डॉ. वेद प्रताप वैदिक: पत्रकारिता के क्षेत्र की एक जगमगाता तारा अस्त हो गया

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पत्रकारों के लिए सदैव प्रेरणा स्त्रोत रहेगा वैदिक जी का लेखन और जीवन

(लिमटी खरे)

डॉ. वेद प्रताप वैदिक का नाम किसी के लिए नया नहीं है। हर कोई इनके विचारों, लिखने की विधा, बीच बीच में चुटीला पुट आदि के मुरीद रहा होगा, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। 79 वर्षीय डॉ. वेद प्रताप वैदिक 14 मार्च को घर में फिसलकर गिरे और उसके बाद वे उठ नहीं सके। उनका अंतिम संस्कार नई दिल्ली के लोधी रोड स्थित शमशान में 15 मार्च को शाम 04 बजे किया जाएगा।

डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने हिन्दी भाषा को समृद्ध बनाने की दिशा में दिल से प्रयास किए। आपका जन्म 30 दिसंबर 1944 को मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में हुआ था। आपने विश्व के अनेक देशों में अध्ययन किया और बाद में वे इन देशों के अलावा अनेक देशों के भ्रमण पर भी गए।

डॉ. वेद प्रताप वैदिक की विद्वता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर शोध किया और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने हिन्दी में अपना शोध जमा करने की जिद पकड़ी और उनका निष्काशन तक हुआ। उस दौरान संसद में यह मामला गूंजा।

उस दौर में डॉ. वेद प्रताप वैदिक को डॉ. राम मनोहर लोहिया, इंदिरा गांधी, गुरू गोलवकर, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. जाकिर हुसैन, रामधारी सिंह दिनकर, डॉ. हरिवंशराय बच्चन, डॉ. धर्मवीर भारती आदि जैसी शख्सियतों का पूरा समर्थन प्राप्त हुआ। अंत में उनकी विजय हुई और उन्होंने एक इतिहास का सृजन किया।

डॉ. वेद प्रताप वैदिक सत्याग्रही भी रहे हैं। महज 13 साल की आयु में 1957 में आप पटियाला जेल में रहे और अनेक जन अंदोलनों के वे सूत्रधार भी बने। आपने भारतीय विदेश नीति के क्षेत्र में भी महती भूमिका का निर्वहन किया। आपने 90 से ज्यादा देशों की यात्राएं भी कीं, इतना ही नहीं अपने 1999 में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया।

डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने लगभग छः दशकों तक सक्रिय पत्रकारिता करते हुए पत्रकारिता के नए आयाम विकसित किए। आपने हजारों आलेख लिखे। वे एक दशक तक हिन्दी समाचार समिति (पीटीआई) के संस्थापक संपादक और नवभारत टाईम्स के विचार संपादक भी रहे। आपके लेख रोजाना ही सैकड़ों समाचार पत्रों, वे पोर्टल्स आदि मे प्रकाशित और प्रसारित होते रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल लिखते हैं कि डॉ. वेद प्रताप वैदिक के निधन के साथ ही हिंदी पत्रकारिता जगत ने उस पीढ़ी के अंतिम हस्ताक्षर को खो दिया, जो आजादी के बाद उभरी थी। पत्रकारिता के इंदौर घराने ने ही उनको पत्रकारिता के संस्कार दिए। भारतीय हिंदी पत्रकारिता के इतिहास पर उनका शोध अद्भुत और चमत्कृत करने वाला है। खास तौर पर उस जमाने में, जबकि इंटरनेट या सूचना प्राप्ति के आधुनिक संचार साधन नही थे। यह ग्रंथ अपने आप में एक संपूर्ण ज्ञान कोष है। अफगानिस्तान पर उनकी पीएचडी उनकी एक और नायाब प्रस्तुति है। बुनियादी तौर पर अफगानिस्तान के अतीत और चरित्र को समझने वालों के लिए यह शोध प्रबंध इन साईक्लोपीडिया से कम नही है।

2004 के बाद लगभग दस साल तक हमने दिल्ली में रहकर पत्रकारिता की। उस दौरान डॉ. वेद प्रताप वैदिक के साथ अनेक मुलाकातें हुईं। उनसे माह में एक बार तो कम से कम मोबाईल पर बात हो ही जाती थी। उनके आलेख नियमित तौर पर हमें ईमेल के जरिए प्राप्त होते, रहे हैं, जिन पर अब विराम लग जाएगा। हम भी उस दौरान राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर विचार साझा किया करते थे, जो अनेक वेब पोर्टल्स और अखबारों में स्थान पाते थे।

इसी दौरान समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह ने क्लिंटन फाऊॅडेशन को 25 करोड़ का दान देने की खबर सामने आई। हमने इस पर ‘कहां से आया क्लिंटन फाऊॅडेशन को देने अमर दान‘ शीर्षक से आलेख लिखा। यह आलेख उस समय काफी चर्चित हुआ। हमें अनेक बधाईयां भी इसके लिए मिलीं।

दिल्ली के लोधी रोड स्थित इंडिया हेबिटेट सेंटर में डॉ. वेद प्रताप वैदिक से एक कार्यक्रम में भेंट हुई। हमने उनके पैर छुए और आर्शीवाद लिया। वे उस समय किसी और से चर्चा में मशगूल थे। उन सज्जन से फारिग होते ही वे हमसे मुखातिब हुए और बोले – ‘तुमने आलेख के लिए न केवल बहुत अच्छा विषय लिया है, वरन लिखा भी बहुत ही बेहतरीन है, क्लिंटन फाऊॅडेशन वाला‘। हम फूल कर कुप्पा हो गए। स्वाभाविक ही था, कि एक ख्याति लब्ध पत्रकार हमारी तारीफ कर रहा था।

अगले ही पल उन्होंने हमारे फुग्गे की हवा निकाल दी। कहने लगे, क्या तुम्हारा आलेख क्लिंटन पढ़ेंगे! हमने कहा नहीं। फिर वे बोले तो इस तरह उपस्थिति दर्ज कराने के लिए लिखने से क्या फायदा! लिखना है तो अपने क्षेत्र के सांसद या विधायक के बारे में लिखो, जिन तक तुम्हारी आवाज पहुंच सकती है। जिससे कुछ सुधार हो सकता है। धारा प्रवाह में बोलते हुए उन्होंने कहा कि अगर खुजाना है (अर्थात किसी बात पर किसी को कुछ लिखकर सुधार करना है) तो मोहल्ले के पहलवान को खुजाओ! बात हमारी समझ में आ गई। उस दिन के बाद हमने इसे गुरू मंत्र मानते हुए उन विषय या व्यक्तित्व पर ही लिखना आरंभ किया जिन तक हमारी पहुंच आसान थी।

डॉ. वेद प्रताप वैदिक के बारे में एक बात खरी उतरती है कि वे पत्रकारिता के क्षेत्र में युग पुरूष की भूमिका में थे। उन्होंने पत्रकारिता को नया आयाम दिया तो नवोदित पत्रकारों के लिए वे आदर्श साबित होते रहे। उन्होंने अपने नफा नुकसान की परवाह किए बिना मूल्य आधारित पत्रकारिता की है। उन्होंने समग्र और सार्थक जीवन जिया, लोगों के लिए वे मिसाल ही साबित हुए हैं और भविष्य में भी वे लोगों के प्रेरणा स्त्रोत ही बने रहेंगे।

डॉ. वेद प्रताप वैदिक जी को ईश्वर अपने श्रीचरणों में स्थान दे, उनकी कमी की भरपाई शायद कभी न हो पाए . . 

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