विपक्ष के सपने को धूमिल कर गए नीतीश


सुरेश हिन्दुस्थानी
बिहार की राजनीति में बहुत तेजी से घटित हुए राजनीतिक घटनाक्रम में नीतीश कुमार ने छटवीं बार प्रदेश के मुख्यमंत्री के रुप में शपथ ले ली है। कहा जाता है कि जहां बेमेल गठबंधन होता है, वहां अस्थिरता का वातावरण हमेशा ही बना रहता है। कुछ ऐसा ही बिहार में भी हुआ है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा उठाए गए कदम के बारे में भले ही राजनीतिक दल या विश्लेषक कुछ भी निष्कर्ष निकालें, लेकिन यह सत्य है कि नीतीश कुमार ने भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेन्स की नीति को अपनी सरकार की प्राथमिकता में रखा। बिहार में हुए अचानक परिवर्तन के केन्द्र में लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव को माना जा रहा है। सीबीआई ने जब से तेजस्वी के विरोध में प्राथमिकी दर्ज की है, तभी से नीतीश कुमार अपनी भ्रष्टाचार विरोधी छवि को बचाने के लिए तेजस्वी को अलग करने की सोच रहे थे, लेकिन लालू प्रसाद की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं ऐसा करने में अवरोध का कारण साबित हो रही थीं। वास्तव में बिहार में जब से लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक अध्याय समाप्त हुआ है, तब से ही राजद के मुखिया इस जुगाड़ में लगे हुए थे कि कैसे भी हो तेजस्वी को नेता बनाकर जनता के सामने लाया जाए। मोदी को रोकने की मुहिम के चलते राजद और जदयू में बेमेल गठबंधन हुआ। फलत: तेजस्वी की नई राजनीतिक पारी का सूत्रपात हुआ।
बिहार में जिस समय राजनीतिक घटनाक्रम चल रहा था, उस समय एक ही समय में दो प्रकार की तस्वीरें दिखाई दे रही थीं। भ्रष्टारियों का साथ छोड़कर एक तरफ बिहार के राजभवन में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, वहीं दूसरी तरफ रांची में भ्रष्टाचार के आरोप में राजद नेता लालू प्रसाद यादव सीबीआई के न्यायालय में प्रस्तुत हो रहे थे। एक तरफ भ्रष्टाचार मुक्ति की राजनीति करके स्वच्छता की ओर कदम बढ़ाने वाले नीतीश कुमार सरकार को भ्रष्टाचार से मुक्त करा रहे थे, वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार के आरोपों कारण लालू प्रसाद यादव न्यायालय में हाजिर हुए थे। दोनों की राजनीति में जमीन आसमान कर अंतर है। इसे दूसरे अर्थ में परिभाषित करें तो यह आसानी से कहा जा सकता है कि भाजपा ने भ्रष्टाचारियों का साथ छोड़ने वाले नीतीश को समर्थन दिया है, वहीं कांगे्रस अभी भी भ्रष्टाचार के आरोप का सामना करने वाले लालू प्रसाद यादव और उनके परिजनों के साथ ही खड़ी दिखाई दे रही है।
राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के सदस्यों  पर भ्रष्टाचार के गंभीर मामले चल रहे हैं। इसलिए उन्होंने राजनीति में पारिवारिक पदार्पण को जारी रखते हुए तेजस्वी को सरकार में उपमुख्यमंत्री के रुप में शामिल कराया। अब जब तेजस्वी यादव भी भ्रष्टाचार के आरोप की परिधि में आ गए हैं, तो नीतीश कुमार का चिंतित होना स्वाभाविक ही था। वास्तव में लालू प्रसाद यादव को तेजस्वी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद ही राजनीतिक शुचिता को ध्यान में रखते हुए अपने कदम उठाना चाहिए था, लेकिन उन्होंने एक प्रकार से भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाली कार्यवाही को अंजाम दिया। गठबंधन की सरकार के समय बिहार की राजनीति में जिस प्रकार से लालू ने अपनी राजनीति को संचालित किया, उससे यही लग रहा था कि लालू प्रसाद यादव ही पूरी सरकार का संचालन कर रहे हैं। इसे समानांतर सरकार चलाने की कार्यवाही भी निरुपित किया जा सकता है। हम जानते हैं कि भ्रष्टाचार के चलते लालू प्रसाद यादव को न्यायालय ने चुनाव लड़ने पर रोक लगाकर एक प्रकार से उनको राजनीति करने के लिए अयोग्य ही घोषित किया था, फिर भी लालू प्रसाद यादव सक्रियता के साथ राजनीति कर रहे हैं। एक घोषित अपराधी का सक्रिय राजनीति में भाग लेना लोतंत्र का खुला मजाक ही कहा जाएगा। यह कदम न्यायालय और जनता का अपमान भी है।
जदयू नीतीश कुमार के राजद के लालू यादव से अलग होने के बाद निश्चित रुप से नीतीश कुमार की छवि में और सुधार ही हुआ है, इसके अलावा लालू यादव कुछ भी आरोप लगाएं, भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद उनकी और उनके परिवार की छवि संदेह के घेरे में हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस मूल कारण के चलते बिहार में गठबंधन सरकार का प्रारुप परिवर्तित हुआ है, उसके वास्तविक कारणों की चर्चा न करके राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव सत्य को झुठलाने का प्रयास कर रहे हैं। लालू प्रसाद यादव अपनी राजनीतिक प्रतिक्रिया में भ्रष्टाचार को छोड़कर सभी राजनीतिक बातें कर रहे हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के बारे में एक भी बात नहीं कर रहे हैं। यह बात सत्य है कि देश के राजनीतिक इतिहास में ऐसी स्थितियां भी कई बार निर्मित हुई हैं कि भ्रष्टाचार के आरोप लगने मात्र पर ही कई नेताओं ने नैतिकता के आधार पर अपना त्याग पत्र दिया है। तेजस्वी यादव अगर पद छोड़ देते तो कोई नई बात नहीं होती, लेकिन लालू प्रसाद ने हठी रवैया अपनाते हुए नीतीश के सामने बेचैनी वाले हालात पैदा कर दिए थे। ऐसे में नीतीश कुमार क्या करते, वह भ्रष्टाचार के विरोध में अभी तक अपनी राजनीति करते आए हैं। इसलिए यह तो लगभग तय था कि नीतीश कुमार भ्रष्टाचार के मामले में कोई समझौता नहीं करेंगे। और हुआ भी ऐसा ही। आखिर नीतीश कुमार ने इस्तीफा देकर यह दिखा दिया कि वह सुशासन बाबू की छवि को बरकरार रखने के लिए भ्रष्टाचार विरोधियों का साथ भी छोड़ने के लिए तैयार हैं। वास्तव में राजनीति का आशय भी यही संदेश देता है कि जिस राज में नीति हो, उसी का पालन करना चाहिए। हालांकि कुछ अपवाद भी हो सकते हैं, लेकिन मन में अच्छा करने का भाव हो तो अपवाद भी बहुत पीछे छूट जाते हैं। नीतीश के इस्तीफा देने के बाद भी वह व्यक्तिगत तौर पर लालू प्रसाद यादव के विरोधी दिखाई नहीं दिए, उन्होंने केवल भ्रष्टाचार का ही विरोध किया। वास्तव में भ्रष्टाचार के विरोध में नीतीश कुमार द्वारा चलाई जा रही मुहिम में लालू प्रसाद यादव को भी साथ देना चाहिए था। उन्होंने साथ क्यों नहीं दिया, यह कारण भी कई सवाल खड़े कर रहा है।
बिहार में गठबंधन का दल परिवर्तित होने के बाद जिस प्रकार के आरोप प्रत्यारोप राजनीति की आशंका व्यक्त की जा रही थी, लगभग वैसी ही दिखाई भी दे रही है। लालू प्रसाद यादव अपनी सफाई में किसी भी प्रकार का ठोस तर्क प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं, वे राजनीति से प्रेरित ऐसे आरोप लगा रहे हैं, जो केवल आत्म प्रशंसा को ही उजागर करते हैं। इसके विपरीत नीतीश कुमार के तर्क में दम दिखाई दे रही है। नीतीश कुमार के कदम को वर्तमान में भ्रष्टाचार के विरोध में उठाया हुआ कदम माना जा रहा है। यह बात सही है कि भ्रष्टाचार की कमाई के कारण कई नेता भले ही आम जनता के विकास की बात करते हों, लेकिन उनकी निजी जिंदगी में बहुत बदलाव आ जाता है। वर्तमान में नीतीश कुमार के कदम को भ्रष्टाचार विरोधी कदम माना जा रहा है, जो जनता के हित में भी है।

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