लेखक परिचय

जयराम 'विप्लव'

जयराम 'विप्लव'

स्वतंत्र उड़ने की चाह, परिवर्तन जीवन का सार, आत्मविश्वास से जीत.... पत्रकारिता पेशा नहीं धर्म है जिनका. यहाँ आने का मकसद केवल सच को कहना, सच चाहे कितना कड़वा क्यूँ न हो ? फिलवक्त, अध्ययन, लेखन और आन्दोलन का कार्य कर रहे हैं ......... http://www.janokti.com/

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bikniगीत-संगीत अर्थात सुरो का सागर, जो मन की गहराईयों में पहुचकर शरीर के सुक्ष्म कोशिकाओं को तरंगीत कर उसे उर्जान्वित करने का काम करती है। संगीत भारत के लिए कोई नई अवधरणा नहीं है बल्कि यह हजारों सालों से धरती पर किसी न किसी रूप, रंग और भाषा के माध्यम से युगों-युगों से चलती आ रही है। देखा जाए तो धरती के निर्माण से पहले ही संगीत का निर्माण हो चुका था। क्योंकि हमारी प्राचीन मान्यताओं और ग्रन्थों के आधर पर ब्रह्‌माण्ड में पृथ्वी लोक के अलावा देव लोक भी है, जहां देवाधिष इन्द्र अक्सर नृत्यांगनाओं के नृत्य का आनन्द उठाते रहे है और सार्थक नृत्य बिना संगीत के हो ऐसा शायद ही संभव है। इसके अलावा विद्या की देवी सरस्वती जो स्वयं सुरो की जननी है। जिनके वीणा में न जाने कितने असंख्य सुरो का समागम होगा इसकी परिकल्पना करना मूर्खता ही कहलाएगी। भिन्न-भिन्न देशों में संगीत के विभिन्न स्वरूप है जो भिन्न-भिन्न माध्यमों से विभिन्न भाषाओं के आधर पर लयबद्ध रूप में सजायें और संजोयें जाते रहे है। वहीं अगर हम भारत के संगीतमय इतिहास की बात करे तो तानसेन, मीरा, कबीर, सूरदास आदि ऐसे कई संगीतज्ञ थे जिन्होंने अपनी आंतरिक शक्ति, शोध् और भक्ति के माध्यम से विभिन्न रूपों में संगीत का परिमार्जन किया। लेकिन उस वक्त उन गीतों के स्वरूप को सहेजना संभव नहीं रहा। यही वजह है कि हम उनके लिखे गीतों को दोहा और चौपाई के माध्यम से पढ़ते और जहां जितना संभव हो सका कबीर और सूरदास जैसे गीतकारों के लिखे गीतों को क्लासिकल व आध्ुनिक संगीत देकर उन्हें जीवित रखा गया। लेकिन जैसे ही देश में सूचना-प्रसारण तकनीकि में थोड़ी बहुत वैज्ञानिक और बौधिक् क्षमता का विकास हुआ हमने गीतकारों और संगीतकारों के माध्यम से गीतों और संगीतों को सहेजना और विभिन्न माध्यम जैसे दृश्य-श्रव्य और श्रव्य माध्यमों से प्रसारित करना प्रारम्भ कर दिया। जिससे संगीत के प्रति भारतीय जनमानस में भी इसके प्रति विशेष रूची देखने को मिली। प्राचीनतम काल में जहां तानसेन की संगीत से निकले तरंगों को सुनकर न केवल इंसान झूम जाते बल्कि दीप खुद व खुद प्रज्जवलित हो उठते। मीरा की गीतों को सुन भगवान श्री कृष्ण दौड़े चले आते थे। सूरदास और कबीर ने तो अपने गीतों से भगवान को ही मंत्रामुग्ध् कर रखा था। वैसे ही दशकों पुराने कुछ संगीतकारों और गीतकारों की ध्ुनो और गीतों को सुन लोग इस कदर मंत्रमुग्ध् होते थे कि उनकी तमाम परेशानियां कुछ पलों में ही खत्म हो जाती थी। यहा तक की कई लाईलाज मानसिक बिमारियां जड़ से खत्म हो जाती थी। हर आदमी राह चलते, सामाजिक बैठकों, समूह में उन गीतों को गुनगुनाना नहीं भूलता और एक दूसरे से गीतों को लेकर चर्चाए चलती रहती थी। और तो और जिस तरह गीत मीठे और सुरीले हुआ करते थे ठीक उसी प्रकार उनके फिल्मो में भी सामाजिक समरसता और विचारधरा का समावेश दिखाई देता था। चूकि भारत में फिल्मो और गीतों का चलन आजादी के पूर्व से ही चला आ रहा है। इसलिए आजादी के पूर्व से लेकर ६०-७० के दशक तक सामाजिक, नैतिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक घटनाओं को ध्यान में रखकर फिल्मो और गीतों को निर्माण किया जाता था। ताकि इस माध्यम से भी लोगों में स्वतंत्रता और जनचेतना का संदेश प्राप्त हुआ करता था। ७०-९० के दशक में स्वतंत्रता और जनचेतना का स्वरूप बदलकर फिल्मो और गीतों ने सामाजिक और वैचारिक रूप धरण कर लिया। वहीं ८० से ९० के दशक में सामाजिक के साथ-साथ फिल्मो और गीतों में प्रेम और प्रेम के माध्ुर्य स्वभाव का अनोखा संगम देखने को मिला। लेकिन सामाजिक गीतों के सुरो में कमी आने लगी थी। ९० से २००० तक संगीत के नयें यंत्रो की मदद से कई नवीन कलाकार उभरे लेकिन उस वक्त भी ७० से ९० तक के गीतों का वहीं महत्व रहा जो १९९०-२००० के गीतों और गीतकारों का था। लेकिन २००० के बाद जो गीत अब लोगों को सुनने को मिल रहा है वह लोगों की मन और आत्मा को शांति देने की बजाये मन और जन को काफी व्याकुल और अशांत करने लगा है। यहा तक की कई प्रकार की बिमारियों को दावत भी देने लगी है। वहीं आज के आध्ुनिक गीतों को लोग ज्यादा दिनों तक झेल भी नहीं पाते। महज १ से २ महीने में ही इन गीतों से उबने लगते है। फ़िर चाहे उन गीतों को संगीत देने व गाने वाला कितना ही बड़ा संगीतकार व गायक हो। आज के गीतों का स्तर इस कदर गीर चुका है कि चंद दिनों या महिनों में ही गीत बेजान/बेकार सी लगने लगती है। खासतौर से आज के आध्ुनिक युवा पीढ़ी गानों को लेकर इस कदर असमंजस में दिखाई पड़ती है कि वह रोज बनते नये-नये गानों से तृप्ती नहीं मिल पाती। वही एक बूढ़ा आदमी और पुरानी पीढ़ी के लोग आज भी पुराने गीतों को सुनकर न केवल सुकून पाते है बल्कि अपने पुराने दिनों को याद ताजा करने उनमें खो जाते है। सबसे बिडम्बना वाली बात है कि आज के नवीनतम गीतकार और संगीतकार के पसन्दीदा गीत ६० से ९० के दशक के गाने है। वे अक्सर अपने साक्षात्कार में पसंदीदा गीतकारों में पंचम दा, किशोर, मो. रफी, मुकेश, के.एल.सेहगल आदि लोगों का नाम लेते है। तो ऐसे में सवाल उठता है कि अगर आपको उनके मीठे और सुरीले गीत पसंदीदा है तो आज के युवा के उस तरह के गीत क्यों नहीं सुना पाते। बेतुके और अर्थहीन गाने का निर्माण क्यों करते है? ऐसे संगीत और गानें क्यों नहीं बना पाते जिसे वर्षों तक नहीं दशकों तक सुना जाये और उसमें बोरियत भी महसूस न हो। लेकिन शायद जैसा मुझे लगता है, आज के सभी गीतकार, गायक और संगीतकार बाजारवाद के ही शिकार है। क्योंकि अर्थपूर्ण गानों में ब्रा और पैन्टीज पर नाचना शायद ही किसी अभिनेत्री और कलाकारों को संभव हो। और आज की आधुनिक फिल्मे तब तक नहीं चलती जबतक की फिल्मो में छलकते जिस्म की नुमाईश न हो। आज बाजारवाद ने लोगों की मानसिकता को इस कदर घृणीत बना दिया है कि बिना सेक्स सीन और अध्नंगेपन का दृश्य दिखाए बिना फ़िल्म हिट नहीं कहलाता। जो धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति और समाज के लिए कोढ़ बनता जा रहा है। इसलिए समय रहते गानों और फिल्मो को भारतीय समाज और सांस्कृति के अनुरूप बनाने के लिए पुराने और नवीन गानों में सामनजस्य बनाने की बेहद आवश्यकता है। यह जरूरी नहीं कि गीतों और फिल्मो को पुराने ढ़र्रे पर लाया जाए लेकिन बदलाव का अर्थ नहीं है कि हम अपनी सामाजिक मान-मर्यादाओं और संस्कृति का सत्यानास कर डाले। इसलिए ऐसे अनोखे उपाय ढुंढने की आवश्यकता है जिससे भारतीय गानों में सामाजिकता और सांस्कृति समरसता पुनः जागृत की जा सके। और पाश्चात्य संस्कृति से पूरी तरह प्रभावित आधुनिक युवा के भटकते और डगमगाते पैरों को संभाला जा सके। 

:= Narendra Nirmal

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8 Comments on "बाजार और बिकनी के चंगुल में गीतकार और संगीतकार"

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Rajeev sinha
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जयराम विप्लव जी ने केवल पोस्ट किया है यह लेख तो नरेन्द्र निर्मल का है !

इसलिए कृपया इसे ठीक कर दीजिये

p m somani
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सभ्यता और संस्कृति का पतन हो रहा है
भगवान ही रक्षा कर सकते हैं

Rajesh Kumar
Guest

Bikkanni is deman of common peoples, every person is watch is bold seen. just like singer is thinking new song regarding bold seen.

dileep dixit
Guest

best lekh

Indra Neel Mukherjee
Guest
If Jairaam is the writer of the above article who is Narender Nirmal …. whose name is stated at the end of the article !!?? I am a Musician / Singer / Composer and have had the privelege to have worked with Maestros like Anil Biswas, Salil Chowdhury, OPNayyar and Ravi. I have sung only recently the other day it seems with stalwarts and Legends like Hemant Kumar,Manna Dey sahab, Jagjit Singh to name a few !! I am presently having very few shows worth its mention … the whole problem is MUSIC IS BEGINNING TO BECOME AN ORGANISED BAZAAR… Read more »
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