लेखक परिचय

गौतम चौधरी

गौतम चौधरी

लेखक युवा पत्रकार हैं एवं एक समाचार एजेंसी से जुडे हुए हैं।

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गौतम चौधरी 

पंजाब में नशीली पदार्थों के तस्करी से आतंकवाद का रिश्ता रहा है। पंजाब में जिस प्रकार नशीले पदार्थ पकडे जाने के मामले सामने आ रहे हैं उससे इस संदेह को बल मिलने लगा है कि पंजाब में आजकल ऐसे पदार्थों की तस्करी बढ गयी है। अगर इस तर्क में दम है तो निःसंदेह पंजाब एक बार फिर आतंकवाद के चपेट में आ सकता है।

पंजाब में एक बार फिर से अलगाववाद सर उठाने के प्रयास में है। इसके पीछे जो तर्क दिये जा रहे हैं वह बडा खतरनाक है। हालांकि 80 के दशक और आज में फर्क है लेकिन पंजाब में आतंकवाद के लिए जिन हथियारों का उपयोग 80 के दशक में किया गया था आज भी उसी औजार को उपयोग में लाया जा रहा है। अस्सी के दशक में बेरोजगार नौजवानों को नशीले पदार्थों के साथ जोडकर पंजाब में आतंकवाद और अलगाववाद की जमीन तैयार की गयी थी। आज फिर से यह काम प्रारंभ किया जा रहा है। प्रथम चरण में हम पंजाब के आतंकवाद और अलगाववाद की पृष्ठभूमि को समझे। सैध्दांतिक रूप से देश के सबसे जुझारू समझे जाने वाले सिखों को लगा कि जब भारत पर अंग्रेजो का शासन स्थापित हो रहा था उस समय दिल्ली पर मुगल बादशाह नाम मात्र के शासक थे। असली शासन की कमान सिख और मराठाओं के हाथ में थी। भारत आजाद होते दो भागों में विभाजित हो गया। इस विभाजन में सिखों को बडा घाटा हुआ। पहले पाकिस्तान बांट कर सिखों को अपनी मातृभूमि से बेदखल किया गया फिर जब स्वतंत्र भारत में पंजाब अपने उत्कर्ष पर था तो उसे तीन भागों में विभाजित कर दिया गया। कारण चाहे जो हो लेकिन सिखों में यह बात घर कर गयी कि दिल्ली शासन ने सिख कौम के साथ धोखा किया है। पहला धोखा बिना किसी सिख नेता को विश्वास में लिए पाकिस्तान के सिध्दांत को मान लिया गया और आधा से अधिक पंजाब पाकिस्तान को सौंप दिया गया। फिर दुवारा धोखा तब हुआ जब पंजाब प्रदेश को विभाजित कर हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बनाया गया। फिर चंडीगढ का विवाद हुआ। इन परिस्थितियों ने पंजाब में ही नहीं देश और दुनियाभर में रहने वाले सिक्खों को आंदोलित कर दिया। इस आंदोलन और असंतोष का फायदा पाकिस्तान ने उठाया और जो नौजवान बेरोजगार थे उन्हें पाकिस्तान ने दिल्ली के खिलाफ भड़काया। यह तो सैध्दांतिक बात है लेकिन पंजाब के आतंकवाद की एक और पृष्ठभूमि है जिसमें कितनी सत्यता है उसकी मीमांसा पर नहीं जाते हुए महज तथ्यों को समझने के लिए यहां उध्दृत करना जरूरी है।

पंजाब में 70-80 के दशक में सीमावर्ती क्षेत्र पिछड़ा था। हालांकि आज भी बहुत विकसित नहीं हो गया है लेकिन उस समय पिछड़ापन थोड़ा ज्यादा था। नौजवान पढ़ रहे थे और नौकरी मिल नहीं रही थी। नौकरी मिलती भी थी तो छोटे वेतन वाली। ऐसी परिस्थिति में सीमावर्ती क्षेत्र के नौजवान नशीली पदार्थों की तस्करी करने लगे। 80 के दशक में एक किलो हसिस को सीमा पार कराने पर 50 हजार से लेकर 2 लाख तक की आमदनी होती थी। पहले तो यह धंधा व्यक्तिगत रूप से चला लेकिन समय के साथ यह धंधा एक संगठित रूप धारण कर लिया। सूनियोजित रूप से लगे लोगों को अच्छी आमदनी होने लगी। साथ ही भारत की शासन व्यवस्था के भ्रष्ट तंत्र ने भी इस धंधे को खूब प्रश्रय दिया। इधर सिक्खों में धीरे-धीरे अलगाववाद के बीज आकार ले रहे थे। उधर सिख नौजवान पाकिस्तान से नशीली दवाएं तस्करी कर ला रहे थे। इसी बीच पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ एक नीति बनाई और भारत में पनप रहे पृथकतावाद को प्रश्रय देना प्रारंभ कर दिया। जो नौजवान पाकिस्तान से नारकोटिक्स ला रहे थे उन्हें पाकिस्तानी नशीली पदार्थों के विक्रेताओं ने कहा कि अब वे पंजाब में पृथकतावाद को मजबूत करें तभी उन्हें इस नशीले पदार्थ उपलब्ध कराया जाएंगा। इस पृथक्तावाद को खड़ा करने के लिए पाकिस्तान ने उन नौजवानों को हथियार और पैसा देने का भी बचन दिया। भ्रष्ट प्रशासन, नशीली पदार्थों की तस्करी, सिखों के अंदर पनप रहे पृथक्तावादी मनोवृति और पाकिस्तान के द्वारा उस पूरे परिस्थिति को आतंकवाद के द्वारा अलगाववाद में परिवर्तित करने की नीति, ये पंजाब में आतंकवाद को फलने-फूलने का अवसर प्रदान करने लगा।

आज एक बार फिर से सीमावर्ती जिलों से पंजाब में नशीली पदर्थों की तस्करी जोरों पर है। एक आकड़े में बताया गया है कि पंजाब की 24 वर्ष से लेकर 35 वर्ष के नौजवानों में से 73 प्रतिशत नौजवान किसी न किसी रूप में नशीली पदार्थों का सेवन कर रहे हैं। यह आंकडा पंजाब को नागालैंड के बाद दूसरा सबसे ज्यादा नशीले पदार्थ सेवन करने वाले राज्यों की श्रेणी में लाकर खडा कर देता है। विगत तीन महीनों में लगभग 50 करोड़ रूपये के नशीली पदार्थ पुलिस ने पकड़ी है। ऐसा कोई सप्ताह नहीं होगा जब नशीली पदार्थ पकड़ा नहीं जा रहा होगा। बीते सप्ताह भी पांच करोड़ रूपये मूल्य का हेरोइन पकड़ा गया। इस मामले को लेकर पंजाब पुलिस तो सतर्क दिखती है लेकिन पंजाब सरकार और प्रशासन मानों आंख मूदे हुए है। विगत कई वर्षों से प्रदेश के नारकोटिक विभाग में बहाली नहीं हुई है। विभाग अधिकारी और कर्मचारियों की कमी को झेल रहा है। यही नहीं जिन क्षेत्रों से ये नशीले पदार्थ आते हैं उन क्षेत्रों पर सरकार की पकड़ और प्रशासन की नजर कमजोर होने के कारण भ्रष्टाचार का बोलबाला है। पंजाब में चोट खाई पृथक्तावाद को अभी पूर्णरूपेण समाप्त नहीं किया जा सका है। यहां के सिख नौजवान में आज भी असंतोष है। जो धीरे-धीरे परिपक्व हो रहा है। समय रहते देश और प्रदेश की सरकार इन परिस्थितियों को सकारात्मक ढंग से नहीं बदली तो निःसंदेह एक बार फिर से पंजाब आतंकवाद के गिरफ्त में जा सकता है।

पंजाब का तीन जिला पहले और वर्तमान का पांच जिला पाकिस्तान की सीमा से जुडता है। इन जिलों में लगभग 45 पुलिस चौकियां हैं जो सीमावर्ती क्षेत्र में नशीली पदार्थों के तस्कारी पर नजर रखती है। इसके अलावा प्रदेश का नारकोटिक विभाग है जो मामले की छानबिन करता है। सूत्रों की मानें तो सीमावर्ती थानों की मिलीभगत से नशली पदार्थ सीमा पार से तस्करी किया जाता है। हालांकि आरोप लगाने वाले सीमा सुरक्षा बत पर भी आरोप लगाते हैं लेकिन छिट फुट घटनाओं को छोड़ दिया जाये तो इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है।

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