लेखक परिचय

राम सिंह यादव

राम सिंह यादव

लेखों, कविताओं का विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। सामाजिक / सरकारी संगठनों के माध्यम से सामाजिक गतिविधियों तथा पर्यावरण जागरूकता में सक्रिय हिस्सेदारी। ’राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं सूचना स्त्रोत संस्थान नई दिल्ली से प्रकाशित राजभाषा पत्रिका संचेतना में ‘‘वन-क्रान्ति-जन क्रान्ति’’ लेख प्रकाशित।

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-राम सिंह यादव- world1

एक बहुत विशाल ऊर्जा का विस्फोट हुआसारे ब्रह्मांड में असंख्य तारे और ग्रह टूटकर छितरा गये। लेकिन ऊर्जा खत्म नहीं हुई, वरन् ब्रह्मांड की एक एक संरचना में समाहित हो गयी और धीरे-धीरे सूर्यों एवं ग्रहों की उत्पत्ति प्रशस्त हुई। इन्हीं में एक अपनी पृथ्वी और सूर्य भी थेसूर्य ने पिता भाव से और माँ पृथ्वी ने अपनी कोख से सृष्टि को जन्म देना आरंभ किया। अरबों सालों तक दोनों रातदिन मेहनत करते रहे। पिता सूर्य नाभिकीय संलयन से ऊर्जा को केन्द्रित करता और माँ को देता फिर माँ उस ऊर्जा को अपने बच्चों में बाँट देतीमाँ पानी लायी और जीवन को सींचना शुरू किया। साइनोबैक्टेरियाशैवालकवक और छोटे छोटे जीवों से जीवन का आधार बना। लेकिन माँ और पिता अभी भी सतत प्रयास कर रहे थे फिर पेड़पौधेजीवजंतुखनिजोंधातुओं का ताना बाना बुनता चला गया। आखिरकार दोनों ने अपनी सबसे शानदार और अतुलनीय औलाद इंसान को पैदा किया। माँबाप फूले न समाये क्योंकि सिर्फ यही एक रचना थी अब तक के खरबों सालों के परिणामस्वरूप जिसमें वो सातों इन्द्रियों को एक स्वरूप में जोड़ सके थे और ये सात इन्द्रियाँ थीं – देखनासुननासूंघनाछूनाबोलना/स्वाद लेनाआभास करना और चलायमान होना।

जिस तरह पहाड़ की चोटी पर पहुँचने पर आत्म संतुष्टि मिलती है और अथक परिश्रम तथा गिनते हुए दिनों का अंत हो जाता हैलेकिन ठीक उसके दूसरी तरफ एक गहरी ढाल भी दिखती है जिसकी ऊंचाई से गिरते वक़्त न तो परिश्रम की आवश्यकता होती है और न समय का एहसास होता है। अब सवाल ये आता है की पहाड़ की चोटी पर जाने को कहा किसने था जबकि दूसरी तरफ गिरने का खौफ था?

ऊर्जा और स्थूलता का खेल बड़ा निराला हैनिरंतर परिवर्तन है। धुआं हमेशा ऊपर ही उठता है और राख़ नीचे ही गिरती है। पौधा जन्म लेते ही ऊपर को उठता है और जड़ जमीन से चिपकती है। मस्तिष्क ऊपर ही क्यों स्थित है। युगों – युगों से यही सवाल और इसका जवाब ढूँढ़ता मानव खोज पर खोज करता जाता हैमन में छुपी अनंत ऊंचाई की अभिलाषा लिए अर्थात यही अभिलाषा उसको ऊपर खींचती है।

क्या है अणु जहां इलेक्ट्रॉनप्रोटोनन्यूट्रॉन नृत्य करते हैं। फिर हिग्स बोसॉन अपनी झलक दिखा कर गायब हो जाता हैदसियों हज़ार श्लोक ऋग्वेद और यजुर्वेद में ऋषि बता जाते हैं। फोटोसिंथेसिसरेस्पिरेशनबिजली कौंधने और उससे जीवन विकाससप्तरंगअंग प्रत्यारोपणदधीचि मुनि को अश्व का सिर लगानावायु गमनअंतर्ध्यानदूरदर्शनटाइम मशीनतंत्र साधनासम्मोहन विज्ञानमानसिक साधनासात चक्रों की साधना का सिद्धान्त जैसे जाने कितने अकल्पनीय विज्ञान का प्रतिपादन करते रहे।

कृष्ण बहुत करीब पहुँच गए इस ब्रह्मांड के नियम को ढूंढते ढूंढते और आत्मा का विकास और विनाश समझायाउन्होने बताया की किस तरह अणु एक तरफ जीवन और जन्म की प्रक्रिया में लगे रहते हैं तथा दूसरी तरफ उनका विनाश और मृत्यु भी निरंतर होती रहती हैकितनी आसान भाषा में वो उस आत्मा अथवा ऊर्जा को एक एक कण या जीव में दिखा देते हैं। अद्भुत विज्ञान दिखता है पुरातन इतिहास में कुबेर का वायुयानलंका व भारत के बीच आदमपुलश्रीलंका का स्वर्ण आभा से जगमगाता शहरशरीर को हल्का कर हवा मे उड़ने वाले हनुमान का विज्ञानमैटर डिसप्लेसमेंट द्वारा पदार्थ में ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित कर शरीरों का स्थानांतरणकहानियों सा लगता है नाशायद कृष्ण इस पर शोध करते हुए बहुत आगे चले गए थे और आध्यात्मिकता के सूत्र को मानवता में पिरो कर जन्म और मृत्यु के बंधनों से परे जाने की शिक्षा देने लगे।

इतनी सटीक और आध्य शिक्षा देने के बाद भी उनके श्लोकों में स्वयं की खोज करने की ही शिक्षा मिलती है। उन्होने ब्रह्मांड के प्रत्येक पदार्थ का मानवीकरण करते हुए आत्मविकास की प्रेरणा दी और मानव को भी पदार्थ का ढांचा बता डाला। पुरातन वेद या गीता की सबसे खास बात ये थी की इनमे कहीं भी किसी धर्म का जिक्र नहीं था बल्कि सिर्फ विज्ञान था। महाभारत काल में इस विज्ञान की पराकाष्ठा दिखती हैचाहे वो संजय की दिव्यदृष्टि का दूरदर्शन होकृष्ण का अध्यात्म और पदार्थ के तत्व एवं उसका आत्मा से संबंध का सिद्धान्त होअभिमन्यु के द्वारा गर्भ में ही शिक्षा ग्रहण की कथा हो या जंगल में रहने वाले अद्वितीय योगी शिव का ‘-‘‘-‘ और सृष्टि के साथ मानव का जुड़ाव था।

लेकिन चोटी के दूसरी तरफ तीव्र ढलान का प्रतिविम्ब महाभारत में अश्वत्थामा द्वारा परमाणु बम सरीखे ब्रह्मास्त्र के प्रयोग में आ जाता है। द्वारिका डूब जाती हैसरस्वती नदी का विलोप हो जाता हैवनस्पतिमनुष्य व जीवों का व्यापक संहार होता हैपहले कभी न वर्णित होने वाला थार मरुस्थल साकार होने लगता है और जेनेटिक डिसार्डर की कल्पना सत्य हो जाती है।

इस काल के बाद नागरीय सभ्यता या संभवतः सिंधु सभ्यता विलुप्त हो जाती है और 5000 ई०पू० से लगभग 2000 ई०पू० का इतिहास अंधकार में डूब जाता है। तीन हज़ार साल पहले जंगलों में छिपा सहमा मानव फिर बाहर निकला लेकिन अब तक वो रूढ़ियों,अंधविश्वासोंकर्मकांडोंभगवान से डरा हुआ और विज्ञान हीन हो चुका था। सृष्टि ने फिर से मनुष्य को मौका दिया पनपने कासृष्टि जीवित थी चूंकि मानव ने अब तक सृष्टि के साथ खिलवाड़ नहीं किया था वो जंगलोंअणुओं की स्थिरता और अध्यात्म को भौतिकता से बहुत दूर रखे हुए था। भारत की भौगोलिक स्थिति ने मानव को जीवन जीने के लिए सबसे सरल व्यवस्था कर रखी थीऋतु चक्रनदियां और उपजाऊ मैदान मानव को आत्म खोज करने के लिए प्रेरित करता रहा और काल दर काल यहाँ का वैज्ञानिक साधु आत्मविद्या के साथ प्राकृतिक जीवन को पोषण देता रहा जिसका जिक्र सिवाय भारत केविश्व के किसी अन्य इतिहास में नहीं मिलता और यही वजह है की आज भी वो साधु या फकीर के रूप में भारत के जंगलों में अध्यात्म की ऊंचाइयां साधते मिल जाते हैं– विलक्षण श्रेणी मानवों की। पुरातन काल से मध्यपूर्व एशिया का ये भाग सम्पूर्ण विश्व के लिए कौतूहल रहाविश्व के हर कोने से इंसान यहां आता रहा और बसता चला गया। अद्भुत सम्मिश्रण है इस धरा पर मानव और प्रकृति का।

कितना अच्छा होता की इस जीवन और धरा का हम सदुपयोग कर पाते।

आज का विश्व अलग हैये विश्व है भौतिकवाद काभारत जो कभी सूक्ष्म ऊर्जा के स्थानांतरण के सिद्धान्त को प्रयोग करता था वो भी अब भौतिक और स्थूल ऊर्जा के स्थानांतरण के पथ पर अग्रसर हो चुका है। आज सम्पूर्ण विश्व में पदार्थों में निहित ऊर्जा से मानव अपनी जरूरतों को पूरा करने की होड़ में लगा हैखनिज जिन्हें सृष्टि ने भूगर्भ में दबाया क्योंकि वो कार्बन तथा हानिकारक यौगिकों का संकलन है और मानव या जीवित प्राणियों के लिए हानिकारक हैवस्तुतः आज विश्व इनसे उत्पन्न कुप्रभावों का प्रत्यक्ष सामना कर रहा है।

भौतिक संसाधनों का अंध उपभोग और निर्भरता मानव अस्तित्व को अपने अंत की ओर धकेल चुका है। ब्रह्मांड के शाश्वत नियम – “ऊर्जा न नष्ट होती है और न ही उत्पन्न होती है” में आज की स्थिति का पूरा वर्णन हैहम लोग खनिजों को जमीन खोखला कर बाहर निकालते हैं जिससे वो जगह खाली हो जाती है अब उस खाली जगह को भरने के लिए ऊर्जा विस्थापन होता हैचूंकि यहाँ से निकला पदार्थ सतह पर पहुँच चुका होता है तो वहाँ से ऊर्जा को हटाएगा हीफलस्वरूप भूस्खलन व चक्रवात संबन्धित घटनाएं बढ़ती हैं। गैस,तेलकोयला जैसे पारंपरिक व खनिज ऊर्जा स्त्रोत जब जलते हैं तो हानिकारक गैसेंधूलधुआँ इत्यादि के रूप में वातावरण में छा जाते हैं। चूंकि पिता सूर्य की जीवनदायिनी किरणें पृथ्वी पर पड़ती हैं और आवश्यकतानुसार ऊष्मा अवशोषित करने के बाद पृथ्वी उन किरणों को परावर्तित कर देती हैलेकिन जब जमीन में दबे खनिजों को सतह पर लाकर उनका प्रसंस्करण किया गया और इतनी तेज़ी से पृथ्वी अपने मैकेनिज़्म में बदलाव नहीं कर सकी तो वातावरण से किरणें परावर्तन मे परेशानी होने लगी जिससे ऊष्मा का एक बड़ा भाग पृथ्वी की सतह पर ठहरने लगाइसके प्रभाव से ध्रुवों पर जमी अथाह बर्फ पिघलना शुरू हो चुकी है साथ ही साथ पारिस्थितिक असंतुलन का एक ऐसा दौर शुरू हो रहा है जिसकी भरपाई मानव प्रजाति कभी नहीं कर पायेगी । प्रकृति को जीवन अनुकूल बनाने के लिए फिर से लाखों सालों के इतिहास को दोहराना पड़ेगा।

ऊष्मा के संरक्षण से वाष्पीकरण बढ़ेगावर्षा अवधि लंबी हो जाएगीऋतु चक्र परिवर्तित हो जाएगाकृषि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगावातावरण विरल हो जाएगाचक्रवातोंतूफानोंसुनामी तथा भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं से मानव अपनी ही बनाई इमारतों में दफन होगा।

महामारियाँ मानव का ग्रास करेंगीनयी नयी बीमारियां उत्पन्न होंगीविषाणु व जीवाणुओं के डीएनए में परिवर्तन होगा जिससे वो हमारी दवाओं के विरुद्ध अधिक शक्तिशाली हो जाएँगे।

खाद्य श्रंखला टूटेगीजीव भूख से तड़प-तड़प कर जान देंगेमानव भी भूखा शीत मृत्यु की शैय्या में पड़ा होगा। मानवीय अपराधों में असीमित बढ़ोतरी होगी।

सर्दियों की अवधि बढ़ जाएगीमैदानी इलाके भी बर्फ से पट जाएँगे उसके बाद अचानक लंबी गर्मी और भयंकर बारिशों से चट्टानी संरचनाओं का क्षरण व मृदा का अपरदन बढ़ेगा।

छद्म ऊर्जा के स्त्रोत भी काम करना बंद कर देंगे।

सबसे पहले पर्वतीय व तटीय इलाकों का विनाश होगउसके बाद शहरों का नाश होगा क्योंकि वहाँ का निवासी पूरी तरह से पराधीन हैपेट भरने के लिए वो गावों के खेतों से आ रहे अनाज तथा सब्जियों पर निर्भर है।

शहरों में पानी अत्यधिक गहराई पर पहुँच चुका है जिसे बिना बिजली के पाया नहीं जा सकता और नदियोंतालाबों या झीलों का पानी इतना प्रदूषित हो चुका है कि पानी न कहकर जहर ही कहा जाने लगा है।

विकास की अंध भक्ति मे डूबे शहरसत्तासीननवीन व व्यावसायिक मानव कातर दृष्टि से अपने इष्टों के प्राण आहुति के साक्षी बनेंगे। आज की गई भूल या अनदेखी उस वक़्त काल नजर आ रही होगी।

वर्तमान की एक छोटी गलती विश्व को किस मोड़ पर खड़ा करेगी उसका अंदाज़ लगाना कठिन है जिस प्रकार सिर्फ दो लोगों की क्षुद्र सत्ता भूख ने भारत और पाकिस्तान का विभाजन कराया और आज दोनों देशों को 250 से ज्यादा परमाणु बम दे दिये। आखिर कौन सी दूरदृष्टि थी इनकीजिसने उनके ही डेढ़ अरब वंशजों को नष्ट करने की राह पर ला खड़ा कियाइसी प्रकार उत्तर कोरियादक्षिण कोरियाफिलिस्तीनइज़राइलइराक़ईरानचीनजापानअमेरिकारूससीरियालीबियाअफगानिस्तानविएतनामयूक्रेनकेन्यानाइजीरिया इत्यादि किस संतुष्टि के लिए उलझते हैंवो किससे लड़ना चाहते हैंवो किसको तबाह करना चाहते हैंइसका अंजाम क्या होगा?

चाहे पारिस्थितिक असंतुलन होधर्मांधता होसत्ता संघर्ष होसीमाओं में बंधते देश हों या परमाणवीय विनाश का सृष्टि के ऊपर मँडराता खतरा होमानव अपने लोभ की वेदी पर विलुप्त होने की कगार पर है।

पृथ्वी का कुछ नहीं बिगड़ेगा वो अपनी संरचना में परिवर्तन कर लेगीऊर्जा फिर से बटेगी जीव मेंजीवन का फिर से विकास होगा परंतु सृष्टि का सबसे उत्कृष्ट जीव – मानव समाप्त हो जाएगा। लेकिन शायद मानव अभी भी बच सकता है। ऊर्जा के दो पहलू होते हैं सकारात्मक और नकारात्मकउसी प्रकार मानव मन में भी सदैव द्वंद चलता रहता हैएक तरफ प्रेमसौहार्दवात्सल्यबंधुत्वसामाजिकता और नैतिकता का भाव है तो दूसरी तरफ अनीति,कठोरताघृणाप्रतिकारसंकीर्णतानिर्दयी क्रूरता का विम्ब है। सभी जीव दोनों पक्षों के वाहक हैं लेकिन सिर्फ मानव ही इन दोनों मे भेद कर सकता है और शांत भाव से आने वाले भविष्य के लिये क्या उचित है उसका विश्लेषण कर सकता है। सम्पूर्ण मानवता दांव पर लगी हुई है और शायद ही ऐसा कोई मानव होगा जो अपनी पीढ़ियों के प्रति चिंतित न होकट्टर से कट्टर व्यक्ति का भी कलेजा रो पड़ता है अगर अनजाने से भी किसी अबोध बालक का खून से सना शव देख ले। अनैतिकता व घृणा सिर्फ दूसरों के सामने स्वयं की उत्कृष्टता को साबित करने का मात्र दिखावा होती है जबकि वो कठोर व्यक्ति भी एकांत में प्रेम और वात्सल्य की मूर्ति होता है।

हे मानव अपनी ऊर्जाओं को पहचान। अपने जन्म के प्रयोजन की खोज कर लेकिन भौतिकता से सृष्टि का विनाश मत कर। जीवन जीने की न्यून आवश्यकताएँ और सृष्टि द्वारा उनकी आपूर्ति को समझ। बहुत संभव है की अधिकतर लोग इस लेख को विकासविरोधी समझेंगे परंतु इस संदर्भ मे उनसे सिर्फ एक ही सवाल है की सांस लेने योग्य वायु न होसूखे कंठ को पानी न हो और तुम्हारी संतान तुम्हारा कपड़ा पकड़कर भूख से बिलख रही होउस वक़्त तुम किस विकास के पक्षधर होंगेयाद रखो केदारनाथ त्रासदी में आदमी लाखों रुपयों में एक–एक पानी की बोतल खरीद रहा थाफिलीपींस का हैयान तूफानब्रिटेन की प्रलयंकारी बाढ़जापान की सुनामी और अमेरिका का पोलर वोर्टेक्स अथवा शीत चक्रवात के रूप मे टनों बर्फ विकास नहीं विनाश की आहट है।

मानव को अपने जीवन को बचाने के लिए स्वयं के संकल्प और क्रियान्वयन की आवश्यकता है न की किसी राजनीतिक इच्छाशक्ति या बाह्य सहायता का इंतजार। राजनीति तथा व्यवसाय सिर्फ दंभ व स्वार्थ की प्रतिपूर्ति करते हैं। स्वविनाश के लक्ष्य की ओर उन्मुख राजनीतिज्ञोंवेद में इंद्र को पुरंदर कहा गया है जो मानसृजित इमारतोंबांधों को नष्ट करता थाजो वणिकों के व्यवसाय का विरोधी था तथा जंगलों में आत्मविद्या की साधना करने वाले साधुओं की रक्षा करता थाजो वास्तव में प्रकृति संरक्षक था। ये था हमारा भारत जिसे जंगलों और प्रकृति के सान्निध्य में असंख्य साधुओंसन्यासियों द्वारा अनवरत खोज करके लिखा गया हैअत्यधिक नूतन विज्ञान चिरकाल से भारत के जंगलों में पोषण पाता रहा है।

झूठे विकास की तरफ मत भटकोअपने भारत को बचा लो। कुछ कठोर और असहज समाधान हैं जिन्हें करना शायद आपके वश में न होगा परंतु मृत्यु की हकीकत का सामनाबच्चों और ईष्ट जनों का करूण चेहरा आपकी प्रेरणा बनेगा।

  • सबसे पहले ज़मीनों की खरीद फरोख्त का व्यवसाय एकदम बंद करें तथा अल्प जरूरत के मुताबिक ही जमीन में कंक्रीट बिछायेँ।
  • हर घर में छोटी बगिया बनाएं जिसमे लौकीकद्दू जैसी बेल वाली सब्जियां या फिर भिंडी इत्यादि जरूरत भर की सब्जियाँ उगा सकें।
  • घरों को जमीन से 1-2 फुट ऊंचाई पर बनाएँ तथा उसके नीचे साफ पानी (वर्षा जलजमा करने का उपाय करें। नालियों व नालों में बालूमौरंग और बजरी की परत डालें जिसके घर्षण से पानी साफ होता रहे तथा सिल्ट की समस्या से बचने के साथ ही जमीन पानी भी सोखती रह सकेनालियां ऊर्ध्व “एल”/बंध आकार की बनाएँ जो पानी को देर तक जमीन पर रोक सकें।
  • घरों में भी कीटनाशकों का प्रयोग कम कर दें और यदि करें भी तो उसका प्रवाह कम करें।
  • साबुनलोशनोंडिटर्जेंट का इस्तेमाल कम करेंइनसे मिश्रित पानी नालियोंतालाबोंनदियों व सतही पानी को बर्बाद कर देता है और उसमे मौजूद जैविक श्रंखला की मृत्यु का कारण बनता हैयह पानी किसी के उपयोग के लायक नहीं रह जाताइससे बदबू,जहरीलापनमच्छरों और महामारियों का जन्म होता है।
  • नदियों में किसी भी प्रकार का कचड़ा या मूर्तियों का विसर्जन न करेंयह अवैज्ञानिक है और न ही वेदों मे वर्णित है।
  • तालाबों को पुनर्जीवित करेंउनका अतिक्रमण न करें और न ही कचरा डालने का साधन समझें। इनका हमारे जीवन व कृषि में अप्रतिम योगदान हैजिसकी वास्तविकता समझेंजमीन के नीचे का पानी जहरीले खनिजों व लवणों से युक्त होता है इसीलिए सृष्टि ने इस पानी को मानव की पहुँच से दूर रखा थापीने योग्य पानी सतत बहता हुआ और ऊपरी परत का ही होता हैगुरुत्वाकर्षण द्वारा खीचें गए खनिजों से भरा जमीन का भीतरी पानी कैंसरपथरीहेपाटाइटिस जैसी जानलेवा बीमारियों का जनक है। हम लोगों द्वारा सतह का पानी बर्बाद किया जा चुका है लेकिन यह हम सबके सघन प्रयास से मात्र 2-5 साल की बारिश से फिर से प्राप्त किया जा सकता है।
  • तालाबों व नदियों के किनारे वनों व छोटे पौधों को रोपित करें तथा वहाँ से निर्माणों को हटाएँलगभग 50-100 घरों के आस पास एक तालाब होना नितांत आवश्यक है। अपनी नदियों तथा तालाबों को स्वच्छ करें।
  • जमीन का अतिक्रमण रोकेंखाली पड़ी फैक्ट्रियों और उनकी ज़मीनों का नयी फैक्ट्रियों तथा आवासों के लिए उपयोग किया जाये।
  • शहरों में मकानों को आवंटित किया जाये न की बेचा जाये जिससे अमूल्य भूमि का खेती व स्वनिर्भरता के लिए सदुपयोग हो सके साथ ही साथ पैतृक मकान के साथ पीढ़ियों का जुड़ाव रह सके।
  • शहरों में न तो सड़कों की कमी है और न ही आदमियों की अनियंत्रित भीड़बल्कि कारोंबाइकों व ट्रकों का जाम हैइनके ऋण की व्यवस्था को सीमित किया जाये तथा उपयोग को हतोत्साहित किया जाये।
  • पब्लिक ट्रांसपोर्ट को सरकार बढ़ावा देसाइक्लिंगकार पूलिंगटैंपोबसों का उपयोग गौण न समझें बल्कि भविष्य के लिये ऊर्जा का संरक्षण करें।
  • प्लास्टिककाँचपेपरतथा आर्गेनिक कचरों को घरों से ही अलग अलग करके उचित निस्तारण करेंअन्न का उपयोग सीमित व जरूरत के आधार पर करें उसका एक दाना भी बर्बाद न करें। जाने कितने भूखे पेट उस दाने का इंतज़ार कर रहे हैं।
  • पारिस्थितिक तंत्र के अनुसार नैसर्गिक पौधों व वृक्षों को बढ़ावा देंसजावटीप्रसंस्कृत पेड़ पौधे जैव विविधता प्रभावित करते हैं और जलवायु व सामाजिक विकृति लाते हैं।
  • परमाणु बमों व सृष्टि को नष्ट करने वाले पदार्थों के घटकों का अध्ययन कर उनको उन्हीं जगहों पर नष्ट किया जाये जहां से उन्हे निकाला गया था। सृष्टि के अपने तंत्र में इनका निस्तारण करने की प्रक्रिया वहीं मौजूद होती है जहां वो यौगिक पाये जाते हैं।
  • ऊर्जा व अन्य साधनों का सीमित प्रयोग करें तथा धीरे धीरे उनपर निर्भरता कम करेंजिससे आने वाले समय में जब इनकी कमी हो जाये तब भी हम जीवित रह सकें।
  • अतिवादी संस्कृति की पराकाष्ठा मे निहित विनाश का अपने हर कदम पर चिंतन करेंअपने मस्तिष्क के सकारात्मक पहलू को उजागर करें।

पश्चिमी विकास के पक्षधर मेरे दोस्तों जरा विश्लेषण करो उस दशा की जब सीमित ऊर्जा का स्त्रोत खत्म हो जाएगा तब ऊर्जा के अभाव में न बिजली होगी और न ट्रांसपोर्ट के साधन काम कर रहे होंगे उस वक़्त गहरी जमीन में दबा पानी कैसे निकालोगेनदियोंतालाबों – झीलों का वैसे भी नामोनिशान मिटा चुके होगेपेट भरने के लिए पौधेसब्जियाँ या घास पत्ते कहाँ से पाओगे अपनी कंक्रीट या बंजर हो चुकी जमीन परभूख और प्यास से तड़पते वक़्त न तुम्हें नैतिकता का ख्याल रहेगा और न समाज का डर लगेगा। राष्ट्र,अनुशासनराजनीतिप्रांतधर्मभाषाशिक्षाप्रवचनसंस्कारवर्णसिद्धान्तपैसाबिल्डिंगेंपुलविकास जैसे असंख्य शब्दों का अस्तित्व खत्म हो जाता है पेट के आगे। महंगाई अपने चरम पर होगी और भूखा मानव हर अपराध करने पर विवश होगा क्यों की भूख से अपराध का सीधा रिश्ता है।

हे महामानवों स्वार्थवैमनस्यविकास में छुपे विनाश और वर्तमान की राजनीति मत करोबल्कि भविष्य की राजनीति करो।

याद करो तुम भारत के जंगलों से निकले हुए वो मानव हो जिन्हें इस ब्रह्मांड की सबसे सरल जलवायु व जीवन मिला है। लौट आओ अपने जंगलों की ओरऔर फिर से नष्ट होती प्रकृति तथा मानव संतति को उज्जवल भविष्य दो। तुम संसार के अग्रज हो जहां माँ का सम्मान थाजहां नारी पुरुष का आधार थीजहां सीतारामराधेश्याम या गौरीशंकर जैसे शब्दों का अस्तित्व था। जहां विश्व की सबसे उन्नत चिकित्सा व्यवस्था थी। जहां आर्यभट्ट जैसे मानव ने हजारों साल पहले ही पृथ्वी की गोलाईनक्षत्रोंसूर्य की दूरीसौर मण्डल,पाई इत्यादि जान लिए थे। जहां स्त्री स्वयंवर मे खुद वर चुनती थी। जहां स्त्री पीढ़ियों की शिक्षक व अभिभावक थी। मातृ और वात्सल्य प्रधान भारत आज गर्त की ओर अग्रसर है क्योंकि वो उन भौतिकवादियों और अत्यंत पिछड़े विश्व का अनुसरण कर रहा है जिनका अनुसंधानजिनकी रूढ़ियाँजिनका विज्ञानजिनकी सभ्यता हम जंगलियों से हजारों साल बाद की है।

हां हम वो जंगली हैं जिसे दस वर्ष की आयु तक माँ ने पढ़ाया हैजिसका गुरुकुल जंगल हैजिसकी प्रयोगशाला जंगल हैजो 25 से 50 साल तक गृहस्थ है। हम वो जंबूद्वीप वासी हैं जहां जन्म जंगल हैजहां मृत्यु जंगल हैजहां उल्लास जंगल हैजहां प्रलाप जंगल हैजहां एकांत जंगल हैजहां अध्यात्म जंगल हैजहां ऊर्जा का सिद्धांत हैजहां पृथ्वी गर्भ हैजहां विश्व कुटुम्ब हैजहां सीमाएं नहीं हैंजहां धर्म नहीं हैजहां प्रत्येक जीव आत्मा हैजहां सत्ता की लालसा नहीं हैजहां झूठा दिखावा नहीं हैजहां शान या प्रतीकार नहीं हैजहां मानव शांत है। जहां हजारों सालों से अतिक्रमण में भी जीवित निरपेक्ष साधुओं या फकीरों की वो जमात है जो जंगलों में बैठे इस सवाल का जवाब खोज रहे हैं कि-

मानव क्या हैवो क्यों आया इस धरा परक्या वो भी अन्य जीवों की तरह जीवन जीने का यत्न करे और उसके बाद प्राण त्याग दे?”

आओ दोस्तों चलें अब वापस अपने जंगलों की तरफ जहां सीमाओं में बंधे राष्ट्रों की तरह विध्वंस और मृत्यु का विकास नहीं है जहां विकास है मानव का पारलौकिक विज्ञानप्रकृति और मानवता में। जहां स्वयं की खोज है

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2 Comments on "विध्वंस का विकास"

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ravindra bhargava
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यादव जी , बहुत सुंदर विचार , आज दुनिया को , खास तोर से भारत को आपके विचारो की जरुरत है |

राम सिंह यादव
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धन्यवाद रवीन्द्र जी,

इन विचारों की सार्थकता तभी है जब हम भविष्य को बचा सकें। वर्तमान पीढ़ी पर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है की इन हालातों का सामना करते हुए मानवता को दिशा दे। ये किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं है वरन हम सबको एक कदम आगे बढ़कर कतार मे खड़ा होना होगा।

हम सभी एक गौरवमयी अनंत संस्कृति के वाहक हैं, व विश्व का भविष्य भी हम ही हैं।

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