लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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बैसाखी पर्व पर विशेष

सूरी सो पहचनिए, जे लड़े दीन के हेत।

पुरजा-पुरजा कट मरे , कबहूँ न छाड़े के।

श्री गुरुग्रंथ साहब की अमर वाणी को अपने जीवन में साकार करने वाले सिखों के दसवें गुरू गोबिंद सिंघजी ने सन् 1699 में बैसाखी के दिन सिख पंथ की स्थापना की थी। उस वक्त वे केवल तैंतीस साल के तेजस्वी युवा थे। ऐसे युवा जिसका पूरा परिवार जैसे बलिदान होने के लिए ही जनमा था। उन्होंने राष्ट्र को खालसा क्रांति के पथ पर चलने का संदेश दिया। गुरु गोबिंद सिंघ जी जब जन्मे, तब हिंदुस्तान में मुगलों का शासन था। देश अत्याचार से त्राहि-त्राहि कर रहा था। अत्याचार से लडऩे वाले लोग कम ते। समाज बिखरा हुआ था। खास कर हिंदू समाज। इसलिए गुरु गोबिंद सिंघ जी ने एक पंथ के जरिए सबको जोडऩे का उपक्रम किया। इनकी पृष्ठभूमि देखें तो सुखद आश्चर्य होता है। उनके पूर्वज भी बड़े बलिदानी थे। गुरू अर्जुन देव इनके परदादा थे, जिन्होंने गुरू ग्रंथ साहब की रचना की थी। दादा गुरू हरगोबिंद जी थे। पिता गुरु तेगबहादुर जी थे। ये सबके सब अन्याय के विरुद्ध हंसते-हँसते शहीद हुए थे। इस अदभुत बलिदानी परम्परा को विरासत में ले कर आने वाले गुरु गोबिंद सिंघ जी भी अंतत: शहीद हुए। इनके चारों पुत्र भी शहादत से पीछे नहीं हटे। गुरु गोबिंद सिंघ जी जानते ते कि उनके पुत्रों को भी अन्याय के खिलाफ लडऩा पड़ेगा इसीलिए तो उन्होंने अपने बच्चों के नाम रके ते, अजीत सिंघ, जुझार सिंघ, जोरावर सिंघ और फतेह सिंघ। हर नाम वीरता का प्रतीक। अजीत सिंघ और जुझार सिंघ मुगलों की दस लाख सेनाओं से लड़े-लड़ते शहीद हुए। वहीं नौ साल के जोरावर सिंघ और सात साल के फतेह सिंघ को दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया। इतना बज्रपात होने के बावजूद गुरु गोबिंद सिंघ जी टूटे नहीं, क्योंकि वे महामानव थे। कहते थे, ”सवा लाख से एक लड़ाऊँ, चिडिय़ों से मैं बाज तुड़ाऊँ। भेड़ों को मैं शेर बनाऊँ, तबै गोबिंद सिंघ नाम कहाऊँ”।

खालसा पंथ की स्थापना करके गुरु गोबिंद सिंघ जी ने सामाजिक समरसता की नींव रखी। आनंदपुर साहिब में जब उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की तो वहाँ अस्सी हजार लोग मौजूद थे। गुरू गोबिंद सिंघ जी ने यहीं अपने पंज प्यारे तैयार किए। भाई दया सिंघ, भाई धरम सिंघ, भाई हिम्मत सिंघ, भाई मोहकम सिंघ और भाई साहेब सिंघ। इनमें चारों वर्णों के लोग थे। उनकी नजरों में ब्राह्मण, शूद्र, क्षत्रिय और वैश्य सब बराबर थे। एक सिख जब कथा-कीर्तन करे तो ब्राह्मण, साफ-सफाई का काम करे तो शूद्र, व्यापार करे तो वैश्य तथा देश धर्म की रक्षा करे तो क्षत्रिय। शूद्रों के पहले प्रबल उद्धारक के रूप में भी गुरु गोबिंद सिंघ जी का याद किया जाना चाहिए। जो शुद्ध करता है, वो शूद्र। इस बाव को समझने की जरूरत है। इसलिए मुझे लगता है कि आज गुरु गोबिंद सिंघ जी ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं। गुरु गोबिंद सिंघ जी धार्मिक गुलामी के विरुद्ध थे। उन्होंने देहधारी गुरुओं की परम्परा को खत्म करके क्रांतिकारी कदम उठाया था। वे समझते थे कि गुरू तो हाड़-मांस का पुतला होता है। कभी भी भ्रष्ट हो सकता है। नष्ट भी हो सकत है। उस दौर में उन्होंने अनेक धार्मिक नेताओं का पतन देखा था। इसलिए उन्होंने कहा सब लोग आज से गुरु ग्रंथ साहिब को अपना गुरु मानें। और सिख समाज ने उनके आदेश को शिरोधार्य करके गुरु ग्रंथ साहिब को गुरू मान लिया।

आज जरूरत इस बात की है कि खालसा पंथ के बहाने समाज को नवजागरण की दिशा की ओर ले जाया जाए। खालसा पंथ के रूप में गुरु गोबिंद सिंघ जी ने जिस वर्णविहीन समाज की रचना का प्रयास किया, उसे आज आत्मसात करने की जरूरत है। आज कुछ लोग अपनी-अपनी जातीय असिमताओं के कारण टकराव की स्थि पैदा करते हैं। इसलिए गुरु गोबिंद सिंघ जी जैसा उदारवादी समाज चाहते थे, वैसा समाज ही बनना चाहिए। खालसा पंथ को याद करते हुए मुझे लगता है, हम सब को सकारात्मक दृष्टि से सोचना चाहिए। निर्मलहृदय वाला समाज ही खुशहाल हो सकता है।

गुरु गोबिंद सिंघ जी जैसे महान विचारक, कवि अनुवादक और योद्धा को सन 1708 में हमसे छीन लिया गया, लेकिन अपने महान विचारों के कारण वे अमर है। हमारे बीच मौजूद हैं। पहले से ज्यादा जरूरत महसूस होती है उनकी। इसलिए जब कभी समाज दिसाहीन होने लगता है, तो उसे गुरु गोबिंद सिंघ जी के रास्ते पर ले जाने की कोशिश होती है। समतामूलक समाज खालसा पंथ के रास्ते चल कर ही बन सकता है। अआज जब चारों तरफ नकली बाबाओं और विवादास्पद गुरूओं की भीड़ है, तब हमें गुरु गोबिंद सिंघ जी प्रकाश स्तंभ की तरह नजर आते हैं। हम सबको दिशा देते हैं। उनकी वाणी को आज बी लोग दुहराते हैं- ”देह शिवा वर मोहे एहा, शुभ करमन ते कबहू न टरौ। न डरौं अर सौ जब जाय लरौं, निश्चय कर अपनी जीत करौं”। उनकी यह पंक्ति भी उनके व्यक्तित्व के शिकर को बताने के लिए पर्याप्त है- ”मानुस की जात सबै एकै पहचानबो”। वे कहते ते जो प्रेम करता है, वही प्रभु तक पहुँचता है। आज प्रेम खत्म हो रहा है। समरसता गायब हो रही है। मैं-मैं-मैं की रट में समाज में विद्वेष फैल रहा है। ऐसे समय में बैसाखी पर्व के बहाने गुरु गोबिंद सिंघ जी के चिंतन-मनन को याद करके हम नये समाज की निर्माण की दिसा में पहल कर सकते हैं।

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