लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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-पंकज झा

जब पंजाब में आतंक चरम पर था तब एक अखबार की काफी आलोचना हुई थी. उस पत्र में बिना कोई भूमिका दिए सीधा शीर्षक इस तरह होता था पंजाब 20, पंजाब 30. मतलब पाठक खुद समझ जाते थे कि आज आतंकी हमले में इतने लोग मारे गए हैं. तब भले ही कुछ लोगों के अनुसार ऐसा संपादन संवेदनहीनता माना गया हो लेकिन बात महज़ इतनी है कि आक्रोश को भी विभिन्न रचनात्मक तरीके से व्यक्त करने की ज़रूरत होती है.

छत्तीसगढ़ के नक्सल समस्या पर भी अलग-अलग तरह से ऐसी ही प्रतिक्रया व्यक्त किये जाने की ज़रूरत है. अभी फिर जब दांतेवाडा से सुकमा जा रही बस को उड़ा कर स्थानीय एसपीओ समेत लगभग पचास लोगों को मौत के घात उतारा गया है तब भी वही घिसे-पिटे शब्दों से पाठकों का साबका पड़ा. खास कर सरकारी बयानों में पिछले सभी बयानों की तरह ही कम्प्युटर में सुरक्षित प्रिंट-आउट को निकाल कर दिनांक, जगह एवं शहीदों की संख्या बदल कर विज्ञप्ति जारी की हुई. नक्सलियों की बौखलाहट, उनका कायराना हरकत, हमले की निंदा, आर-पार के लड़ाई का आश्वासन आदि ऐसे ही शब्दों की पीड़ा नागरिकों को झेलनी पड़ी. खैर. सरकारें तो अपनी ही राह चलेगी, कुछ बंधे-बंधाए लीकों से अलग हटकर चलने की उम्मीद आप बयान लेखक नौकरशाहों से तो बिलकुल नहीं कर सकते. मगर हां, देशभक्त बुद्धिजीवियों और लेखकों से ज़रूर यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह आगे आ कर अपनी सम्पूर्ण उर्जा से, अपने पूर्वाग्रह-दुराग्रह को अलग रख इस विभीषण समस्या पर मतैक्य स्थापित करें. शायद यही एक रास्ता हो सकता है लोकतंत्र को बचाने की.

इस मुद्दे पर हाल के दिनों में प्रदेश के प्रख्यात एवं वरिष्टतम पत्रकार श्री ललित सुरजन जी का आह्वान रेखांकित करने लायक हैं. उन्होंने सीरीज में लिखे अपने आलेखों में बुद्धिजीवियों से यह अपेक्षा की है कि कम से कम इस मुद्दे पर न्यूनतम सहमति कायम की जाय. अलग-अलग अपने-अपने दरबे में सोचने के बदले सामूहिक रूप से एकत्रित होकर समस्या के समाधान हेतु तरीकों पर विमर्श की जाय. लीक से अलग हटकर. निंदा-भर्त्सनाओं के जाल से मुक्त होने का प्रयास कर समाधानमूलक चिंतन प्रस्तुत किया जाय.

तो अव्वल यह कि अब सबसे पहले सभी बुद्धिजीवीगण यह तय कर लें कि नक्सल मामले पर ‘कब’ और ‘क्या’ की बात कर अपना और पाठकों का समय एवं अखबारों का संसाधन बर्बाद नहीं करेंगे. मोटे तौर पर नागरिकों को अब यह बार-बार बताने की ज़रूरत नहीं है कि आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद को पनपने के लिए सरकार की कमी, विकास का न होना, वनवासी क्षेत्रों का शोषण आदि कारक रहे हैं. इसका कौन दोषी है कौन नहीं इस पर भी विमर्श करने का यह समय नहीं है. निश्चित ही कुछ चीज़ें इतिहासकारों के लिए भी छोड़ देनी चाहिए. हमें तो अभी ‘वर्तमान’ लिखने का दायित्व नियति ने दिया है. सामान्यतया पत्रकार-गण वर्तमान के ही इतिहास-कार होते हैं. बात अब केवल ‘कैसे’ की होनी चाहिए. यानी दुनिया के इस सबसे बड़े, सबसे सफल एवं सबसे कम बुरे लोकतंत्र को बचाया कैसे जाय? अब किसी भी देशभक्त के विचार का एक मात्र बिंदु यही होना चाहिए कि नक्सली समस्या से त्राण कैसे पाया जाय? और इससे अलग मुद्दे को भटकाने वालों का बहिष्कार भी ज़रूरी है.

सबसे पहले यह कि केंद्र सरकार यह घोषित करे कि हम विदेशी मदद से थोपे गए आंतरिक युद्ध से गुजर रहे हैं. चुकि नक्सलियों ने पहले ही अपने अभियान को युद्ध और सरकारी अमले को दुश्मन घोषित किया हुआ है. तो सरकारों को भी चाहिए कि इसी तरह की भाषा का उपयोग कर उन्हें अपना दुश्मन घोषित करें. निश्चित ही उनमे से अधिकांश भारत के नागरिक हैं. अपने ही नागरिकों को दुश्मन घोषित किया जाना इतना आसान नहीं होता. लेकिन अब आसान उपायों को अपनाने का समय भी नहीं है. महाभारत समेत कई कथानक इस बात की गवाही देते हैं कि युग-सत्य की रक्षा में आपको कई बार अपने भाइयों से भी लड़ना होता है. दूसरा यह कि भारतीय नागरिकों को मिली तमाम नागरिक सहूलियत केवल भारतीय संविधान में घोषित तौर पर आस्था रखने वाले व्यक्ति को ही मिले. सीधे तौर पर या तो आप लोकतंत्र के पक्ष में हैं या उसके दुश्मन, यही मानदंड अपनाने का समय है. बुद्धिजीवियों से आग्रह कि भले ही उनकी भावना कुछ भी हो लेकिन कभी भी लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गयी सरकारों और नक्सलियों दोनों को एक सामान महत्व नहीं दें. भूल कर भी उसको ‘पक्ष’ नहीं कहें. यानी बातचीत की बात करते हुए कभी भी ‘दोनों पक्षों’ ऐसा संबोधन नहीं दें. कभी भी पुलिस कारवाई और नक्सली हिंसा दोनों को भी एक जैसा नहीं ठहराए. सामन्यतया पुलिस विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों के अधीन एवं ढेर सारे विधि-निषेध का पालन करते हुए कोई कारवाई करती है. उसके अलावे मानवा-धिकार संगठनों से लेकर प्रेस, न्यायालय आदि सबक बंधन भी होता है. तो नक्सलियों की बे-लगाम हत्याएं और सरकारी कारवाई को एक सामान नहीं ठहराया जाना चाहिए.

सरकारों के लिए यह भी तय करने का समय है कि वह अब विकास के द्वारा नक्सलवाद खतम करने का प्रयास करना चाहती है या नक्सलवाद को खतम कर विकास करना उचित होगा. ज़ाहिर तौर पर विकास के तय मानकों यानी पुल-पुलिया-सड़क आदि के लिए किये जाने वाले ठेकेदारी में एक निश्चित प्रतिशत राशि नक्सलियों के पास पहुच ही जाया करती है. यह कोई रहस्य नहीं है कि इस तरह के वसूली का आंकडा दो हज़ार करोड़ तक पहुच गया है. तो बिना उनके लिए संजीवनी का काम करने वाले लेवी पर रोक लगाये, उनके आपूर्ति लाइन को काटे आप उनपर नियंत्रण नहीं कर सकते. तो अगर साठ साल वहां कोई कथित विकास नहीं हुआ तो इन चार-पांच सालों में कोई पहाड़ टूट पड़ने वाला नहीं है. उचित तो यही होगा कि पहले नक्सल उन्मूलन हो फिर विकास की बात की जाय. चावल, नमक जैसी मूलभूत ज़रूरतों के अलावा कुछ दिनों के लिए किसी भी तरह के विकास कार्यों को तरजीह ना दी जाय. साथ ही सरकार, घोषित तौर पर किये गए सभी एमओयू को निलंबित-निरस्त करते हुए, अगर ज़रूरी हो तो हर तरह के उत्खनन पर भी तात्कालिक रूप से रोक लगाए. ज़मीन के अंदर में छुपा हुआ खनिज भी कही भागा नहीं जा रहा है. सुस्पष्ट रूप से सरकार यह तय करे कि बस्तर में शांति के बाद नए तरह से औद्योगिक कार्यों को अंजाम दिया जाएगा. और हर तरह का उद्यम करते हुए सरकार की यह घोषित नीति रहेगी कि बाद में किये जाने वाले किसी भी एमओयू में माटी पुत्रों के हित की पहले चिंता की जायेगी. हर तरह के विकास कार्यों का पहला लाभार्थी स्थानीय लोगों को बनाना सरकार अपनी घोषित नीति तय करे. दुनिया कही भागी नहीं जा रही है. अनावश्यक दौर लगाने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है.

इसके अलावा बयानवीरों के बारे में भी सोचने की ज़रूरत है. मीडिया को भले ही मसाला चाहिए लेकिन पुलिस को या अन्य सम्बंधित लोगों को अपने अखबारी कटिंग को मोटे करते जाने की कोई ज़रूरत नहीं है. पुलिस, अर्धसैनिक वलों आदि के प्रवक्ता की सफलता अखबार में छपे ढेर से नहीं मापी जानी चाहिए बल्कि वह कितनी सूचनाओं को गोपनीय रख पाया इससे उसकी सफलता मापनी चाहिए. सम्बंधित अधिकारियों को चाहिए कि वह सभी समाचार माध्यमों को आमंत्रित कर उनसे यह निवेदन करें कि कृपया युद्ध की इस घड़ी में अपने पेशे से भी ऊपर लोकतंत्र को रखें. युद्ध रिपोर्टिंग की कुशलता इसमें नहीं है कि आप कितनी सूचनाएं दे पाए, कुशलता यह है कि आप गोपनीय नीतियों को उजागर ना कर किस तरह सैनिकों के मददगार हो सकें. यह भरोसा करने का पर्याप्त कारण है कि कम से कम प्रदेश का मीडिया कभी असहयोग नहीं करेगा. लेकिन आपको अपने छपास की भूख पर लगाम ज़रूर रखना होगा.

और अंतिम बात सेना का इस्तेमाल करने के पक्ष में. निश्चित ही अब सेना का उपयोग करने का समय आ गया है. किसी भी देश के लिए अपने आंतरिक क्षेत्रों में सेना का उपयोग वास्तव में अंतिम उपाय ही होता है. लेकिन मोटे तौर पर सेना का काम ही होता है देश को सुरक्षित रखना. देश के दुश्मन सांपो का सफाया करना. इससे कोई फर्क नहीं पडना चाहिये कि वह सांप बिलों में छुपे हैं या आपके आस्तीनों में. आज पंजाब इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि उतनी बड़ी बाहरी चुनौतियों, पाकिस्तान जैसे सरहदी देश के प्रत्यक्ष मदद के बावजूद हम लोकतंत्र को बचाने में कामयाब रहे थे, अपने प्रधान मंत्री और मुख्यमंत्री के जान की कीमत चुकाकर भी. तो यहाँ भी अब इसी तरह के बलिदान का समय है. श्रीलंका का उदाहरण अभी भी सामने है जब टेंक आदि से सुसज्जित एवं अपार जन-समर्थन वाले लिट्टे को भी वहां दृढ इच्छशक्ति और सेना की बदौलत मटियामेट कर दिया गया था. कम से कम नक्सली उतनी ताकतवर तो नहीं ही हैं. और भारत भी श्रीलंका से कई गुना ज्यादा ताकतवर तो है ही. बस ज़रूरत निर्णय लेने और उस पर अटल रहने की है. इस चुनौती से भी लोकतंत्र पार ज़रूर पायेगा इसमें कोई संदेह नहीं है.

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23 Comments on "नक्सलवाद: समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध"

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रंजना.
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आपके बताये गए सभी उपायों से पूर्णतः सहमत हूँ….जबतक सरकार इस रास्ते नहीं चलेगी,समस्या का हल नहीं निकलेगा…यह एकदम पक्का है… पंकज जी, मैं पूर्व में भी कह चुकी हूँ….आपकी यह भावना केवल व्यक्तिगत भावना नहीं है,बल्कि आज यह करोड़ों लोगों की भावना है जिसे आप शब्द दे रहे हैं…आपके हमारे पास जो सामर्थ्य है,उसमे हम यही कर सकते हैं…गलत के खिलाफ कलम उठाकर विरोध दर्ज कराना कलमकार का कर्तब्य होता है…और इस क्रम में यदि कोई उल जूलूल बोल उग्र या हतोत्साहित करने का प्रयत्न करे तो कृपया उसपर एक क्षण को भी ध्यान न दें…अपने विवेक को सतत… Read more »
Jitendra Dave
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भारत के बुद्धीजीवियों की समस्या ये है कि वह किसके हित में अपनी बुद्धि का इस्तेमाल कर रहे हैं. उनको संतुलित नजरिया रखना चाहिए और किसी भी प्रकार के अतिवाद से बचना चाहिए. दूसरी और असल बुद्धीजीवी इसा लफड़े में पड़ने से डरते हैं और मौन धारण कर रखते हैं.

गिरीश पंकज
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पंकज झा का यह लेख पढ़ कर मुझे इसलिए संतोष हुआ कि उन्होंने पीड़ा से भर कर लिखा. नक्सलियों से निपटने केलिए सेना का इस्तेमाल हो या न हो, इस बारे में मैं अभी कुछ नहीं कह सकता, लेकिन इतना कहा जा सकता है, की बस्तर में पुलिस और दूसरी बटालियने ईमानदारी और होशियारी के साथ अपना फ़र्ज़ अदा नहीं कर पा रही है. वे असफल हो रही है वे जुझारू तरीके से मोर्चा लें तो नक्सलियों से मुकाबला किया जा सकता है. सेनाकी ज़रुरत ही नहीं पड़ेगी. पंकज की इस बात से सहमत हूँ की पुलिस कारवाई और नक्सली… Read more »
फ़िरदौस ख़ान
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आतंकवाद सरकार की ग़लत नीतियों का नतीजा है… आतंकवाद के ख़ात्मे के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारना होगा…

डॉ. महेश सिन्‍हा
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ये श्रीमान panday पता नहीं हिन्दी में क्या उच्चारण होगा इनके उपनाम का बहुत बड़े नक्सली समर्थक हैं . नक्सली याने देशद्रोही . क्यों इन नक्सलइयों का सीमा क्षेत्र जंगलों तक सीमित है . विकास तो पूरे देश में अवरूद्ध है ये कहते हैं सरकार की नजर वन सम्पदा पर है तो इनकी नजर किस पर है . सब स्वमभू ठेकेदार हो गए हैं आदिवासियों के ? इतना बड़ा माल असबाब और छुपने की जगह मैदानो में तो नहीं मिल सकती . सर्वहारा के समर्थक इतने विदेशी हथियार कहाँ से जुटा रहे हैं ? सरकार तो जब संसद तक आतंकवादी… Read more »
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