लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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आज भारत के नौजवान आरएसएस के बारे में न्यूनतम जानते हैं। भारत में युवाओं के मन को विचारधारात्मक तौर पर विषाक्त करने में संघ परिवार की सबसे बड़ी भूमिका रही है। अधिकांश युवा नहीं जानते कि संघ का लक्ष्य भारत को लेकर क्या था?

आज हमारे देश में जो लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और संघात्मक राष्ट्र का वातावरण है और जिस संघात्मक व्यवस्था में हमारा शासन चल रहा है। इन सबका संघ ने विरोध किया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उन संगठनों में है जिसने वयस्क मताधिकार का विरोध किया था।

सन् 1919 में वयस्क मताधिकार का विरोध करते हुए गोलवल्कर ने लिखा ‘वयस्क मताधिकार सभी देशों में नहीं है। केवल नहीं है जहाँ शताब्दियों का अनुभव है और वहां अशिक्षित जन समुदाय को मताधिकार प्रदान करना अनुचित प्रतीत नहीं होता। सर्वप्रथम जन समुदाय को शिक्षित करना आवश्यक है।’ (पत्रकारों के बीच श्री गुरूजी, हिन्दुस्तान साहित्य 2,राष्ट्रधर्म प्रकाशन लखनऊ,पृ38)

भारत में भाषावार राज्यों का गठन हो, यह स्वाधीनता संग्राम में पैदा हुई साझा राष्ट्रीय मांग थी, कांग्रेस का यह वायदा भी था कि आजादी के बाद भाषावार राज्यों का गठन किया जाएगा। गोलवलकर ने भाषावार राज्यों को ‘राष्ट्र की व्याधि’ कहा था। उन्होंने राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद कहा- ‘ हम संघात्मक संविधान की चर्चा एकदम बंद कर दें; भारत में पूर्ण या अर्द्ध स्वायत्त सभी राज्यों को समाप्त कर दें तथा एक देश, एक राज्य, एक विधानसभा और कार्यपालिका की घोषणा करें, जो प्रादेशिक, सांप्रदायिक अभिनिवेश से मुक्त हो तथा जिसकी अखंडता को किसी भी भांति भंग न किया जा सके।’ (पालकर, श्री गुरूजी व्यक्ति और कार्य,पृ.277)

धर्मनिरपेक्ष राज्य का विरोध करते हुए लिखा ‘असांप्रदायिक (धर्मनिरपेक्ष) राज्य का कोई अर्थ नहीं।’ (पत्रकारों के बीच गुरूजी,पृ36)

आरएसएस के सरसंघचालक ने फासीवादियों की तरह ही एकात्मक निगमीय अथवा सहकार्य (कारपोरेट) राज्य की स्थापना को संघ का लक्ष्य बताया था। उसकी स्थापना के उद्देश्यों की घोषणा में कहा गया है कि वह एक सुसंगठित और सु-अनुशासित निगमीय (कारपोरेट) जीवन का निर्माण करने के लिए स्थापित किया गया था।’( एंथनी एलेनजी मित्तम पूर्वोक्त,पृ.79)

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16 Comments on "गुरू गोलवलकर की जुबानी संघ की असली विचारधारा"

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GOPAL K ARORA
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भाई चतुर्वेदी जी, अपने परिचय में आप अपने आप को “वाम-पंथी चिन्तक” बताते हैं .. मेरे विचार से चिन्तक को स्वतंत्र चिन्तक होना चाहिए तभी वह स्वस्थ चिंतन करा सकता है.. चश्मा पहन कर देखने से तो सारा संसार चश्मे के रंग का ही दिखाई देगा ..हर व्यक्ति / संस्था में कुछ गुणात्मक होता है कुछ दोषपूर्ण .. संघ में आपको दोष ही दोष दिख रहे हैं यह चश्मे का ही प्रभाव है .. आपके कई लेख इस स्तम्भ में पढ़ चुका हू.. हर लेख के अनुसार संघ को फासीवादी, प्रजातंत्र का शत्रु, आदि लिखा है किसी में भी ऐसा… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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भाई सुनील पटेल जी, हमारे लेखन की सार्थकता आप सरीखी विचारशील व संवेदनशील पाठकों के कारण है. सच बात तो एक यह भी है कि लेखक लेखन के बिना ठीक उसी प्रकार नहीं रह सकता जैसे ईश्वर सृष्टि रचना के बिना ( एको अहम् बहुस्याम ), माँ अपने बच्चे को जन्म दिए बिना नहीं रह सकती. एक मुक्तक इसपर है—————- “जच्चा के इक बच्चा हुआ है / पहला-पहला / अभी-अभी , जनने का सुख / पाने की पुलक / बच्चा तो बच्चा जच्चा भी चुप रहे कैसे / यही हाल होता कवि का रचने को / और नया कुछ रचने… Read more »
sunil patel
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धन्यवाद चतुर्वेदी जी. आपके कारन डॉ. कपूर जी और डॉ. मधुसुदन जी से संघ के बारे में और भारतीय इतिहास के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला जो की स्कूल, कालेग के इतिहास में नहीं मिलता है.
मैं संघ से तो नहीं जुड़ा हु किन्तु जहाँ तक जनता हूँ संघ बहुत ही आदर्शवादी, जिम्मेदार संगठन है. इससे जुड़े लोग बहुत अनुशाषित, स्वाभिमानी होते है.

डॉ. राजेश कपूर
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*****भारत, भारतीयता से घबराने वालों के लिए****** सन 1750 के बाद तक भी यूरोपीय देश लुटेरे थे और भुखमरी का शिकार थे. सैंकड़ों नहीं हज़ारों पृष्ठों के प्रमाण है जिनसे पता चलता है कि भारत को अंधाधुँध लूटने के बाद ब्रिटेन आदि देश समृद बने. आज भी ये लोग साफ़-सुथरे शहरों और विशाल भवनों के स्वामी इमानदारी से नहीं लूट के कारण हैं. ऐसे अमानवीय व्यवहार और व्यापार की जड़ें इनकी बर्बर अपसंस्कृति की ही उपज है. सवाल यह उठता है कि ऐसे लोग संसार के परदे पर केवल भारत में ही क्यों हैं जो अपने देश कि प्रशंसा से… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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राजेशजी ऐतिहासिक जानकारी के लिए सहर्ष, धन्यवाद। रॉयल एशियाटिक सोसायटी की मिटींग अप्रैल १०, सन १८६६ में लंदनमें हुयी थी। जिसमें “Aryan Invasion of India का षड्‌यंत्र भी रचा गया था। यह जानकारी Vivekanandaa- A Comprehensive Study -by Jyotirmayaanand जी की पृश्ठ ३६६ पर, पुस्तकमें छपा हुआ है। “A clever clergyman Edward Thomas spelled the theory with Lord Strangford in the chair. अब इन सारे “मस्तिष्क क्षालन” (Brain Washing) का परिणाम, हमें दिखाई देता है। हमारा भाग्य है, कि श्री. हेडगेवार, तिलक, सावरकर, गुरूजी, गांधीजी, इत्यादि, अनेक नेता इस “मस्तिष्क क्षालन” से बचे। अहरे गहरे इसमें बह गए। लगता है,… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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आदरणीय भाई जगदीश्वर चतुर्वेदी जी, आपका “प्रवक्ता.काम” पर मिला जवाब आपकी प्रतिष्ठा के अनुरूप ही होना था. आपकी मित्रता गौरव का विषय है. महोदय, आप जानते हैं कि आंशिक सामग्री से कई बार विषयवस्तु का सही अर्थ समझाने में भूल होजाती है. संघ दर्शन संक्षेप में समझने के लिए दीनदयाल जी का ‘एकात्म-मानववाद’ मेरी दृष्टि में सर्वोत्तम है. वास्तव में भारतीय जीवन दर्शन, संस्कृति ही संघ दर्शन है.उसपर व्यवहारिक आचरण करने ,समझने में भूल असंभव तो नहीं. संघ के व्यवहारिक पक्ष क़ी कुछ झलकियाँ उसे समझने में सहायक होंगी. उसकी एक अटैचमेंट संलग्न है. आपने बड़े सहज भाव से मुझे… Read more »
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