लेखक परिचय

राजेश करमहे

राजेश करमहे

काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर एवं हैदराबाद विश्वविद्यालय से पी जी डिप्लोमा इन लाईब्रेरी ऑटोमेशन के पश्चात् आकाशवाणी मे कार्यरत| १९९६ में आकाशवाणी वार्षिक पुरस्कार में मेरिट सर्टीफिकेट| पठन-पाठन एवं आध्यात्म में रूचि|

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 राजेश करमहे

दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़ा भारी मेला लगा है मानो जनसैलाब उमड़ आया हो। एक अवतारी पुरूष प्रकट हुए हैं नाम भी बड़ा प्यारा सा है अन्ना, बिल्कुल हर दूसरे भारतीय घर के बुजुर्ग की तरह नयी पीढ़ी से उम्मीद करता हुआ और उन्हीं से ठगा जाता हुआ। अपना देश वैसे ही मेलों एवं तीज-त्योहारों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। नवरात्र में नौ दिन व्रत करो, निर्जला पंच भीष्म व्रत तो अति पुण्यदायक है फिर अपने मुस्लिम भाई तो महीने भर रोजा रखते हैं। बड़े तपस्वी माने जाते हैं जो नौ दिन अपनी छाती पर कलश लेकर व्रत करते हैं। यहाँ भी माजरा कुछ वैसा ही है। चौहत्तर साल का एक बुजर्ग अपनी छाती पर भ्रष्टाचार मिटाने के संकल्प का कलश लेकर लेटा है। शंख नगाडे बज रहे हैं, उद्घोषणाएं हो रहीं हैं, रंग बिरंगे कलाकार अपना फन दिखा रहे है। बहुत चकाचौंध है। इलेक्ट्रानिक मिडिया की चांदी है। ब्रेकिंग न्यूज देने के होड में न्यूज को ही ब्रेक कर दे रहें हैं। टीम सरकार और टीम अन्ना के बीच मैच का लाइव प्रसारण, प्रायोजक हैं अमुक अमुक। लगता है कि प्रायोजक जनता के पैसों से नहीं, विदेशों से काला धन लाकर प्रयोजन कर रहें हैं। सो कुंभ के मेले की तरह वर्षों बाद मौका आया है अबतक के भ्रष्टाचरण या पाप की गठरी को अन्ना की गंगा में धोने का। दूर दूर से तीर्थयात्री आ रहे हैं। मेले के प्रायोजक भी बराबर ध्यान रख रहें हैं कि कहीं कोई भगदड़ न हो, कोई अफरातफरी न होने पावे। सो भीड़ आश्वस्त है, लोग बढते जा रहे हैं, दफ्तर के बंदी के दिनों में तो बच्चे एवं गृहणियां भी गृहस्वामी को ले चलने की जिद कर रहें हैं। अपना पप्पू जो कभी पास नहीं होता है और डांस भी नहीं जानता है वो तो अन्ना वाला टीशर्ट एवं कैप भी खरीद लाया है कहता था बड़ी डिमांड है सो मुश्किल से ब्लैक में खरीद कर लाया हूँ। उसकी गर्लफ्रेंड तो यहाँ तक कहा कि इस ड्रेस में वह बहुत कुल दिखता है। सब अपनी इमेज बनाने और धाक जमाने रामलीला मैदान जा रहे हैं। ठेकेदार और आफिसर और आम जनता सब ऐसे जा रहे हैं मानो आजकल बाघ-बकरी ब्रांड चाय पीने लगे हों। बेशक इन सब में वैसे भी लोग हैं जो अन्ना की सोच के हैं पर वे मुट्ठीभर हैं अन्ना की तरह इस्तेमाल होने के लिए।

कहते हैं वर्षों पहले गाँधी बाबा बड़े अवतारी पुरुष हुए। बड़े सत्याग्रही थे अंग्रेजों को देश से दूर भगा दिया फिर बेचारे क्या करते चेले सब भ्रष्टाचारी हो गए सो देश की दुर्गति हो गयी। उस समय प्रायः हम सब पैदा भी नहीं हुए थे इसलिए ज्यादा कुछ पता नहीं। वो इतिहास पढ़नेवाले बेहतर जानते हैं पर सुनते हैं कि इतिहास में भी बड़ा भ्रष्टाचार हुआ। सरकारें बदलती गयीं इतिहास बदलता गया। फिर इस आई टी और बाज़ार के युग में इतिहास और परम्पराओं की चिन्ता कौन करे। खैर छोडिए, उसके बाद क्या हुआ सो सुनिए। एक जयप्रकाश बाबा थे उन्हीं गाँधी बाबा के पक्के चेले। उनको गाँधी बाबा का तिरस्कार न देखा गया और सरकार ही पलट कर दम लिए। बड़ी सम्पूर्ण क्रांति थी – सन सतहत्तर की ललकार, दिल्ली में जनता सरकार। सरकार बन भी गयी पर फिर चेले बेईमान हो गए। देश को ही लूट लिया। पर यह देश तो अवतारों का ही है। जब जब धरम की हानि होती है अवतार प्रकट हो जाते हैं। अपने अन्ना बाबा को भी गाँधी बाबा की ही अवतारी गद्दी मिली है। बाबा हैं बिल्कुल भोले। बिल्कुल अपने गाँव के दादाजी की तरह। फ़ौज में रहे सो कितने दुश्मनों के दाँत खट्टे किए। कई बार तो बड़े बड़े नेताओं को भी अपने सत्याग्रह से गद्दी से उतार दिए। सो उन्हीं को इसबार गद्दी का हकदार चुना गया। बाबा में लेशमात्र भी दोष कहना महापाप होगा। पर उनके चेले फिर इतिहास भूल गए। गाँधीजी का व्रत होता था हृदय परिवर्तन के लिए, दंगे फसाद को रोकने के लिए, आत्मचिंतन एवं शुद्धिकरण के लिए। पर गांधी ने कभी दुराग्रह या दवाब कई राजनीति नहीं की। गाँधी के साथ सुभाष या शिवाजी का मिक्सचर कभी नहीं बना। गाँधी या जयप्रकाश ने कभी कोई डेडलाइन नहीं तय की।

इतनी बड़ी भ्रष्टाचार की समस्या मानो देश की देह में कैंसर की तरह और कहतें हैं कई बस तीस तारीख तक आपरेशन कर दो सब कुछ ठीक हो जायेगा। क्या कोई जादू है या फिर माइक्रोसॉफ्ट ने कोई प्रोग्राम इजाद किया है?

मैं अन्ना हूँ – मैं अन्ना हूँ। कौन है अन्ना? एक शुद्ध बुद्ध बुजुर्ग कई दिनों से भूखा बैठा है। किसी को लाज है? किसको समझ है कि भ्रष्टाचार का मूल क्या है? भ्रष्टाचार अत्यधिक भूख से पैदा होता है, दूसरों के भूख को अनदेखा कर अपना हित साधने से। पशु कभी भ्रष्टाचार नहीं करते हैं। तीन तरह के भूख – बौद्धिक भूख, पेट की भूख और आदम भूख जब लालच बन जाते हैं तो भ्रष्टाचार का उद्भव होता है। लेफ्ट के अनुसार ये ठीक नहीं है ये फासिज्म है, राइट के अनुसार ये डेमोक्रेटिक नहीं है। सरकार कहती है कि संविधान इजाजत नहीं देता। इतनी बौद्धिक जानकारी मँहगाई एवं भ्रष्टाचार से त्रस्त आम जनता के किस काम की? अन्ना ने देशहित में व्रत रखा उसका सम्मान करना सीखो। व्रत का निहितार्थ समझो। व्रत अत्यधिक भूख या लालच का निरोध है। व्रत से मन मानस शुद्ध होता है। न तो आपमें बौद्धिक तिकडम करने कि ताकत रहती है और न ही आप पेट या पेट के नीचे की आग बुझाने के लिए भ्रष्टाचार की सोचते हैं।

सरकार ने गलती की या नहीं ये विचारणीय विषय हो सकते हैं पर जरा गौर करिए कि तब क्या होता जब सरकार के नुमाइंदे भी समानांतर अनशन पर बैठ जाते। क्या तब यह विश्वाश नहीं जगता कि दोनों ही पक्ष संजीदगी से भ्रष्टाचार मिटाने को तत्पर हैं। फिर क्या टीम अन्ना के पास संसदीय तरीके के अलावे कोई रास्ता बचता? जब साधु को शैतानी तिकडम दिखाइएगा तो फिर देश में तमाशा देखिए। देश में अन्ना हजारे हजारों की संख्या में पैदा हो गए हैं। पर एक भी असली अन्ना नहीं है। कहते हैं कि अन्ना को कुछ हुआ तो सरकार दोषी होगी पर क्या अन्ना के साथ वाले दोषी नहीं होंगें, क्या विपक्ष दोषी नहीं होगा?

क्या वक्त नहीं आ गया है कि अन्ना टोपी पहनने वाले, मैं अन्ना हूँ कहने वाले अन्ना व्रत का अर्थ समझें और अपने उस श्रद्देय, भोले भाले बुजुर्ग का अनशन समाप्त करवाकर खुद जिम्मेवारी लें और इस अनशन व्रत को खासकर युवा अपनाएं और संकल्प लें कि मैं भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं होऊंगा और जब सैकड़ों – हजारों अन्ना अनशन करेंगें तब भ्रष्टाचार का राक्षस स्वयं भाग खड़ा होगा। अन्ना भी कहते है कि क़ानून बनने से साठ से पैसठ फीसदी भ्रष्टाचार कम होगा अतः लम्बी लड़ाई लड़नी है परिवर्तन की लड़ाई। अन्यथा डर है कि फिर अन्ना के चेले भी वही करेंगे जो गाँधी बाबा और जयप्रकाश बाबा के चेलों ने किया। सशक्त लोकपाल निसंदेह भ्रष्टाचार पर अंकुश रखेगा पर क़ानून से हृदय परिवर्तन संभव नहीं है। जब तक देश उपभोक्तावादी प्रवृत्ति को त्याग कर गाँधी, जयप्रकाश या अन्ना की तरह संयम एवं मर्यादा का व्रत नहीं करेगा भ्रष्टाचार उन्मूलन असंभव है।

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2 Comments on "उत्तर अन्ना चिंतन"

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S B Jha
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हम सबों को इश्वर से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि ऐसा अवतारी पुरुष इस भारत भूमि पर बार बार जन्म लें | मानव योनी में श्री राम, कृष्ण, पैगम्ब्बर मोहम्मद, यीशु मसीह, भगवन बुद्ध, महावीर, गुरु नानक, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गाँधी इत्यादि के बाद श्री अन्ना हजारे जी का नाम भी स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाना चाहिए

swamisamvitchaitanya
Guest

भ्रस्ताव्हार कभी भी ख़तम नहीं हो सकता क्योकि वह तो लोगो के लिए सुविधा के हिसाब से बिना बनाये ही बना है

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