लेखक परिचय

डॉ. सुभाष राय

डॉ. सुभाष राय

जन्म जनवरी 1957 में उत्तर प्रदेश में स्थित मऊ नाथ भंजन जनपद के गांव बड़ागांव में। शिक्षा काशी, प्रयाग और आगरा में। आगरा विश्वविद्यालय के ख्यातिप्राप्त संस्थान के. एम. आई. से हिंदी साहित्य और भाषा में स्रातकोत्तर की उपाधि। उत्तर भारत के प्रख्यात संत कवि दादू दयाल की कविताओं के मर्म पर शोध के लिए डाक्टरेट की उपाधि। कविता, कहानी, व्यंग्य और आलोचना में निरंतर सक्रियता। देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं, वर्तमान साहित्य, अभिनव कदम,अभिनव प्रसंगवश, लोकगंगा, आजकल, मधुमती, समन्वय, वसुधा, शोध-दिशा में रचनाओं का प्रकाशन। ई-पत्रिका अनुभूति, रचनाकार, कृत्या और सृजनगाथा में कविताएं। अंजोरिया वेब पत्रिका पर भोजपुरी में रचनाएं। फिलहाल पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय।

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-डॉ.सुभाष राय

भगवान एक ऐसी कल्पना है, जो हमारे संस्कारों में इस तरह बसी हुई है, कि अनायास उसकी असम्भाव्यता के बारे में नास्तिक भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं होता। नास्तिक जब कहता है कि भगवान नहीं है, तो वह प्रकारांतर से यह स्वीकार कर रहा होता है कि बहुलांश का विश्वास है कि वह है क्योंकि वह किसी भी तरह प्रमाणित नहीं कर सकता कि भगवान नहीं है। यही समस्या विज्ञान के साथ भी है। वह भगवान को नहीं मानना चाहता है, पर उसके पास अभी तक ऐसी कोई विधि या तकनीक नहीं है, जिससे वह इसे प्रमाणित कर सके कि भगवान वास्तव में नहीं है।

भगवान है या नहीं, यह बहस बहुत पुरानी है। शायद उतनी ही पुरानी, जितनी पुरानी आदमी के जन्म की कथा। पहला मनुष्य कब जन्मा होगा, इस बारे में दुनिया के अलग-अलग धर्मों में तमाम मिथकीय कथाए हैं, पर ऐतिहासिक या पुरातात्विक प्रमाण के बिना उन्हें विश्वास पर आधारित कल्पना के अतिरिक्त कुछ और कहना मुश्किल है। डार्विन के विकासवाद ने इस सवाल को ही निरर्थक बना दिया है। आदमी के पूर्वज बंदर या रीछ रहे होंगे और जरूरत एवं परिस्थितियों के अनुसार धीरे-धीरे आदमी के रूप में विकसित हुए होंगे। ऐसे में विकास की किस अवस्था में बंदर आदमी बन गया होगा, यह तय करना बहुत कठिन होगा। आदिम काल के बाद धीरे-धीरे मनुष्य ने अपने को व्यक्त करने के लिए माध्यम की तलाश की होगी और इस क्रम में उसने भाषा इजाद की होगी। अपने चारों ओर फैले रहस्यों को समझने के लिए जैसे-जैसे उसने प्रकृति की विभिन्न ताकतों से मुठभेड़ की होगी, या तो वह सफल हुआ होगा या असफल। ऐसी हर सफलता ने उसके जीवन को और आसान बनाया होगा और हर असफलता ने उसे किसी ज्यादा ताकतवर और रहस्यमय अस्तित्व की कल्पना के लिए विवश किया होगा। शायद यही बाद में भगवान की अवधारणा के रूप में सामने आया होगा। इस तरह भगवान केवल विश्वास का विषय है और इसीलिए इस पर विश्वास न करने की छूट भी हर किसी को मिली हुई है।

चूंकि दुनिया के लगभग सभी हिस्सों में आदमी के विकास की प्रक्रिया कमोबेश एक जैसी रही होगी, इसलिए सबने अपने-अपने भगवान गढ़ लिए। एशियाई महाद्वीप में कई अति प्राचीन सभ्यताएं होने के कारण यहां दर्शन और चिंतन विश्व के अन्य हिस्सों से पहले विकसित हुआ और अलग-अलग चिंतन स्कूलों ने अपने लिए अलग-अलग भगवान भी रच लिये। उनके महिमामंडन की हजारों साल लंबी प्रक्रिया के बाद भगवान ने हमारी सामाजिक संरचना में एक महत्वपूर्ण जगह बना ली। जिन कुछ लोगों ने कभी-कभी भगवान को तर्क पर कसने की कोशिश की या उसके होने पर सवाल उठाया, उन्हें इसकी छूट तो दी गयी लेकिन उन पर भरोसा नहीं किया गया। भगवान का होना इसलिए सुविधाजनक था क्योंकि जो भी अव्याख्येय था, रहस्यमय था, समझ में नहीं आने लायक था, उसे एक ऐसे भगवान की केंद्रीय सत्ता समझने में मदद करती, जो सर्वज्ञ, सर्वगुणसम्पन्न, सर्वातिशायी है, जो सब कुछ रचता है और फिर उन्हें विनष्ट कर अपने भीतर समेट लेता है।

विज्ञान न भगवान को स्वीकार करता है, न ही अस्वीकार। यह विज्ञान के लिये विचार का विषय ही नहीं है। विज्ञान उन सत्यों की तलाश करता है, जो पहले से ही हैं, अपना काम कर रहे हैं पर हम उनके बारे में नहीं जानते। गुरुत्व न्यूटन के आने से पहले भी था, पहले भी सेब के फल डाली से टूट कर जमीन पर ही गिरते थे, आसमान में नहीं जाते थे। लोगों को सेब खाने से मतलब था, किसी ने भी इस सहज गति पर सोचने की कभी जरूरत नहीं महसूस की कि सेब आखिर नीचे ही क्यों गिरता है, वह चन्द्रमा की ओर क्यों नहीं चला जाता। ऐसे सवाल पर सोचना तब मूर्खता ही कही जाती पर वैज्ञानिक ऐसी ही मूर्खताओं में नये सूत्र खोज लेते हैं। न्यूटन ने ही सबसे पहले हमें बताया कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण की शक्ति है, जिससे हर वस्तु सहज रूप से ऊपर से नीचे की ओर गिरती है। इसी तरह बादल करोड़ों साल से चमकते, तड़कते आ रहे हैं। कवियों ने इस प्राकृतिक घटना पर खूब लिखा, पर कभी किसी ने इस पर नहीं सोचा कि आखिर बादलों में बिजली क्यों पैदा हो जाती है। बिजली है तो है, भगवान ने रचा है, इस पर क्या सोचना? पर नहीं, विज्ञान ऐसे किसी चीज को नहीं मानता है। वैज्ञानिक हर घटना का पर्यवेक्षण करता है, परीक्षण करता है, कारण जानने के लिये प्रयोग करता है और सच का पता लगाता है। फ्रेंकलिन रूजवेल्ट नहीं आते तो कौन बताता कि बादल विद्युताविष्ट क्यों रहते हैं।

आस्थावादी, धार्मिक लोगों के लिये कारण नहीं कार्य का ही महत्व है। कारण तो एकमात्र भगवान है ही। सूर्य प्रकाश देता है, भगवान की कृपा से, ग्रह, नक्षत्र, तारे गतिमान हैं, फूल खिलते हैं, बीज से वृक्ष उगता है, सागर में ज्वार-भाटा आता है, ज्वालामुखी फटता है, सब भगवान की माया है। पर विज्ञान के काम करने का तरीका अलग है। वह अपने भीतर हमेशा एक बड़ा क्यों लेकर चलता है और उसका उत्तर चाहता है। यही क्यों उसे परिणाम के कारण तक ले जाता है। वह इस खोज में तब तक अनेक परिकल्पनायें करता है और फिर उनका परीक्षण करता है, जब तक कि उसे सही उत्तर न मिल जाये। धर्म की विज्ञान से कोई लड़ाई नहीं है, क्यों कि मूलतः धर्म और जीवन मूल्य विज्ञान के विषय हैं ही नहीं। वह इस पर कोई निर्णय नहीं दे सकता कि लोग सच क्यों नहीं बोलते या लोग नैतिक क्यों नहीं हैं या ज्यादातर लोग भ्रष्ट क्यों हैं। ये समाज विज्ञान, मनोविज्ञान और दर्शन शास्त्र के विषय हैं, विज्ञान के नहीं। इसी तरह भगवान भी विज्ञान के लिये विचारणीय नहीं है। एक धर्मज्ञ आसानी से कह देगा कि भगवान सर्वत्र है, सर्वज्ञानी है, सर्वातिशायी है, समूचे ब्रह्मांड में व्याप्त है। एक अभौतिक और अमूर्त सत्ता का परीक्षण कैसे हो? और अगर सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्ति को उसकी भौतिक सत्ता के रूप में देखा जाय तो उसका परीक्षण वह कैसे कर पायेगा जो उस सत्ता के भीतर है। कुछ अति भावुक लोग भगवान के सगुण रूप की कल्पना करते हुए दिखायी पड़ते हैं और उसके दर्शन का दावा भी करते हैं पर वह नितांत व्यक्तिगत मामला है, इसलिये ऐसे दावों पर भरोसा करना मुश्किल है। कोई भी घटना जब तक मूर्त नहीं होती, भौतिक रूप से घटिल नहीं होती, तब तक वह कल्पना से ज्यादा कुछ नहीं है और कल्पनायें हमेशा सच हों या सबके अनुभव में समान रूप से आयें, ऐसा सम्भव नहीं है, इसलिये उनकी कोई वैज्ञानिकता नहीं है।

भगवान एक ऐसी ही कल्पना है, जो हमारे संस्कारों में इस तरह बसी हुई है, कि अनायास उसकी असम्भाव्यता के बारे में नास्तिक भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं होता। एक नास्तिक जब कहता है कि भगवान नहीं है, तो वह प्रकारांतर से यह स्वीकार कर रहा होता है कि बहुलांश का विश्वास है कि वह है क्योंकि वह किसी भी तरह प्रमाणित नहीं कर सकता कि भगवान नहीं है। यही समस्या विज्ञान के साथ भी है। वह भगवान को नहीं मानना चाहता है, पर उसके पास अभी तक ऐसी कोई विधि या तकनीक नहीं है, जिससे वह इसे प्रमाणित कर सके कि भगवान वास्तव में नहीं है। वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांडीय मेधा (कास्मिक इंटेलिजेंस) की जो कल्पना की वह भी भगवान की कल्पना से बहुत भिन्न नहीं है, क्योंकि वे यह नहीं बता सकते कि आखिर इस महामेधा के पीछे कौन है, अगर यह कार्य है, परिणाम है तो इसका कारण क्या है।

विश्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग अपने समय के सबसे ख्यातनाम भौतिक विज्ञानी हैं। वे कुछ कहते हैं तो समझा जाना चाहिये कि उसका कुछ मतलब है। यद्यपि उन्होंने अपनी किताब अ ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाइम में पहले भी यह कहा था कि बिग बैंग से ब्रह्मांड के निर्माण की प्रक्रिया में भगवान की कोई भूमिका नहीं हो सकती लेकिन अगर भगवान की कोई भूमिका होगी भी तो वह बिगबैंग के क्षणांश मात्र में इस तरह अनुस्यूत होगी कि उसके होने का कोई अर्थ नहीं होगा। चूंकि ब्रह्मांड की उत्पत्ति को भौतिक विज्ञान के सिद्धांतों से समझा जा सकता है, इसलिये यहां भगवान की मौजूदगी की कोई जरूरत नहीं लगती। अ ग्रैंड डिजाइन नामक अपनी नयी पुस्तक में उन्होंने अपनी उन्हीं स्थापनाओं को और तार्किक ढंग से रखने की कोशिश की है। उनका कहना है कि भौतिक विज्ञान के सिद्धांत यह साबित करते हैं कि प्रारंभ में जब कुछ नहीं था, तब भी गुरुत्व था और वही कारक हो सकता है ब्रह्मांड के निर्माण का। शून्य में से ब्रह्मांड के प्रस्फुटन के लिए लगता नहीं कि किसी भगवान को चाभी घुमाने की जरूरत रही होगी। पर वे ब्रह्मांड की उत्पत्ति शून्य से नथिंगनेस से नहीं मानते। कुछ था और उस कुछ में से बहुत कुछ या सब कुछ निकला। वे यह नहीं बताते कि आहिर गुरुत्व कहां से आया। किसी भी वैज्ञानिक ने पहली बार भगवान के वजूद को इस तरह चुनौती दी है। उनकी इस धारणा के बीज उनके प्रारंभिक जीवन में ही पड़ गये थे। उनकी मां इसाबेला 1930 में कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य रही थीं और साम्यवादी चिंतन को लगभग नास्तिक चिंतन माना जाता है पर अपने शुरुआती विचारों में हाकिंग न तो नास्तिक दिखते हैं, न आस्तिक। वे न तो भगवान की संभावना में विश्वास करते हैं, न ही उसकी असंभावना में।

विज्ञान को भगवान से कोई मतलब होना भी नहीं चाहिए क्योंकि यह बहस दर्शन के क्षेत्र की है। मूल्य, चरित्र, धर्म और नैतिकता तय करने का काम दर्शन करता है, विज्ञान नहीं। विज्ञान तो प्रायोगिक सत्यों का उद्घाटन करता है और उन्हें जीवन की उपयोगिता से जोड़ता है। विज्ञान के कदम जहां-जहां पड़ते जाते हैं, भगवान स्वयं ही वह इलाके छोड़कर हट जाता है। कल तक जो बहुत सी चीजें असंभव मानी जाती थीं, विज्ञान ने आज उन्हें संभव कर दिया है। अब वहां भगवान की कोई जरूरत नहीं रह गयी। पर जहां विज्ञान का उजाला अभी तक नहीं पहुंच सका है, उस अंधेरे में टिकने का कोई सहारा तो चाहिए। आदमी ने अपनी निरुपायता में भगवान को गढ़ा है, जब उसकी शक्ति, उसका संकल्प, उसकी मेधा पराजित हो जाती है तब वह भगवान को याद करता है। भगवान उसकी मदद के लिए आये या न आये पर उसकी अमूर्त और काल्पनिक उपस्थिति से मनुष्य को शक्ति मिलती रही है। वैज्ञानिक के जीवन में भी ऐसे क्षण आते हैं। वह कभी यह कह सकने की स्थिति में नहीं हुआ, न ही शायद होगा कि कुछ भी ऐसा नहीं, जो वह न कर पाये। सवाल है कि जो वे नहीं कर सकते या नहीं कर पा रहे हैं, वह कौन करता है? वैज्ञानिकों ने भगवान के होने, न होने पर ज्यादा बहस नहीं की। बल्कि कइयों ने तो यह स्वीकार किया कि कोई न कोई ब्रह्मांड मेधा तो है, जो अगणित ग्रह, तारा, नक्षत्र मंडलों को संतुलित रखती है, जो फूलों को खिलाती है, महकाती है, जो सृजन और ध्वंस का भी नियमन करती है। उसे बेशक भगवान न कहो, कोई भी नाम दे दो क्या फर्क पड़ता है।

अनेक वैज्ञानिकों को हाकिंग की घोषणा पर आपत्ति है। उनका कहना है कि विज्ञान को सांप्रदायिक नहीं होना चाहिए। उसे आने वाली नस्लों को यह मौका नहीं देना चाहिए कि वह विज्ञान का सहारा लेकर अपने नास्तिवाद को मजबूत कर सके। यह विज्ञान का न तो धर्म है, न ही उसके काम करने का तरीका। इससे विज्ञान की प्रामाणिकता पर भी लोग ऊंगलियां उठायेंगे क्योंकि विज्ञान कभी भी कोई ऐसी बात नहीं कहता, जिसे वह प्रमाणित न कर सके। यह सच है कि विज्ञान के पास कोई ऐसा साधन नहीं है, जिसके माध्यम से वह यह साबित कर सके कि भगवान है। इसी तरह वह यह भी सिद्ध नहीं कर सकता कि भगवान नहीं है। फिर तो किसी भी वैज्ञानिक का यह कहना नितांत अवैज्ञानिक होगा कि भगवान नहीं है या उसकी ब्रह्मांड की रचना में या उसके विस्तार में कोई भूमिका नहीं है। यह निश्चित है कि हाकिंग ने जो बहस छेड़ी है, उस पर आने वाले समय में धर्मविज्ञानियों और शुद्ध विज्ञानियों के बीच गम्भीर विमर्श होगा, पर इस बार भी शायद कोई निष्कर्ष न निकले। ऐसे समय में जब विज्ञान ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय निकले परमाणु से भी लघु, बल्कि लघुतम कणों की तलाश कर रहा है, यह बहस रोचक होगी। आप जानते हैं उन कणों को विज्ञान क्या कहता है? गाड पार्टिकिल्स, भगवत्कण। शायद इस खोज में अस्ति और नास्ति का मिलन बिन्दु हाथ लग जाये, धर्म और विज्ञान में कोई साम्यमूलक सूत्र हाथ लग जाये।

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11 Comments on "अवैज्ञानिक क्यों हो गये हाकिंग?"

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Sachin
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Yogesh Kateshiya
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बहुत अच्छा और आधुनिक लेख

Neeraj
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मेरा माना है की जो विज्ञानं कहते है और जो धर्मों कहते है ये दोना एक ही बात है क्योकि विज्ञानं कहती है की ब्रह्मांड भौतिक की नियम से बना है और धर्मों के कहते है की ब्रह्मांड भगवान ने बनाया है जैसे की धर्मों के लोग कहते है की भगवान तो शक्तिशाली है उनका कोई रूप नही उनका कोई आकार नही है ऐसे ही विज्ञानं कहती है की ब्रह्मांड भौतिक की नियम से बना है जैसे गुरुत्वाकर्षण बल बताते है तो बात यहाँ पर आती है की गुरुत्वाकर्षण बल भी तो शक्तिशाली है इसका भी तो कोई रूप आकार… Read more »
गिरीश पंकज
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एक अरसे बाद ईश्वर की सत्ता को लेकर इतने गंभीर विमर्शो से भरा लेख पढ़ा. मान गया सुभाष जी को. ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं यह तो कहा नहीं जा सकता , मगर मुझे लगता है कि कोई अदृश्य सत्ता ज़रूरर है जिसके कारन दिनया संचालित है. वह हूबहू ईश्वर जैसी अवधारणा वाला भले न हो, पर कुछ तो है जो हमें याद आता रहा हो. मेरा एक शेर है— ”जीने का सामान मिल गया/ पत्थर में भगवान मिल गया”. भगवान् पत्थर में भी मिल सकता है. विशवास की बात है. हाकिंग अवैज्ञानिक नहीं हुए है. वे अपनी जगह… Read more »
shishir chandra
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राइ जी आपने काफी मेहनत करी है. मेरा मन्ना है वस्तुतः हर कोई ही नास्तिक है. तर्क के कसौटी की बात है तो नास्तिकता के सामने भगवन कहीं नहीं ठहरती. यह सही है की नास्तिकता, भगवन के सन्दर्भ में ही कही जाती है. लेकिन नास्तिकों की संख्याबल भी कम नहीं है. आस्तिकों में भी भरी मतभेद है. बल्कि मै तो कहूँगा का कुछ आस्तिक सिर्फ ज्ञान की रौशनी को नहीं देख पाते. जबकि नास्तिक को ज्यादा अच्छी समझ होती है. दुनिया में नास्तिकों की संख्या लगातार बढती रहेगी. सिर्फ कट्टरपंथी ही आस्तिक रह जायेंगे. और ये कट्टरपंथी दुनिया के लिए… Read more »
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