लेखक परिचय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय

नरेश भारतीय ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। लम्बे अर्से तक बी.बी.सी. रेडियो हिन्दी सेवा से जुड़े रहे। उनके लेख भारत की प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। पुस्तक रूप में उनके लेख संग्रह 'उस पार इस पार' के लिए उन्हें पद्मानंद साहित्य सम्मान (2002) प्राप्त हो चुका है।

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नरेश भारतीय

जो हुआ, अद्भुत हुआ. देश के लोगों को दिशा बोध हुआ है. १६ अगस्त २०११ को स्वतंत्रता की दूसरी लड़ाई की घोषणा करने के बाद जन बल के साथ मैदान में उतरने वाले अन्ना हजारे और उनके कर्मठ सहयोगियों ने कुशलतापूर्वक एक ऐसी आग को शांत करने का सफल प्रयास किया है जो अंदर ही अंदर सुलग रही थी. यदि इस तरह सुलगती आग लपटें लेने तक छोड़ दी जाती तो जाने कितना अनिष्ट होता. देश की दुखती रग को सही समय पहचान कर एक ऐसा प्रभावी जनांदोलन खड़ा किया गया जिसने उभरते जनाक्रोश को एक शांतिपूर्ण क्रांति की राह दिखाई है. ऐसी क्रांति जिसके लिए मात्र जनोद्बोधक आह्वान की ही नहीं अपितु उसे सफल बनाने के लिए एक सही, सशक्त और संकल्पसिद्द नेतृत्व की भी आवश्यकता रही है. देश की जनता ने अन्ना टीम को निर्भीकता और खुले दिल के साथ इसलिए सशक्त समर्थन दिया क्योंकि आए दिन घपले घोटालों के खुलते रहस्य और रिश्वतों की हर क्षण जकड़ती जंजीरों की पीड़ा उसके लिए अब असहनीय होती जा रही थी.

देश में लोकतंत्र है और उसकी गरिमा को बरकरार रखते हुए विश्व के समक्ष भारत ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि परिवर्तन लाने के लिए पाशविक शक्ति प्रदर्शन के स्थान पर शांत और संयत उपाय अधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं. निस्संदेह, अन्ना के नेतृत्व ने पुनरपि भारतीयों की सभ्य, सांस्कृतिक एवं परिपक्व दृष्टि और व्यवहार की अमिट छाप विश्व इतिहास के पन्नों पर अंकित कर दी है. भारत में लंबे समय से निरंकुश कदम जमाते भ्रष्टाचार का मुद्दा एक अह्म मुद्दा रहा है जिससे आम आदमी संत्रस्त है. लोकपाल बिल का जैसा प्रस्तावित स्वरूप जनता की ओर से और जनता के हित में बनाए जाने के लिए यह शांतिपूर्ण संघर्ष हुआ है अन्ना के ही शब्दों में “अभी उसमें आधी जीत ही मिली है.” लेकिन यह आधी जीत भी जनशक्ति के उभार की प्रतीक है. यही जनशक्ति अंतत: यह भी सुनिश्चित करेगी कि यह आधी जीत राष्ट्र की पूरी जीत बने.

जनता के इस उत्साह और तत्परता का बने रहना नितान्त आवश्यक है. इसके साथ यह भी जरूरी है कि जो हुआ है और जैसे हुआ है उस पर सभी सम्बंधित पक्ष अब सहजता के साथ मनन करें. भविष्य में क्या कुछ करना है उस पर जनता और जनप्रतिनिधि दोनों गंभीरता के साथ परस्पर तालमेल बिठाते हुए आगामी दिशा निर्धारित करें. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार के साथ वार्तालाप का जो स्वरूप देखने को मिला है वह स्पष्ट करता है कि जनप्रतिनिधियों और जनता के बीच एक ऐसी खाई बन गई है जिसे पाटने का प्रयास होना चाहिए. इसका स्पष्ट प्रमाण हाल के दिनों में हुए घटनाक्रम में मिला है जिसमें कुछ ऐसी गलत किस्म की प्राम्भिक पैंतरेबाज़ी सरकार के मंत्रियों ने करने की चेष्ठा की जो शोभनीय व्यवहार नहीं माना जा सकता. सांसदों को अन्नामंच से एक दो वक्ताओं के शब्द और व्यवहार आपतिजनक लगे और तुरंत संसद में विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने की तैयारी होने लगी. कैसा है यह अहंकार जन प्रतिनिधियों में कि वे खुद को ही अपने खुदा का खुदा मानने लगे? क्या वाकया ही आज के भारत का यही सच बनता जा रहा है कि सत्ता के गलियारों में पहुंचते ही उनके द्वारा चयनित प्रतिनिधियों के मन मस्तिष्क में एक प्रकार का ‘विशिष्टतावाद’ पनपने लगता है. जाने अनजाने जनसाधारण को यह लगने लगता है कि वे तो हमेशा से किसी के द्वारा शासित हैं, प्रजा हैं. राजा तो वे हैं जो सरकार में हैं. उसके मंत्री हैं. ज्यों ज्यों ऐसे विशिष्ट व्यक्तियों के लिए विविध सुविधाओं का दायरा बढ़ता जाता है, उनकी सुरक्षा के इंतजाम बढ़ते जाते हैं, मंडराने लगते हैं उनके आस पास ऐसे सहयोगी कर्मचारी जो ताम झाम का जुगाड़ करके आम मतदाता से उनकी दूरी बढ़ाते हैं. उनसे संपर्क करना तक असंभव हो जाता है. आम आदमी पूर्ववत दिनरात अपनी रोटी रोजी के लिए ही संघर्ष ही करता नज़र आता है. उसकी सुध तब ली जाती है जब वोट के लिए उसकी आवश्यकता पड़ती है.

गत अनेक वर्षों से भारत में काले धन का खूब प्रचलन हुआ है. यह सर्वविदित है कि काले धन का मुख्य स्रोत है भ्रष्टाचार से संचित धन. इससे उस आम आदमी का कोई लेना देना नहीं होता जो खेत खलिहानों में बसता है जहां नोट पेड़ों पर नहीं उगते, बल्कि खून पसीना बहा कर दो वक्त का खाना जुटाने के लिए बनाए जाते हैं. उनके खाते स्विस बैंकों में नहीं खुलते. लेकिन तरह तरह के अनावश्यक नियमों के शिकंजे में कसे जन साधारण को जगह जगह घूस देकर काम करवाने की विवशता का सामना करना पड़ता है. विकिलीक्स ने हाल में अनेक विशिष्ट व्यक्तियों के नाम और विदेशों में उनके खातों के विवरण दिए हैं. लेकिन इस सम्बन्ध में यदि संसद में शोर उभरा भी है तो फिर जाने क्यों थम कर रह गया है? कोई जाने तो सही कि इस किस के जाँच शुरू हुई है? भ्रष्टाचार का आकार गत अनेक दशकों में निरंतर बढ़ता ही गया है.

अभी तो इसके आकार को कम करने के लिए पहला कदम उठा है. अन्ना टीम के प्रस्तावों पर सैद्धान्तिक सहमति संसद में सभी दलों के द्वारा सशर्त या बिना शर्त प्रकट करने के बाद संसदीय प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. लोकपाल विधेयक के स्थाई समिति द्वारा स्वीकृत अंतिम प्रारूप पर सदन में अभी बहस होना बाकी है. यह सकारात्मक स्थिति विकास है. इसे आम आदमी और उनके द्वारा ही चुने गए प्रतिनिधियों के बीच बनी दूरी को कम करने की प्रक्रिया का प्रारम्भ भी माना जाना चाहिए. इस दूरी को मिटाने के लिए अब राजनीतिज्ञों को सूझ बूझ के साथ ठोस कदम उठाने चाहिएं ताकि भविष्य में ऐसी स्थितियां उत्पन्न न हों जिनसे देश के लोकतंत्र की मूल भावभूमि कमज़ोर पड़े. आज देश में विवाद की नहीं संवाद की आवश्यकता है.

लोकपाल विधेयक का यथा शीघ्र तैयार होना और संसद द्वारा पारित किया जाना श्रेयस्कर होगा. देश की जनता अपनी शक्ति की प्रभाविकता के प्रति अधिक जागरूक हुई है जनप्रतिनिधियों को भी कदम आगे बढ़ा कर यह सिद्ध करने के लिए जुटना होगा कि वह जनता की इच्छाओं और अपेक्षाओं के अनरूप कम करने के लिए अधिक कृतसंकल्प हों. इस जनांदोलन के फलस्वरूप अनेक अन्य विषय उभर रहे हैं जिन पर ध्यान दिया जाना और संवाद का उभरना देश के व्यापक हित में होगा. लेकिन उसके लिए एक सही ढांचे के निर्माण की नितान्त आवश्यकता है.

भविष्य में जनमतसंग्रह एक ऐसा संवैधानिक प्रावधान हो सकता है जिसके अंतर्गत किसी महत्वपूर्ण विषय पर संसद में राजनीतिक असहमति होने पर सीधे मतदान के माध्यम से आम आदमी का मन और मत जाना जा सके. इससे न तो संसद और न ही किसी सांसद की हेठी होती है जैसा कि हाल में कुछ सांसदों ने आभास दिया है. क्या लोकतंत्र का यह मूलमंत्र है नहीं है कि उसमें जनता सर्वोच्च शक्ति होती है? लोकतंत्र में अपनाई गई संसदीय प्रणाली के तहत संसद को सर्वोच्च घोषित कर दिए जाने का मतलब यह नहीं हो सकता कि जनशक्ति की उपेक्षा की जाए जो उसकी आत्मा है. संसद का गठन जनता के ही द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों से होता है. सरकार भी जनता के द्वारा दिए गए बहुमत के निर्णय के आधार पर ही बनाई जानी संभव है. जनता के इस लोकतांत्रिक अधिकार से उसे संसदीय या राष्ट्रपतीय किसी भी प्रणाली का हवाला देकर वंचित नहीं किया जा सकता.

यह सभी जानते हैं कि भारत का संविधान मुख्य रूप से ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली पर आधारित है. फर्क यह है कि ब्रिटेन के पास लिखित संविधान नहीं है और भारत के पास लिखित संविधान है. लेकिन समस्त संसदीय प्रक्रियाएं लगभग यथावत हैं. इस पर भी ब्रिटेन में आवश्यकता पड़ने पर जनमत संग्रह कराया जा सकता है, जैसा कि ब्रिटेन के यूरोपीय संघ की सदस्यता के विषय पर हुआ. लेकिन भारत में किसी व्यापक महत्व के विषय पर यदि जनमतसंग्रह की अब रेखांकित होती आवश्यकता की उपेक्षा कर दी गई तो आने वाले वर्षों में अनेक ऐसे मुद्दे जनांदोलन खड़े करने के लिए जनता को विवश कर सकते हैं.

समय आ गया है कि जनता और जनप्रतिनिधि घुल मिल कर एक आम बहस छेड़ें और यह सोचें कि ऐसे कौन से मुद्दे हो सकते हैं जिनके निकट भविष्य में शीघ्र समाधान की आवश्यकता है. उन मुद्दों के समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने के लिए योजनाएं बनाई जाएँ और शासन की ओर से सार्वजनिक की जाएँ. जो काम विधानपालिका और कार्यपालिका के करने के हैं उन्हीं को करना है. जनता कानून बनाए जाने की मांग कर सकती है लेकिन कानून बना नहीं सकती. जो स्थितियां निर्माण हो रहीं हैं सांसदों और विधायकों के लिए यह श्रेयस्कर होगा कि वे अपने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लोगों के साथ अपने संपर्क साधन मजबूत करें, एक ऐसा व्यवस्था ढांचा कायम करें जिसमें जनता के हित से सम्बंधित महत्वपूर्ण मामलों पर वे उनका मत जान सकें. उसके बाद भी यदि संसद में किसी मुद्दे पर आम सहमति बनाना संभव नहीं होता और विषय सुनिश्चित निर्णय की मांग करता हो तो सीधे मतदान के माध्यम से जनता से पूछने के सिवा और कोई बेहतर विकल्प नहीं है. जनमतसंग्रह जनता की सीधी भागीदारी का आभास देता है जो देश की एकजुटता को भी किसी हद तक मज़बूत करता है. इसलिए संविधान में संशोधन करके ऐसे प्रावधान पर ध्यान दिया जाना समय की आवश्यकता बन गई है.

एक बार चुनाव जीत कर संसद या विधान सभा में पहुंचे किसी भी जनप्रतिनिधि के प्रति यदि उसके निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं का इसलिए विश्वास गिरता है क्योंकि उसने आपराधिक कृत्य किया है, उनसे विश्वासघात किया है. राष्ट्रहित विरोधी गतिविधियों में उसकी लिप्तता उन्हें सप्रमाण दिखती है तो उन्हें अधिकार होना चाहिए कि उसे पुन: उसी निर्वाचन क्षेत्र में मध्यावधि चुनाव के आयोजन के साथ अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए बाध्य कर सकें. यह प्रावधान जितना आसान लगता है शायद उतना आसान सिद्ध न हो क्योंकि ऐसे प्रयोग पश्चिम के कुछ देशों में हुए हैं लेकिन बहुत ही गंभीर मामलों में. भारत में ऐसा प्रयोग करने से पूर्व उन भ्रष्टाचारी तौर तरीकों से निजात पाना आवश्यक है जो चुनाव जीतने के लिए प्राय: अपनाए जाते हैं, जिनमें कुछ इलाकों में लोगों को डरा धमका कर या प्रलोभन देकर वोट लेने की घटनाएं खुले आम होती हैं. अन्यथा यथेष्ठ परिणाम प्राप्त कर सकने की सम्भावना बलवती सिद्ध नहीं होगी.

बहुत कुछ है जो करणीय है. बहुत कुछ है जिसे करने के संकल्प को मुखर अभिव्यक्ति दी गई है. बहुत कुछ है जिनके लिए संघर्ष करना पड़ सकता है. बहुत कुछ है जिसे सभ्य, सहज और सौहार्दपूर्ण वातावरण का निर्माण करके परस्पर संवाद से सुलझाया जा सकता है. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्रीय देश भारत ने जिस तरह एक महत्वपूर्ण मुद्दे के समाधान की दिशा में, प्राम्भिक अवरोधों के कारण खड़े हो सकने वाले संकट को बुद्दिमत्ता के साथ टाल कर, सही दिशा में कदम उठाया है वह अनुकरणीय है. यह लोकशक्ति के महत्व को रेखांकित करता है और उम्मीद जगाता है कि भविष्य में जनता की आशाओं अपेक्षाओं के प्रति सत्ताधीश जनप्रतिनिधि ऐसा उदासीन और विरोधी रुख नहीं अपनाएंगे जिससे यह लगे कि देश अभी पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं है. अंतत: सद्भाव कायम हुआ है जो अब बने रहना चाहिए.

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3 Comments on "अब आगे बढ़ा जाए…."

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Anil Gupta,Meerut,India
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Anil Gupta,Meerut,India

सबसे बड़ी बात ये है की देश का हित चिंतन करने वाले सभी लोग ये समझ लें की कौन देश का वास्तविक हितेषी है और कौन घडियाली आंसू बहा रहा है. केवल कुछ स्वार्थी लोगों के दुष्प्रचार से घबराकर जो देशद्रोही लोगों की खुशामद करने चले जाते हैं और देश के लिए दिन रात काम करनेवालों से दूरियां बनाकर चलते हैं उनको भी ठन्डे दिमाग से सोचकर भविष्य की लड़ाई के लिए तयारी करनी होगी. वैचारिक स्पष्टता आवश्यक है.

नरेश भारतीय
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लेख पर आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. आपके विचारों से किसी के असहमत होने का कोई कारण नहीं होना चाहिए. आपके शब्दों में एक ऐसी पीड़ा है जो आज पूरा देश अभिव्यक्त करने को तत्पर है, इसीलिए छोटे से प्रयास को भी इतना व्यापक समर्थन मिला है. देश के भविष्य की बागडोर युवाओं के हाथ में है और उनका आगे बढ़ कर इस नासूर बन चुके फोड़े की चीरफाड़ करके देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराना नितांत आवश्यक है. व्यवस्था को चुनौती मात्र देने से समाधान नहीं होते. बुरी व्यवस्था का बेहतर विकल्प प्रस्तुत करके उसे लागू करने के लिए… Read more »
Shailendra Saxena
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हम होंगे कामयाब एक दिन ………… आजकल राजनीति मैं सुधार की बातें चल रही हैं . अनेक प्रकार के विचारक अपने -अपने विचार दे रहें हैं . परन्तु ऐसा लगता है कि राजनेतिक दलों को इससे कोई सरोकार नहीं है भारत के सारे दल जो संसद मैं भ्रस्टाचार समाप्त करने के लिए अन्ना जी या राम देव जी या फिर किसी अन्य विचारक का समर्थन करते हैं वे सारे अन्दर ही अन्दर डरें हुए हैं उन्हें लगता है कि यदि अन्ना जी का जन लोकपाल बिल पास हो गया तो उनकी चलती हुई दूकान बंद हो जायेगी अभी तो अन्ना… Read more »
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