चुनाव एक संवैधानिक अथवा धार्मिक प्रक्रिया? 

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अनिल अनूप 

मध्यप्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ का जो वीडियो बेनकाब हुआ है, उसके मद्देनजर यह सवाल स्वाभाविक है कि चुनाव एक संवैधानिक या मजहबी प्रक्रिया है? क्या सार्वजनिक तौर पर हिंदू-मुसलमान समुदायों के नाम पर वोट मांगे जा सकते हैं और यह संवैधानिक भी होगा? एक ओर कमलनाथ का दावा है कि हिंदुओं के करीब 80 फीसदी वोट कांग्रेस के पक्ष में आएंगे। यदि ऐसा है, तो फिर मुस्लिम वोट न पड़ने से कांग्रेस को बहुत बड़ा नुकसान क्या और कैसे हो सकता है? यह भी एक विडंबना है कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी मंदिर-मंदिर जा रहे हैं और पूजा-पाठ भी कर रहे हैं, लेकिन परदे के पीछे पार्टी का फोकस मुसलमानों पर है। यह दोगलापन अस्वीकार्य होगा और दो नावों पर एक साथ सवार होने की सियासत भी कबूल नहीं होगी। कांग्रेस को इसका खामियाजा उठाना पड़ सकता है। दरअसल कमलनाथ का एक वीडियो सार्वजनिक हुआ है, जिसमें वह मुस्लिम बुद्धिजीवियों से बात कर रहे हैं। उसी दौरान उन्होंने कहा है कि मप्र में मुस्लिम समाज के 90 फीसदी से ज्यादा वोट कांग्रेस के पक्ष में नहीं पड़े, तो कांग्रेस को बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है। कमलनाथ का यह बयान भी बिलकुल स्पष्ट है-मुझे जीतने वाले उम्मीदवार चाहिए। मुझे फर्क नहीं पड़ता कि किसके खिलाफ कितने केस पेंडिंग हैं।’ उन्होंने यह तथ्य भी रखा है कि पिछली बार मुसलमानों ने कम वोट दिए थे, जिसके कारण कांग्रेस कई सीटें हार गई थी।’ वीडियो का निष्कर्ष साफ है कि मप्र में चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस को मुस्लिम वोटों का ही सहारा है। यह राजनीतिक और चुनावी बयान संवैधानिक आधार पर अवैध और आपराधिक भी है। लिहाजा भाजपा के उपाध्यक्ष एवं सांसद प्रकाश झा ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज कराई है। कुछ और भाजपा नेता भी चुनाव आयोग में गए हैं। विरोध व्यापक स्तर पर हुआ है। कांग्रेस की मान्यता रद्द करने के साथ-साथ कमलनाथ की गिरफ्तारी की मांग भी की गई है। यह निर्वाचन आयोग का विशेषाधिकार है कि वह क्या फैसला लेता है, लेकिन कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की पुरानी आदत खत्म नहीं हुई है। कांग्रेस शुरू से ही मुसलमानों  का सियासी इस्तेमाल करती आई है, लेकिन औसत मुसलमान आज भी लुटा-पिटा, अनपढ़, गरीब है। करीब 42 फीसदी मुस्लिम अनपढ़ हैं, करीब 18 फीसदी बेरोजगार हैं, मात्र 2 फीसदी ही सरकारी नौकरी में हैं। यह 70 साल से सियासी तुष्टिकरण के बावजूद मुसलमानों का यथार्थ है। चूंकि मप्र में कांग्रेस 15 साल से सत्ता के बाहर है। यह चुनाव उसके लिए करो या मरो की स्थिति का है, लिहाजा उसे 50-60 फीसदी नहीं, मुस्लिम बूथों पर 90 फीसदी से ज्यादा वोट चाहिए। विडंबना यह है कि कांग्रेस के प्रवक्ता टीवी चैनलों की बहस के दौरान मप्र में बलात्कार, व्यापमं, बेरोजगारी की दर, 2 लाख से भी ज्यादा गरीबी रेखा के तले जी रहे लोगों, कुपोषण और अन्य बीमारियों, पानी के संकट, भष्टाचार आदि मुद्दों पर धाराप्रवाह चिल्लाते देखे-सुने जा सकते हैं, लेकिन चुनाव लड़ने की अंदरखाने नीति ‘सांप्रदायिक’ है। मप्र में मुसलमान मतदाता बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। करीब 24 विधानसभा सीटें मुस्लिम बहुल हैं, 19 जिलों में 1 लाख से ज्यादा मुस्लिम हैं, करीब एक दर्जन विधानसभा सीटें तो ऐसी हैं, जो चुनाव नतीजे में निर्णायक साबित होंगी। कांग्रेस ने घोषणा-पत्र में वक्फ बोर्ड और उर्दू शिक्षकों की भर्ती सरीखे ही वादे किए हैं, जबकि भाजपा ने मदरसों के आधुनिकीकरण और मुस्लिम नौजवानों के लिए रोजगारपरक प्रशिक्षण एवं कार्यक्रम की बात कही है, लेकिन कांग्रेस का फोकस गाय, नर्मदा, राम वन गमन आदि हिंदू मुद्दों पर भी पर्याप्त है। कांग्रेस पसोपेश में है और दो नाव पर सवार होकर जनादेश रूपी किनारा पाना चाहती है। कांग्रेसी नेता कमलनाथ ऐसे बयान भी देते रहे हैं कि आरएसएस वालों से निपट लेंगे, उन्हें देख लेंगे, इन्हें देख लेंगे, बस आपको 11 दिसंबर तक प्रतीक्षा करनी है। मप्र में मतदान 28 नवंबर को है। किसी भी जाति, लिंग, भाषा, समुदाय, नस्ल आदि के प्रत्यक्ष आधार पर वोट मांगना असंवैधानिक है।

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