लेखक परिचय

ए.एन. शिबली

ए.एन. शिबली

उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी में विभिन्‍न समसामयिक मुद्दों पर निरंतर कलम चलाने वाले शिबली जी गत दस वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। दैनिक हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, कुबेर टाइम्स, उर्दू में राष्ट्रीय सहारा, क़ौमी आवाज़, क़ौमी तंजीम आलमी सहारा, हिन्दी और उर्दू चौथी दुनिया सहित अनेक वेबसाइट्स पर लेख प्रकाशित। फिलहाल उर्दू दैनिक हिंदुस्तान एक्सप्रेस में ब्‍यूरो चीफ के पद पर कार्यरत हैं।

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ए एन शिबली

यह तो पहले ही तय हो गया था की बिहार के इलेक्शन में नितीश कुमार और उनकी टीम को सफलता मिलेगी मगर सफलता इतनी बड़ी होगी की लालू की लालटेन का तेल खत्म हो जाएगा और पासवान की झोपड़ी उड़ जाएगी इसका अंदाज़ा किसी को नहीं था। पासवान की झोपड़ी तो उडी ही लालू की पार्टी का भी यह हाल हुआ की अब बिहार में विपक्ष नाम की कोई चीज़ ही नहीं बची। फ़ेस बूक पर मेरे एक मित्र परवेज़ अहमद ने सही लिखा है की बिहार की जनत को अब लालटेन नहीं बल्कि हैलोजन लैम्प चाहिए। यह सही भी है। जब हमेशा बिजली मिलने लगेगी तो फिर लालटेन का किया काम।

लालटेन तो पूरानी चीज़ हो गयी उसमें बार बार किरासन तेल डालने का झंझट भी है। यही मामला झोपड़ी के साथ भी है। हर कोई चाहता है की उसका विकास हो उसे भी अच्छे दिन देखने को मिलें और उसका घर भी पक्का का हो जाए। यही सही भी है झोपड़ी में रहने की तमन्ना कियूं की जाये पक्के मकान का ख़ाब कियों न देखा जाये। हालांकि लोकतंत्र में विपक्ष का नहीं होना अच्छी बात नहीं है मगर जब कोई इस लायक हो जाये की उसे वोट ही न मिले तो कोई दूसरा क्या करे। नितीश एंड कंपनी को जो शानदार सफलता मिली है उस से यह साबित हो गया है की फिलहाल बिहार में वही जनता की सब से पहली पसंद हैं और उनके मुकाबले में जनता ने लालू और पासवान को घास नहीं डाली । लालू और पासवान को भी अब इस बात का अंदाज़ा अच्छी तरह से हो गया होगा की बिहार के लोग बिहारी तो हैं मगर दिल्ली वाले ‘बिहारी’ नहीं हैं। इस बार जनता ने इन दो नेताओं का जो हाल किया है उसे वो काफी दिनों तक भूल नहीं पाएंगे। आखिर इन दोनों को यह बात समझ में कियूं नहीं आती की जनता को विकास चाहिए उसे किसी के बेटे या बीवी से क्या मतलब? लालू और पासवान दोनों ने अपने अपने बेटे को इलेक्शन में घुमाया। मगर जनता ने उन्हें उनकी औकात बता दी और बता दिया की न तो लालू का बेटा अजहरुद्दीन है और न ही पासवान का बेटा संजय दुत्त। एक ने कोई ऐसा मैच ही नहीं खेला की उसे याद रखा जाये दूसरे ने कभी कोई फिल्म भी बनाई है इसका किसी पता ही नहीं। रहा सवाल पत्नी का तो रबड़ी देवी में ऐसी कौन सी खूबी है की जनता उसे वोट दे। जनता को तो यह पता था की पति ने तो हमें लूटा ही इस महिला ने भी खूब लूटा तो फिर दोबारा अवसर कियूओन दिया जाये। यही कारण है की रबड़ी दो स्थानों से इलेक्शन लड़ी और दोनों जगह से हार गयी। पासवान के भाई का भी बुरा हाल हुआ।

लालू और पासवान जी को जनता ने अपना जनादेश सुना कर यह बताने की कोशिश की है की अब बिहार के लोगों में भी समझ आ गयी है। उन्हें भी लाग्ने लगा है की जात पात और धर्म की राजनीती बकवास की चीज़ है। सब से ज़रूरी चीज़ है विकास। विकास के बिना सब कुछ बेकार है। क्या बिहारी नहीं चाहते की उनके घर में भी बिजली आए, क्या बिहारी नहीं चाहते की बिहार की सड़कें भी देश के दूसरे राज्यों की सड़कों जैसी हों, क्या बिहारी यह नहीं चाहते की जब वो शाम को दिन भर काम करके अपने घर लौटें तो उन्हें कोई लूटे नहीं,क्या बिहार के ठेकेदार यह नहीं चाहते उनसे कोई रंगदारी टैक्स नहीं ले, क्या स्कूल के विद्यार्थी यह नहीं चाहते की उनका टीचर पाबंदी से स्कूल आए, क्या कॉलेज के विद्यार्थी यह नहीं चाहते की देश के दूसरे कॉलेज और यूनिवरसिटि की भांति उनका सेशन लेट न हो। बिहार में भी ऐसा ही चाहने वाले लोग हैं और उन्हें ऐसा माहौल दिया जा रहा है या फिर ऐसा माहौल देने की हर संभव कोशिश की जा रही है तो फिर नितीश एंड कंपनी की मदद कियून नहीं की जाये। उन्हें वोट कियूं नहीं दिया जाये। इलेक्शन से पहले ऐसा कहने वालों की कमी नहीं थी की बिहार में जात पात के आधार पर इलेक्शन होता है इसलिए नितीश ने लाख काम किए हों मगर लालू और पासवान को भी बहुत सीटें मिलेंगी। मगर इलेक्शन के नतीजे ने बता दिया की दूसरे राज्यों की भांति बिहार के लोगों को भी विकास पसंद है और वो भी उसे वोट देंगे जो उनके विकास की बात करेगा। सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि अब तो सारा देश देख रहा है की नितीश के आने के बाद बिहार में काफी काम हुये हैं। ऐसा भी नहीं है की बिहार को नितीश कुमार ने जन्नत बना दिया है। अभी बहुत से काम ऐसे है जो उन्हें करने की ज़रूरत है। बहुत से काम ऐसे हैं जो उनके अफसर उन्हें बताते हैं की हो गया मगर सही मायेने में वो होता नहीं है। उन्हें काग़ज़ पर तो होता हुआ नज़र आता है मगर सच्चाई में ऐसा नहीं होता। बिहार में योजनाओं की कमी नहीं है मगर इसका लाभ उचित तरीके से उन लोगों को नहीं मिल रहा जिन के लिए यह योजनाएँ बनी हैं। सरकारी आंकड़े बताते हैं की फलां जगह इतने लोगो के नाम बी पी एल में दर्ज हैं जबकि इतने लोगों को इंद्रा आवास योजना के तहत घर दिये गए। मगर सच्चाई यह है की बी पी एल में ऐसे लोगों के नाम भी दर्ज हैं जो महीने में हजारों कमाते हैं। इंद्रा आवास के तहत जिन लोगों को घर के लिए पैसे मिलते हैं उन्हें भी पूरी रकम नहीं मिलती। सिक्षा में सुधार तो हुआ है मगर इसे बहुत बेहतर नहीं कहा जा सकता। अब भी कई स्कूल ऐसे हैं जहां बहुत सारे बच्चों को पढ़ने के लिए एक ही टीचर है। बहुत सारे स्कूल ऐसे हैं जहां पीने का पानी नहीं है। बहुत सारे स्कूल ऐसे हैं जहां शौचालय भी नहीं है। अभी भी लाखों की संख्या में ऐसे बच्चे है जिन्हें स्कूल में होना चाहिए मगर वो कहीं काम कर रहे होते हैं। यही नहीं यदि अचानक स्कूल मुआइना किया जाये तो बहुत से स्कूल में टीचर ग़ायब रहते है। अफसोस की बात यह है की सर्व सिक्षा अभीयान के तहत जो कीताबें मुफ्त बांटे के लिए होती हैं उन्हें कहीं कहीं खरीद कर हासिल किया जाता है।

बहुत से स्कूल ऐसे हैं जिनमें शिक्षकों की कमी है। जो हैं भी वो पढ़ाई में रूचि नहीं लेते। स्कूल में बच्चों को खिलाने के लिए जो अनाज आता है उसे कोई और लेकर चला जाता है। स्कूल के टीचर और मुखिया मिलकर इसे बाज़ार में बेच देते हैं। आवासिए प्रमाण पत्र या फिर जन्म या मिरत्यु प्रमाण पत्र बनवाना हो बिना पैसे के बिना यह चीज़ें नहीं बनती। स्कूल में मुफ़््त खाने की बात कही जाती है मगर कई स्कूल ऐसे हैं जहां हफ्तों हफ्तों खाना नहीं बनता। शिक्षा मित्रा के तौर पर जो टीचर बच्चों को पढ़ा रहें हैं उनमें कई ऐसे है जिन्हें अभी खुद पढ़ने की ज़रूरत है। शिक्षा मित्रों को अपनी सलेरी के लिए मुखिया की चाहे वो अनपढ़ ही कियूं न हो मालिश करनी पड़ती है। ऐसे टीचरों को रिश्वत देने के बाद ही सैलरी मिलती है। टीचर आगे किसी से इस की शिकायत भी नहीं कर सकते कियून की उन्हें पता है की वो भी बेईमानी से ही टीचर बने हैं। कुल मिला कर नितीश जी के बहुत काम करने के बाद भी अभी बहुत कुछ करने की ज़रूरत हैं। नीचे से लेकर ऊपर तक रिश्वत लेने देने का सिलसिला जारी है। इस पूरी बे इमानी में छोटे मोटे दलाल , मुखिया, ग्राम सेवक , बी डी ओ और दूसरे सभी अफसर शामिल हैं। जो अफसर लालू प्रसाद के जमाने में बेईमान थे वो अब भी बेईमान हैं। बिहार में जब कई साल बाद मुखिया इलेक्शन हुआ तो लूलहे लँगड़े सब मुखिया बन गए। इस से लोगों का तो भला नहीं हुआ मुख्य लोग ग़रीब से अमीर बन गए। अब जबकि नितीश को जनता ने एक और अवसर दिया है तो उन्हें चाहिए की इन सब खामियों पर क़ाबू पा कर वो जनता की आशाओं पर खड़े उतरें ताकि वो भी एक मिसाली मुख्य मंत्री बन सकें।

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