लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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प्रथम अध्याय

निशा नागर, एक सुन्दर सुघड़ षोडशी नयी नयी कालेज में आयी थी,एक सुंदर सी बड़ी कार में.जब वह प्रथम दिन गाडी से उतरी तो न जाने कितने दिल फेंकों ने अपने अपने दिल उसकी ओर उछाल दिए.कुछ तो उसकी पैरों के आगे गिरे,पर उसने एक नजर भी उनकी ओर नहीं डाली.वे दिल यो हीं धूल धूसरित होकर तड़पते रहे.कुछ दिल जरा जोर से फेंके गए थे,वे भी उसके सुनहले घुंघराले बालों में उलझ कर गुम हो गए.न कोई दिल उसके दिल से टकराया और न उसकी निगाहों के सम्मुख ही आया. मनचलों को बुरा तो बहुत लगा.कुछ तो निराश भी हुए.उन्होंने सोचा कि ऐसा भी क्या गरूर कि नजर भी नहीं उठी उनलोगों की ओर.न सकुचाहट न सकपकाहटआखिर यह सुन्दरी है कौन? प्रथम दिवस वाली घबराहट भी नहीं दिख रही थी उसमे.कुछ लोगों ने मन मनाया कि क्यों न इसका रास्ता रोका जाए,पर उनके साथियों को लगा कि कहीं दाव उलटा न पड़ जाए.अच्छी सी सुन्दर कार में आयी थी,वह भी ड्राइवर के साथ.जाहिर था कि किसी बड़े बाप की बेटी है.

अच्छी खासी बहस की सबब बन गयी वह लड़की.मनचलों और दिलफेंकों को साफ़ साफ़ अपनी हार नजर आ रही थी,जो उन्हें कतई गवारा नहीं था.बैठक में एक से एक प्लान बनते रहे,पर कोई ठोस बात बनती नजर नहीं आ रही थी.दूसरा दिन भी इसी तरह बीत गया,पर लड़की के तेवर ढीले नहीं पड़े.एक मनचले की टिप्पणी पर उसने आँख तरेर कर देखा अवश्य,पर उन निगाहों में पता नहीं मनचले को क्या दिखा कि वह नजरे चुरा कर खिसक गया.यह दृश्य बहुतों ने देखा.लोग हैरान भी हुए.ऐसा तो कभी नहीं हुआ था.मनचलों का समूह भी अपने साथी की यह हालत देख कर परेशान हुआ.आखिर तीसरे दिन पता लग ही गया कि यह सुन्दरी है कौन?उसके खानदान का पूरा लेखा जोखा उनके सामने था और उनको हताश करने के लिए वह काफी था.

पर वाह रे मनचले. उनलोगों ने फिर भी हार नहीं मानी.निशा नगर शहर के सुप्रशिद्ध वकील, राजिंदर नागर की एकलौती सुपुत्री थी.अपने पिता के प्रभाव के साथ साथ उसके अपने सौन्दर्य ने उसको घमंडी बना दिया था.उसका एक छोटा भाई भी था,पर वह भी अपने बहन के लिए किसी की जान ले सकता था. हो सकता है कि कहानी में आगे भी उसकी कुछ भूमिका आये,अतःउसके बारे में भी कुछ जानकारी हासिल कर लेते हैं.

ऋषि नागर की उम्र महज चौदह वर्ष की थी,पर उसका डील डौल देख कर कोई भी उसे बच्चा समझने की भूल नहीं करता था.माँ का देहांत हो चुका था.पिता को फुर्सत नहीं थी कि बच्चों की ओर ध्यान दे सकें,अतः वे अपने ढंग से बड़े हो रहे थे.

ऐसा भी नहीं था कि निशा इन सब बातों से बेखबर थी. वह इन लड़कों की एक एक हरकत को ध्यान से देखती थी.अब तो समय बीतने के साथ नए लड़के भी,जो पहले अपने वरिष्ठ साथियों के सामने सिकुड़े रहते थे,अब अपना पंख फैलाना आरम्भ कर रहे थे.उनको एक ऐसी सुविधा भी थी,जो बड़ों के पास नहीं थी.वे कक्षा में साथ साथ बैठते थे.पर वाह री निशा, न जाने वह किस दुनिया में खोई रहती थी कि वह इन सब बातों से बेखबर नजर आती थी.सहेलियां उसको कुरेदने का भी प्रयत्न करती थी.कुछ तो मन ही मन उससे खार भी खाती थी,उसके सामने मडाराते हुए अलि वृन्द को देख कर.उनको भी लगता था कि न जाने किस धातु की बनी है यह.जब अन्य लडकियां लड़कों के बारे में चटकारे ले लेकर बातें करती रहती थीं ,तो वह उनकी बातों को सुनती रहती थी,पर अपनी ओर से कुछ भी नहीं कहती थी.सहेलियों द्वारा उकसाए जाने पर केवल इतना ही कहती थी कि मुझे इन सब बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है.पर क्या सचमुच ऐसा था?

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आलोक,आलोक मेहता.हाँ यही नाम था उस लड़के का,जिसने निशा के साथ ही कालेज में दाखिला लिया था.अपने आप में मस्त रहने वाला.माता पिता के सपनों को साकार करने के लिए प्रयत्नशील. बहुत ही होनहार छात्र था वह.उसकी तमन्ना तो अभियंता बनने की थी,पर उसके पिता को न जाने क्यों लगता था कि उसे वकील बनना चाहिए. माता पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर उसने इस कालेज में दाखिला ले लिया था.देखा उसने भी था निशा को, पर इस चमकीली लड़की पर ध्यान देने की शायद उसने आवश्यकता ही नहीं समझी थी.अपने माँ बाप का होनहार बेटा,अपनी लाड़ली बहन का प्यारा भाई और अपने अनुज का आदर्श, आलोक अपनी पढाई लिखाई में ही मग्न रहता था.पर निशा को यह कैसे गवारा होता?उसकी भ्रमणशील निगाहें आलोक पर भी पडी थी.उसे लगा कि यह लड़का तो उसकी ओर एकदम आकर्षित नहीं लगता,जबकि अन्य छात्रों की निगाहें हरदम उसका पीछा करती रहती थी.कहाँ उससे बात करने ,यहाँ तक कि अपनी और ध्यान देने के लिए सब लालायित रहते थे,वहीं यह किस मिट्टी का बना हुआ था कि उसकी ओर नजर भी नहीं उठाता था.निशा ने अपनी तरफ से एक आध बार पहल करने का प्रयत्न किया पर उसपर कोई प्रभाव नहीं पडा.ऐसा लगता था कि उसकी निगाह में निशा का कोई महत्त्व नहीं है.ऐसे निशा अब कक्षा में खुलने लगी थी.अब पहले दिन वाला गरूर भी नहीं रह गया था.ऐसा लगने लगा था कि पहले दिन और उसके कुछ दिन बाद वाला उसका स्वांग कालेज के माहौल की थाह लेने के लिए था.ऐसे तो अब अनेक छात्र छात्राएं उसके निकट आ चुके थे,पर उसका ख़ास झुकाव किसी की ओर नहीं था .उसका ध्यान था तो केवल आलोक की ओर. आलोक तो उसके लिय चुनौती बन गया था. ऐसे भी छात्र छात्राओं पर उसका काफी रोब था. शहर के प्रसिद्ध वकील की बेटी जो थी वह .

देखते देखते एक वर्ष बीत गया.इस एक वर्षं में बहुत परिवर्तन हुए ,पर एक परिवर्तन नहीं हुआ.निशा के प्रयत्नों के बावजूद आलोक और उसके बीच की दूरी नहीं कम हो सकी.वे एक दूसरे के लिए अजनवी ही बने रहे. आलोक के मन में न जाने क्या था?निशा समझ ही नहीं पा रही थी कि उसको काबू में लाने के लिए कौन सा मन्त्र काम में लाया जाए?हार ब्रदास्त करना तो उसने सीखा नहीं था,अतः मन ही मन वह अपनी योजनायें बनाती और मिटाती रहती थी

द्वितीय अध्याय

कालेज में एक वर्ष बीत भी गया ,पर निशा का प्यार परवान नहीं चढा.प्रेम कहानी आगे बढ़ ही नहीं पा रही थी. लोगों की उत्सुक निगाहें कुछ नया देखने की प्रतीक्षा करते करते थकने लगी थी कि लोगों ने आलोक और निशा को साथ साथ देखा.उनकी तो आँखें फटी की फटी रह गयी.सबको मालूम था कि निशा आलोक पर बहुत दिनों से डोरे डाल रही थी,पर अब उन लोगों को लगने लगा था कि शायद निशा को असफलता हीं हाथ लगे.बहुतों ने तो निशा के साथ अपने भविष्य के ताने बाने भी बुनने आरम्भ कर दिए थे.उनके दिलों को ऐसा सदमा लगा कि वे आह तक नहीं कर सके.पर यह अनहोनी हो कैसे गयी?

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उस दिन आलोक कैंटीन में अकेले ही चाय का प्याला लिए बैठा था.न जाने वह किस विचार में मग्न था?किस्मत भी क्या क्या रंग दिखलाती है?सदा सहेलियों और मित्रों से घिरी रहने वाली निशा उस दिन अकेले ही कालेज कैंटीन के सामने से गुज़र रही थी.उसने जब आलोक को अकेले देखा तो उसे इस शुभ अवसर को गंवाना उचित नहीं समझा और एक प्याला चाय लेकर उसके सामने बैठ गयी.उसने तो आलोक से इजाजत लेने की औपचारिकता निभाने की भी आवश्यकता नहीं समझी.आलोक थोड़ा सकपकाया अवश्य ,पर मन ही मन प्रसन्न भी हुआ. उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह सुन्दरी जिसको वह ह्रदय से लगाए बैठा था,आज उसके इतने निकट थी.निशा को तो उसके इन भावनावों का आभास तक नहीं हुआ.बैठने के बाद उसने पूछा अवश्य, “आलोक ,मैंने तुम्हारे विचारों में बाधा तो नहीं डाली?”

आलोक को तो उत्तर देने में भी कठिनाई हो रही थी.उन दोनों को देख कर ऐसा लग ही नहीं रहा था कि दोनों पिछले एक वर्ष से सहपाठी हैं.किसी तरह उसने इतना हीं कहा,”नहीं निशा जी ,मुझे आपको अकेले अपने साथ बैठे हुए देख कर आश्चर्य अवश्य हो रहा है”

‘क्यों?आश्चर्य क्यों हो रहा है?”निशा फूट पडी.

आलोक को लगा कि वह बुरी तरह फँस गया.वह इसका क्या उत्तर दे.वह अपने मन की भावनावों से तो उसे अवगत करा नहीं सकता था,क्योंकि इतना साहस तो उसमे था नहीं,पर कुछ न कुछ तो बोलना ही था.

वह बोला,”नहीं, ऐसी कोई बात नहीं.आपको हमेशा सहेलियों के साथ देखा था,अतः आज अकेले देख कर आश्चर्य हुआ”.

निशा को यह जानकर थोड़ी प्रसन्नता अवश्य हुई कि आलोक भी उसकी ओर ध्यान देता है,पर बात फिर भी बनी नहीं.यह कैसे पता चले कि आलोक के दिल में उसके लिए क्या स्थान है.

थोड़ी इधर उधर की बातें अवश्य हुई,पर निशा आलोक के दिल की भावनावों का थाह नहीं पा सकी.ऐसे लड़कियों का अंतर्ज्ञान इस मामले में अधिक होता है.उसे इतना तो लग ही गया था कि वह उसे चाहता है,पर यह चाहत कैसी है,यह पता नहीं लग रहा था.आलोक बातें करने में इतना हिचकिचा रहा था कि निशा थोड़ी ही देर में उबने लगी,पर इससे आलोक को बश में करने के उसके चाहत में कोई कमी नहीं आयी.

एक दो और मुलाकातें अवश्य हुई ,पर निशा को बात बनती नहीं दिख रही थी. निशा को यह अवश्य लगने लगा था कि आलोक उससे प्यार करता है.वह यह सोचकर मन ही मन प्रसन्न हो रही थी,पर उसके समझ में नहीं आ रहा था कि इस प्यार की गहराई का पता कैसे लगे? उसने समझ लिया था कि आलोक तो कुछ कहेगा नहीं.अपनी तरफ से वह प्यार का इजहार करना नहीं चाहती थी.अगर उसका अनुमान गलत निकला तो क्या होगा?

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अंतत: निशा ने अपनी अंतिम चाल चलने की ठान ली.सहपाठियों को थोड़ा आश्चर्य हुआ,जब निशा बिना ड्राईबर के कालेज आने लगी.कार भी बदल गयी थी.लगता था,निशा ने ख़ास अपने लिए नई कार खरीद ली थी. आलोक मेहता का घर कालेज से बहुत दूर नहीं था.इतनी हैसियत तो उसके माता पिता की थी कि वह अपने लिए मोटर साईकिल खरीद सकता था.कालेज के छात्र छात्राएं अधिकतर कार,मोटर साईकिल या स्कूटर में आते थे .कुछ छात्रों के पास साइकिलें थीं.आलोक भी उन्हीं में से एक था.अधिकतर सड़क पर साईकिल से अकेले ही जाता नजर आता था.एक दो बार निशा ने उसको अपने कार में लिफ्ट देने को भी सोचा.एक बार तो वह बोली भी,”आलोक, तुम साईकिल से क्यों आते हो?मेरे साथ आया करो.”

आलोक को पहले तो लगा कि निशा के संगत से ज्यादा अच्छा क्या होगा?पर उसके दिमाग ने दिल की आवाज नहीं सुनी.उसके खुद्दारी को यह गवारा नहीं हुआ.उसने नम्रता,पर दृढ़ता पूर्वक इनकार कर दिया.अक्सर ऐसा भी हो जाता था कि निशा भी आलोक के साईकिल के साथ ही साथ अपनी कार में उससे बातें करती हुई कुछ दूर तक चली जाती थी.लोगों की आश्चर्य भरी निगाहों का भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता था.

उस दिन तो गजब हो गया.न जाने अचानक यह सब कैसे हो गया?जैसे ही आलोक की साईकिल से उसकी कार आगे बढी,दो मोटर साईकिल सवारों ने उसकी कार का रास्ता रोक लिया.निशा को कार तो रोकना पड़ा,पर जब तक वह कुछ समझ पाती, चार मुस्तंडे मोटर साइकिलों से उतर कर उसके सामने आ गये और कार का दरवाजा खोल कर उसको खींचनेकी चेष्टा करने लगे.यह दृश्य कुछ लोगों ने देखा भी ,पर कौन बीच में पड़ता.वह जोर से चिल्ला पड़ी.आलोक चूंकि थोडा ही पीछे था,उसने भी वह दृश्य देखा और पलक झपकते ही वह कार के नजदीक था.निशा के चिल्लाने और बदमाश के दरवाजा खोलने के प्रयत्न के साथ ही आलोक उस पर पिल पड़ा था और जब तक उसके दूसरे साथी उसकी मदद को पहुँचते तब तक तो आलोक उसको जमींन सूंघा दूसरे पर पिल पड़ा था.उसका आक्रमण इतना अचानक हुआ था कि दूसरे को भी धरासाई होते देर नहीं लगी.जब तक वह इनको छोड़ कर आगे बढ़ता तब तक दूसरे एक मोटर साईकिल लेकर भाग चुके थे.वह उनके पीछे दौड़ा भी,पर जब वे पकड़ में नहीं आये तो वह पीछे मुड़ा.उसकेपीछे मुड़ने के पहले ही दोनों घायल महारथी भी मैदान छोड़ चुके थे ,क्योंकि अब राह चलते दूसरे लोग भी उन लोगों की और आकर्षित हो गए थे. वे जान रहे थे कि रूकने पर बेभाव की पड़ेगी.

निशा बहुत देर तक आलोक के साथ सड़क के किनारे बैठी रही.आलोक के चेहरे पर चोट भी लगी थी,जिससे खून निकल रहा था.निशा ने पहले तो अपने रूमाल से उसके चेहरे के खून को साफ़ किया,फिर उसको डाक्टर के पास ले जाने के लिए इसरार करने लगी.

आलोक ने इतना ही कहा,”मामूली जख्म है,तुरत ठीक हो जाएगा.”

निशा ने उसके दोनों हाथों को अपने हाथों में ले रखा था.वह बोली,”आलोक ,अगर आज तुम समय पर नहीं पहुँचते तो न जाने क्या हो जाता?मैं तो सदा के लिए तुम्हारी ऋणी हो गयी.”

आलोक ने उसकी आँखों में देखा तो उसे वहाँ अपने लिए प्यार नजर आया.उसे तो पता भी नहीं चला कि वह निशा की आँखों में अपने प्यार की परछाई देख रहा था.वह निहाल हो गया.

कुछ देर बाद दोनों ने एक दूसरे से विदा ली,पर अब वे एक दूसरे के अन्तरंग हो चुके थे.

आलोक तो यह भी नहीं जान सका कि यह सब नाटक था ,जो निशा ने उसकी सन्निघता के लिए अपने अनुज की सहायता से रचा था.वे चारो लड़के उसके छोटे भाई के मित्र मंडली के सदस्य थे.

आलोक ने तो अब खुल कर अपने प्रेम का इजहार कर दिया.उसे लग गया कि आग दोनों तरफ लगी हुई है.ऐसे इस नाटक के कार्यावन के समय ऋषि ने पूछा था,”दीदी,क्या तुम सचमुच आलोक को इतना चाहती हो?”

उसका उत्तर था,”यह मेरे दिल की बात है.क्या तुम मेरे लिए इतना नहीं कर सकते?”

इसके बाद ऋषि ने छोटे भाई की तरह केवल आज्ञा पालन किया था.

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निशा ने आलोक का साथ तो पा लिया था,पर उसके मन में हमेशा ही अंतर्द्वंद्व मचा रहता था.क्या आलोक उसके लिए अच्छा जीवन साथी साबित होगा?क्या सचमुच वह उसके सपनों का राजकुमार बन सकता है?

उधर आलोक अपनी पढाई के साथ साथ निशा के सपनों में भी डूबा रहता था.निशा उसके लिए एक प्रेरणा स्रोत बन गयी थी.उसने मन ही मन ठान लिया था कि वह बहुत बड़ा वकील बनेगा.निशा के पापा से भी अधिक नाम कमाएगा.

निशा के साथ ही वह उसके पापा से भी एकबार मिला था ,पर वे आलोक से प्रभावित नहीं नजर आये थे.आलोक ने तो शायद इस पर ध्यान भी नहीं दिया था.

इसी तरह के उहा पोह में जिन्दगी आगे बढ़ रही थी.धीरे धीरे इस कालेज की पढाई भी समाप्त हो रही थी,पर दोनों में किसी ओर से इस प्यार को आगे बढाने की जल्दी नहीं नजर आ रही थी.पढाई समाप्त होने के बाद अब तो आलोक ला कालेज में चला गया था.निशा ने एम्. ए.में प्रवेश ले लिया था.दोनों का मिलना जुलना बदस्तूर जारी था,पर निशा के प्यार में पहले वाली गर्मी नहीं रह गयी थी.आलोक को कभी कभी लगने लगा था कि निशा उससे दूर हो रही है,पर वह इसके आगे सोच नहीं पाता था,क्योंकि निशा तो अब उसके लिए जिन्दगी बन गयी थी.उसने निशा के रूख के बारे में अधिक ध्यान देने की आवश्यकता भी नहीं समझी.उसे लग रहा था कि अगर वह वकील बन जाए तो निशा उसकी जीवन संगिनी बनने के लिए राजी हो जायेगी.

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अंतत: आलोक वकील बन गया.उसकी कुशाग्रता से एक बड़े ला फर्म के मालिक बहुत प्रभावित हुए और वह उनके संग काम करने लगा.हांलाकि वह ला फर्म निशा के पिता का एक तरह से प्रतिदंद्वी था,पर उसके मालिक आरम्भ में इसका ध्यान अवश्य रखते थे कि आलोक उनसे न टकराए,क्योंकि उन्हें मालूम था कि मिस्टर नागर को कभी कोई मुकदमा हारते नहीं देखा गया था.आलोक तो दिन रात के कड़े परिश्रम से अपना स्थान बनाने में लगा हुआ था.उसे लग रहा था कि अब निशा को उसकी जीवन संगिनी बनने से इनकार नहीं होगा.पर बात आगे बढ़ नहीं रही थी.आलोक के संकेतों को भी या तो वह समझ नहीं पा रही थी या उसे न समझने का ढोंग कर रही थी. इसी तरह एक दो वर्ष बीत गए.आलोक समझ नहीं पा रहा था कि आखिर निशा क्या चाहती है.स्वयं निशा को भी शायद नहीं पता चल रहा था कि वह क्या चाहती है.फिर वह आलोक को क्या बताती?उसे तो अब यह भी लगने लगा था कि शायद वह एक जूनून था,एक चुनौती थी जिसके तहत वह आलोक की ओर आकृष्ट हुई थी.उसे तो लगने लगा था कि शायद वह जूनून उसी दिन समाप्त हो गया था,जब उसने आलोक का प्यार जीत लिया था. उसे तो यह भी पता नहीं चल रहा था कि वह शादी के बंधन में बंधेगी या नहीं.

आलोक भी अब हताश होने लगा था.माता पिता की ओर से भी शादी के लिए दबाव पड़ रहा था.घर का बड़ा लड़का था.उससे छोटे भाई बहनों की शादी का भी तो प्रश्न था.इसी बीच मिस्टर नागर से भी वह एक मुकदमे के सिलसिले में टकरा चुका था.निशा ने मना भी किया था,पर परिणाम आशा के प्रतिकूल हुआ.एडवोकेट नागर पहली बार कोई मुकदमा हारे थे.पर यह जीत भी आलोक के प्यार को की दिशा देने में असमर्थ रही.निशा तो थोड़ी नाराज भी दिखी,पर अब आलोक की स्थिति ऐसी हो गयी थी कि उसने इस नाराजगी को भी नजर अंदाज कर दिया .मदिरा को कभी न छूने वाला आलोक अब शराब का सहारा ढूंढने लगा.

उतना मेधावी छात्र और एक तेज तर्रार वकील अपने गम को भुलाने के लिए अब नियमित मदिरा पान की और आकर्षित हो गया.उसके पिता को भी लग गया था कि कहीं कोई गड़बड़ है.निशा के साथ आलोक के प्यार का उनको पता था ,पर अब उनको पता नहीं चल रहा था कि उन दोनों के बीच आखिर ऐसा क्या हो गया?.उन्होंने एक दो बार आलोक के दिल की हालत जानने का भी प्रयत्न किया,पर यह काम इतना आसान नहीं था.ऐसे भी जब आलोक को स्वयं पता नहीं चल रहा था,तो अपने पिता को क्या बताता? वे अपने होनहार पुत्र को निराशा के गर्त में डूबते देखते रहे और कुछ न कर पाने की असमर्थता के कारण तड़पते भी रहे.

तृतीय अध्याय

आज निशा मानसिक अस्पताल में है.कभी हँसती है,कभी रोती है.अक्सर बड़बडाती रहती है,”आलोक तुम कहाँ हो?तुमने मुझे यहाँ अकेले क्यों छोड़ रखा है?तुम मुझे लेने क्यों नहीं आते?कुछ पागल लोग तो यह भी कहतेहैं की तुम इस दुनिया में नहीं हो.पर ये सब पागल हैं.झूठ बोल रहे हैं.तुम मुझे अकेला छोड़ कर जा हीं नहीं सकते’.बोलते बोलते,वह रो भी पड़ती है.फिर हँसने लगती है,” देखो देखो मेरा आलोक मुझे लेने आ रहा है.अब मैं उसे नहीं जाने दूंगी.मैं उसके संग ब्याह रचाउंगी. मैंने उसे बहुत तड़पाया है,इसीलिये वह रूठ गया था ,पर मैं उससे माफी मांग लूंगी.वह मुझे अवश्य माफ़ कर देगा.अब मैं इतने बड़े वकील की बीबी कहलाउंगी.वह पापा से भी बड़ा वकील है.पापा ने किस तरह उससे मुंहकी खाई थी.”

उसका इसी तरह का बड़बडाना चलता ही रहता था,पर कभी कभी एकदम चुप हो जाती थी.अन्य पागलों जैसा हिंसक व्यवहार कभी नहीं करती थी.न कभी गाली गलौज न कोई हंगामा.हाँ कभी कभी अपना गला दबाने का प्रयत्न अवश्य करती थी.उस समय उसकी आवाज मुखर हो जाती थी,”.मैं तुम्हें छोडूंगी नहीं.गला घोंट का मार डालूँगी.आलोक मेरा है,केवल मेरा है.उसको मुझसे कोई नहीं छीन सकता.”

निशा को इस हालत में देख कर मैं कहानी की बिखरी हुई कड़ियों को जोड़ने का प्रयत्न कर रहा था,पर सफल नहीं हो पा रहा था,पर आखिर वह कड़ी मिल ही गयी.

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आलोक जिस ला फर्म में काम करता था, वहीं एक नयी वकील काम करने लगी. वह माधुरी थी.माधुरी आलोक के पिता के मित्र की बेटी थी,पर आलोक को उससे कोई लेना देना नहीं था.पहले दिन वह बड़े ही औपचारिक ढंग से उससे मिला.ऐसे भी वह आफिस में बहुत ही गंभीर और अपने काम से काम रखने वाला वकील समझा जाता था.उसके सहकर्मियों को आश्चर्य भी होता था कि न जाने आलोक में क्या है,जिसके चलते बॉस की निगाहों में उसकी इज्जत सबसे अधिक है.ला फर्म के मालिक स्वयं एक अच्छे वकील थे,अतः वे आलोक की कीमत समझते थे.आलोक का प्रेम प्रसंग भी उनको ज्ञात था.वे कभी कभी आलोक को समझाने का भी प्रयत्न करते थे कि निशा उसकी जीवन संगिनी बनने के लायक हीं नहीं,पर आलोक उस दिल का क्या करे,जो अभी भी निशा के प्रेम में पागल था.मदिरा का सहारा उसे कुछ समय के लिए सुकून अवश्य देता था,पर नशे में भी वह कभी कभी चिल्ला उठता था,”निशा तुमने ऐसा क्यों किया?”

माधुरी आलोक को जानती थी,पर वह उससे उम्र में बड़ा था,अत:जब उसके पिता आलोक के पड़ोसी थे तब भी उससे माधुरी का कोई संपर्क नहीं हो पाया था.आलोक के छोटे भाई बहन अवश्य उसके संगी साथी थे.अब जब वह आलोक के आफिस में आयी तो न जाने क्यों कुछ हीं दिनों में उसमे दिलचस्पी लेने लगी.उसेआलोक की तीब्र बुद्धि का अहसास था.वकालत में भी उसी उम्र में उसका कम नाम नहीं था.ऐसे भी वह बचपन से उसे जानती थी.प्रभावित तो होना ही था.उसे लगा कि आलोक के संपर्क में उसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.वह उसके करीब आने का प्रयत्न करने लगी.पर आलोक ने तो कुछ दिनों तक उसकी ओर ध्यान भी नहीं दिया.ऐसे भी निशा ने उसको ऐसा दर्द दिया था जिससे उबरना इतना आसान नहीं था.

पर वाह री माधुरी.धीरे धीरे उसे सब कुछ पता चल गया.उसे आलोक की बेरूखी का कारण भी समझ में आ गया.अभी तक तो वह उससे कुछ सीखना चाहती थी,पर अब उसे लगा कि आलोक को भी उसकी आवश्यकता है.उसने ठान लिया कि वह आलोक को इस सदमे से बाहर निकाल कर रहेगी.यह उसके लिए आलोक के प्यार के साथ साथ एक तरह की चुनौती भी बन गयी.एक चुनौती ने आलोक को इस हालत में पहुंचा दिया था,पता नहीं अब यह दूसरी चुनौती क्या गुल खिलायेगी?

माधुरी अब धीरे धीरे आलोक के नजदीक आने का प्रयत्न करने लगी.एक हीं दफ्तर में काम करने और एक ही पेशे का होने के कारण यह कोई कठिन भी नहीं था.वकालत आलोक के लिए पेशा हीं नहीं एक जूनून था.किसी भी मुकदमे के लिए वह इतना सबूत कहाँ से जुटा लेता था,यह लोगों क आश्चर्य का विषय था,ऊपर से उसका जिरह,विपक्षी वकील के छक्के छुड़ा देता था.माधुरी को तो उससे बहुत कुछ सीखना था.माधुरी कोई भी उलझन लेकर उसके पास पहुंच जाती थी और आलोक था कि उसको सुलझा कर ही दम लेता था.इन सबके चलते उसे आलोक के समीप आने का अधिक से अधिक मौक़ा मिलता गया.फिर भी निकटता हो नहीं पा रही थी.

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उस दिन लोगों को थोड़ा आश्चर्य अवश्य हुआ,जिस दिन आलोक और माधुरी साथ बैठ कर चाय पीते देखे गए.आलोक दफ्तर में चाय के समय किसी के साथ नहीं बैठता था.बॉस के कमरे में भले ही वह उनके साथ कभी कभी चाय पी लेता था,अन्यथा चाय के प्याले के साथ वह अकेला ही देखा जाता था.अब माधुरी इस नियम को तोड़ने में सफल हो गयी थी.

कुछ समय के बाद तो वे अक्सर चाय के वक्त साथ होने लगे.ऐसे भी किसी न किसी बहाने माधुरी उसके पास चली ही जाती थी.आलोक को भी उसकी बच्चों जैसी जिज्ञासा अच्छी लगती थी.कभी कभी तो वह उसको झिड़क भी देता था.उसकी झिड़क से माधुरी रोने रोने को हो आती थी.आलोक की नजर जब उसके उदास चेहरे पर पड़ती थी ,तो वह उसको मनाने भी लगता था.अब तो दोनों के बीच नोंक झोंक भी चलने लगा था.ऐसा प्रतीत हो रहा था कि आलोक जिन्दगी की ओर उन्मुख हो रहा है. उसके पिता से माधुरी के पिता ने जब इस बढ़ते सम्बन्ध के विषय में चर्चा की तो वे तो निहाल हो गए.उन्हें तो अपने बेटे को खो देने का डर सताने लगा था. न जाने क्यों उनको लगा कि अब शायद उनका बेटा लौट आये.निराशा के गर्त में डूबते हुए उसके पिता के दिल को इस खबर ने बहुत शकून प्रदान किया.

अब जब दोनों के माता पिता इस सम्बन्ध को जान गए थे ,तो उनके शादी व्याह की बात चलना स्वाभाविक था.माधुरी तो मन ही मन आलोक को प्यार करने लगी थी,अतःउसकी ओर से तो इनकार का प्रश्न हीं नहीं उठता था.बात थी तो आलोक के दिल की बात समझने की और उसको शादी के लिए तैयार करने की.यह बहुत ही कठिन कार्य था.ऐसे भी आलोक के जिदी स्वभाव से उसके पिता बहुत अच्छी तरह वाकिफ थे.उस पर निशा के प्यार का सदमा.बहुत ही साहस जुटा कर उसके पिता ने उस दिन बात छेड़ी.उन्होंने माधुरी के बारे में आलोक से पूछा,”माधुरी कैसी लडकी है?”

आलोक को माधुरी के पिता से अपने पिता के ताल्लुकात का पता था,अतः उसको इस प्रश्न से कोई आश्चर्य नहीं हुआ.उस ने माधुरी की बहुत बडाई की और बताया कि अपने पेशे में बहुत दिलचस्पी रखती है.उसका भविष्य बहुत उज्जवल है.

उसके पिता ने आगे पूछा,”तुम्हे कैसी लगती है?”

आलोक बोला,”बहुत अच्छी लगती है. इतनी सुन्दर है,फिर भी कोई घमंड नहीं.कभी कभी बच्चों जैसी हरकत करती है.लगता है किउसका बचपना अभी गया नहीं.मुझे क्रोध भी आता है, पर जब उसके मायूस चेहरे पर नजर पड़ती है तो मेरा क्रोध एक दम समाप्त हो जाता है और उसपर प्यार आ जाता है.”

आलोक के पिता यह जान कर बहुत प्रसन्न हुए कि माधुरी धीरे धीरे उसके दिल में स्थान बना रही है.पर अभी उन्होंने आलोक से शादी के बारे में बातचीत करना उचित नहीं समझा.

इस तरह की असमंजस की स्थिति में कुछ दिन और निकल गए.माधुरी के पिता ने एक दो बार इशारा भी किया, पर आलोक के पिता ने उन्हें धैर्य रखने की सलाह दी और स्वयं उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगे.

संयोग बस ऐसा अवसर आ भी गया.आलोक का छोटा भाई किसी लडकी से प्रेम करता था.अब शादी की बात चलने लगी थी.दोनों के माता पिता इस शादी के लिए तैयार थे,इसलिए कोई अड़चन तो थी नहीं,पर आलोक के पिता चाहते थे कि पहले उसकी शादी हो जाए ,तब उसके भाई की शादी की जाए.उन्होंने बड़े ही नाटकीय ढंग से इसका जिक्र किया.

वे आलोक से बोले,”बेटा, तुमको शायद पता नहीं,माधुरी के पिता और मैं बहुत पहले से यह तय कर चुके थे कि माधुरी तुम्हारी जीवन संगिनी बने,पर अवसर हीं नहीं मिल रहा था यह सब कहने के लिए. इसी बीच परिस्थितियों ने इस तरह करवट ली कि लगा,यह शायद हीं संभव हो,पर अब जब भगवान ने यह अवसर प्रदान किया है तो हमलोग सोच रहे हैं कि क्यों न तुम दोनों को विवाह के बंधन में बाँध दिया जाये. ऐसे कोई जल्दी नहीं थी,पर अब जब तुम्हारे छोटे भाई की शादी के लिए दबाव पड़ रहा है,तो मैं उचित समझता हूँ कि तुम भी शादी के लिए हामी भर दो.तुम्हारी बहन भी सयानी हो रही है,फिर उसका भी व्याह करना है”.

आलोक असमंजस में पड़ गया.उसे पता नहीं चल रहा था कि पिता को क्या उत्तर दे.माधुरी को वह चाहने अवश्य लगा था,पर निशा के प्यार में उसने ऐसी ठोकर खाई थी कि अब उसे प्यार शब्द से ही डर लगने लगा था.माधुरी के निश्छल प्रेम ने उसे सोचने के लिए अवश्य मजबूर कर दिया था.

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आखिर आलोक के माता पिता का अनवरत प्रयत्न और माधुरी का निश्छल प्रेम रंग लाया. आलोक के हामी भरते हीं उनके माता पिता ने फिर कोई देर नहीं की.उन दोनों का चट मंगनी और पट व्याह संपन्न हो गया.

पर यह क्या?जिस निशा को सब भूल चुके थी,आलोक के हनीमून से लौटते ही न जाने वह कहाँ से प्रकट हो गयी.आलोक को यह तो पता था कि निशा ने अभी शादी नहीं की है,पर उसने आलोक के प्रति जिस तरह की उपेक्षा दिखाई थी वह उन दोनों के सम्बन्ध विच्छेदके लिए काफी समझा गया था.पर ऐसा हुआ नहीं.

आलोक के दफ्तर में घुस कर तो उसने ऐसा नाटक किया कि सब दंग रह गए. वह दनदनाती हुई आलोक के दफ्तर में दाखिल हुई .क्रोध से उसकी आँखें लाल हो रही थी.वह सीधे उसके केविन में घुसी और उस पर चढ़ बैठी.उसने उसका कालर पकड़ लिया और बोली,”आलोक तुमने किसी अन्य लडकी से व्याह करने का साहस कैसे किया?तुम मेरे हो.तुम अन्य किसी के हो ही नहीं सकते.तुम तुरत माधुरी को तलाक दे दो.मैं यह ब्रदास्त नहीं कर सकती कि तुम अन्य किसी के बनो.”

आलोक तो हक्का बक्का रह गया.वह तो कुछ बोल ही नहीं पाया. किसी तरह उसने अपने को उसके चंगुल से मुक्त किया. उसने तो सोचा भी नहीं था कि जो निशा उसे घास नहीं डाल रही थी,उसकी शादी की खबर सुनते हीं रणचंडी बन जायेगी.दफ्तर वालों के लिए तो यह बहुत बड़ा कौतुहल था.संयोग बस माधुरी उस समय दफ्तर में नहीं थी.वह कचहरी गयी हुई थी.पता नहीं वह रहती तो क्या होता?आलोक के बॉस निशा को जानते थे.वे तो आलोक की प्रेम कहानी से भी वाकिफ थे.उन्होंने एक तरह से जबरदस्ती उसको दफ्तर से निकलवाया.वह बिफरती हुई चली गयी.जाते जाते उसने यह अवश्य कहा कि वह माधुरी को नहीं छोड़ेगी. बॉस ने आलोक को कुछ नहीं कहा.आलोक भी चुप हीं रहा.

दूसरे ही दिन वह माधुरी से भी टकरा गयी.बहुत बुरा भला कहा उसने माधुरी को.धमकी भी दी उसे.माधुरी भी उसके प्रेम प्रकरण से अनजान नहीं थी,अतः पहले तो चुप रहने में ही भलाई समझी,पर बाद में वह भी गरज पडी,”तुमने अपने को समझ क्या रखा है?बड़े बाप की बेटी हो तो क्या तुमको अधिकार मिल गया कि तुम कुछ भी कर सकती हो?आलोक मेरे पति हैं.उनकी ओर आँख उठा कर भी देखने की कोशिश नहीं करना.तुम किस तलाक की बात कर रही हो?हम दोनों एक दूसरे को प्यार करते हैं और सब कुछ जानते हुए शादी के बंधन में बंधे हैं.तुम्हारे कहने से क्यों तलाक लेंगे?”

निशा बिफरते हुए बोली,”माधुरी ,तुम मेरा कहना मान लो.तुम मुझे नहीं जानती. मैं आलोक को पाने के लिये कुछ भी कर सकती हूँ”

माधुरी ने इतना ही कहा,”मैं भी देखूंगी.”

निशा तो एक तरह से पागल हो गयी.घर में भाई और बाप दोनों उसकी हरकत से परेशान हो गए.बाप ने भी कुछ करने में असमर्थता जताई.

फिर तो निशा पर एक भूत सा सवार हो गया.वह प्रतिशोध के लिए बेचैन हो उठी उसे लग गया कि जब तक माधुरी जिन्दा है,आलोक उसका नहीं हो सकता.उसने ठान लिया कि माधुरी को रास्ते से हटाना ही है.भले ही इसके लिए उसकी ह्त्या क्यों न करनी पड़े.

वह मौके की तलाश में रहने लगी,पर माधुरी तो जैसे आलोक की साया बन गयी थी. वे दोनों हमेशा साथ रहते थे.यहाँ तक कि अगर माधुरी का कोई मुकदमा अलग से भी होता तो आलोक उसे छोड़ने कचहरी अवश्य जाता और वह तब तक कचहरी से बाहर नहीं आती,जबतक आलोक उसे लेने नहीं आ जाता.निशा तो उसको मारने के लिए अब पिस्तौल ले कर चलती थी.उसे तो यह भय भी नहीं रह गया था कि माधुरी की ह्त्या करने से उसको सजा हो जायेगी और वह आलोक को कभी नहीं पा सकेगी.उसने तो उन दोनों का प्रेम देख कर यह भी सोच लिया था कि वह माधुरी को आलोक के साथ नहीं रहने देगी,बाद में चाहे आलोक उसका बने या नहीं.

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उस दिन आखिर उसने गोली चला हीं दी. वह तो मौके की तलाश में भटकती रहती थी.आलोक और माधुरी ने बहुत बार उसे देखा भी था.उस दिन आलोक ने एक जगह गाडी रोकी और माधुरी नीचे उतरी.जगह भी कोई सुनसान नहीं था.फिर भी निशा ने यह क्षण गवांना उचित नहीं समझा और माधुरी का निशाना लेकर गोली दाग दी.पर यह क्या?गोली तो आलोक के सीने को पार कर गयी. पता नहीं कब और कैसे आलोक माधुरी के सामने ढाल बन कर खड़ा हो गया था.उधर आलोक गिरा और इधर निशा बेहोश हो कर गिर पडी.

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1 Comment on "प्रेम कहानी / आर. सिंह"

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Bipin Kishore Sinha
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वैरी गुड स्टोरी.

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