लेखक परिचय

राजेश कश्यप

राजेश कश्यप

स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं समीक्षक।

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राजेश कश्यप 

देश इन दिनों भयंकर महंगाई, भ्रष्टाचार और आतंकवाद से जूझ रहा है और सत्तारूढ़ सरकार इन समस्याओं से जूड़े सवालों पर कोई जिम्मेदाराना जवाब देने की बजाय बस एक ही राग अलाप रही है कि हमारे हाथ में क्या है? वर्ष 2011 में चौथी बार पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए गए और सरकार की तरफ से जवाब आया, ‘हमारे हाथ में क्या है?’ दिल्ली व मुम्बई जैसे प्रमुख शहरों में आतंकवादी घटनाएं देश को दहला रही हैं, सरकार अपनी लाचारी व बेबसी का रोने के सिवाय कुछ भी नहीं कर पा रही है। भ्रष्टाचार व काले धन के कारण देश निरन्तर खोखला होता जा रहा है और सरकार के सिर में जूं तक नहीं रेंग रही है और उसे रोकने में अपनी असमर्थता दर्शाने के अलावा उसके पास कोई चारा ही दिखाई नहीं दे रहा है। क्या सचमुच में सरकार के हाथ में कुछ भी नहीं है? यदि उसके हाथ में कुछ भी नहीं है तो फिर कि आधार पर वह सत्ता के सिंहासन पर विराजमान है? यदि उसके हाथ में कुछ है तो फिर वह झूठ क्यों बोल रही है? क्या सरकार के इस सच और झूठ का पर्दाफाश होना देश के लिए अति आवश्यक नहीं हो गया है?

महंगाई के कारण आम आदमी का जीना बेहद मुश्किल हो गया है। नौकरी करने वाले और मोटी तनख्वाह पाने वाले लोग महंगाई के कारण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, तो उन 80 फीसदी लोगों का क्या हाल होगा, जिनकी औसतन आमदनी मात्र 20 रूपये प्रतिदिन है? क्या सरकार को तनिक भी इस पहलू का अहसास है? देश में 75 फीसदी करोड़पति मंत्रियों की फौज, गरीबों के खून-पसीने की कमाई पर मौज कर रही है, क्या सरकार को यह जानते हुए भी कोई शर्म अथवा संकोच नहीं होता है? क्या सरकार ने अपना दीन-ईमान इस कद्र बेच खाया है कि उसे उन 121 करोड़ लोगों की उम्मीदों और भावनाओं की जरा भी परवाह नहीं रह गई है, जिन्होंने उन पर ‘कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ’ के नारे पर विश्वास करके उन्हें सत्ता की बागडोर सौंपी थी? भारी भ्रष्टाचार के कारण सौ दिन के रोजगार की गारंटी वाली ‘मनरेगा’ योजना भी आम आदमी के साथ छलावा साबित हो रही है और सरकार फिर भी बड़ी बेशर्मी के साथ इसे अपनी ढ़ाल बनाने से बाज नहीं आ रही है?

सरकार की लापरवाही और निष्यता के कारण आज भ्रष्टाचार देश के लिए नासूर बन चुका है। देश के एक मामूली संतरी से लेकर, विधायक, मंत्री और केबिनेट मंत्री तक भ्रष्टाचार से लिप्त हैं। एक तरफ आम आदमी दिनोंदिन गरीबी की रेखा से नीचे की दलदल में धंसता चला जा रहा है और देश के भ्रष्टाचारी नेताओं की संपत्ति में निरंतर 100 से 1000 फीसदी तक की बढ़ौतरी दर्ज हो रही है। एक तरफ आम आदमी को बुनियादी विकास के लिए 100 में से 16 पैसे भी मुहैया नहीं हो पाते और दूसरी तरफ प्रतिवर्ष 16 अरब डालर से अधिक भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहे हैं। विदेशों में काले धन के रूप में 1500 अरब डॉलर को वापिस लाने में भी सरकार अपनी लाचारी दिखा रही है। सबसे बड़ी विडम्बना का विषय यह रहा कि पहली बार लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार के नासूर पर पन्द्रह मिनट लगाए और अंत में यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। इसका सीधा सा मतलब सामने आया कि भ्रष्टाचार के आगे भी सरकार लाचार है और इस मामले में भी सरकार के हाथ में कुछ भी नहीं है।

पिछले दिनों जिस तरह मुम्बई और दिल्ली में आतंकवादी हमले हुए, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को हिलाकर रख दिया। हर आतंकवादी हमले के लिए आंख बंद करके सीधे पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराने वाले जुमले की जगह देशी आतंकवाद का नया राग सुनने को मिला। देश के हिन्दू संगठनों को आतंकवाद का गढ़ साबित करने का बाकायदा एक सुनियोजित अभियान भी चलाया गया। आतंकवादी हमलों के जिम्मेदार लोगों को सरकार खोज तो पा नहीं रही है, ‘उलटे खिसियानी बिल्ली खम्बा नोंचे’ की तर्ज पर विपक्षी पार्टियों के साथ तू-तू, मैं-मैं के भ्रामक ड्रामें से देश की जनता को बरगला रही है। सरकार आतंकवाद के प्रति कितनी संवेदनशील है, इसका पर्दाफाश भी पिछले दिनों तब हो गया था जब, पाकिस्तान को सौंपी गई मोस्ट वांडेट आतंकवादियों की सूची में कई आतंकवादी अपने देश की जेलों में ही कैद मिले। सरकार की नाक के नीचे आतंकवादी हमले हो रहे हैं और सरकार बेखौफ और बेपरवाह बनी हुई है। जले पर नमक छिड़कते हुए सरकार कहती है कि वो गारंटी नहीं दे सकती कि आगे से आतंकवादी हमले नहीं होंगे। आखिर ऐसा कैसे हो सकता है? आतंकवाद के प्रति सरकार की नीयत और नीति ने आतंकवादी हमलों को देश की नीयति बनाकर रख दिया है और इसके बावजूद सरकार धड़ल्ले से चल रही है? आखिर, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में यह सब क्या हो रहा है?

पिछले दिनों आर्थिक नीतियों पर सरकार ने अपनी पीठ स्वयं थपथपाई। विकास दर को को उच्च स्तर पर बनाए रखने की जादूगिरी का ढ़िढोंरा बखूबी पीटा। वैश्विक मंदी से निपटने की अपनी कला का जोरदार प्रचार-प्रसार किया। इस मामले में सरकार ने दिखाने का प्रयास किया कि केवल विकास दर को उच्च से उच्चतर बनाने की बाजीगिरी केवल उसी के पास है और और वैश्विक मन्दी से निपटने की करिश्माई कला और जादूई छड़ी भी केवल उसी के हाथों में है। भला, सरकार की यह कैसी विरोधाभासी छवि है? एक तरफ सरकार कहती है कि उसके हाथों में कुछ भी नहीं है और दूसरी तरफ कहती है कि जो दुनिया के वश में नहीं है, वो जादुई कला उनके हाथों में है? आखिर, सरकार का यह कैसा राज है? क्या सरकार को इस राज का खुलासा नहीं करना चाहिए?

दरअसल, सरकार झूठ बोल रही है कि उसके हाथ में कुछ भी नहीं है। उसके हाथ में सब कुछ है। सरकार के हाथ में जादूई छड़ी नहीं, बल्कि वो मजबूत पुलिसिया डण्डा है, जिनके बलपर वह नैतिकता और न्याय की दुहाई देने वाली आम जनता की कमर अलोकतांत्रिक तरीके से बड़ी बेशर्मी और बेदर्दी से तोड़ने से नहीं चूकती। बाबा रामदेव के साथ रामलीला मैदान में अनशन पर बैठी मासूम जनता पर आधी रात को हुए बर्बर पुलिसिया ताण्डव, मिसाल के तौरपर ली जा सकती है। भ्रष्टाचार के निवारण की मांग को लेकर बारह दिनों तक अनशन पर बैठने वाले गांधीवादी नेता अन्ना हजारे को तिहाड़ जेल पहुंचाने और टीम अन्ना को झूठे मुकदमों में फंसाने जैसी घटिया और शर्मनाक रणनीति भी सरकार के हाथों का कमाल ही कही जानी चाहिए। जिस तरह से भ्रष्टाचार के विरूध्द बाबा रामदेव व अन्ना हजारे के नेतृत्व में देश के कोने-कोने से उमड़े जन-सैलाब को सरकार ने दबाने की कुचेष्टा की, क्या वो सब भी सरकार के हाथ में नहीं था? सरकार के हाथ में सबकुछ होता है और वह जो चाहे कर सकती है।

यदि सरकार चाहे तो क्या नहीं कर सकती? क्या वह भ्रष्टाचारियों को जेल का रास्ता दिखाकर उनकी संपत्ति को जब्त करने जैसे कड़े कानून बनाकर लागू नहीं कर सकती? क्या विदेशों में जमा हजारों अरब रूपये के कालेधन को देश में लाकर राष्ट्र के वास्तविक विकास में खर्च नहीं कर सकती? क्या कृषि व्यवस्थाम में सुधार लाकर प्रतिवर्ष औसतन 46 किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं पर अंकुश नहीं लगा सकती? क्या कर्मचारियों की लापरवाहियों व भ्रष्टाचारी प्रवृतियों पर नकेल कसकर किसानों के खून-पसीने से उपजे अनाज को सरकारी गोदामों में सड़ने से नहीं बचा सकती? क्या आम आदमी को उनकी बुनियादी सुविधाओं के लिए 100 में से मिलने वाले 16 पैसों में बढ़ौतरी नहीं कर सकती? क्या सरकार हर बार महंगाई बढ़ाकर विकास दर की उच्चता को बनाए रखने की भोथरी रणनीति त्यागकर सच्चे अर्थों में आम आदमी का विकास नहीं कर सकती? क्या सरकार न्याय प्रणाली एवं शिक्षा प्रणाली में आई खामियों को दूर करके एक सुनहरी समाज का निर्माण नहीं कर सकती है? क्या ‘पोटा’ जैसे सख्त कानून लागू करके और अपनी गुप्तचर संस्थाओं को मजबूत बनाकर आतंकवाद पर अंकुश नहीं लगा सकती है? कहने का अभिप्राय है कि भय, भूख और भ्रष्टाचार से जुड़ी, ऐसी कोई भी चीज नहीं है, जो सरकार के हाथ में न हो।

फिर, क्यों सरकार इतनी बेबसी और लाचारी दिखा रही है? क्यों वह चिकना घड़ा बनी हुई है? आखिर क्यों उसे विवादों के साए में सत्ता चलाने में मजा आ रहा है? सरकार की कथित लाचारी, देश को भविष्य में कितनी भारी पड़ सकती है? कुल मिलाकर, यदि समय रहते यूपीए सरकार ने गहन आत्म-मंथन करके यथाशीघ्र अपनी नीति और नीयत में बदलाव नहीं किया तो निश्चित तौरपर देश एक भयंकर ‘रक्त-क्रांति’ और ‘गृहयुध्द’ जैसी त्रासदी झेलने के लिए बाध्य हो जाएगा। क्योंकि आम आदमी के सामने धीरे-धीरे विकल्पों का अभाव होता चला जा रहा है और उसके अन्दर आक्रोश की भारी बारूद जमा हो चुकी है। जिस दिन उस बारूद ने किसी तरह की कोई चिंगारी पकड़ ली तो उसका कितना महाभयंकर अंजाम होगा, इसकी शायद ही कल्पना की जा सके।

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1 Comment on "सरकार की लाचारी, देश पर पड़ेगी कितनी भारी?"

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आर. सिंह
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महंगाई,भ्रष्टाचार और आतंकवाद ये तीन ऐसे शब्द हैं जो हमें सोचने को मजबूर करते हैं.पर जब महंगाई के सिलसिले में पेट्रोल के मूल्य वृद्धि पर हाय तौबा मचना शुरू होता है,तब मेरे जैसे लोगों के समझ में यह बात नहीं आती की जब पट्रोल या पट्रोलियम पदार्थ के हमारे देश में खपत का अधिकांश भाग आयात होता है तो उसमे सरकार या कम्पनियां विश्व स्तर पर मूल्य वृद्धि होने पर अपने देश में उनके मूल्यों पर किस तरह लगाम लगा सकती है?

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