लेखक परिचय

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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मानव शरीर को ईश्वर की सर्वोत्तम कृति माना गया है|पौराणिक कथाओं और हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार चौरासी लाख योनियों से गुज़रने के बाद मनुष्य योनि प्राप्त होती है जो क्रमश:ईश प्राप्ति की ओर बढ़ते कदमों की अंतिम परणिति मानी गई है|मानव शरीर के द्वारा साधना, उपासना आराधना संकल्प और त्याग इत्यादि के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति होती है ऐसा पुराणों में वर्णित है|अन्य धर्मों में भी कमोवेश इसी तरह की जानकारियां मिलती हैं|सवाल ये उठते हैं कि यदि ईश्वर प्रदत्त यह श्रेष्ठतम कृति शारीरिक रूप से सक्ष्म न हो ,अंग भंग हो अथवा पैदाईशी रूप में शरीर के कोई अंग ही न हों या किसी दुर्घटना में किन्ही हिस्सॊं को अलग करना पड़ा हो तो क्या मनुष्य अपने वही स्वाभाविक कार्य कर सकता है जो एक स्वस्थ मनुष्य से अपेक्षित होता है|इअका सीधा सीधा उत्तर हां हो सकता है |दुनियाँ ऐसे उदाहरणों से भरी पड़ी है|यदि मनुष्य में दृढ़ इच्छा शक्ति हो,आत्म विश्वास हो और कार्य के प्रति सच्ची लगन हो तो विकल्लंगता के चरम पर होने के बावज़ूद महान महान कार्यों का निष्पादन किया जा सकता है|

स्टीफन‌ हाकिंग इसका सटीक उदाहरण है|विवेकानंद भी कहते हैं कि इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता|हिम्मत लगन और आत्म विश्वास हो तो असंभव को भी संभव करके दिखाया जा सकता है| उठो और चल पड़ो और जब तक चलते रहो जब तक कि मंजिल न मिल जाये|हाथ पैरों से, शरीर से ,इंद्रियों के शिथिल होने के बाद भी आदमी अंतर्मन से अनंत यात्रा कर सकता है और अपनी मंजिल पा सकता है|तीव्र इच्छा, जिजीविषा और जी तोड़ परिश्रम आपको मंजिल तक पहुँचाकर ही दम लेगा|आयु,शारीरिक अक्षमता और विकलांगता इसमें कहीं बंधनकारी नहीं होगा|वर्षों से अपंग लोगों ने ,जन्म से अंधे लोगों ने न सिर्फ पढ़ाई में सफलता प्राप्त की बल्कि एम. ए. एम .फिल करने के बाद शोध के महान कार्य करके डाक्ट्रेट की उपाधियां भी प्राप्त कीं|

बाइस साल की उम्र में एमियो ट्रोफिक लेटरल स्केलरोसिस नामक बीमारी से ग्रस्त होने के बावज़ूद स्टीफन हाकिंग ने जो उपलब्धि हासिल की वह दुनियाँ के इतिहास में अज़ूबा है| इस बीमारी में सारा जिस्म अपंग हो जाता है|केवल दिमाग काम करता रहता है|स्टीफन ने स्वयं कहा है कि” मैं भाग्यशाली हूं कि मेरा शरीर बीमार हुआ है मन और दिमाग तक रोग नहीं पहुंचा है|”

वे एक महान वैग्यानिक हैं और इस क्षेत्र में न्यूटन और आस्टीन के समकक्ष खड़े दिखते हैं| कास्मोलाजिस्ट ,मेथामेटिशियन,केम्ब्रिज मेंल्यूकेशियन के प्रोफेसर, अंतरिक्ष और ब्लेक होल से परदा हटाने वाले एक अदभुत और महान वैग्यानिक हैं|वह एकमात्र एक ऐसे वैग्यानिक हैं जिन्होंने अंतरिक्ष में काले गढ्ढों की खोज की है| उन्होंने अंतरिक्ष के अस्तित्व पर भी सवालिया निशान खड़े किये हैं| उनके द्वारा रचित पुस्तक ए ब्रीफ हिस्टरी आफ टाइम ने तो बिक्री के नये नये रिकार्ड बना डाले| हालाकि उनकी उनकी व्यक्तिगत जिंदगी उतार चढ़ावों से भरी रही फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी|उन्होंने कास्मोलोजी विद्या पर स‌घन खोज की| ब्रहमांड की खोज उनका प्रमुख विषय रहा है|उन्होंने अपने साथी कीप औ पर्सिकल के साथ ब्लेक होल पर काम किया| ब्लेक होल ऐसा स्थान है जहां से दूसरे ब्रहमांड में पहुँचा जा सकता है| इतिहास गवाह कि ब्लेक होल में कई बड़े जहाज और हवाई जहाज गायब हुये हैं उनका आज तक पता नहीं लगा है|और तो और् तो उर उनका मल्वा भी ढूंढे से भी नहीं मिला है| सोचने की बात यह है कि जिस व्यक्ति का मस्तिष्क को छोड़कर सारा शरीर अपंग हो वह इतने जटिल काम कैसे कर सकता है किन्तु स्टीफ्फन ने किये हैं| भारतवर्ष के महाराजकृष्ण जैन भी इसी तरह का उदाहरण है वर्षों तक व्हील चेयर पर रहने के बाद भी उन्होंने विपुल साहित्य लिखा और डाक्ट्रेट की उपाधि हासिल की |उनकी पत्नि अंबाला में कहानी लेखन महाविद्यालय की संचालिका हैं| अष्टावक्र आठ जगह से टेढ़े मॆढ़े थे परंतु उनकी विद्वता दूर दूर तक जानी जाती थी तेमूर लंग इतिहास में में खूनी योद्धा के रूप में मशहूर हुये|14वीं शताब्दी में उन्होंने युद्ध के मैदान में कई दॆशों को जीता| कहते हैं उसे अपने दुश्मनों के सिर काटकर जमा करने का शौक था| उस जमाने जबकि युद्ध बहुबल से लड़ा जाता था, बम और बंदूकों के सहारे नहीं ,ऐसे लंगडे तैमूर लंग की उपल्ब्धि किसी करिश्मेंसे कम नहीं आंकी जा सकती| तेमूर का दायां हिस्सा पूर्णत: खराब था|

 

एबिल बोडीड का मतलब सबल आदमी माना जाता है किं यदि बीस तीस मीटर ही दौड़ना पड़ जाये तो हालत खराब हो जाती है दूसरी तरफ दक्षिण आफ्रिका के आस्कर प्रिस्टोरियस‌ हैं जो घुटने के नीचे दोनों पैर कटे होने के बाद भी चार सौ मीटर की दौड़ 45 सेकिंड में पूरी कर लेते हैं| विगत दिनों चीन के तैराक जैंग ताओ ने स्वर्ण पदक जीता है किंतु वे अपने पदक को हाथों से छू भी नहीं सकते|सीटी बज़ने पर उनके कोच उनके पेट के नीचे हाथ रखकर उन्हें पानी में उतारते हैं क्योंकि उनके दोनों हाथ कंधे से कटे हैं| जरा पेरालिंपिक्स देखिये तो पता लगेगा कि कितने लंगड़े लूले लॊग पदक जीतकर ले जाते हैं|इससे साफ तौर पर मालूम पड़ता है कि समस्या शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक है| हिम्मत और लगन आँख कान या हाथ पैर की मोहताज़ नहीं है|

 

 

ऐसे करिश्में देखकर तो यही प्रतीत होता है इंसान में विकलांगता मन से होती है शरीर सॆ नहीं|हिम्मत और लगन हाथ पैर अथवा आँख कान की मोहताज नहीं||मन शरीर का अंग अहींहै इससे टूटे हुये मन और पस्त हौसले वाले को विकलांग नहीं कहा जाता,जबकि असल विकलांग ये ही लोग हैं और दुनिया की कितनी आबादी इस तरह विकलांग होगी कहा नहीं जा सकता|लोग सोचते होंगे कि केवल दिखावे और हौसला अफजाई के लिये ही पेरालिंपिक्स के आयोजन होते हैं किंतु जब इनके परिणाम सामने आते हैं तो लगता है कि विकलांक लोग भी वह कारनामे कर दिखाते हैं जॊ सबल शरीर वाले भी नहीं नहीं करपाते|

वैसे इस तरह के पेरालल ओलंपिक का नाम करेज ओलंपिक अथवा ब्रेभ ओलंपिक या डिटरमिनेशन ओलंपिक रखा जाना चाहिये क्योंकि इसमें मनोबल की परीक्षा होती है| ऐसे में इच्छा होती है कि ऐसे बुलंद हौसले वालों को सलाम करें उन्हें सिर आंखों बैठायें|जिन्होंनें बिना पैरों के दुनियाँ की बड़ी बड़ी बाधायें पार की हैं जिन्होंने आंखें न होते हुये भी बड़ी बड़ी पुस्तकों का पाठन और लेखन कर लिया है ,ऊंचे सपने देखकर उन्हें साकार कर लिया है उनके प्रति नमन कर उन्हें सम्मान देना ही हमारा कर्तव्य होना चाहिये|

2001 के एक सर्वे के अनुसार भारत में ही 2.19 करोड़ विकलांग थे जो कि देश की कुल आबादी का दो प्रतिशत से भी अधिक है इसमें से27.87प्रतिशत ऐसे हैंजो अंग संचालन में पूर्णत: या अंशत: असमर्थ हैं| एक अनुमान के अनुसार हर साल 40000 अपंग नये जुड़ जाते हैं|

एक जुम्मॆवार नागरिक होनें के नाते हमारा भी दायित्व है कि हम विकलांगों के प्रति सहानुभूति रखें| भारत‌ सरकार ने 1990 में विकलांग सहायता एवं पुनर्वास योजना प्रारंभ की है|इसे राष्ट्रीय प्रकल्प का दर्जा दिया गया है|तेरह ऐसे केंद्र बनाये गये हैं जो विकलांगों को कृत्रिम अंग या उपकरण कराते हैं|ये केंद्र अहमदाबाद,दिल्ली,गुवाहाटी,हिसार,हैदराबाद,इंदौर,कोटा,मुरादाबाद लुधियाना नगकोटा पटना और पुणे में खोले गये हैं| शास ने विकलांगों को नौकरियोंमें भी विशेष आरक्षन दिया है| बस कमी है तॊ लोगों तक सही और स‌मुचित जानकारी नहीं पहुँच पाने की है| राणा सांगा के शरीर में अस्सी घाव होने के बाद भी वे रण भूमि में कहर बरसा देते थे|ऐसे किस्से हम विकलांगो के स मक्ष प्रस्तुत कर हमेशा उनकी हौसला अफज़ाई करते रहें,इसी तरह‌ के प्रोत्साहन देना विकलांगों के प्रति सच्ची सेवा होगी|

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1 Comment on "म‌न के हारे हार है मन के जीते जीत"

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siddharth pandey
Guest

Good and effective for empaired peoples

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