लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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beggersसामन्यतया न्यायाधीशों के लिए तर्क एवं सबूतों की बिना पर ही कोई फैसला लेना संभव होता है. ऐसा माना जाता है कि न्यायपालिका के लिए भावनाओं के आधार पर फैसले लेना संभव नहीं है. लेकिन बार-बार अपने विभिन्न फैसलों में कोर्ट ने यह साबित करने का सफल प्रयास किया है कि अंततः कानून, समाज के लिए ही है. ऐसे ही मानवीयता का परिचय भिखारियों से सम्बंधित एक सुनवाई में दिल्ली हाई कोर्ट ने दिया है. ख़बरों के अनुसार न्याय मूर्ति ए पी शाह एवं मुरलीधर की खंडपीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली सरकार को जमकर लतार लगाई. वस्तुतः दिल्ली में अभी राष्ट्रकुल खेलों के लिए जम कर तैयारियां चल रही है. विदेशियों के आगे अपना उज्जवल छवि परोसने के फिराक में दिल्ली सरकार ने प्रदेश को भिखारियों से मुक्त करने का अभियान चलाया हुआ है. उपरोक्त याचिका इसी के विरोध में था और न्यायालय ने सरकार की तुलना इस मामले में राज ठाकरे के बाहरियों को भगाओ जैसे अभियान से कर दी. उसने सरकार से पूछा है कि ऐसे में आपमें और राज ठाकरे में अंतर ही क्या रह गया ?

नफरत,घृणा और नकारात्मकता को ही अपने जीवन का आधार बना कर काम करने वाले राज ठाकरे जैसे लोग भले ही खुश हो सकते हैं कि उन्हें दिल्ली सरकार के बराबर मान लिया गया. उसके कुख्याति में वृद्धि हो जाना यूं तो राज की उपलब्धि ही मानी जायेगी लेकिन दिल्ली सरकार के लिए इससे बड़ी शर्मनाक बात नहीं हो सकती कि उसकी तुलना राष्ट्रद्रोह जैसा काम करने वाले व्यक्ति से की गयी है. वास्तव में एक देश के रूप में हमें यह सोचना होगा कि भारत की अलग पहचान एवं मौलिकता है. हम ना तो साम्यवादियों की तरह मशीनी हो सकते हैं और ना ही साम्राज्यवादियों की तरह शोषक. हमारे विकास का रास्ता जब भी होगा अपना ही होगा और वो होगा समाज के हर तबके को साथ लेकर चलना ,चाहे वह भिखारी ही क्यू ना हो. अभी चीन ने ओलम्पिक के दौरान जिस तरह अपने ही लोगों ख़ास कर मजदूरों के साथ जैसी बदसलूकी की, जिस तरह से उनको अपने ही शहर और देश में जबरन विस्थापित किया गया. हम उसका अनुकरण नहीं कर सकते.

अभी संसद के विगत सत्र में राज्यसभा में सांसद प्रभात झा द्वारा इस मामले को सबसे पहले उठाया गया था. शायद भारत के संसदीय इतिहास में यह पहला मामला था जब किसी सांसद ने भिखारियों तक की फ़िक्र की हो. सरकार ने हालाकि तब यह आश्वस्त किया था कि बिना उचित पुनर्वास के भिखारियों को नहीं भगाया जाएगा. संसद में सवाल उठाने वाले श्री झा के अनुसार देश में पौने दो करोड़ भिखारी हैं.वास्तव में उनका कहना सही है कि सरकार बीपीएल बना चुकी है. एपीएल बना चुकी है. लेकिन पता नहीं इन भिखारियों की जमात किस मे आती है. पिछले दिनों मुंबई के वीटी स्टेशन पर तीन दिन तक दो भिक्षुक मृत पड़े रहे,वही जोगेश्वरी स्टेशन पर तीन दिन तक एक लाश पडी रही साथ ही दिल्ली में अभी पिछले दिनों तीन मौतें भिखारियों की हुई है. शरीर से अशक्त इन भिखारियों के मुँह से भीख मांगने की ताकत भी नहीं बची थी. देश में अनेक समस्याएं होंगी लेकिन इस ज्वलंत समस्या पर भी सरकार को चिंतन करना चाहिए. यह भी जानकारी है कि देश भर में इनके माध्यम से इन भिखारियों बीच अपराध करने वाले लोग भी तैयार होते हैं. यहाँ तक जानकारी मिली है कि भिखारियों में जो थोड़े स्वस्थ पाए जाते हैं उनके सम्बन्ध नामी अपराधियों से होते हैं. और वे उनके लिए ट्रेनों में काम करने लगते हैं. शायद सरकार के लिए यह उचित होगा कि देश के सभी भिखारियों की छानबीन की जाए,जो अशक्त और अजीर्ण हैं उनके लिए रैन बसेरा बनाया जाए या उनके बारे में कुछ और सोचना चाहिए.

लेकिन उससे भी बड़ा सवाल तो यह है कि आखिर ये कौन सी व्यवस्था है जो करोडों भिखारियों को जनम दे रही है? आजादी के ६ दशक बीत जाने के बाद भी अगर इतनी बड़ी संख्या में लोगों को अपनी मूलभूत ज़रूरतों के लिए भी हाथ फैलाना पड़े,सरकार द्वारा खरबों रुपया खर्च किये जाने के बाद भी अगर अंतिम लोग सड़क पर तड़प-तड़प कर मरने को मजबूर हो तो आखिर आप इस व्यवस्था को क्या कहेंगे? कैसे हम गर्व कर पायेंगे अपने देश पर? राष्ट्र को केंसर की तरह खोखला करते जा रहे असमानता के दानव से अगर हम मुँह मोड़ लें.अर्थव्यवस्था द्वारा पैदा किये जा रहे कुछ अरबपतियों को ही हम अगर अपनी सफलता का पर्याय या तेज़ी से बढ़ते और मुटाते कुछ मध्य वर्ग को ही अगर “भारत” मान लिया जाए तो इससे बुरी बात किसी लोकतंत्र के लिए क्या हो सकती है. यही सब तो ऐसे बहाने हैं जिनपर नक्सलवाद भी फल-फूल रहा है. सवाल केवल भिखारियों का भी नहीं है. शहरों में नारकीय जिन्दगी जी रहे करोडों लोगों की हालत भी उन भिखारियों से थोड़ा ही बेहतर है. एक आकड़े के अनुसार निजी अस्पताल की तो आप बात ही छोड़ दें, सरकारी अस्पतालों में भी मात्र एक तिहाई गरीब ही अपना इलाज़ करा पाते हैं. तो कल्पना की जा सकती है कि देश की आधी से अधिक जनसँख्या आज कहाँ पर हैं. तो हमारे विकास का पैमाना मुट्ठी भर अरबपति हुए या ये दरिद्र नारायण? आज अगर दिल्ली की सरकार को भिखारियों को भगा कर कृतिम रूप से अपना चेहरा साफ़ करने की ज़रूरत पड़ रही है,अपना स्वाभाविक चेहरा विदेशियों को दिखाने में शर्म महसूस हो रही है तो सोच लीजिये हम कहाँ तक पहुचे हैं. हो सकता है आप २ हफ्तों की अय्याशी के इस खेल के लिए जिसे सरकार के ही एक मंत्री ने “पाप” की संज्ञा दी है, आप हजारों करोड़ बहा कर गंदगी को कालीन के नीचे छुपा दें, लेकिन क्या शुतुरमुर्ग बन जाने का यह प्रयास सटीक होगा? एक पुराने कांग्रेसी मुख्य मंत्री ने वैसे इससे पहले भी एक बार ऐसी कसरत की थी जब लावारिस जानवरों की तरह मजदूरों को ट्रकों पर लाद कर शहर से दूर फिकवा दिया था.एक बार एक प्रदेश के नौकरशाहों ने तो अपने मुख्यमंत्री को दिखने के लिए एक नकली गाँव का निर्माण ही आनन-फानन में कर दिया था.तो इन सब कवायदों का कोई फायदा नहीं होने वाला. सूचना तकनीक के इस ज़माने में आप केवल दो सप्ताह के लिए साफ़ सुथरे हो कर अपने देश की छवि बदलने का ढोंग नहीं कर सकते. अगर वास्तव में आपको अपने ही भाई-बंधुओं की हालत देख कर शर्म आ रही हो तो विकास के विदेशी तरीके पर फिर से गौर कीजिये. केवल आंकडों की बाजीगरी ही तो विकास का पैमाना नहीं हो सकता ना? और आंकडे भी कैसे-कैसे जिस पर आपको खुद ही भरोसा ना हो.गरीबों की हालत क्या, आपको उसकी संख्या का ही पता ना हो. सरकार द्वारा बनायी गयी एक कमिटी के अनुसार ७७ प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे है, तो दुसरे के अनुसार ये आंकडे ३३ प्रतिशत के करीब है तो किसी अन्य अध्ययन के अनुसार केवल २२ प्रतिशत ही इस सीमा में आते हैं. एकाध राज्यों में तो राज्य की कुल जनसँख्या से ज्यादा गरीबी रेखा के कार्ड निर्गत हो चुके हैं. अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आखिर गरीबों के नाम पर उगाही जा रही करदाताओं की रकम जा कहाँ रही है. इसी तरह महंगाई से इस तरह कराह रहे हैं निम्न मध्य वर्ग के लोग कि उनके पास अब भिखारियों को देने के लिए भी पैसे नहीं बचे हैं, लेकिन सरकारी सूचकांक के अनुसार महंगाई को आंकने वाला मुद्रा स्फीति की दर नकारात्मक. यानि महंगाई बढ़ नहीं रही है बल्कि पहले से भी कम हो रही है. तो आज तक हम अपनी स्थिति को सही-सही बयान करने वाला कोई सूचकांक तक का निर्माण नहीं कर पाए हैं. वो भी तब, जबकि दिग्गज अर्थशास्त्री कहे जाने वाले कर्णधारों से अटा पड़ा है देश. तो ऐसे मुंगेरी लाल के हसीन सपने दिखने वाले आंकडों से वोट के अलावा और क्या हासिल की जा सकती है? सीधी सी बात है,समावेशी विकास का कोई विशुद्ध भारतीय तरीका खोजिये. अर्थशास्त्र को कल्याणकारी बनाइये. एक रूपये का रिसते-रिसते १० पैसे हो जाने की राजीव जी की स्वीकारोक्ति पर गौर कीजिये और व्यवस्था का शीर्षासन कराइए. सबसे अंतिम व्यक्ति को सबसे ज्यादा फायदा हो ऐसे फार्मूले पर चलना शुरू कीजिये. आखिर ऐसे ही हिंद स्वराज का स्वप्न तो गाँधी ने देखा था जिसमें भिखारियों तक के लिए सम्मान की जिन्दगी वसर करने लायक किसी अन्य पेशा को अपनाने हेतु प्रेरित करने की गूंजाइश हो या अक्षम हो गए लोगों की देखभाल की भी व्यवस्था हो. इसी गाँधी के सपने को पूरा करने का दंभ भर-भर कर वोटों का भिक्षाटन करने तो निकलते हैं आप भी यदा-कदा. इस तरह आप ही के भाई बन्धु तो हैं ये भिखारी भी.भगवान के लिए इनका भी ख्याल कीजिये और इनकी ज़मात में खाते-पीते रहे लोग भी शामिल ना हो जाएँ ऐसे कथित विकास की अवधारणा को बदलिए. फिर आपको अपना चेहरा चमकाने के लिए ना शुतुरमुर्ग बनने की ज़रूरत होगी,ना ही राज ठाकरे जैसा बन जाने की.

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6 Comments on "गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा – पंकज झा"

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Satyendra Kumar
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बहुत बढ़िया आलेख लिखा है। धन्यवाद।

yagnyawalky
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बहुत शानदार। मगर क्‍या अदालती टिप्‍पणीयों से सरकार को शर्म आएगी। राज ठाकरे से तुलना राज ठाकरे के लिए ही नहीं इस मानसिकता की सरकारों के लिए भी सम्‍मान की बात होती है।

दिनेशराय द्विवेदी
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ये यथास्थितिवादी सरकारें हैं। जो स्थितियों को बद से बदतर ही बना सकती हैं। इन के लिए विकास का अर्थ सिर्फ पूंजी का विकास है। मानवता भले ही उस विकास के तले दम तोड़ रही हो।

Surendra Pathak
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बहुत बढ़िया आलेख,
सरकारे सम्वेदनशील हॊ चुकि है

Kusum Thakur
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पहली बार आपकी लेख पढ़ी बहुत अच्छा लगा बधाई !!!

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