-पुराने सभी समझौतों की धज्जियां उड़ाते हुए गलवान जैसे गंभीर विवाद खड़े कर दिए। आखिर कौन भूल सकता है कि चीनी सैनिकों ने सीमा का उल्लंघन करते हुए भारतीय जवानों पर हमला कर दिया था और हमारे चौबीस जवान शहीद हो गए थे। लेकिन अब ज्यादा चिंता की बात यह है कि चीन गलवान विवाद को खत्म करने के बजाय और बढ़ाने पर ही तुला है। अब तक तेरह दौर की वार्ताओं में उसके रवैए से यही सामने आया है। ऐसे में भारत चिंतित होना लाजिमी है और अपनी सुरक्षा के लिए हरसंभव कदम भी उठाएगा ही। म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में विदेश मंत्री ने दो टूक शब्दों में दुनिया को उचित ही बताया है कि चीन किसी भी समझौते को मान नहीं रहा है और उसी का नतीजा है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते बेहद खराब हो गए हैं। इसी महीने मेलबर्न में क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन और आस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री के साथ द्विपक्षीय वार्ता में भी भारत ने अपना पक्ष रखा। चीन के रवैया से भारत ही नहीं, सभी देशों की चिन्ता तो बढ़ ही रही है, बड़ी चुनौती का कारण भी बनी है। साथ ही क्षेत्रीय शांति भी खतरे में पड़ती जा रही है।
चीन हरसंभव वह कोशिश कर रहा है जिससे भारत जबावी कार्रवाही करें और फिर विवाद खड़े हो। लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब हजारों सैनिकों को तैनात कर उसने मोर्चाबंदी शुरू कर दी। पिछले साल अगस्त में बड़ी संख्या में चीनी सैनिक उत्तरांखड के बाड़ाहोती सेक्टर में घुस आए थे और तीन घंटे तक वहां तोड़फोड़ करते रहे। अरुणाचल प्रदेश से लगती सीमा पर ऐसी घटनाएं आम हैं। गलवान विवाद से पहले लगभग साढ़े चार दशक तक भारत-चीन सीमा पर शांति बनी रही थी। भारत की ओर से कभी भी ऐसा कोई अनुचित कदम नहीं उठाया गया जो अशांति पैदा करता। लेकिन पिछले दो दशकों में चीन जिस तेजी से विस्तारवादी नीतियों पर बढ़ चला है और वह भारत से लगती लगभग चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा पर ऐसी ही गतिविधियां जारी रखे हुए है, जिन पर भारत को सख्त एतराज रहा है। जबकि सीमा पर शांति बनी रहे, इसके लिए भारत और चीन के बीच 1996 में समझौता हुआ था। इस समझौते के अनुच्छेद-6 में साफ कहा गया है कि कोई भी पक्ष वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के दो किलोमीटर के दायरे में गोली नहीं चलाएगा। इतना ही नहीं, समझौते के मुताबिक इस क्षेत्र में बंदूक, रासायनिक हथियार या विस्फोटक ले जाने की अनुमति भी नहीं है। लेकिन चीन इन सब समझौता शर्तों को नजरअंदाज कर विश्व को भटकाने एवं तनाव पैदा करने की कोशिश कर रहा है।
विश्व को गुमराह करने के लिये ही उसने अपनी वेबसाइट पर वास्तविक इतिहास को इस तरह तोड़मरोड़ कर सत्य को झूठा नकाब पहनाया है कि इसे पचाना किसी भी समझदार व्यक्ति के लिए संभव नहीं। जाहिर है, इतिहास को झूठलाना, अपनी आक्रामक नीतियों पर परदा डालना किसी शांतिप्रिय देश का लक्षण नहीं हो सकता। जहां तक 1962 युद्ध को लेकर बनाई जा रही नई धारणा का सवाल है तो इस लेख में कही गई बातें और इसमें दिए गए तथ्य ही इसके खिलाफ गवाही दे रहे हैं। वैसे भी 1962 युद्ध से जुड़े साक्ष्य आधारित विवरण मौजूद हैं, जो इस तरह के नए दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं। इस तरह के झूठे, गुमराह करने वाले एवं भ्रामक इतिहास की प्रस्तुति से चीन को कुछ हासिल होने वाला नहीं है। चांग शियाकांग, जो पूर्व सैन्य कमांडर जनरल चांग ग्वोहुवा की बेटी हैं, वही यह ‘संशोधित इतिहास’ लेकर सामने आई हैं, उसने चीन को एक शांतिप्रिय देश ठहराने के लिये यह हरकत की है।
चीन किस तरह का शांतिप्रिय देश है उसका अनुमान इन घटनाक्रम पर एक नजर डालने से ही पता चल जाता हैं। चीन हांगकांग के सवाल पर ब्रिटेन से, व्यापार को लेकर ऑस्ट्रेलिया से, ईस्ट चाइना सी के सेंकाकू द्वीपों के स्वामित्व के मसले पर जापान से, सैन्य शक्ति प्रदर्शन को लेकर अमेरिका से और साउथ चाइना सी पर नियंत्रण के सवाल पर साउथ ईस्ट एशियन देशों से पंगेबाजी करता रहा है। ताइवान और हांगकांग पर कब्जा करने की चीन की कोशिश, पाकिस्तान के गवाहदार सी पोर्ट पर विकास के नाम पर कब्जा लेना, पाकिस्तानी हुक्मरानों का मुंह पैसा देकर बंद करवा देना, नेपाल की शासकीय कम्युनिस्ट पार्टी को पैसे और सुरक्षा के लालच देकर नेपाल को चीन के हाथों गिरवी रखवा देना, यह सब चीन की विस्तारवादी नीति और तानाशाही सोच के उदाहरण है। चीन की क्रूरता पर रोक लगाना भारत, एशिया और पूरे विश्व का कर्तव्य है। चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं, पड़ोसी देशों की सीमाओं पर निरंतर अतिक्रमण करने और विश्व में अशांति फैलाने के विस्तारवादी, आसुरी और तानाशाही चरित्र को दुनिया जाने, यह अपेक्षित है। जब कोई बड़ा देश लिखित समझौतों का अनादर करने लगे तो यह पूरी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के लिए जायज चिंता की बात हो जाती है। इन कारणों से टकराव और युद्ध की संभावनाएं बढ़ रही है। भारत जैसे कुछ एशियाई देशों के समक्ष आने वाले सालों में काफी चुनौतियां होंगी, लेकिन समय रहते इससे निपटने के लिए उपाय एवं उपचार कर लेना अब नितांत जरूरी हो गया है और इसी से चीन की घेरेबंदी करना संभव होगा।

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