लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

Posted On by &filed under कला-संस्कृति.


आज एक पत्थर मारकर आवागमन में विघ्न डालने जा रहा हूं। बिना पत्थर मारे कोई मेरी बात सुनेगा ही नहीं। कोई ध्यान देगा ही नहीं। संसार के आठवें आश्चर्य के विषय में लिखने की सोची है।

जानते हो, कि, संसार भर में एक देश ऐसा भी है, जो बैसाखी पर दौड रहा है। सारे के सारे देश के नागरिक, नर नारी जिन्हें विरासत में परमोत्कृष्ट चरण प्राप्त थे, परमात्मा नें इस देशपर बडी कृपा की थी, सभी देशों की अपेक्षा, इस देशको अत्त्युत्तम सशक्त सक्षम पैर मिले थे। ऐसे पैर कि जो और किसी के पास नहीं थे, आज भी किसीके पास नहीं है। केवल भूतकाल में ही नहीं, आज भी यह कथन सत्य ही प्रमाणित होगा। ऐसा हो नेपर भी, सारे के सारे नागरिक बैसाखी पर दौड रहे हैं। जो नहीं दौडते वे दुःखी है,वे भी दौडना चाहते हैं। क्यों? बडा अचरज हैं। इसे संसारका ८ वाँ आश्चर्य कहना चाहिए।

ऐसी स्थिति किसी और देशकी भी है क्या? जी नहीं। जापान अपने पैरोंपर खडा हो कर दौड रहा है।अभी अभी, हमारे साथ साथ ही प्रारंभ करता हुआ, इज्राएल अपने पैरों पर खडा हो गया, और अब दौड भी रहा है, बहुत आगे भी निकल गया है। जर्मनी, फ्रांस, चीन, रूस सारे अपने पैरोंपर दौड रहे हैं।

पर इस देशका प्रधान मंत्री भी बैसाखीपर ही दौडता है, उसका हर मंत्री बैसाखी पर दौडने में गौरव अनुभव करता है, हर पढा लिखा (?)विद्वान भी बैसाखीपर दौडे बिना अपने आप को सुशिक्षित नहीं मानता। नेता क्या अभिनेता क्या? और जब बैसाखीपर कठिनाई अनुभव करता है, जब आगे जा नहीं पाता, दौड नहीं पाता, तो बीच बीच में बैसाखी से उतरकर चल भी लेता है। अपना काम निकल जाने पर फिरसे बैसाखी पर चढ कर शेखी बघारता हुआ द ौडने लगता है। कभी आपने हमारे ही पैसों पर धनी हुए अभिनेता ओं के साक्षात्कार देखें हैं? प्रश्न हिंदी में पूछा जाता है। पर बहुतों का उत्तर बैसाखीपर आता है। अबे मूरख! तू सारे चल चित्र में हिंदी में बोल सकता है, तो कौनसे रोग के कारण अब बैसाखीपर चढ गया?

आपने अनुमान कर ही लिया होगा, यह बैसाखी अंग्रेज़ी की बैसाखी है।

बालकों का सारा बचपन खेल कूद में, बीतने के बदले, बैसाखीपर चढना सीखने में, फिर संतुलन सीखने में, फिर धीरे धीरे लडखडा कर चलना ,और फिर ठीक चलना,फिर दौडना सीखने में बीत जाता है। बिना खेल कूद के बचपन का परिणाम युवाओं के कुंठित मानस और व्यवहार में देखा जाता है। अब कहते हैं कि विश्वकी उन्नति की दौडका ऑलिम्पिक भी इसी बैसाखीपर दौड कर जीत कर दिखाओ।

इसी बैसाखी का, हमें बहुत लाभ(खाक) हुआ?

(एक) तो, हमारा समाज हीन ग्रंथिसे पीडित हो गया,

( दो) पश्चिमसे मति भ्रमित हुआ, या धौत बुद्धि हो गया , हतप्रभ हो गया, आत्म विस्मृत हो गया।

(तीन) और हम पीछड गये।

(चार)आज यदि हमारा साधारण {७० % से भी अधिक} बहुसंख्य नागरिक प्रति दिन २५ रूपयों से कम वेतन पर जीवित है, तो कारण है, यह बैसाखी।

(पांच) बैसाखी पर चढे हुए छद्म अफसर साधारण नागरिक को हीनता का अनुभव कराते हैं, तो कारण है यह बैसाखी। सारे देशकी असंतुलित उन्नति आयी तो सही, पर इस साधारण नागरिक के निकट से निकल गयी। उसे पता तक नहीं चला कि, ऐसी कोई उन्नति भी आयी हुयी थी, जिसका कुछ लाभ उसे भी प्राप्त हुआ हो।

(छः) इस देशके कृषक की ऐसी उन्नति हुयी, कि, वह आत्म हत्त्या कर रहा है।{धन्य धन्य }

और मंत्री क्या, अफसर क्या, नेता क्या, अभिनेता क्या, हर कोई बैसाखी पर चढा हुआ, अपने आपको आम जनता से बिलकुल दूर और ऊंचा अनुभव करता है। जैसे स्वतः कोई आकाशसे टपक पडा ना हो? बैसाखीपर चढे चढे बाते करता है।

यह बैसाखी के बीज की घुट्टी अंग्रेज़ी शिक्षा के माध्यमसे पिलायी गयी।

सूज्ञ पाठक भी अब तक, समझ ही गये होंगे, कि यह बैसाखी जिसकी चर्चा चल रही है, वह अंग्रेज़ी की बैसाखी है।

वैसे नेतृत्व का मूल नेत्र हैं। नेता वह है, जिसे नेत्र हैं। जो दूरकी भी, और निकटकी भी देख सकते हैं। और ठीक देखकर देशको दिशा देता हैं। दुर्भाग्य हमारा, हमारे नेतृत्वनें, निकटकी {चुनावकी}तो देखी पर दूरकी नहीं देख पाये।

॥ठोस उदाहरण॥

एक ठोस घटा हुआ ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ। चौधरी मुख्तार सिंह एक देशभक्त हिन्दीसेवी एवं शिक्षाविद थे।

1946 में वायसराय कौंसिल के सदस्य चौधरी मुख्तार सिंह ने जापान और जर्मनी की यात्रा के बाद यह अनुभव किया था कि यदि भारत को कम (न्यूनतम) समय में आर्थिक दृष्टि से उन्नत होना है तो जन भाषा में जन वैज्ञानिक बनाने होगे । उन्होने मेरठ के पास एक छोटे से देहात में ”विज्ञान कला भवन” नामक संस्था की स्थापना की। हिन्दी मिड़िल पास छात्रों को उसमें प्रवेश दिया। और हिन्दी के माध्यम से मात्र पांच व र्षों में उन्हें एम एस सी के कोर्स पूरे कराकर ”विज्ञान विशारद” की उपाधि से विभूषित किया। इस प्रकार के प्रयोग से वे देश की सरकार को दिशा देना चाहते थे कि जापान की भांति भारत का हर घर ”लघु उद्योग केन्द्र” हो सकता है।

दुर्भाग्यवश दो स्नातक टोलियों के निकलने के बाद ही चोधरी साहब की मृत्यु हो गई और प्रदेश सरकार ने ”विज्ञान कलाभवन” को इंटर कॉलेज बना दिया। वहां तैयार किए गए ग्रन्थों के प्रति भी कोई मोह सरकार का नहीं था। पर इस प्रयोग ने यह भी सिद्ध तो किया ही (अगर यह सिद्ध करने की जरूरत थी तो) कि जनभाषा ही आर्थिक उन्नति का रहस्य है। जनविज्ञान, विकास की आत्मा है।

जनभाषा ही जनतंत्र की मूल आत्मा को प्रतिबिंबित कर सकती है, यह बात गांधी जी ही नहीं और नेता भी जानते थे। तभी तो राजाजी कहते थे, ’हिन्दी का प्रश्न आजादी के प्रश्न से जुड़ा है’। और तभी तो ”आजाद हिन्द फौज की भाषा हिन्दी” थी। तभी तो युवको को अंग्रेजी स्कूलों से हटा कर उनके अभिभावकों ने हिन्दी एवं राष्ट्रीय विद्यालयों में भेजा था। लाल बहादुर शास्त्री आदि देशरत्न ऐसे ही विद्यालय� �ं की उपज थे। हिन्दी परिवर्तन की भाषा थी, क्रान्ति का उद्बोधन थी उन दिनों। {विकिपीडिया,- एक मुक्त ज्ञानकोष से}

कुछ हिसाब लगाते हैं। चौधरी मुख्तार सिंह जी के ऐतिहासिक उदाहरण के आधार पर कुछ हिसाब लगाते हैं।

आज मिड़िल के, उपरांत ४ या ५ वर्ष तो शालामें ही पढना पडता है। उसके पश्चात ६ वर्ष M Sc करने में लग जाते हैं। तो हिंदी (या जन भाषा) माध्यमसे हर छात्र के ६ वर्ष बच जाते हैं।

(क) तो, करोडों छात्रों के ऐसे ६ वर्ष, बच पाएंगे,

(ख) अब्जों की मुद्रा बचेगी। हां जिन्हें अंग्रेज़ी माध्यमसे पढना हो, वे पढें, और अधिक वर्ष तक पढें, अपने बल पर, अपने पैसे खर्च कर, पढें, भारत का शासन उसे सहायता ना करें।

(ग) वास्तवमें भारत की गरीब जनता ही तो, उसे अनुदान दे रही है। {सरकार किसका धन देती है?}

(घ) हमारा आम नागरिक हीनता का अनुभव क्यों करता है? उसे ऐसा अनुभव कराने वाला खुद बैसाखीपर चढा हुआ छद्म अफसर है।

१) जिस दिनसे भारत हिंदी को एक क्रांतिकारी, प्रतिबद्धतासे पढाएगा; भारतका सूर्य जो ६३ वर्षोंसे उगनेका प्रयास कर रहा है, वह दशकके अंदर चमकेगा,अभूतपूर्व घटनाएं घटेगी। कोटि कोटि छात्रोंको अंग्रेजीकी बैसाखीपर दौडना(?) सीखानेमें, खर्च होती, अब्जोंकी मुद्रा बचेगी। सारा समाज सुशिक्षितता की राह पर आगे बढेगा। कोटि कोटि युवा-वर्षॊकी बचत होगी, बालपन के खेलकूद बिनाहि तरूण बनते युवाओंके ज� �वन स्वस्थ होंगे।

सारे देशको अंग्रेजी बैसाखीपर दौडानेवाले की बुद्धिका क्या कहे? फिर इसी बैसाखीपर, विश्वमें ऑलिम्पीक जीतना चाहते हैं ? श्वेच्छासे कोई भी भाषा का विरोध नहीं, पर कुछ लोगोंकी सुविधाके लिए सारी रेल गाडी मानस सरोवरपर क्यों जाए?

(२) अंतर राष्ट्रीय कूट नीति की पाठय पुस्तकों के अनुसार, साम्राज्यवादी देश, (१) सेना बल से (२)या, धन बल से (३) या, सांस्कृतिक (ब्रैन वाशिंग करकर) आधिपत्य जमाकर परदेशों पर शासन करते हैं।यह तीसरा रास्ता मॅकाले ने अपनाया था।हम बुद्धुओं को समझ ना आया।

Leave a Reply

20 Comments on "बैसाखी पर दौडा दौडी"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
डॉ. मधुसूदन
Guest

डॉ. प्रतिभा जी सक्सेना -अनेकानेक धन्यवाद।
आप टिप्पणी करती रहें। असहमति, त्रुटियां भी बिना हिचकाहट, दिखाती रहें।

Shashi
Guest
और तो और, अँग्रेजी ने बुद्ध को बुद्धा बना दिया, योग को योगा। मुखोपध्याय, सूट-टाई पहनकर मुखर्जी हो लिए और श्रीवास्तव बन गए श्रीवास्तवाज़। अब तो अरोड़ा भी अरोरा कहलाते हैं। देसाई जी खुद को ‘दिस्साई’ कहकर इतराते हैं। बाकि तो छोड़ो, हमारा नाम भी मिटटी में मिला दिया, कितना भी सुधारो, शशि को शाषी बोलते है| भारत में और बुरा हाल है| बच्चे अब चंदा मामा नहीं, मून देखते हैं। गैया ‘काऊ’ और चिया ‘स्पैरो’ बन गई है। भाषा व्याकरण ऐसा गड़बड़ाया कि अब “आँधी आता है तो पेड़ गिरती है।”, राष्ट्र आगे बढ़ता नहीं, ‘बढ़ती’ है।
डॉ. प्रतिभा सक्‍सेना
Guest

आप का कथन उचित तर्क-सम्मत है -इस पर मतभेद की कोई संभावना नहीं है .
जो देश अपनी भाषा में नहीं बोल सकता वह अपने स्वाभिमान और संस्कृति को भी नहीं बचा सकता !

डॉ. मधुसूदन
Guest

विमलेश जी, हम आप सभी साथ साथ हैं, साथी है। मनुष्य मात्र, गलती पात्र होता है।

Vimlesh Trivedi
Guest

आदरणीय मधुसुदन जी आपको तो अब धन्यवाद कहने में भी मुझे संकोच होने लगा है और मै धन्यवाद देना भी नहीं चाहूँगा …..

सूरज को रौशनी दिखाना अपने आप में अपना उपहास उड़ना ही है.

wpDiscuz