लेखक परिचय

संजय बिन्नाणी

संजय बिन्नाणी

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संजय बिन्नाणी

कोलकाता में इन दिनों बड़ाबाजार की बाड़ी-बाड़ी में, संध्या समय, सालियों द्बारा जीजा के घेराव के दृश्य दिखाई देने लगे हैं। यह घेराव तभी टूटता है, जब जीजाजी अपनी सालियों की शॉपिंग माल, रेस्तराँ, वाटर वर्ल्ड, निक्को पार्क, जेटी, मल्टीप्लेक्स ले जाने की या फिर किसी चाट जंक्शन पर चाट-पत्ते, पुचका, पिज़्ज़ा आदि खाने-खिलाने की डिमाण्ड पूरी करते हैं। जीजा हैं ईसरजी (ईश्वर/शिव) और सालियाँ हैं गौरी की बहनों व सखियों के रूप में उसकी पुजारिनें।

कुमारियों व नवविवाहिताओं के अट्ठारह दिवसीय गौरी पूजन के तेरह दिन बीत चुके हैं। पिछले छ: दिनों से पूजा काल की अवधि भी बढ़ गयी है। अब सुबह, शाम ढलने के पहले और रात के पहले पहर में पूजा का क्रम चल रहा है। गौरा (गौरी) के दूल्हा बने ईसर, अन्दरमहल में विराज रहे हैं। पुजारिनें उनकी खातिरदारी में कोई कमी नहीं रखना चाहतीं। नित्य नये मेनू के अनुसार, जीजी-जीजाजी को खिलाती-पिलाती हैं। वे अपने गीतों के माध्यम से, गौरी की बहनों व सखियों के रूप में ईसरजी के साथ छेड़-छाड़, हँसी-ठिठोली करती रहती हैं; जैसा कि स्त्रियाचारों के अन्तर्गत होता आया है।

असल में, वर्तमान बाजारवादी, उपभोक्तावादी महानगरीय सभ्यता ने हमारी संस्कृति-परम्परा को गहराई तक प्रभावित किया है। इसीका परिणाम है ‘जीजाजी’ का घेराव। पहले जहाँ सारे स्त्रियाचार घरों के अन्दरमहल में ही होते थे, वे अब घर की चारदीवारी लाँघ कर भू-मण्डलीय होने लगे हैं। टीनएजर्स की इसमें अहम भूमिका होती है और अधिकतर पुजारिनें टीनएजर ही होती हैं।

मान्यता है कि वसन्त-उत्सव के दिन, गौरी, कन्या के रूप में अपने पीहर आती है। अगले 18-2० दिन, वह अपनी हमउम्र सखियों व बहनों के साथ खेल-खेल में बिताती है। चैत्र शुक्ल चतुर्थी या पञ्चमी को उसे दूल्हे राजा ईसर के साथ, ससुराल के लिए विदा किया जाता है। अपनी परम्परा व जीवन मूल्य में गाँव, मोहल्ले, टोले के किसी भी घर की बेटी हो, उसे अपनी ही बेटी माना जाता रहा है। इसी आधार पर गौरी, सारे परिवारों की बेटी मानी जाती है और ईसर जी जवाँई राजा। उल्लेखनीय है कि पुराणों में, चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन शिव-सती (गौरी) का विवाह हुआ – ऐसा वर्णित है।

इस बीच महत्वपूर्ण प्रगति की बात यह है कि सन् 188० में, बड़ाबाजार स्थित बलदेवजी के मन्दिर प्रांगण से गौरी (गणगौर) पूजन की जिस सार्वजनिक परम्परा की शुरुआत हुई थी, वह परम्परा इस वर्ष सात समन्दर पार, अमरीका पहुँच गई है। बोस्टन में होने वाले गणगौर उत्सव के लिए ईसर-गवर की प्रतिमाएँ भी कोलकाता से रवाना कर दी गई हैं। बड़ाबाजार के सर हरिराम गोयनका स्ट्रीट, हंसपुकुर लेन, महात्मा गांधी रोड, नीम्बूतल्ला, ढाकापट्टी, गांगुली लेन, कलाकार स्ट्रीट सहित विभिन्न अंचलों में, गणगौर पर्व के सार्वजनिक उत्सव-आयोजन की तैयारियाँ जोरों से चल रही है। विभिन्न आयोजक मण्डल, नए वन्दना गीतों के अभ्यास में जुटे हैं। मण्डप तैयार हो रहे हैं, बाड़ियों में रंग-रोगन के साथ-साथ भित्ति-चित्र उकेरे जा रहे हैं। गौरी माता की सवारी और शोभायात्रा के लिए रथों को अन्तिम रूप दिया जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि बड़ाबाजार के नौ स्थानों पर, नौ मण्डलियों द्वारा गणगौर पूजन के सार्वजनिक महोत्सव आयोजित किये जाते हैं। चैत्र शुक्ल तृतीया व चतुर्थी को गणगौर की शोभायात्रा निकाली जाती है, पञ्चमी को रात्री जागरण होता है। इस वर्ष, इन नौ मण्डलियों में से एक, श्रीश्री मनसापूरण गवरजा माता मण्डली द्वारा ‘सौभाग्य जयन्ती’ मनाई जा रही है।

इनके अलावा, वी आई पी अँचल, विधाननगर, काँकुड़गाछी, हावड़ा, हावड़ा अँचल, लिलुआ, हिन्दमोटर आदि क्षेत्रों में भी गणगौर पर्व की धूम रहती है।

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