लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

Posted On by &filed under जन-जागरण, विविधा.


ashramज्ञानेश्वरी से अनुवाद:
आश्रम का स्थान कैसा हो?
डॉ. मधुसूदन

यह ज्ञानेश्वरी की अनुवादित पंक्तियाँ है।

 ध्यान-साधना

ध्यान साधना के लिए, मठ या आश्रम का स्थान कैसा हो? इस विषय पर ज्ञानेश्वरी की १९ ओवियाँ मराठी से सरल हिन्दी में, अनुवादित की है। धीरे धीरे कविता प्रस्तुति की शैली में, पढने का अनुरोध है। जिस दृश्यका वर्णन किया जा रहा है, उसको मनःचक्षुओं के सामने लाकर पढें।
पंक्तियों के अंत पर बलाघात करते हुए पढें। इस प्रकार पढने पर आप मानसिकता से ऊपर उठ कर, ध्यान में आगे बढ पाएंगे।
ध्यान के पूर्व मन को स्तब्ध करने का प्रयास करना होता है। विचारों को थमाना होता है। इस लिए जितनी धीरे धीरे निम्न ओवियों का पठन आप करेंगे, उतने अधिक आप ध्यान में सफल होंगे।

ध्यान के लिए आप आँख जब बंद करते हैं, तो, बाहर के संसार से आप का अलिप्त होना प्रारंभ हो जाता है।आप यदि शांत कक्षमें जा बैठते हैं, तो आपका श्रवण (सुनना) बंद होता है।न आप बोल रहे हैं, न कुछ खा रहे हैं, न किसी हेतुसे आप कुछ छू रहे हैं। जब आप आंख बंद कर मन में पहुंच जाते हैं। तो विचार भी धीरे धीरे थम जाएंगे।पश्चात आप बुद्धि में पहुंचते हैं। और आगे आत्मा में। पाँच इंद्रियों से आप इस संसार से जुडे रहते है। संसार से संबंध तोडने से आप ध्यान में पहुंच जाते हैं। प्रस्तुत है–

–आश्रम का स्थान कैसा हो?

(१६३)
स्पष्ट  कहता हूँ,  पार्थ,
जो अनुभव से समझोगे।
ध्यान करने अच्छा-सा
स्थान अनिवार्य है॥
(१६४)
स्थान हो ऐसा, जहाँ,
जाते, मन रम जाए।
जो ध्यान पर बैठे तो,
उठना  भी ना चाहे॥

(१६४)
आस पास जो दौडाएँ,
दृष्टि कहीं, कितनी भी,
पर वासना जगे ना;
वैराग्य दुगना हो जाए॥
(१६५)
संतों ने बसाया हो,
पहुंचने पर हो संतोष।
अंतःकरण में धीरज,
आप ही उदय हो।
(१६६)
योग जहाँ अनायास,
सहज, रम्य अनुभव हो।
ऐसा ही अनुभव भी,
बिना खण्ड चलता हो॥
(१६७)
पाखण्डी पहुंचे,  वहाँ
आस्था अनुभव करे।
तपस्या हेतु वहीं,
जाकर ही  रुक जाये॥
(१६८)
कोई लंपट जहाँ
अकस्मात पहुंचे तो,
वापस आने का
मन उसका ना करे॥
(१६९)
जो रुकने आया न हो,
आकर ही रुक जाए।
घूमने आया जो,
दृश्य वहीं रोक ले।
(१७०)
विरक्ती ऐसी जगे
बिना प्रयास उत्तेजित,
राजा भी जहाँ, राज्य
त्यजने  सिद्ध हो जाए॥
(१७१)
ऐसा हो स्थान श्रेष्ठ,
हो अति पवित्र भी।
स्वयं ब्रह्मानन्द जहाँ
साक्षात प्रकट हो जाए॥
(१७२)
ध्यान रहे, पार्थ वहाँ
साधक ही रहते हो।
इस लोक की प्रसिद्धि की
चाह ना  रखते हो॥
(१७३)
वृक्ष हो मूल सहित ,
अमृत फल मीठे हो।
और घनी झाडी हो।
ध्यान रहे,  धनंजय॥
(१७४)
आस पास झरने हो,
-वर्षा ऋतु निर्मल हो।
विपुल जल, उतार हो,
पार्थ ऐसा स्थान हो॥
(१७५)
धूप दे, शीतलता ।
पवन मन्द मन्द हो।
झुल झुल स्वर पवन,
धीमें से बहता हो, ॥
(१७६)
स्थान हो, निःशब्द, शान्त।
न  जंगली जन्तु वास हो।
तोते, भँवरों का गुंजन
जहाँ चलता हो॥
(१७७)
बतखें,  कुछ हंस हो,
दो चार सारस  हो।
कभी कभी वहाँ पर;
कोयल की कूक हो॥
(१७८)
बीच बीच आकर
मोर भेंट देते हो।
ऐसा ही हराभरा,
तपस्या का  स्थान हो॥
(१७९)
अनिवार्य  ऐसा स्थान,
मठ हो छिपा जहाँ;
या हो कोई शिवाला
छिपा घनी झाडी में॥
(१८०)
जैसे भी पसंद हो,
चित्तको जो रूचे।
ढूंढ लो एकान्त स्थान।
फिर बैठो, ध्यान पर॥
(१८१)
खोजो ऐसा स्थान पार्थ ।
फिर मन को शांत करो ।
स्थिर हो जाए मन,
फिर आसन ध्यान करो॥

स्पष्ट  कहता हूँ,  पार्थ,
अनुभव से समझोगे,
ध्यान करने ऐसा
स्थान  अनिवार्य है।
———————–

भगवत गीता के ७०० श्लोकों को विस्तार सहित समझाने में. ज्ञानेश्वरी में कुल ८८३० ओवियाँ लिखी गयी है। ओवी महाराष्ट्र के संतों ने प्रयोजा हुआ एक छंद है, जो  दोहे जैसा एक पदबंध होती है। ज्ञानेश्वर महाराज ने, गीता के एक एक अध्याय पर सैंकडों ओवियाँ रची हैं।  भगवद्गीता के ७०० श्लोकों को समझाने प्राकृत मराठी भाषा में आप ने ८८३० ओवियाँ लिखी है।
१९ ओवियाँ केवल ध्यान के लिए, मठ या आश्रम का अच्छा-सा  स्थान कैसा चुने, इसी  पर लिखी गयी है।
ध्यान-योग के अभ्यास हेतु या आश्रम या मठ के लिए  जो साधक वन-उपवन में स्थान ढूंढते हैं, उनके लिए यह मार्ग दर्शन भी है।

हम-आप के लिए फिर भी इसका उपयोग क्या?
कम से कम जाने तो सही कि हमारे पुरखों ने कितना गहरा काम कर के रखा है। दूसरा, हम यदि ध्यान करना चाहते हैं, तो उसका समय और स्थान ठीक चुन सकें।
सामान्यतः सबेरे ब्राह्म मुहूर्त में ध्यान करना सरल होता है।
यह गीता के छठवें आत्मसंयम योग  के एक श्लोक का विस्तार है।
ज्ञानेश्वर महाराज ऐतिहासिक व्यक्तित्व है। पौराणिक नहीं। और १४ की आयु में ज्ञानेश्वरी आपने ज्ञानेश्वरी की (८८३० ओवियाँ)लिखी थीं। २१-२२ वर्ष की आयु में आप ने समाधि लेकर इस लोक की यात्रा समाप्त की थी।

Leave a Reply

6 Comments on "आश्रम का स्थान कैसा हो?"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
डॉ. मधुसूदन
Guest

योगात्मानन्द वेदान्त सोसायटी द्वारा
नमस्कार, प्रिय मधुभाई।
भवताः कृतः अनुवादः अति मनोज्ञः।
कृतज्ञोस्मि।
योगात्मानन्दः
Namaskar, priya Madhubhai.
Bhavata kritah anuvaadah ati manojnah .
kritajnosmi. – Yogatmananda

‘Arise, awake and stop not till the goal is reached’ – Swami Vivekananda

For Information on Vedanta Society of Providence or on Swami Yogatmananda, please visit http://www.vedantaprov.org

Rekha Singh
Guest
अभी अभी इन पंकिंतियो को पढ़कर मन मे एकदम विश्वास हो गया , जो इन पंकिंतियो मे लिखा है । मै मातृ भूमि भारत से लौटी हू ।मेरी द्वतीय पुत्री एक महीने के लिए योग टीचर ट्रैनिंग करने ऋषिकेश, भारत गई थी । उसी के साथ मैने भी कुछ दिन ऋषिकेश मे बिताए । पहली बार मुझे भारत की उस आध्यात्मिक सत्ता का , इतनी बड़ी आध्यात्मिक विरासत का ,प्रकृति मे चारो तरफ जीवंत अनुभव हुआ , जिसपर भारत गर्व करता है । यह जीवंत अनुभूति पूर्ण स्नेहिल , सौम्य , शांत , रमणीक स्थान सूर्योदय से सूर्यास्त तक एक… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest
(१)अति सुंदर मन रम गया ,कल्पना में लाते लाते वह स्थान ,शरीर स्पंदित हो उठा। -निर्मला अरोरा (२) अतीवरम्यं आश्रमस्थानवर्णनम् । मनोमुग्धकारिचित्रमिव प्रतिभाति । भवता कृत: अनुवादोsपि भावपूर्ण: सार्थकश्च ।। साधुवाद: !! Shakun Bahadur ============================================ आ. निर्मला जी और आ. शकुन्तला जी…… मैं ने मुम्बई में, बाबा महाराज सातारकर के ज्ञानेश्वरी पर प्रवचन सुने हुए हैं। हमारी भाषाओं की मिठास भी और हमारा हिन्दी-संस्कृत शब्द भण्डार भी ऐसे अनुवाद में बहुत सहायता करता है। इस पहलू के प्रभाव का अनुपात क्या दुगना या तिगुना? कितना गुना? अमृत से भी मिठी है हमारी भाषाएँ। क्या अंग्रेज़ी में कोई इन्हीं पंक्तियों का… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest
आदरणीय डॉ झवेरी – साधारण सा विषय लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण – आश्रम का स्थान कैसा हो – । आप ने वास्तव में इसे असाधारण बना दिया है और वह भी सहज, सुंदर, सरल एवं सरस भाषा में । हार्दिक धन्यवाद । आ. गोयल जी — धन्यवाद-संत ज्ञानेश्वर ने, मराठी में जो प्रायः ९००० ओवियों में गीता पर भाष्य लिखा है, उसका एक अंश ही, राष्ट्र भाषा हिन्दी में अनुवाद करते करते, किंचित ध्यान का स्पर्श हो जाता था। ऐसे हमारे भारत में और भी अनेक सन्त हुए हैं। आप ही ने,दक्षिण के सन्तोंके परिचय आलेख जो लिखे, उन्हीं को पढते… Read more »
बी एन गोयल
Guest
बी एन गोयल

पढ़ने में साधारण सा विषय लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण – आश्रम का स्थान कैसा हो – । लेखक ने इसे असाधारण बना दिया है और वह भी सहज, सुंदर, सरल एवं सरस भाषा में । हार्दिक बधाई ।

wpDiscuz