लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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(क ) एक रविवारीय भोज के बाद, वार्तालाप में, भोजनोपरांत डकारते डकारते, मेरे एक पश्चिम-प्रशंसक, { भारत-निंदक, उन्हें स्वीकार ना होगा } वरिष्ठ मित्र नें प्रश्न उठाया, कि ”क्या, तुम्हारी हिंदी अंग्रेज़ी से टक्कर ले सकती है? सपने में भी नहीं।” यह सज्जन, हिंदी के प्रति, हीन भाव रखनेवालों में से है। वे, उन के ज्ञान की अपेक्षा, आयु के कारण ही, आदर पाते रहते है।

पर आंखे मूंद कर, ”साहेब वाक्यं प्रमाणं”, वाला उन का, यह पैंतरा और भारत के धर्म-भाषा-संस्कृति के प्रति हीन भावना-ग्रस्त-मानस मुझे रुचता नहीं। पर, ऐसी दुविधा में क्या करता? दुविधा इस लिए, कि यदि, उनकी आयु का आदर करूं, तो असत्य की, स्वीकृति समझी जाती है; और अपना अलग मत व्यक्त करूं, तो एक वरिष्ठ मित्र का अपमान माना जाता है। पर कुछ लोग स्वभाव से, आरोप को ही प्रमाण मान कर चलते हैं। यह सज्जन ¨ भी बहुत पढे होते हुए भी, उसी वर्ग में आते थे।

इस लिए, उस समय, उनका तर्क-हीन निर्णय और सर्वज्ञानी ठप्पामार पैंतरा देख, मुझे कुछ निराशा-सी हुयी। ऐसा नहीं, कि मेरे पास कुछ उत्तर नहीं था; पर इस लिए भी , कि हिंदी तो मेरे इस मित्र की भी भाषा थी, एक दृष्टि से मुझ से भी कुछ अधिक ही।पर उस समय उनका आक्रामक रूप, चुनौती भरा पैंतरा और ”सपने में भी नहीं” यह ब्रह्म वाक्य और आयु देख, उन्हें उत्तर देना मैं ने उचित नहीं माना। पर इस प्रसंग ने मेरी जिज्ञासा जगाई, अतः इस विषयपर कुछ पठन-पाठन-चिंतन-मनन इ. करता रहा।

(ख) तो, क्या, हिंदी अंग्रेज़ीसे टक्कर ले सकती है?

निश्चित ले सकती है। और हिंदी भारतके लिए कई गुना लाभदायी ही नहीं, शीघ्र-उन्नतिकारक भी है। भारत की अपनी भाषा है। मैं इस विषयका हरेक बिंदु न्यूनतम शब्दों में क्रमवार आपके सामने रखूंगा। केवल तर्क ही दूंगा, भावना नहीं जगाउंगा। तर्क की भाषा सभी को स्वीकार करनी पडती है, पर केवल भावनाएं, आप को वयक्तिक जीवन में जो चाहो, करने की छूट देती है। और मैं चाहता हूं, कि सभी भारतीय हिंदी को अपनाएं; इसी लिए तर्क, केवल तर्क ही दूंगा।

(ग)

आप निर्णय लें, मैं नहीं लूंगा। न्यूनतम समय लेकर मैं क्रमवार बिंदू आप के समक्ष रखता हूँ। इन बिंदुओं में भाउकता नहीं लाऊंगा। राष्ट्र भक्ति, भारतमाता, संस्कृति, इत्यादि शब्दों से परे, केवल तर्क के आधार पर प्रतिपादन करूंगा। तर्क ही, सर्व स्वीकृति के लिए उचित भी और आवश्यक भी है। इस लिए, केवल तर्क-तर्क-और तर्क ही दूंगा।

”हिंदी और देवनागरी की वैज्ञानिकता”

(१)हर बिंदू पर गुणांक, आप अपने अनुमानके अनुसार, लगाने के लिए मुक्त हैं।

हमारी देवनागरी समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है,सर्वोत्तम हैं। और, संसार के किसी भी कोने में प्रयुक्त वर्णमाला वैज्ञानिक रूप में विभाजित नहीं है, जैसी देवनागरी है। [गुणांक ५० अंग्रेज़ी २०]

(२) आप अपना नाम हिंदी में लिखिए। मैं ने ”मधुसूदन”(५ अक्षर) लिखा। अब अंग्रेज़ी-रोमन में लिखिए ”madhusudan” (१० अक्षर) अब, बताइए कि १० अक्षर लिखनेमें अधिक समय लगेगा, या ५ अक्षर लिखने में? ऐसे आप किसी भी शब्दके विषय में कह सकते हैं। गुणांक {हिंदी २०-अंग्रेज़ी १०}

(३) हिंदी में वर्तनी होती है, पर अंग्रेज़ी की भांति स्पेलिंग नहीं होती। लिपि चिह्नों के नाम और ध्वनि अभिन्न (समरूप) है।जो बोला जाता है, उसीको लिखा जाता है। क लिखो, और क ही पढो, गी लिखो और गी ही पढो।जो लिखा जाता है, वही बोला जाता है। ध्वनि और लिपि मे सामंजस्य है।

अंग्रेज़ी में ऐसा नहीं है। लिखते हैं S- T- A- T- I- O- N, और पढते हैं स्टेशन। उसका उच्चारण भी आपको किसीसे सुनना ही पडेगा। हमें तो देवनागरी का लाभ अंग्रेज़ी सीखते समय भी होता है, उच्चारण सीखने में भी, शब्द कोष के कोष्ठक मे देवनागरी में लिखा (स्टेशन) पढकर हम उच्चारण सीख गए। सोचो, कि केवल अंग्रेज़ी माध्यम में पढने वाला इसे कैसे सीखेगा? चीनी तो और चकरा जाएगा। देखा देवनागरी का प्रताप ! [हिंदी ५० अंग्रेज़ी २५]

(४) और, अंग्रेज़ी स्पेलिंग रटने में आप घंटे, बीता देंगे। इस एक ही, हिंदी के गुण के आधार पर हिंदी अतुलनीय हो जाती है। आज भी मुझे (एक प्रोफेसर को) अंग्रेज़ी शब्दों की स्पेलिंग डिक्षनरी खोल कर देखने में पर्याप्त समय व्यय करना पडता है।हिंदी शब्द उच्चारण ठीक सुनने पर, आप उसे लिख सकते हैं। कुछ वर्तनी का ध्यान देने पर आप सही सही लिख पाएंगे। {हिं 100 गुण -अं – १० )।

हो सकता है, आपको 100 गुण अधिक लगे। पर आप के समय की बचत निश्चित कीमत रखती है। इससे भी अधिक, यह गतिमान, शीघ्रता का युग है। समय बचाने आप क्या नहीं करते? विमान, रेलगाडी, मोटर, बस सारा शीघ्रता के आधार पर चुना जाता है।

(५) हिंदी में, एक ध्वनिका एक ही संकेत है। अंग्रेज़ी में एक ही ध्वनि के लिए, अनेक संकेत काम में लिए जाते हैं। उदा. जैसे —-> क के लिए, k (king), c (cat), ck (cuckoo) इत्यादि.

एक संकेत से अनेक ध्वनियाँ भी व्यक्त की जाती है। उदा. जैसे—> a से (१) अ (२)आ (३) ऍ (४) ए (५) इत्यादि। [हिंदी २५ अंग्रेज़ी १०]

(६) यही कारण था, कि, शालांत परीक्षा में हिंदी (मराठी) माध्यम से हम लोग शीघ्रता से परीक्षा के प्रश्न हल कर लेते थे। जब हमारे अंग्रेज़ी माध्यमों वाले मित्र विलंब से, उन्ही प्रश्नों को अंग्रेज़ी माध्यम से जैसे तैसे समय पूर्व पूरा करने में कठिनाई अनुभव करते थे। एक उदाहरण लेकर देखें। भूगोल का प्रश्न:

कोंकण में रेलमार्ग क्यों नहीं? {१२ अक्षर}और अंग्रेज़ी में होता था,

Why there are no railways in Konkan?{२९ अक्षर}

उसका उत्तर लिखने में भी उन्हें अधिक लिखना पडता था। अक्षर भी अधिक, गति पराई भाषा होने से धीमी, और अंग्रेज़ी में, सोचना भी धीमे ही, होता था। प्रश्न तो वही था, पर माध्यम अलग था।और फिर शायद उन्हें स्पेलिंग का भी ध्यान रखना पडता था। पर परीक्षार्थी का प्रभाव निश्चित घट जाता होगा। जो उत्तर एक पन्ने में हम देते थे, वे दो पन्ने लेते थे। (हिं २५-अं १०}

(७) हिंदी का लेखन संक्षेप में होता है।

उदा:एक बार मेरी, डिपार्टमेंट की बैठक में, युनिवर्सीटी के अध्यक्ष बिना पूर्व सूचना आए थे, जब हमारी सहायिका (सेक्रेटरी) छुट्टी पर थी। तो कनिष्ठ प्राध्यापक होने के नाते, मुझे उस के सविस्तार विवरण के लिए नियुक्त किया गया।इस बैठक मे, अध्यक्ष ने महत्व पूर्ण वचन दिए थे, जिस का विवरण आवश्यक था।

मैने कुछ सोच कर, देवनागरी मे, अंग्रेजी उच्चारों को लिखा, जो रोमन लिपिकी अपेक्षा, दो से ढाइ गुना शीघ्र था। जहां The के बदले ’द’ से काम चलता था, laboratory Expense के बदले लॅबोरॅटरी एक्सपेंस इस प्रकार लिख कर नोट्स तैय्यार किए, शब्दों के ऊपर की रेखा को भी तिलांजली दी। फिर घर जाकर, उसी को रोमन लिपि मे रूपांतरित कर के दुसरे दिन प्रस्तुत किया। विभाग के अन्य प्रोफेसरों के, अचरज का पार ना था। पूछा, क्या मà �ˆ शॉर्ट हॅंड जानता हूं? मैने उत्तर मे हिंदी- देव नागरी की जानकारी दी। उनके नाम लिख कर थोडी प्राथमिक जानकारी दी। उन्हें, हमारी नागरी लिपि कोई पहली बार समझा रहा था। अपेक्षा से कई अधिक, प्रभावित हुए। एक आयर्लॅण्ड से आया प्रॉफेसर लिपि के वलयांकित सुंदर(सविनय,मेरे अक्षर सुंदर है)अक्षरों को देख कर बोला ,यह तो सुपर-ह्यूमन लिपि है। {मन में सोचा, यह तो, अंग्रेज़ी में, इसे, देव(Divine) नागरी कह रहा à ��ै।} संसार भर में, इतनी वैज्ञानिक लिपि और कोई नहीं। सारे पी एच डी थे, पर उन्हें किसी ने हिंदी-नागरी लिपि के बारे में ठीक बताया नहीं था। हिंदी को उस के नाम से जानते थे, कुछ शब्द जैसे नमस्ते इत्यादि जानते थे। बंधुओ ! लगा, कि, हम जिस ढेर पर बैठे हैं, कचरे कूडे का नहीं पर हीरों का ढेर है। हृदय गद गद हुआ। हिंदी पर, गौरव प्रतीत हुआ। [हिंदी ५० अंग्रेज़ी २५]

(८) व्यक्ति सोचती भी शब्दों द्वारा है।जब आप सोचते हैं, मस्तिष्क में शब्द मालिका चलती है। लंबा शब्द अधिक समय लेता है, छोटा शब्द कम।

तो जब अंग्रेज़ी के शब्द ही लंबे हैं, तो उसमें सोचने की गति धीमी होनी ही है। अतिरिक्त, वह परायी भाषा होनेसे और भी धीमी। इसका अर्थ हुआ, कि अंग्रेज़ी में विचारों की गति हिंदी की अपेक्षा धीमी है। मेरी दृष्टि में हिंदी अंग्रेज़ी से दो गुना गतिमान है। [हिंदी ५० अंग्रेज़ी २५]

(९) लेखन की गति का भी वही निष्कर्ष। जो आशय आप ६ पन्नों में व्यक्त करेंगे। अंग्रेज़ी में व्यक्त करने में आपको १० पन्ने लगते हैं। गीता का एक २ पंक्ति का श्लोक पना भरकर अंग्रेज़ी में समझाना पडता है।[हिंदी ५० अंग्रेज़ी २५]

(१०) अर्थात, आप अंग्रेज़ी भाषा द्वारा शोध कर रहे हैं, तो जो काम ६ घंटों में हिंदी में कर सकते थे, उसे करने में आप को १० घंटे लग सकते हैं। अर्थ: आप शोध कार्य हिंदी में करेंगे, तो जीवन भर में ६७% से ७५% अधिक शोधकार्य कर सकते हैं। [हिं ५० अंग्रेज़ी २५]

(११) इस के अतिरिक्त हर छात्रको हिंदी माध्यम द्वारा, आज की शालेय शिक्षा अवधि में ही,(११-१२ वर्ष में) MSc की उपाधि मिल पाएगी। अर्थात आज तक जितने लोग केवल शाला पढकर निकले हैं, वे सारे M Sc से विभूषित होत।अंग्रेज़ी के कारण, यह ज्ञान भंडार दुर्लक्षित हो गया है।{ संदर्भ: बैसाखी पर दौडा दौडी, मुख्तार सिंह चौधरी} तो, क्या भारत आगे नहीं बढा होता? क्या भारत पीछडा होता ? भारत आज के अनुपातमें, कमसे कम, ३ स े ५ गुना आगे निकल गया होता?वैसे हम भारतीय बहुत बुद्धिमान है। यह जानकारी परदेश आकर पता चली। { हिंदी ५०० अंग्रेज़ी १००}

(१२) किसी को अंग्रेज़ी, रूसी, चीनी, अरबी, फारसी ही क्यों झूलू, स्वाहिली. हवाइयन —-संसार की कोई भी भाषा पढने से किस ने रोका है? प्रश्न:कल यदि रूस आगे बढा तो क्या तुरंत सभी को रूसी में शिक्षा देना प्रारंभ करेंगे? और परसों चीन आगे बढा तो? और फ्रांस?

वास्तव में पडोस के, चीन की भाषा पर्याप्त लोगों ने (सभी ने नहीं)सीखने की आवश्यकता है। उन की सीमा पर की कार्यवाही जानने के लिए। मेरी जानकारी के अनुसार आज कल यह जानकारी हमें अमरिका से प्राप्त होती है। या,फिर आक्रमण होने के बाद! [अनुमानसे लिखा है] अमरिका में सारी परदेशी भाषाएं गुप्त शत्रुओं की जान कारी प्राप्त करने के लिए पढी जाती हैं।

जो घोडा प्रति घंटा ५० मील की गति से दौडता है, वह क्या २० मील प्रति घंटा दौडनेवाले घोडेसे अधिक लाभदायी नहीं है?

पर भारतीय कस्तुरी मृग(हिरन) दौड रहा है, सुगंध का स्रोत ढूंढने। कोई तो उसे कहो, कहां भटक रहे हो, मेरे हिरना!तेरे पास ही, सुगंध-राशी है।

मुझे यह विश्वास नहीं होता, कि ऐसी कॉमन सेन्स वाली जानकारी जो इस लेखमें लिखी गयी है, हमारे नेतृत्व को नहीं थी? क्या किसी ने ऐसा सीधा सरल अध्ययन नहीं किया?

अब भी देर भले हुयी है। शीघ्रता से चरण बढाने चाहिए।

तो,क्या हिंदी अंग्रेज़ी से टक्कर ले सकती है? आप बुद्धिमान हैं। आप ही निर्णय करें।

===>सूचना: प्रश्नों के उत्तर देने में पर्याप्त विलंब होगा। विशेष: भाग दो की भी प्रतीक्षा करें।

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43 Comments on "डॉ. मधुसूदन: ”हिंदी-अंग्रेज़ी टक्कर?” भाग-एक"

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ken
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(२) आप अपना नाम हिंदी में लिखिए। मैं ने ”मधुसूदन”(५ अक्षर) लिखा। अब अंग्रेज़ी-रोमन में लिखिए ”madhusudan” (१० अक्षर) अब, बताइए कि १० अक्षर लिखनेमें अधिक समय लगेगा, या ५ अक्षर लिखने में? कोंकण में रेलमार्ग क्यों नहीं? {१२ अक्षर}और अंग्रेज़ी में होता था, Why there are no railways in Konkan?{२९ अक्षर} One may count key strokes ,pen strokes and look at visual eye strain while reading and simplicity in writing when evaluating a language. India needs simple script but let the people and tools offered by computer decide what’s good for them. मधुसूदन म ध उ स ऊ द… Read more »
dr dhanakar thakur
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मधुसुदंजी के इस उत्तम लेख आ उर उस पर प्रस्तुत टिप्पणियां महत्वपूर्ण हैं फिर भी मेरा यह मत है की भारत केलिए सरल संस्कृत ही ग्राह्य और स्वीकार्य भाषा होने जा रही है भले ही इसका विरोध कुछ हिन्दू विरोधी व ब्रह्मण विरोधी अनेक नाम से करें – इस आलेख्मे जिस लिपि देवनागरी की चर्चा की गयी है वह संस्कृत की है इस लिए यह हिन्दी अंगरेजी टक्कर नहीं रोमन देवनागरी / संस्कृत टक्कर है और भी आसान हो जता आपका आकलन यदि आप प्रचलित हिन्दी के मानकों से हंट संस्कृत की तरह शब्द -ब्विभक्ति को मिला लिखने सलाह देते(… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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डॉ. ठाकुर कल ही,
“अंग्रेज़ी से कड़ी टक्कर” डाला है.
देखने की कृपा का अनुरोध करता हूँ.

Vishwa Mohan Tiwari
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मुझे तो लगता है कि भारत को फ़ोड़ने के लिये एक षड़यंत्र चल रहा है।
यदि हिन्दी का अस्तित्व ही‌हटा दिया जाए, यह कह कुप्रचारकर कि वह कोई भाषा ही नहीं है, तब अंग्रेज़ी के विरोध में कोई भी‌भारतीय भाषा, संस्कृत सहित, खड़ी नहीं हो सकती। आम जन को संस्कृत से कोई ‘मतलब
नहीं। कुछ विद्वान क्या कर सकेंगे, बस अभी तक हिन्दी और अन्य राष्ट्ीय भाषाओं वाले लड़ रहे थे ( यह भी दुर्भाग्य’ है) अब हिन्दी और संस्कृतवाले भी लड़ने लगेंगे
.बिल्लियां आपस में लड़ती रहें, बन्दर को लाभ मिलेगा ही।

डॉ. मधुसूदन
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(१) डॉ, ठाकुर : मधुसुदंजी के इस उत्तम लेख आ उर उस पर प्रस्तुत टिप्पणियां महत्वपूर्ण हैं म:==>विधान: एक आदर्श ब्राह्मण की भाँति, प्रादेशिकता से ऊपर उठकर, राग-द्वेष रहित, पर राष्ट्रीयता को जगाकर, व्यवहार्यता को लक्ष्य़ में, रखते हुए, चिन्तन अपेक्षित है। मेरा ऐसा प्रयास है। यह एक वर्ष पुराना आलेख है।मेरे विचारमें कुछ बिन्दु और परिष्कृत किए जा सकते हैं। मैं न्यूनतम विरोध की दृष्टि से, और प्रादेशिकता से ऊपर उठकर सोचने का प्रयास करता हूँ।”सर्वेषां अविरोधेन” यदि संभव नहीं तो “न्यूनतम विरोधेन” का प्रयास है। ——————————– (२) डॉ, ठाकुर :फिर भी मेरा यह मत है की भारत केलिए… Read more »
Vishwa Mohan Tiwari
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प्रिय मधुसुदना जी, बहुत बधाई, धन्यवाद तथा साधुवाद, आपकी शैली के अनुकूल आपने जड़ में जाकर कार्य किया है, और तर्क स्वीकार करना होता है.. आपको १०० में से ९५ अंक देता हूँ एक बिंदु खोलना चाहता हूँ जो आप के मन में उपस्थित है : आपने भाषा के एक ही गुण को लेकर चर्चा की है – वर्तनी और उससे सम्बंधित गुण.. आप जानते हैं की भाषा के अनेक गुण होते हैं , तभी तो आपने इस लेख के शीर्षक में “भाग एक” लिखा है, और अन्य भागों को आप क्रमशः लिखेंगे ..जैसे व्याकरण, अर्थ विषयक, भाषा विज्ञान, अदि,… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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आदरणीय तिवारी जी,
आपने अगले लेख का आशय सही सही पहचाना/सुझाया।
आप के शब्द और प्रतिक्रिया,मेरे लिए प्रेरक हैं।
एवं मेरे अगले लेख की दिशा भी सुनिश्चित करते है।
हृदयतल से धन्यवाद।

shishir chandra
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आदरणीय मधुसुदनजी नमस्कार! चित्त प्रसन्ना हुआ यह जानकार की आप मातृभाषा की सेवा का काम अनवरत जारी रखे हुए हैं,

डॉ. मधुसूदन
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शिशिर जी,
कहाँ खो गये थे?
प्रवक्ता के लिए,कुछ समय निकाल कर अपना स्वतन्त्र,दृष्टिकोण, अलग हो तो भी,दर्शाते रहिए।
बहुत बहुत धन्यवाद।

डॉ. मधुसूदन
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डॉ. राजेश कपूर जी मैं अपनी ओर से पूरा प्रयास करुंगा. मुझे संदेह नहीं है, कि हिंदी ही भारत की शीघ्रताशीघ्र उन्नति के लिए परमावश्यक है| पर, अन्य मतों को भी सुनना चाहता हूँ, जिस से मेरी प्रस्तुति परिशुद्ध हो, और मेरी प्रस्तुति की त्रुटियाँ पता चले. कोई भी देश पराई( अंग्रेजी की) वैशाखी पर चढ़कर विश्वकी ओलिम्पिक जित नहीं सकता. कुछ दूर दर्शिता के अभाव में तत्कालीन राज्य कर्ताओं नें शायद(?) त्वरित राजकीय लाभ की ओर देखकर देशका बहुत बड़ा घाटा होने दिया. आप की और अन्य विद्वानों की टिप्पणियां मुझे विश्व विद्यालय से अनुमति लेने में भी सहायक… Read more »
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