लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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सिद्धार्थ शंकर गौतम 

दुनिया के सबसे पुराने धर्मो में से एक है। वर्तमान का हिंदू धर्म ही सनातन धर्म है। इस धर्म का दर्शन बहुत विशाल है और इसकी मूल अवधारणा है, वसुधैव कुटुंबकम। मेरा अपना मानना है कि जो भी हीन भावना को दुत्कारकर भगा दे, वही हिंदू है। मगर, वर्तमान में हिंदुत्व में ठहराव-सा आ गया है। हिंदू समाज को विभाजित करने का कुचक्र चल रहा है। कुछ कमी हम में है, तो कुछ हमारी राजनीति में। आज हिंदू बंटा हुआ है। कुटिल राजनीतिज्ञों की राजनीतिक चालों में फंसकर हिंदू विभाजित हो गए हैं। इतिहास गवाह है कि जो भी समाज संगठित रहा है, दुनिया में उसका ही सिक्का चला है। जैसे-पूरी दुनिया में यहूदियों की संख्या सवा करोड़ से ज्यादा नहीं है, पर विश्व की 47 प्रतिशत संपत्ति पर इनका आधिपत्य है। जिन वैज्ञानिक आविष्कारों का सुख पूरी मानवता भोग रही है, उनमें से साठ फीसदी से अधिक यहूदियों ने किए।

ऐसा नहीं है कि यहूदियों में वर्ण व्यवस्था नहीं थी। प्राचीनकाल में इस समाज में तीन वर्ण होते थे, मगर सदियों तक शोषित तथा दबे-कुचले यहूदियों ने स्वयं को संगठनात्मक स्तर पर इतना मजबूत और एकात्म किया कि वर्तमान में यहूदी एक सशक्त ताकत के रूप में पूरी दुनिया से अपना लोहा मनवा रहे हैं। हिटलर ने यहूदियों पर जुल्म ढाए, मुस्लिम शासकों ने उनका वजूद मिटाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। फिर भी, यहूदी सिर उठाकर जी रहे हैं। इसका कारण सिर्फ एकता है। जब यहूदी एक हो सकते हैं, वे वर्णो और वर्गो से मुक्त हो सकते हैं, तो हिंदू क्यों नहीं? आखिर हिंदू भी तो सदियों से दबे-कुचले रहे हैं। फिर, यहूदियों के मुकाबले हिंदू आबादी भी बहुत ज्यादा है। तब कहीं तो कमी होगी? ऐसे कई संगठन हैं, जो हिंदुओं को एकजुट करने के प्रयास में लगे हुए हैं, तब यह काम हो क्यों नहीं रहा है? दरअसल, जो भी संगठन हिंदुओं को एकजुट करने का पवित्र कार्य कर रहे हैं, उनमें व्यावहारिकता की कमी स्पष्ट रूप से दिखती है। लगता है, मानो रंगमंच पर कोई नाटक चल रहा है, जिसका प्रमुख पात्र भी हिंदू है और खलनायक भी हिंदू। हिंदू तभी एकजुट हो सकेंगे, जब वर्तमान परिस्थितियों के अनुकूल उन्हें ढाला जाएगा।

भाषावाद, जातिवाद, प्रांतवाद आदि का भेद पूरी तरह समाप्त हो। सांस्कृतिक, आर्थिक व राजनीतिक भेदभाव बंद हो। वर्तमान में हिंदुओं को एकजुट करने के जितने भी प्रयास होते हैं, उनमें इन सभी बुराइयों को दूर करने के प्रयास नहीं किए जाते। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता ने हिंदुत्व को जमकर नुकसान पहुंचाया है। एक सशक्त, एकात्म और संगठित हिंदू समाज के निर्माण के लिए जब तक प्रचीनकाल से चली आ रही बुराइयों को दूर नहीं किया जाएगा, हिंदू एकजुट नहीं हो सकते। आज हिंदू और हिंदुत्व की अवधारणा ही भारत को विदेशी आक्रांताओं से बचा सकती है। अपने आसपास के परिवेश में हम आसानी से देख रहे हैं कि दूसरे धर्म-संप्रदाय स्वयं की संगठनात्मक क्षमताओं में कैसे वृद्धि करते जा रहे हैं, वह भी हिंदुओं की भागीदारी से। कई हिंदू इन धर्म-संप्रदायों को ग्रहण करके इनका आधार बढ़ा रहे हैं।

फिर, यह कहने में भी गुरेज नहीं होना चाहिए कि कमी हमारी ही राजनीतिक व्यवस्था में है, तभी हिंदू इस कदर दिग्भ्रमित हैं कि उन्हें अन्य धर्म अपनाने पड़ते हैं। इस प्रकार की समस्या आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में आम है। मात्र अंशकालीन लाभ के लिए देश के पथभ्रष्ट राजनीतिज्ञ दीर्घकालीन नुकसान की अनदेखी कर रहे हैं, जिसे किसी भी नजरिए से उचित नहीं ठहराया जा सकता। यदि भारत में हिंदू ही सुरक्षित न रहा, तो कौन रहेगा? फिर देश के भीतर तो ठीक, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदू व हिंदुत्व के खिलाफ कुछ ताकतों द्वारा झंडा बुलंद किया जा रहा है। हो सकता है कि इस बात से कुछ लोग सहमत न हों कि हिंदुओं के विरुद्ध कोई अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र चल रहा है। ऐसे लोगों से पूछना चाहिए कि नेपाल, जो विश्व का एकमात्र घोषित हिंदू राष्ट्र था, आज उसका क्या हुआ? क्या यह हिंदुत्व के विरुद्ध षड्यंत्र नहीं है? पूरी दुनिया में ऐसे ही षड्यंत्र चल रहे हैं और इससे बचने का उपाय यह है कि हमें हिंदू धर्म का पुनर्गठन करना होगा। जातियों और वर्णो की समाप्ती वर्तमान समय की आवश्यकता है। यह होगा कैसे, हमारे विद्वानों और विचारकों को अब इसी पर विचार करना होगा।

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8 Comments on "हिंदुत्व के खिलाफ हो रहे हैं षड्यंत्र"

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rp agrawal
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इन वर्षों देश में चुआचुत देखने में नहीं आरही है !बसों में ट्रेनों में स्माल बिग होटलों में ,मंदिरों में भी कोई नहीं पूछता है की तुम किस जाती के हो !इक्का दुक्का अपवाद घटनाओ को तूल देने की कोई जरुरत नहीं!वेसे कलक्टर और चपरासी कभी बराबर नहीं हो सकते चाहे किसी जाती के हो !सेठ और मुनीम बराबर नहीं !ये स्तरके भेदभाव तो स्वाभाविक है !समाज में भेदभाव तो केवल राजनीती वालो ने जानाबुज कर विक्सित किये है !नए नए शब्द अल्पसंख्यक ,दलित ,जनजाति अनुसूचित ,धर्मनिरपेक्स, आदि! ये सब समाज को लड़ाने के लिए शब्द रचना की गयी !सन… Read more »
shakt dhyani
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भेद भाव किस धर्म मैं नहीं हैं केवल बराबरवाद के नाम पर इस सास्वत धर्म की टांग मत खिचिये …मीत खाने वाले और साकाहारी , सराब सुतने वाले और यम-नियम पर चलने वाले बराबर कैसे हो सकते हैं, जातिओं का आधार स्वाभाव था , आज जो ब्रह्मण मुर्गा खता है वह चौथे वर्ना का ही है, संत रैदास ब्राहमण ही थे ,,रामदेव जन्म से नहीं अपने स्वाभाव के कारन सभी के पूजित हैं, हिन्दू पुस्तकों के फतवे से नहीं अपने विवेक पर जिन्दा है

तनवीर जाफरी
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गौतम जी आप की चिंताओं की मैं भी कद्र करता हूँ .
ज़रा लगे हाथों इस लिंक पर भी नज़र डालियेगा और इसके बारे में भी कुछ रौशनी डालियेगा अपने अगले लेख में की इसमें कौन सी शक्तियां षड्यंत्र रच रही हैं ? इस विषय पर मुझे आपके अगले लेख की प्रतीक्षा रहेगी.
http://dailyreportsonline.blogspot.com/2011/12/blog-post_08.html?spref=fb

आर. सिंह
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कमी राजनैतिक व्यवस्था नहीं बल्कि सामाजिक व्यवस्था में है.आज भी उन सवर्ण हिन्दुओं की कमी नहीं जो दलित और आदिवासी हिन्दुओं के साथ बैठने में भी अपनी तौहीन समझते है.उनके साथ खान पान का सम्बन्ध तो दूर की बात है.आज अंतर्जाल बार हिन्दू धर्म की विभिन्न जातियों के नाम पर खुले हुए वेब साईट पर जाईये,आपको पता चल जायेगा कि हम में एक दूसरे के प्रति कितना भेद भाव है?मैं भी मानता हूँ कि हिन्दू दर्शन जिसका प्रचलित नाम प्राच्य दर्शन है,बहुत संवृद्ध है,पर उसका अनुशरण करने वाले कितने हिन्दू हैं?हिन्दू आपासी भेद भाव और छूत अछूत का झगडा छोड़… Read more »
Jeet Bhargava
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किसी भी अच्छे धर्म का बचना ना केवल उसके धर्मावलम्बियों के लिए बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए जरूरी है.

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