लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

Posted On by &filed under कविता.


      aam                                                     

गर्मी के दिन, बड़े  बड़े दिन,

तपती  धूप जलन के ये दिन।

ये दिन बहुत सताते हैं,

परन्तु  रसीले आम  भी  तो,

इनहीं  दिनो ही आते हैं।

 

आम भी एक अनोखा फल है,

कच्चे वाले आम का पन्ना,

गर्मी से राहत दे जाता है।

और अचार आम का,

बेसुवाद खाने को भी,

लज़ीज बना कर जाता है।

कच्चे आम की मीठी चटनी,

उसका तो अंदाज़ अलग है,

उसकी तो कुछ बात अलग है,

बिन खाये  ही नाम लिया तो,

मुंह मे पानी आ जाता है।

 

पके  आम के रंग निराले,

हरे हरे,पीले पीले और सिंदूरी,

तरह तरह के आम रसीले,

इस  मौसम की  सौग़ात  सजीले,

मलिहाबाद  का हो  दसहरी,

या हो फिर बनारसी लंगड़ा,

सबका  स्वाद  सुगंध अलग है,

फिर भी सारे भाई- बंध हैं।

रत्नागिरि के आफुस  भाई,

सबसे  महंगे आम हैं  भाई,

चौंसा  सफेदा  भी कहाँ  है सस्ते,

खेंच तान के बजट मे फंसते।

चाहें आम काट के खाओ,

चाहें मिल्क शेक बनाओ,

चाहें तो अमरस पी जाओ,

या  फिर आइस क्रीम बनाओ,

लीची-आम  कस्टर्ड बनाओ,

या फ्रूट क्रीम मे आम मिलाओ,

आम  खाओ जी  भर कर मित्रों,

बस, गर्मी गर्मी मत चिल्लाओ।

 

Leave a Reply

1 Comment on "आम"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
PRAN SHARMA
Guest

कविता पढ़ कर आम खाने का जी कर आया हूँ . बहुत खूब ! आम खरीदने
बाज़ार जा रहा हूँ .

wpDiscuz