लेखक परिचय

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

मीणा-आदिवासी परिवार में जन्म। तीसरी कक्षा के बाद पढाई छूटी! बाद में नियमित पढाई केवल 04 वर्ष! जीवन के 07 वर्ष बाल-मजदूर एवं बाल-कृषक। निर्दोष होकर भी 04 वर्ष 02 माह 26 दिन 04 जेलों में गुजारे। जेल के दौरान-कई सौ पुस्तकों का अध्ययन, कविता लेखन किया एवं जेल में ही ग्रेज्युएशन डिग्री पूर्ण की! 20 वर्ष 09 माह 05 दिन रेलवे में मजदूरी करने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृति! हिन्दू धर्म, जाति, वर्ग, वर्ण, समाज, कानून, अर्थ व्यवस्था, आतंकवाद, नक्सलवाद, राजनीति, कानून, संविधान, स्वास्थ्य, मानव व्यवहार, मानव मनोविज्ञान, दाम्पत्य, आध्यात्म, दलित-आदिवासी-पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक उत्पीड़न सहित अनेकानेक विषयों पर सतत लेखन और चिन्तन! विश्लेषक, टिप्पणीकार, कवि, शायर और शोधार्थी! छोटे बच्चों, वंचित वर्गों और औरतों के शोषण, उत्पीड़न तथा अभावमय जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययनरत! मुख्य संस्थापक तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष-‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान’ (BAAS), राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एंड रायटर्स एसोसिएशन (JMWA), पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा/जजा संगठनों का अ.भा. परिसंघ, पूर्व अध्यक्ष-अ.भा. भील-मीणा संघर्ष मोर्चा एवं पूर्व प्रकाशक तथा सम्पादक-प्रेसपालिका (हिन्दी पाक्षिक)।

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-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश

इन दिनों देशभर में बुखार और आईफ्लू के बीमार देखे जा सकते हैं। बीमारी नियन्त्रित नहीं हो रही हैं। महंगे उपचार के बाद भी रोगी मारे भी जा रही हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस मार्डन ऐलोपैथी पर हम पूरी तरह से निर्भर हैं, वह कितनी सही और निरामय है।

यह बात निर्विवाद सत्य है कि ऐलोपैथिक चिकित्सा पद्धति जिसे आधुनिक या मॉडर्न चिकित्सा पद्धपि भी कहा जाता है की लगभग शतप्रतिशत दवाईयों का मानव पर उपयोग करने से पूर्व मूक जानवरों पर परीक्षण किया जाता है। जिसके चलते दवाईयों के शारीरिक प्रभाव एवं कुप्रभाव तो नोट कर लिये जाते हैं, लेकिन इनके मानव मन पर क्या-क्या कुप्रभाव होते हैं। इसका कोई परीक्षण या परिणाम पता नहीं चल पाता है। इसलिये ऐलोपैथिक दवाईयों से रोगियों में अनेक प्रकार की मनोविकृतियाँ पैदा हो जाती हैं। जिनके उपचार के लिये फिर से नयी दवाईयाँ दी जाती हैं और यह सिलसिला मृत्युपर्यन्त चलता रहता है।

इन दिनों भारत जैसे देशों में विदेशी कम्पनियों को अपनी दवाईयों के मरीजों पर क्लीनिकल परीक्षण की अनुमतियाँ प्रदान की जाने लगी हैं। जिनके कारण अनेक गरीब और निर्दोष लोगों की मौत तक हो जाती हैं। भारत के लोग चुप बैठे तमाशा देखते रहते हैं। यह सब भारत की आईएएस लॉबी की कभी न समाप्त होने वाली धनलिप्सा के कारण सम्भव हो पा रहा है।

इसके अलावा भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के भारत में ही लगातार पिछडते जाने का मूल कारण है, केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय में नीतिनियन्ता पद पर (चिकित्सा महानिदेशक के पद पर) केवल और केवल ऐलोपैथ चिकित्सकों का काबिज होना, जो कभी नहीं चाहते कि आयुर्वेद या होम्योपैथी या अन्य निरामय चिकित्सा पद्धतियाँ प्रभावी हों। इन पैथियों के विकास, उत्थान, अनुसन्धान आदि पर कितना बजट खर्च करना है, इसका निर्धारण एक ऐलोपैथ तय करता है।

इस दिशा में हम आम लोगों और मीडिया की चुप्पी भी बडा कारण है। इसके चलते अन्य पैथियों को उतना बजट नहीं मिल पाता है, जितना जरूरी है, इसका दु:खद दुष्परिणाम यह होता है कि आयुर्वेद के वैद्य भी स्वयं को डॉक्टर लिखने/कहलवाने और ऐलोपैथिक दवाईयों का उपयोग करने में पीछे नहीं रहते हैं। जबकि उन्हें ऐलोपैथी की दवाईयों का उपयोग करने का कानूनी अधिकार नहीं होता है।

इन दिनों देशभर में आईफ्लू फैला हुआ है, जिससे एक ओर तो चश्मों की विक्री हो रही है, दूसरी ओर आईड्रॉप भी खूब बिक रहे हैं। परिवार में किसी को भी यह तकलीफ हो गयी तो आम तौर पर परिवार के सभी सदस्यों में इसका संक्रमण हो जाता है। इसके बावजूद भी ऐलोपैथिक पद्धति में इसकी रोकथाम के लिये कोई टीका ईजाद नहीं किया गया है।

यदि किसी बन्धु को यह पीडा हो तो होम्योपैथी में इसका बडा ही आसान और सरल उपचार है। वैसे तो होम्योपैथी में रोगी के लक्षणों को देखकर के दवा का चयन किया जाता है, लेकिन मेरा करीब 20 वर्ष का अनुभव है कि आईफ्लू में हर रोगी के 90 प्रतिशत लक्षण एक समान पाये जाते हैं। जिनके लिये मेरी ओर से हर बार एक ही दवाई लोगों को मुफ्त में बाँटी जाती है। जिसका नाम है-यूफ्रेसिया-30 पोटेंसी में 4-5 पिल्स दिन में 4 बार रोगी को चूसने को देने पर 24 घण्टे में आराम मिल जाता है।

जिन लोगों को तकलीफ नहीं है, यदि वे भी इसकी दो दिन में चार खुराकों का सेवन कर लें तो उनका इस तकलीफ से बचाव हो जाता है। मेरा अनुभव है कि यह 90 से 95 फीसदी मामलों में सफल रही है। फिर भी योग्य होम्योपैथ की राय लेना उचित होगा।

इसी प्रकार से देशभर में इन दिनों अनेक प्रकार के बुखार चल रहे हैं, जिन्हें अनेक नामों से पुकारा जा रहा है। जिनमें अनेक लोगों की मृत्यु भी हो रही है। इलाज के नाम पर लूट भी खूब हो रही है। पिछले 20 दिनों में मेरे परिवार के चार सदस्यों को भी बुखार ने जकड लिया था। होम्योपैथी की दवाईयों के उपयोग से सभी स्वस्थ हो चुके हैं। जबकि अनेक हमारे परिचित एक माह से भी अधिक समय से एलोपैथों के चक्कर में बेहाल हैं।

कल समाचार मिला कि अजमेर में जिस बच्ची का पिछली वर्ष विवाह हुआ था, उसका जयपुर के एक प्रसिद्ध होस्पीटल में इलाज करवाया गया, तीन लाख रुपये खर्च हो गये और फिर भी कल 08.09.10 को लडकी की मृत्यु हो गयी।

मेरा प्रवक्ता के माध्यम से पाठकों से आग्रह है कि ऐलोपैथी के जहर से बचें।

डिब्बाबन्द भोजन का उपयोग बन्द करें। शारीरिक श्रम करने में शर्म का अनुभव नहीं करें। प्रतिदिन हल्काफुल्का व्यायाम करें। भोजन में दाल, हरी सब्जी और ताजगी का खयाल रखें और जब कभी तकलीफ हो ही जाये तो कम से कम ऐलोपैथ के चक्कर में नहीं पडें और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि किसी भी होम्योपैथ या आयुर्वेद के वैद्य पर तब तक विश्वास नहीं करें, जब तक कि आपको उसके ज्ञान एवं अनुभव की सही एवं विश्वसनीय जानकारी नहीं हो, क्योंकि आजकल नकली आयुर्वेदाचार्य और होम्योपैथ भी कम नहीं है।

इसी प्रकार से ऐलोपैथी का ज्ञान नहीं रखने वाले किसी वैद्य या होम्योपैथ से कभी भी ऐलोपैथिक दवाईयाँ नहीं लें। अन्यथा जीवन को खतरे से निकालना असम्भव है!

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2 Comments on "बीमारियों का प्रकोप, कैसे बचें?"

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sunil patel
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ज्ञानवर्धन जानकारी. आप जिस ‘लाबी’ का जिक्र कर रहे है, बिलकुल सत्य है.
वास्तव हिन्दुस्तान के लोग विकसित देसों की दवाइयों के प्रयोग स्थल है. और भारत से बड़ा बाजार दुनिया में कहाँ है.

सरकार एलोपेथी पर होने वाले कुल खर्च का १० प्रतिशत भी आयुर्वेद / होम्यो पेथी पर खर्च करे तो देश की आधी से ज्यादा बीमारियाँ ख़त्म हो जाएँ.

डॉ. महेश सिन्‍हा
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आम आदमी की सबसे बड़ी परेशानी यही है की, वह कौन असली है और कौन नकली इसका पता लगाने में अक्षम है । सरकार भी नकली चिकित्सक और नकली दवा के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही नहीं करती ।

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