लेखक परिचय

विश्‍वमोहन तिवारी

विश्‍वमोहन तिवारी

१९३५ जबलपुर, मध्यप्रदेश में जन्म। १९५६ में टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि के बाद भारतीय वायुसेना में प्रवेश और १९६८ में कैनफील्ड इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी यू.के. से एवियेशन इलेक्ट्रॉनिक्स में स्नातकोत्तर अध्ययन। संप्रतिः १९९१ में एअर वाइस मार्शल के पद से सेवा निवृत्त के बाद लिखने का शौक। युद्ध तथा युद्ध विज्ञान, वैदिक गणित, किरणों, पंछी, उपग्रह, स्वीडी साहित्य, यात्रा वृत्त आदि विविध विषयों पर ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित जिसमें एक कविता संग्रह भी। १६ देशों का भ्रमण। मानव संसाधन मंत्रालय में १९९६ से १९९८ तक सीनियर फैलो। रूसी और फ्रांसीसी भाषाओं की जानकारी। दर्शन और स्क्वाश में गहरी रुचि।

Posted On by &filed under विविधा.


एयर वाइस मार्शल विश्व मोहन तिवारी, से. नि

चित्र देखें। इसमें और आज की स्थिति में उतना ही अन्तर है जितना कि उस जमाने की प्रौद्योगिकी में और आज की प्रौद्योगिकी‌ में है। आप शायद सहमत न हों, किन्तु थोडा सा गौर तो करें। आज इस वैज्ञानिक युग में जहां विज्ञान की खोज के प्रकाशन को विद्वानों द्वारा परखा जा सकता है, वहां इस देश में उसी वैज्ञानिक की पदोन्नति होती‌ है जिसके प्रपत्र विदेशी जर्नल अर्थात यू एस ए और ब्रितानी जर्नलों में प्रकाशित हुए हों! देशी जर्नल में प्रकाशित होते ही उस प्रपत्र को तीसरे दर्जे का मान लिया जाता है। क्या हम लोग विज्ञान में इतने पिछड़े हैं कि एक प्रपत्र को परख नहीं सकते और हमें विदेशी जर्नल की शरण लेना पडती है? क्योंकि हम अंग्रेज़ी के गुलाम हैं। यही बात साहित्य पर या विज्ञान कथा पर लागू होता है। यदि विदेशी पत्रिका में कुछ भी प्रकाशित हो जाए तो लोग उत्सव मनाते हैं, और देशी माध्यम में प्रकाशित हो तो उसे घटिया मानते हैं, क्योंकि हम अंग्रेज़ी के गुलाम हैं। उस जमाने में अंग्रेज़ साहब जैसी हिन्दी बोलता था आज हम सब वैसी ही हिन्दी, उसी शान से, बस शायद थोडी और आधुनिक गुलामी से भरी, बोलते हैं। उस जमाने में हिन्दुस्तानी जितनी शान से अन्ग्रेज़ की सेवा करता था (फ़ोटोग्राफ़र का कमाल है) आज हम भी उसी शान से अमेरिकी या ब्रितानी की सेवा करने में अपना गौरव समझते हैं। मेरे एक मित्र की पुत्री अंग्रेज़ी कि पत्रकार थी. उनके पास विवाह के लिये एक लडके का प्रस्ताव आया। उऩ्होने कहा कि मैं अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कैसे कर सकता हूं, क्योंकि वह तो हिन्दी का पत्रकार है! हमारे प्रसिद्ध स्कूलों के प्रसिद्ध प्रिन्सिपल विद्यार्थियों को हिन्दी में बातचीत करने पर दण्ड देते हैं, वे छोटे से अपने प्यारे ‘इंग्लैण्ड’ में रहते हैं; वे शायद सपने में उस अंग्रेज़ साहब को पंखा झल रहे हैं। अंग्रेज़ी राज के ज़माने से हमारे दिलों में यह सपना बैठ गया, तभी तो अंग्रेज़ी को इस देश की राजभाषा बनाया गया। फ़िर क्या था। बहुतों‌ ने मन्नतें कीं कि मेरा बच्चा भी बस जन्म लेते ही साहब के समान गिटपिट बोलने लगे, और मेरा बेटा भी वहीं वैसे ही साहब-सा बैठकर अपने पैरों कि सेवा करवाए किसी घटिया भाषा बोलने वाले से। आप शायद अभी भी सहमत न हों, कि हम अभी भी गुलाम हैं; तब मैं समझ जाउंगा कि मैं तो घटिया भाषा में बोल रहा हूं, आप कैसे उसे मान सकते हैं।

Leave a Reply

22 Comments on "भारत की गुलामी"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
डॉ. मधुसूदन
Guest
“आर्थिक उन्नति का रहस्य” टिप्पणी चार। कृपया ज़रुर पढिए। मेरा सीना तन गया, उंचाई कुछ बढ गयी, निम्न इतिहास पढकर। (मेरे मित्र अनुनादसिंह जी ने यह जानकारी, भेजकर हम भारतीयोंपर बहुत बडा उपकार किया है।) पढिए, पढिए, और औरोंको भी पढाइए।ना छोडिए। ==> १९४६ में वायसराय कौन्सिलके सदस्य चौधरी मुख्तार सिंह ने जापान और जर्मनी (वहां छात्र जन भाषामें पढते हैं) यात्रा के बाद यह अनुभव किया था कि यदि भारत को कम समय में आर्थिक दृष्टिसे उन्नत होना है, तो जन भाषा में जन वैज्ञानिक बनाने होंगे। उन्होने मेरठ के पास एक छोटे से कस्बे में “विज्ञान कला भवन”… Read more »
विश्व मोहन तिवारी
Guest
विश्व मोहन तिवारी
धन्यवाद प्रो.. मधुसूदन जी। चौधरी मुख्तार सिऩ्ह जी सचमुच में ही सिऩ्ह थे, मुख्तार अर्थात मुखिया थे और चौधरी अर्थात नेता तो थे ही., वे निस्वार्थी और सक्रिय क्रियावान देशभक्त् थे , दूरदर्शी थे और गहन दर्शी भी। उनके विषय में जब मुझे पहले ज्ञात हुआ तब से मैं उनके सिऩ्ह के समान साहस की प्रशंसा करते नहीं थका हूं। किन्तु आज के भारतीय को क्या कहा जाए !! मुझे लगता है कि शराब से ज्यादा नशा टी वी में है, और आज औसत भारतीय उस नशे में मस्त रहता है, उस पर महत्वपूर्ण घटनाओं का असर ही नहीं पड़ता।;… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
Guest
आदरणीय तिवारी जी! एक अछे विषय की अछी प्रस्तुती के लिए बधाई. आपके आलेख पर प्रश्न चिन्ह लगाने वालों से मेरा निवेदन है——————– * आप अंग्रेज़ी भक्तों को पता है कि संसार के अधिकाँश देश अंग्रेज़ी नहीं बोलते. * उन्नत देशों में गिने जाने वाले देशों चीन, जापान, रूस, जर्मन, फ़्रांस ने अपना विकास अपनी-अपनी भाषाओं के आधार पर किया है, अंग्रेज़ी की गुलामीन के बिना. * जापान ने अपनी आजादी के तुरंत बाद अंग्रेज़ी स्कूलों ( कान्वेंट स्कूलों को ) को प्रतिबंधित कर दिया क्योंकि उनकी नज़र में इन स्कूलों से देशद्रोही पैदा होते हैं. ( अपवादों को छोड़कर… Read more »
प्रेम सिल्ही
Guest
प्रेम सिल्ही
हिंदी भाषा को लेकर मेरे विचारों को आप भावुकतावश व्यर्थ ही कोई शरारती प्रयत्न या असद्भाव जैसी उपमा दे रहे हैं| तिवारी जी मुझसे बड़े हैं और उन्हें मुझसे कही अधिक जीवन-अभ्यास और ज्ञान है| मैंने उनकी रचना में गुलामी शब्द को लेकर अपने विचार व्यक्त किये थे| हिंदी भाषा की एक चित्र के पृष्ठपट पर अंग्रेजी भाषा से तुलना करना ही उसे गुलामी का दर्जा देने के समान है| मेरे स्वयं के विचार प्रोफ़ेसर मधुसूदन जी के विचारों से समक्रमिक हैं और इस कारण विषय के बिखराव को रोक मैंने व्यक्तिगत टीका टिप्पणी से यह कह कर विश्राम ले… Read more »
डॉ. मधुसूदन
Guest

मित्रों, आदर सहित, निष्पक्ष विचार रखता हूं।
मैं मानता हूं, कि, व्यक्तिगत टीका टिप्पणीसे बचना चाहिए। और मै मानता हूं, कि, जिन बातोंको आज कोई मानता है, संभव है, कि १५-२० वर्ष पहले ना भी मानता हो; तो क्या वह मत बदल सकता नहीं? क्या आप अपना मत बदलनेका अधिकार नहीं रखते?

डॉ. मधुसूदन
Guest
टिप्पणी तीन: तिवारी जी–कुछ प्रमाणातीत, आधिपत्य जमाने के अपराध बोध सहित, मैं लिखने को उद्यत हूं। तुलना अंग्रेज़ी —हिंदी की। (१) हिंदी स्वर व्यंजनोंका ज्ञान होने पर किसी भी शब्द को लिखना संभव होता है। पर -अंग्रेजी आप जीवन भर स्पेलिंग पाठ करते रहोगे।(कितना समय बचा?) (२) देवनागरी संक्षेप की लिपि है। (रोमन) अंग्रेजी नहीं उदा: मधुसूदन(५ अक्षर)– Madhusudan (१० अक्षर) {कितना परिश्रम बचा?) (३) हिंदी वाचन की गति अंग्रेजी वाचन से तीव्र है। ( अनुमानित देढ से दो गुना)(कितना…..?) (४)हिंदी में आप अक्षरों की इकाइयां पढते हैं, अंग्रेजीमें आप पूरा शब्द देख लिए बिना उसका उच्चारण निर्धारित नहीं कर… Read more »
विश्व मोहन तिवारी
Guest
विश्व मोहन तिवारी
प्रोफ़ैसर मधुसूदन जी, आपका धन्यवाद, आप मुद्दे पर बात करते है और तर्कसंगत बात करते हैं. आशा है कुछ पाठक इस पर उचित्त ध्यान दें। मुझे लगता है कि भाषा का मुद्दा भारत में रोटी से इतना अधिक जुड़ गया है कि तर्क सुनने के लिये कोई तैयार नहीं। दुख की बात है कि यह रोटी कि बात केवल गरीब कर रहे होते तो और बात थी किन्तु धनी लोग भी अपनी रोटी का भविष्य अंग्रेज़ी ही में देख रहे हैं। इसके लिये शासन ही सबसे बड़ा अपराधी है। इस के समाधान के लिये उचित जनमानस बनाना ही एक् रास्ता… Read more »
विश्व मोहन तिवारी
Guest
विश्व मोहन तिवारी
डा मधुसूदन उवाच, “जिस दिनसे भारत हिंदी को एक क्रांतिकारी, प्रतिबद्धतासे पढाएगा; भारतका सूर्य जो ६३ वर्षोंसे उगनेका प्रयास कर रहा है, वह दशकके अंदर चमकेगा,अभूतपूर्व घटनाएं घटेगी” उपरोक्त कथन जितना विवेकपूर्ण और सत्य है इसे समझना उतना ही कठिन क्यों‌है?? बिना मानसिक गुलामी की अवधारणा के कृपया कोई इसे समझाए । उपरोक्त कथन में एक उपवाक्य जोड़ना चाहता हूं – “यदि आज से अंग्रेज़ी माध्यम की अनिवार्यता शिक्षा तथा नौकरी से नहीं हटाई जाती तब एक दशक के भीतर भारत का सूर्य डूब जाएगा। यहांके लोग पिजिन इंग्लिश बोलेंगे और पश्चिम को जी‌हुजूर।” मुझसे अक्सर लोग कहते हैं कि… Read more »
प्रेम सिल्ही
Guest
प्रेम सिल्ही

खेद हैं कि अब यह जानते हुए कि आपके पुत्र, पुत्री, पौत्र, पौत्रियां, और नातियाँ संयुक्त राष्ट्र अमरीका में रह रहे हैं, मुझे आपके लेख, भारत की गुलामी, और यहाँ प्रस्तुत अन्य कथन मात्र हिपाक्रसी प्रतीत होते हैं| आपका कथन “तब यह कहना सही होगा कि कुछ बात है कि हस्ती मिट रही है हमारी” भयभीत व निराशाजनक है|

विश्व मोहन तिवारी
Guest
विश्व मोहन तिवारी

प्रेम सिल्ही जी,
आप बहुत जल्दी और थोड़े से या गलत उदाह्रणॊंसे बिमा गहराइ से विचारे निष्कर्ष निकाल लेतेहैं।

इस तरह पुत्र आदि के व्यवहार के केवल एक पक्ष के आधार पर मेरे चरित्र का निर्णय आपने निकाल लिया, तब यदि आप् गांधी जी के पुत्र हरिदास के देखकर् उनका पता नहीं क्या कर डालते ।
मेरे पुत्र आदि के कार्यों को भी तो कुछ वजन देते ।

वैसे कायदे से, आप मेरे बारे में निर्णय लेना चाहते हैं तो मेरे कार्यों को देखिये।
और आप तर्क से अपनी बात सिद्ध कीजिये, मेरे कथनों और कार्यों को देखते हुए। ।
धन्यवाद।

wpDiscuz