लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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japanडॉ. मधुसूदन

(एक)
प्रवेश:

आज हम ऐसे मोड पर खडे हैं, जहाँ से दो रास्ते निकलते हैं। एक कठिन परिश्रम का। दूसरा फिरसे गत ६७ वर्षों की उदासीन और ढीली कार्यवाही का। इस दृष्टि से जापान का उदाहरण हमें काम आएगा, प्रेरणा भी देगा। हम अपनी भविष्य की पीढियों के लिए कुछ आमूलाग्र बदली हुयी परम्पराएँ छोडकर जा सकते हैं।
कठिन रास्ता ही हमें समृद्धि की ओर ले जा सकता है।

(दो)
कर्मठ नेतृत्व

कुशलातिकुशल, संन्यासी जैसा, निस्वार्थ, स्वानुशासित दिनचर्यावाला, कठोर परिश्रमी, कर्मठ नेतृत्व हमें मिला है। मैं इसे, असंभाव्य ऐतिहासिक घटनाओं का शुभ संयोग मानता हूँ। ऐसा नेतृत्व खडा होना, विधि के संकेत बिना नहीं हो सकता। पर ऐसा नेतृत्व भी हमारे सहकार बिना सफल नहीं हो सकता। क्यों कि भारत जनतंत्र हैं। जनता का तंत्र, जनता के सहकार बिना, कैसे सफल होगा?

(तीन)
दुर्लभ असामान्य अवसर

दुर्लभ पर असामान्य अवसर है। करो या मरो की चुनौती है। समस्याएँ हैं। अकेला प्रधान मंत्री सब कुछ नहीं कर पाएगा।हर रेलगाडी में टिकट निरीक्षक को, छिपकर देख नहीं सकता।आप के घर के सामने का कूडा स्वच्छ भारत की घोषणा से साफ नहीं होगा। यह जनतंत्र है।जनता को भी अपने हिस्से का पूरक काम करना पडेगा। जनता अकर्मण्य हो कर बैठेगी तो कुछ उपलब्ध नहीं होगा। नहीं तो,और ६७ वर्ष हाथ मलते रहना पडेगा। भविष्य के गर्भ में जो घटनेवाला है, उसके हम-आप शिल्पी हैं।

(चार)
जापान में कौनसा आरक्षण है?

तनिक, जापान का आरक्षण  ले। जापान ने मात्र कठिन परिश्रम को आरक्षित किया है। एक जापानी कर्मचारी ९ (9 Man Days) मानव-दिन में एक (ऑटोमोबाईल) स्वचल-यान  निर्माण करता है, जब कि अन्य देशों को उसी प्रकार का वाहन  निर्माण करने में औसत ४७ दिन लग जाते हैं।
अर्थात जापान का कर्मचारी  ४७/९=५.२ कर्मचारियों का काम अकेला करता है। विश्वास, मुझे भी कठिन लगा था; पर एक स्रोत से भी सुनिश्चित हुआ।
इसी बात को कुछ आगे बढाता हूँ। यदि एक कर्मचारी पाँच गुना काम करेगा, तो, इसका परिणाम क्या होगा?
देश की उन्नति पाँच गुना होगी। पाँच गुना समृद्धि होगी। पांच गुना लोगों के लिए सुविधाएँ  होंगी। ये सुविधाएं जब सभीको मिलेगी तो जीवनमान ऊंचा उठेगा। देश आगे बढेगा, समृद्धि आयेगी; अच्छे दिन आएंगे।

(पाँच)
समृद्धि उत्पादन क्षमता बढने से आती है।

समृद्धि मात्र नौकरी पर समय काटने से नहीं आती। पर आज की कहानी क्या है? छात्र को शाला-महाविद्यालय पालक पिता भेजता है, एक प्रमाण पत्र के लिए; विद्या के लिए नहीं। शिक्षक भी पढाता नहीं, समय काटता है। कर्मचारी कार्यालय जाते हैं, आठ घंटे आसन पर बैठ कर वापस घर आते हैं. मेजपर कागज रोकने का वेतन खाते हैं।
जब जापान ५ गुना स्वचल यान निर्माण करता है। तो पाँच गुना मुद्रा कमाता है।
क्यों कि कर्मचारी समय नहीं काटता, कठोर परिश्रम  करता है।

(छः)
जापान में, औसत काम के घंटे:

(6)सामान्य जापानी नागरिक कठिन परिश्रम करने वाला होता है। सामान्यतः जापान में प्रत्येक कर्मचारी प्रतिवर्ष २४५० घंटे,
संयुक्त राज्य (USA) अमरिका का कर्मचारी १९५७ घंटे,
संयुक्त राज्य U K का कर्मचारी  १९११ घंटे,
जर्मनी का कर्मचारी १८७० घंटे,
फ्रान्स का कर्मचारी १६८० घंटे काम करता है।
भारत का कर्मचारी, कितने घंटे? आप बताइए।
हिसाब लगाइए। जापान का कर्मचारी अमरिका से २५% अधिक समय काम करता है; U K से २८% अधिक, जर्मनी से ३१% अधिक, और फ्रांस से ४६ % अधिक घंण्टे काम करता है।

(सात)
जापानी उन्नति का एक और रहस्य !

शीघ्र अनुवादित पुस्तकों का प्रकाशन है; जापानी  उन्नति का रहस्य।  जापान में बडा उद्योग  शीघ्र अनुवादित पुस्तकों का है। जापान में परदेशी पुस्तकों के अनुवाद का ही पूर्ण विकसित उद्योग है, जो १७ वी सदी में प्रारंभ हुआ था।फ्रान्सीसी, जर्मन, अंग्रेज़ी इत्यादि ५ भाषाओं की शोध पुस्तकें, और सामयिक जापान ३ सप्ताह के अंदर जापानी में अनुवाद कर छापता था। और मूल कीमत से सस्ते दाम पर बेचता था।मूल पुस्तक के प्रकरण अलग कर, अलग अलग अनुवाद कर्ता अनुवाद करते थे। और छाप कर बेचते थे।

(आठ)
जापान को लाभ:

पराई भाषा सीखे बिना जापानी में, ५ -६ उन्नत भाषा की पुस्तकों का लाभ मिल जाता था। आज की स्थिति कुछ अलग हो सकती है।आलेख लिखते समय तक सुनिश्चित नहीं कर पाया।

जापान की साक्षरता ९९% (२००२) है क्यों कि शिक्षा का माध्यम जापानी भाषा है।
और जापानी भाषा में ही कर्मचारी कार्यालय में काम करता है।
वार्षिक कुल राष्ट्रीय उत्पाद (प्रति व्यक्ति) $३४,३०० है।
Literacy: (15 years and older): 99% (2002)
GDP- per capita (PPP):  $34,300 (2011 est.)

(नौ)
भारत का लाभ

हम यदि ऐसी ५-७ उन्नत भाषाओं की पुस्तकें हिन्दी में अनुवादित करे, तो हमें लाभ हो सकता है। छात्र कम से कम ३-४ वर्ष बचाता है। अंग्रेज़ी के अतिरिक्त और ४-५ भाषाओं की अनुवादित शोध पुस्तकें सीधी हिन्दी में पढ सकता है। ३३% देश की मुद्रा बचती है। छात्र के ३-४ शाला वर्ष बचते हैं।
बचे हुए ४ वर्ष विशेषज्ञ होने में लगा सकता है। या जर्मन, फ्रांसीसी, रूसी, चीनी,  संस्कृत, पालि, फारसी, अरबी..
अंग्रेज़ी भी,(हाँ अंग्रेज़ी भी) ,.. इत्यादि अपने चुनाव की भाषा पढ सकता है। (इसका विस्तार आगे किया जाएगा)

इस विषय पर अलग पूरे आलेख की सामग्री है। आगे समय मिलनेपर लिखा  जाएगा।

आजकल जापान का क्रम कुछ खिसक के थोडा नीचा आया है। विचार करें। मुक्त टिप्पणी दें।

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7 Comments on "जापान : कर्मयोग का ज्वलंत आदर्श"

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अनुनाद सिंह
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अनुनाद सिंह

बहुत सारी बातें अपनी भाषा में न होने से अधकचरा समझ में आतीं हैं। अपनी भाषा में अध्ययन-अध्यापन न होने के कारण न तो अध्यापक ठीक से अभिव्यक्त कर पाता है न छात्र ठीक से समझ पाते हैं। आजकल कम से कम दसवीं कक्षा तक बच्चे अंग्रेजी में लिखी बातें अच्छी तरह नहीं समझ पाते जिससे रटने के अलावा कोई चारा नहीं बचता।

संगोष्ठियों (सेमिनार/कॉनफरेंस आदि) में परायी भाषा में चर्चा होने से चर्चा नीरस और बेजान होती है।

इन सब बातों से देश को बहुत हानि उठानी पड़ रही है।

मुकुल शुक्ल
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मुकुल शुक्ल
जापान कई मायानों मे हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत हो सकता है | जापानी लोगों की देशभक्ति से हम बहुत कुछ सीख सकते है | ये देशभक्ति की भावना ही है जिसके कारण जापान एक बहुत ही उन्नत राष्ट्र के रूप मे विकसित हुआ और सबसे बड़ी बात की जापान ने उन्नति सिर्फ भौतिक स्तर पर नहीं की बल्कि मानवीय मूल्यों को भी देशभक्ति की भावना से जोड़ा और अपने लोगों को जापान के नेताओं और मार्गदर्शकों ने एकता के सूत्र मे पिरोया | हम ऐसा सोच सकते हैं की जापानियों के लिए ये सब आसान रहा होगा क्योंकि वहाँ… Read more »
Mohan Gupta
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इस लेख में डॉ मधुसूदन जी ने बताया के कैसे जापानी लोग कठिन परिश्रम द्वारा, जो अन्य देशो की तुलना में ५ गुना अधिक हैं ,जापान देश की उन्नति होती हैं , लोगो का जीवनमान उचा उठता हैं। जापान देश की सरकार लोगो को देश की अपनी भाषा में विश्व का श्रेष्ठ साहित्या उपलब्ध कराती हैं जबकि भारत में अधिकांश अच्छी पुस्तके अंग्रेजी भाषा में मिलती हैं। ऐसी पुस्तके हिंदी या अन्या भारतीय भाषाओ में नहीं मिलती। जापानी भाषा में श्रेष्ठ पुस्तके मिलने के कारन जापानी लोगो को विदेशी भाषा नहीं सीखनी पड़ती। एक विदेशी भाषा सिखने में बहुत समय… Read more »
Parshuram kumar
Guest

यही मंत्र है यही साधना_____

Vishwa Mohan Tiwari (retd), Air Vice Marshal
Guest
Vishwa Mohan Tiwari (retd), Air Vice Marshal

likhate jaaiye madhusudan jee aur hamaara hausalaa badhaate jaaiye.

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