लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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भारत को आजाद हुए बासठ साल से अधिक बीत चुके हैं। मानव जीवन में अगर कोई बासठ बसंत देख ले तो उसे उमरदराज माना जाता है। सरकार भी बासठ साल की आयु में अपने कर्तव्य से सरकारी कर्मचारी को सेवानिवृत कर देती है। राजनीति में यह नहीं होता है। राजनीति में 45 से 65 की उमर तक जवान ही माना जाता है। इन बासठ सालों देश पर हुकूमत करने वाली सरकारें अपनी ही रियाया को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवाने में नाकाम रहीं हैं, इससे ज्यादा और शर्म की बात हिन्दुस्तान के लिए क्या हो सकती है।

अपने निहित स्वार्थों की बलिवेदी पर भारत के हितों को अब तक कुर्बान ही किया गया है, यहां के जनसेवकों ने। देश में सरकारी तौर पर आर्युविज्ञान (मेडिकल), आयुर्वेदिक, दंत, और होम्योपैथिक कालेज का संचालन किया जाता रहा है। अब तो निजी क्षेत्र की इसमें भागीदारी हो चुकी है। भारत में न जाने कितने चिकित्सक हर साल इन संस्थाओं से पढकर बाहर निकलते हैं। इन चिकित्सकों को जब दाखिला दिलाया जाता है तो सबसे पहले दिन इन्हें एक सौगंध खिलाई जाती है, जिसमें हर हाल में बीमार की सेवा का कौल दिलाया जाता है। विडम्बना ही कही जाएगी कि पढाई पूरी करने के साथ ही इन चिकित्सकों की यह कसम हवा में उड जाती है।

हाल ही में भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को सुझाव दिया है कि एमबीबीएस की डिग्री के बाद अगर कोई विद्यार्थी तीन साल तक ग्रामीण अंचलों में सेवा का वायदा करे तो स्नातकोत्तर की परीक्षा में 25 फीसदी आरक्षण लागू किया जाए। सवाल यह उठता है कि इस व्यवसायिक पाठयक्रम में प्रलोभन का क्या काम।

भारत को भी अन्य देशों की भांति चिकित्सा की डिग्री के उपरांत पंजीयन के पहले यह शर्त रख देना चाहिए कि सुदूर ग्रामीण अंचलों और पहुंच विहीन क्षेत्रों में कम से कम छ: माह, विकासखण्ड, तहसील और जिला मुख्यालय से निर्धारित दूरी में एक साल तक सेवाएं देने वाले चिकित्सकों का सशर्त पंजीयन किया जाएगा कि वे अपनी सेवाओं का प्रमाणपत्र जब जमा करेंगे तब उनका स्थाई पंजीयन किया जाएगा।

इसके अलावा अगर केंद्र सरकर विदेशों की तरह स्वास्थ्य कर लगा दे तो सारी समस्या का निदान ही हो जाएगा। सरकार को चाहिए कि न्यूनतम सालाना शुल्क पर साधारण और कुछ अधिक शुल्क पर असाध्य बीमारियों का इलाज एकदम मुफ्त मुहैया करवाए। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले इस कर से मुक्त रखे जाएं। अगर एसा हुआ तो चिकित्सकों की जमी जकडी दुकानों पर ताले लगने में देर नहीं लगेगी। मोटी कमाई करने वाले मेडिकल स्टोर और दवा कंपनियों के मेडिकल रिपरजेंटेटिव भी अपना का समेटने लग जाएंगे। जब अस्पताल में ही इलाज और दवाएं मुफत में मिलेंगी तो भला कोई निजी चिकित्सकों के पास क्यों जाएगा। इससे निजी तौर पर चिकित्सा पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाएगी। डिग्री धारी चिकित्सक सरकारी तौर पर ही इलाज करने को बाध्य होंगे।

एक खबर के अनुसार आने वाले चार सालों में भारत पर डेढ सौ से ज्यादा समय तक राज करने वाले ब्रिटेन से लगभग पच्चीस हजार चिकित्सक भारत लौटने के इच्छुक हैं। इनकी वतन वापसी से अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान की बिहार, छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, उडीसा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में खुलने वाली नई शाखाओं में चिकित्सकों के टोटे से निजात मिलने की उम्मीद है।

आज हिन्दुस्तान में चिकित्सा सुविधाओं का आलम यह है कि देश में 45 करोड से भी अधिक लोगों को अने निवास के इर्द गिर्द सवास्थ्य सुविधाएं मुहैया नहीं हो पाती हैं। देश में औसतन 10 हजार लोगों के लिए अस्पतालों में सिर्फ सात बिस्तर मौजूद हैं, जिसका औसत विश्व में 40 है। भारत में हर साल तकरीबन 41 हजार चिकित्सकों की आवश्यक्ता है, जबकि देश में उपलब्धता महज 17 हजार ही है।

सौ टके का सवाल यह है कि अस्सी के दशक के उपरांत चिकित्सकों का ग्रामीण अंचलों से मोह क्यों भंग हुआ है। इसका कारण साफ है कि तेज रफ्तार से भागती जिंदगी में भारत के युवाओं को आधुनिकता की हवा लग गई है। कहने को भारत की आत्मा गांव में बसती है मगर कोई भी स्नातक या स्नातकोत्तर चिकित्सक गांव की ओर रूख इसलिए नहीं करना चाहता है, क्योंकि गांव में साफ सुथरा जीवन, बिजली, पेयजल, शौचालय, शिक्षा, खेलकूद, मनोरंजन आदि के साधानों का जबर्दस्त टोटा है। भारत सरकार के गांव के विकास के दावों की हकीकत देश के किसी भी आम गांव में जाकर बेहतर समझी और देखी जा सकती है।

इक्कीसवीं सदी में एक बार फिर केंद्र में काबिज हुई कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार द्वारा अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में ग्रामीण स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान केंद्रित करने की शुरूआत की थी। 2005 में इसी के अंतर्गत राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को भी आरंभ किया गया था। अपने अंदर वास्तव में ग्रामीणों को स्वस्थ्य रखने की अनेक योजनाओं को अंगीकार किए इस मिशन की असफलता के पीछे यह कारण है कि इसे बिना पूरी तैयारी किए हुए ही आनन फानन में लागू कर दिया गया।

दरअसल इस मिशन की सफलता चिकित्सकों पर ही टिकी थी, जो ग्रामीण अंचलों में सेवाएं देने को तैयार हों। अमूमन देश के युवा चिकित्सक बडे और नामी अस्पतालों में काम करके अनुभव और शोहरत कमाना चाहते हैं, फिर वे अपना निजी काम आरंभ कर नोट छापने की मशीन लगा लेते हैं। अस्पतालों में मिलने वाले मिक्सचर (अस्सी के दशक तक दवाएं अस्पताल से ही मुफ्त मिला करतीं थीं, जिसमें पीने के लिए मिलने वाली दवा को मिक्सचर के आम नाम से ही पुकारा जाता था) में राजनीति के तडके ने जायका इस कदर बिगाडा कि योग्य चिकित्सकों ने सरकारी अस्पतालों को बाय बाय कहना आरंभ कर दिया।

आज देश भर में दवा कंपनियों ने चिकित्सकों के साथ सांठगांठ कर आम जनता की जेब पर सीधा डाका डाला जा रहा है। लुभावने पैकेज के चलते चिकित्सकों की कलम भी उन्हीं दवाओं की सिफारिश करती नजर आती है, जिसमें उन्हें दवा कंपनी से प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर लाभ मिल रहा हो। चिकित्सकों को पिन टू प्लेन अर्थात हर जरूरी चीज को मुहैया करवा रहीं हैं, दवा कंपनियां।

इस साल केंद्र सरकार ने एक अनुकरणीय कदम उठाकर चिकित्सकों के पेट पर लात जमा दी है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने एक जनवरी से चिकित्सकों के लिए नई आचार संहिता जारी कर दी है। अब चिकित्सक दवा कंपनियों से न तो कोई उपहार ले सकेंगे और न ही कंपनी के पैसे पर देश विदेश की सैर कर सकेंगे। दरअसल, चिकित्सक और दवा कंपनियों की सांठगांठ से मरीज की जेब ही हल्की होती है। अनेक नर्सिंग होम के संचालकों के परिवार को दवा कंपनियां न केवल विदेश यात्रा करवातीं हैं, बल्कि उनके लिए शापिंग का प्रबंध भी करती हैं। अब अगर एसा पाया गया तो चिकित्सक पर कार्यवाही कर उसकी चिकित्सक की डिग्री भी रद्द किए जाने का प्रावधान है।

केंद्र सरकार की हेल्थ मिनिस्ट्री ने अब एमसीआई के सहयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में मेडिकल के छात्रों के लिए पाठयक्रम तैयार करने पर विचार आरंभ किया है। यहां से पढकर निकले चिकित्सक पूरी तरह ग्रामीण क्षेत्रों में ही अपनी सेवाएं देने प्रतिबध्द होंगे। इतना ही नहीं इनके लिए संस्थानों की स्थापना भी ग्रामीण क्षेत्रों में ही की जाएगी। अगले माह फरवरी में होने वाले सम्मेलन में इसको मूर्तरूप दिया जा सकता है। सुई का कांटा फिर वही अटक जाएगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं के अभाव के चलते इसमें छात्र तो प्रवेश ले लेंगे, किन्तु उन्हें पढाने वाले शिक्षक क्या गांव की ओर रूख करना पसंद करेंगे।

इस सबसे उलट छत्तीसगढ में सच्चे चिकित्सकों की तस्वीर भी दिखाई पडती है। भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से डिग्री हासिल करने वाले चिकित्सकों ने रायुपर से लगभग 120 किलोमीटर दूर गनियारी गांव में एक अनूठा खपरेल वाला अस्पताल खोला है। दिल्ली निवासी डॉ. योगेंद्र जैन और गुडगांव निवासी डॉ.रमन कटियार ने एम्स से एमबीबीएस किया है। इन दोनों ने पिछले लगभग एक दशक पूर्व इस गांव में जनस्वास्थ्य केंद्र की आधार शिला रखी। आज कारवां इतना आगे बढ गया कि यहां दस चिकित्सक हैं जिनमें से नौ एमडी हैं और पांच ने तो एम्स से एमडी की है। ये आज 1500 के तकरीबन गांव वालों का इलाज कर रहे हैं। लोगों के मुंह से इन्हें देखकर बरबस ही निकल पडता है, इन्हें डालर नहीं दुआ कमानी थी जनाब।

-लिमटी खरे

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