लेखक परिचय

अभिषेक रंजन

अभिषेक रंजन

लेखक कैम्पस लॉ सेन्‍टर, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में एल.एलबी. (द्वितीय वर्ष) के छात्र हैं।

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अभिषेक रंजन 

pravaktaप्रवक्ता डॉट कॉम का जिक्र आते ही ट्राई द्वारा मोबाइल मैसेज पर लगाई पाबंदी और उसका विरोध याद आ जाता है. यह प्रवक्ता ही था, जिस पर सोशल मीडिया के लिए लिखा मेरा पहला लेख छपा. छपने के बाद फेसबुक पर इसे शेयर करने से कई लोगों की प्रतिक्रियाएं आई, देशभर के तक़रीबन एक दर्जन लोग एक मुहीम से जुड़े और एक छोटा सा लेकिन करोड़ों मोबाइल ग्राहकों के हित में हुआ विरोध सफल रहा.

हुआ कुछ यूँ था कि छात्र राजनीति में सक्रिय रहने की वजह से अपनी हर गतिविधि को करने के मर्यादा की एक सीमा अपेक्षित थी. इसकी वजह से कई बार हम कई बातों का विरोध या समर्थन नही कर सकते थे, जिसे कभी कभी करना जरुरी समझ में आता था. कुछ यही हाल मोबाइल मैसेज पर प्रतिबंध का विरोध करने के निर्णय के वक़्त भी था. भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने 100 से अधिक मैसेज मोबाइल से भेजने पर प्रतिबंध लगा दिया था. प्रतिबंध की वजह से कोई भी चाहे कितना भी जरुरी हो, 100 से अधिक मैसेज किसी भी हाल में नही भेज सकता था.

वैसे अपनी कोई महिला मित्र भी उस तरह की नही थी, जिन्हें 100 से अधिक मैसेज भेजने का दैनिक कर्तव्य पूरा करना जरुरी हो मेरे लिए. न ही ऐसे मज़बूरी वाले मित्रों के कष्ट दूर करने की कोई मंशा. दरअसल उस समय मै लॉ फैकल्टी, दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र के नाते फैकल्टी की गतिविधियों में बढ़-चढ़कर भाग लेता था. स्वाभाविक था, कुछ जिम्मेवारियां भी मिली हुई थी, जिसकी वजह से अमूमन सप्ताह में 1-2 दिन सौ से अधिक मैसेज मोबाइल से मित्रमंडली में भेजना जरुरी हो जाता था. जिस दिन प्रतिबंध की ख़बरें पता चला तो मुझे अजीब सा लगा. उसी दिन अपनी कक्षा समाप्त होने के बाद जब हमने चाय के दुकान पर 100 से ज्यादा मैसेज न भेजने के निर्णय के बारे में मित्रों से चर्चा की तो ट्राई के दफ्तर में काम करने वाले एक सीनियर ने बताया कि “ये बिल्कुल अव्यवहारिक फैसला है, जिसे कपिल सिब्बल के ईशारे पर लिया गया है”. जब मैंने उत्सुकतावश उनसे इसकी वजह जाननी चाही तो उन्होंने बताया कि “मोबाइल मैसेज की वजह से लोग प्रदर्शन में पहुँच जा रहे है.

मैसेज पैक सस्ते आते है. लोग सूचना के लिए फ़ोन, चिठ्ठी की वजाए मैसेज का इस्तेमाल धरल्ले से करते है. अगर इसपर रोक लग जाएगी तो इसका असर कम हो जाएगा”. मुझे ये बात मन को छू गई. मैंने तुरंत कहा, “इसका विरोध होना चाहिए”. चाय की दुकान पर खड़े लोग मेरा मुहं देखने लगे. मानो कोई मजाक सीरियस मूड में कर दिया हो. बात हवा हो गई. कुछ असर नही हुआ. चाय की दुकान पर हुई बात आई गई जैसी हो गई.

लगभग एक सप्ताह बाद प्रतिबंध लागू हो गया. एक तरफ मैसेज से गुटर-गु करने वाले प्रेमी जोड़े परेशान थे. वही दूसरी ओर यूथ अगेंस्ट करप्शन सहित कई अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़े कई साथी भी इस प्रतिबंध से दुखी नज़र आ रहे थे. मैंने फिर एकबार इसका जिक्र क्लास, चाय की दुकान और मित्रों के बीच छेड़ा. इसबार 2-3 साथियों ने मेरे विरोध करने के फैसले का समर्थन किया था. लेकिन विरोध हो तो कैसे हो? इस बात पर मामला आकर अटक गया. कई छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों से बात की. लेकिन कोई इसको लेकर बिल्कुल भी परेशान नही था, उल्टे प्रवचन भी सुनने को मिल जाती थी –“कोई काम धाम नही बचा? मोबाइल पर 100 मैसेज भेजता कौन है डेली?”. कोई अपनी गर्ल फ्रेंड को मैसेज न भेज पाने की कसक को विरोध की वजह बता रहा था तो कोई बेमतलब के प्रयास.

इसी बीच हमने जब इस विरोध के संबंध में जेएनयू के कुछ मित्रों से चर्चा की तो सबने वहां की स्टाइल में पर्चा निकालने का सुझाव थमा दिया. रात भर जग कर तर्क ढूंढे और एक लंबा चौड़ा लेख लिख डाला. संभवतः यह पहला समसामयिक लेख था, जिसके बारे में मैंने कोई पूर्व तैयारी नही की थी. इससे पहले लेख “लेख प्रतियोगिता” के लिए ही लिखा करता था.

एक दिन जेएनयू से पढ़े और प्रवक्ता के संपादक संजीव जी के साथ कमल संदेश में काम कर रहे विकास आनंद भैया से जब हमने अपने अभियान का जिक्र छेड़ा और अपने लेख के बारे में उन्हें बताया तो उन्होंने इसे प्रवक्ता को भेजने की सलाह दी. बस क्या था, उसे भेज दिया. दो दिनों के बाद वो दिखने भी लगी वेबसाइट पर.

इसी बीच मित्रों ने “फोरम अगेंस्ट ऑटोक्रेसी ऑफ़ ट्राई” नाम से विरोध के इस मंच का नामकरण भी कर दिया. सोशल मीडिया में अपनी बात पहुँचाने के लिए फेसबुक पर एक पेज बन चूका था. जब प्रवक्ता पर छपे लेख को हमने फेसबुक पर डाला तो कई लोग उत्सुकतावश इस अभियान के बारे में जानकारी मांगने लगे.

इच्छा जगी तो कई लोगों ने इसमें सहभागी होने की मंशा दिखाई. लेख में विरोध का तर्क पूरे तथ्यों के साथ दिए गए थे, जिसकी वजह से इसे पढ़ने वाला हर कोई हमारी बातों से 80 से 90 प्रतिशत तक सहमत हो जाता था. प्रवक्ता के उस लेख का कमाल था कि लगभग दर्जन भर देश के कई कोनो में रहने वाले अजनबी लोगों ने संपर्क किया और अपनी तरफ से विरोध जताकर इस अभियान को गति दी, इसे अंजाम तक पहुँचाया. बाद में इसी लेख को कई अन्य स्थानों पर भी भेजा.

इन सब बातों का यह असर हुआ कि ट्राई के इस फैसले के विरोध में फोरम के बैनर तले दिल्ली के 5 स्थानों सहित देहरादून, ग्वालियर, मुजफ्फरपुर सहित देश भर के 15 स्थानों पर प्रदर्शन हुए. Way2SMS.COM जैसी वेबसाइट हमारे साथ विरोध में शामिल हुई. ट्राई मुख्यालय के बाहर भी हमलोगों ने विरोध जताया. जिसके बाद ट्राई के आलाधिकारी सकते में आए और अपने फैसले को बदलकर मैसेज की सीमा 200 करने की खबर हमें मेल और मैसेज करके दी. बाद में फैकल्टी के ही एक मित्र ने इसको लेकर हाई कोर्ट में अपील की, जिसके बाद कोर्ट ने इस फैसले को निरस्त कर दिया.

उस एक लेख ने लिखने, पढ़ने, सामाजिक मुद्दों को लेकर लड़ने की जो मानसिकता विकसित की, वह आज न केवल भाषाई स्तर पर समृद्ध कर रहा है बल्कि निरंतर लिखते रहने की प्रवृति भी जगाई है, जिससे नए मित्रों की कड़ी जुड़ती जा रही है. नयी सोच को जन्म देने की भी वजह यह बना है. आज एक बेटी नवरूणा को न्याय दिलाने के लिए हमलोग संघर्षरत है. चारो तरफ से घेराबंदी करके लड़ाई लड़ रहे है. 100 से अधिक लेख किसी अंजान बेटी पर लिख पाने का माद्दा ट्राई की मुहीम और प्रवक्ता पर छपे लेख से प्रोत्साहित लेखक मन से पाई है. भले ही कुछ वजहों से नवरूणा से संबंधित लेख प्रवक्ता पर न लगे हो, प्रवक्ता हमारे लेखनी के लिए हमेशा प्रेरणादाई रही है. प्रवक्ता का जिक्र आते ही ऐसा लगता है, मानो यह प्रेरित करती हो कुछ लिखने की, कुछ बोलने की, कुछ करने की.

यह सुखद है कि प्रवक्ता की अनथक यात्रा की पांच वर्ष पूरी हुई! ईश्वर से प्रार्थना है यह शतायु हो, दीर्घायु हो. हिंदी भाषा की समृद्धि को समर्पित रहे, ऐसी अपेक्षा के साथ, प्रवक्ता परिवार को ढ़ेरों शुभकामनाएं!

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