लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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वर्तमान में भारत का जो राजनैतिक दृश्य है उसे देखकर यह लगता है कि हमारे देश में एक केन्द्रीय नेतृत्व का अभाव है। एक ऐसा नेता जिसकी राट्रव्यापी क्षवि हो और जिसे छ लाख गाँवों में भी वैसी ही पहचान मिली हो जैसी इस देश के गुने चुने महानगरों में। एक ऐसा नेतृत्व जिसकी आवाज आम आवाम के दिलो दिमाग पर असर करे और जिसका प्रभाव आमजन तक हो।

एक समय था जब इस देश में महात्मा गाँधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर ास्त्री, इंदिरा गाँधी, जय प्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया व राजीव गाँधी जैसे एक छत्र नेताओं ने राज किया। ये वे नेता थे जिनकी पहचान राट्रीय स्तर की थी और जिन्हें भारत का आम आदमी अपना नेता मानता था। ये ऐसे नेता थे जो इन देश की आमजन की नब्ज पहचानते थे और आम आदमी के सुख दुख में भी इन लोगों की सीधी भागीदारी थी। उस समय जब चुनाव होते थे तो लोग पार्टी को वोट देते थे, लोग नेहरू व इंदिरा को वोट देते थे उन्हें इस बात से कम मतलब होता था कि पार्टी ने जिस प्रत्याशी को खड़ा किया है वो केैसा है।

जब राट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या हुई तो लोगों को लगा कि अब यह देश कैसे चलेगा और कुछ ऐसा ही लोगों ने तब सोचा जब इंदिरा गाँधी नहीं रही। कहने का मतलब यह है कि इन लोगों ने अपने आप को इस देश का पर्यायवाची बना लिया था। इसी तरह जब इस देश में अनाज की कमी हुई तो लाल बहादुर ास्त्री ने लोगों को सोमवार के दिन उपवास रखने के लिए कहा और इस अपील का ऐसा प्रभाव हुआ कि आज तक हजारों लोग सोमवार का उपवास रखते हैं। पंडित नेहरू की एक आवाज पर लाखों लोग गाँव से ाहरों से निकल कर आजादी के आंदोलन में कूद पड़े थे। जय प्रकाश नारायण की एक अपील सुनकर लोगों ने अपनी नेता इंदिरा गाँधी का तख्ता पलट दिया था। एक ऐसा व्यक्ति जिसकी बम विस्फोट में मौत होने पर लोगों को ऐसा लगा कि जैसे अपने खुद के घर में किसी की मौत हो गई हो। मुझे याद है कि जब राजीव गाँधी की हत्या हुई तो इस देश में हजारों ादियाँ स्थगित हो गई थी क्योंकि देश ने अपने प्रिय नेता को खो दिया था। वर्तमान में इस तरह का सर्वमान्य नेतृत्व नजर नहीं आता। ऐसे नेता का हमारे पास अभाव है जिसकी पहचान पूरे भारत में एक जैसी हो या यूं के जिसकी पहचान एक जन नेता की हो।

वर्तमान में हमारे पास राट्रीय पार्टीयों के राट्रीय अध्यक्ष हैं लेकिन इन राट्रीय पार्टीयों के पास कोई भी राट्रीय नेता नहीं है। वर्तमान परिदृश्य में इस देश में एक भी ऐसा नेता नहीं है जो यह दावा कर सके कि उसे कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक औैर बंगाल से लेकर पंजाब तक पहचाना जाता है और यही कारण है कि राट्रीय पहचान का अभाव होने के कारण इन बड़ी पार्टीयों को क्षेत्रीय दलों से समझौते करने पड़ते हैं और गठबंधन की मजबूरी पूरे देश को उठानी पड़ती है।

नेताओं की राट्रीय क्षवि पूरे भारत को एकसूत्र में पिरोने का काम करती है और उस नेता से जुड़ा हर कार्यकर्ता व आम आवाम अपने आप को एक परिवार की तरह समझता है पर वर्तमान में ऐसा कोई बड़ा परिवार हमारे सामने नजर नहीं आ रहा है। एक नेता होने से नीति निर्माण व ासन व्यवस्था चलाने में सुविधा रहती है और पार्टी अपनी खुद की विचारधारा पर चलकर देश के लिए कुछ कर सकती है। परन्तु वर्तमान में किसी भी पार्टी की विचारधारा का प्रभाव देश पर नहीं पड़ता नजर आता। सर्वमान्य नेता की कमी ने स्थानीय नेताओं को ताकतवर बनाया और स्थानीय नेताओं के ताकतवर होने से देश में गठबंधन की सरकारें बनने लगी और जैसा की हमारे वर्तमान नेता मानते हैं कि गठबंधन की अपनी खुद की मजबूरियाँ होती है इसलिए सर्वमान्य नेतृत्व का अभाव केन्द्रीय सरकार पर नजर आने लगता है और ऐसी सरकार मजबूर सरकार बन जाती है।

यह सही भी है कि अगर किसी भी पार्टी में सर्वमान्य नेता हो तो छुटभैये नेताओं की नहीं चलती और उस कद्दावर नेता के सामने कोई भी टिक नहीं पाता और सर्वमान्य नेता का अभाव होने से हर कोई छोटा नेता भी अपने आप को बड़ा ताकतवर समझने लगता है। इससे पार्टी को तो नुकसान होता ही है साथ ही साथ इसका प्रभाव देश पर भी पड़ता है। जैसा कि पहले था कि काँग्रेस के पास नेहरू, इंदिरा जैसे सर्वमान्य नेता थे जिनकी पहचान अंतर्राट्रीय नेता के रूप में थी और यही कारण था कि उनके सामने कोई भी विरोध के स्वर पैदा नहीं होते थे और अगर होते भी तो ऐसे विरोध करने वाले नेता खुद हाशिये पर चले जाते थे। कुछ ऐसा ही आलम भारतीय जनता पार्टी में रहा जब अटल बिहारी वाजपेयी जैसा बड़ा नेतृत्व पार्टी को मिला। लोग अटल बिहारी को भाजपा का मुखौटा कहते थे और इसी मुखौटै ने भाजपा की राट्रीय पहचान बनाई थी, इसी एक नेतृत्व के कारण भाजपा ने कईं पार्टीयों को एक मंच पर लाने का काम किया और केन्द्र में सरकार भी बनाई।

वर्तमान में भारत की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी काँग्रेस व सबसे बड़ी विरोधी पार्टी भाजपा के पास केन्द्रीय नेतृत्व तो है लेकिन दोनों ही पार्टी के नेता उस स्तर के नहीं है जो स्तर इंदिरा गाँधी या कुछ हद तक अटल बिहारी वाजपेयी का रहा है। इसी कारण इन दोनों पार्टीयों को देश के लगभग हर राज्य में राज्य स्तरीय पार्टीयों से हाथ मिलाना पड़ रहा है। कारण साफ है कि इन राज्यों में दोनों पार्टीयों के पास ऐसे नेतृत्व का अभाव है जिसकी खुद ही पहचान उस राज्य में हो तो ऐसी स्थिति में राज्य में पहचान रखने वाले नेतृत्व का हाथ थामना पड़ता है। इस प्रकार सत्ता में रहने के लिए इन पार्टीयों के लिए गठबंधन एक मजबूरी बन जाता है। ये राट्रीय पार्टीयाँ सत्ता चलाने के लिए फिर इन क्षेत्रीय पार्टीयों के दबाब में रहती है और इसी दबाब को ये लोग गठबंधन का धर्म कहते हैं और इसी दबाब को पूरे देश को मजबूरी के रूप में सहन करना पड़ता है।

अगर इन पार्टीयों के पास करिश्माई व पहचान वाला केन्द्रीय नेतृत्व हो तो इन पार्टीयों को इन क्षेत्रीय दलों की जरूरत न पड़े और नही ऐसे किसी दबाब में देश को सहन करना पड़े।

अगर हम चिंतन करें तो यह बात सामने आती है कि इस देश में केन्द्रीय नेतृत्व का अभाव इसलिए हुआ क्योंकि राट्रीय स्तर की सोच व पूरे भारत की समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति वर्तमान में राजनीति में नजर नहीं आता है। अगर हम बात नेहरू, पटेल, गाँधी व इंदिर की करते हैं तो यह बात एकदम साफ है कि इन लोगों को पूरे भारत की समझ थी और ये लोग भारत की संस्कृति व भारत के लोगों से पूरी तरह परीचित थे। इन लोगों ने घूम घूम कर पूरे देश के दौरे किए थे। नेहरू इलाहबाद के कुंभ में काफी समय बिताया करते थे और पटेल ने पूरे देश को एकसूत्र में पिरोकर अपना कद बहुत बड़ा कर लिया था। इंदिरा गाँधी को नेहरू की पुत्री होने का लाभ मिला तो गाँधी जैसे कालजयी लोगों का भी सामिप्य मिला। कुछ ऐसी ही परिस्थितियाँ रामनोहर लोहिया व जय प्रकाश नारायण की थी कि ये लोग भारत भूमि से दिल से जुड़े थे और इन लोगों में विरोध करने की भी सकारात्मक ताकत थी। अटल बिहारी वाजपेयी की भी बात करें तो वाजयपेयी में भी भारतीय व राट्रीय सोच थी जिसने उन्हें राट्रीय नेता बनाया था। तो यह बात साफ है कि राट्रीय नेता वो ही बन सकता है जिसके पास राट्रीय सोच व नजरिया हो। वर्तमान में ऐसी सोच व नजरिये के व्यक्तित्व का अभाव है इसलिए राट्रीय नेताओं का भी अभाव है।

जरूरत है ऐसे व्यक्तित्व की जो पूरे भारत को एक धागे में पिरो सके और पूरे देश को एक पहचान दिला सके। जब एक ऐसा नहीं होगा हमारे सामने महँगाई, क्षेत्रियता, अलगाववाद व आतंकवाद जैसी समस्याऍं आती रहेगी। घर परिवार में जब बुजुर्ग व्यक्ति की मौत हो जाती है तो सभी भाई अपने अपने अलग अलग मकान बनाकर रहने लगते हैं और कुछ ऐसा ही किसी देश में तब होता है जब एकछत्र नेतृत्व नहीं होता तो ऐसी स्थिति में सभी क्षेत्रीय लोग अपनी फली अपनी राग बजाने लगते हैं। इसलिए जिस तरह घर का बुजुर्ग घर की पहचान होता है और पूरा परिवार उसी बुजुर्ग का परिवार कहकर जाना जाता है ठीक उसी तरह देश का एक सर्वमान्य नेता पूरे देश ही पहचान होत है और उस ऐसे नेतृत्व में ही देश प्रगति कर सकता है पहचान बना सकता है।

याम नारायण रंगा ‘अभिमन्यु’

नत्थूसर गेट के बाहर

पुकरणा स्टेडियम के पास

बीकानेर {राजस्थान} 334004

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3 Comments on "सर्वमान्य नेतृत्व का अभाव : एक दृटिकोण"

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prem
Guest
लेख का शीर्षक अनुपयुक्त है| सर्वमान्य नेता शून्य से उदय नहीं होता| वह व्यक्ति जो राष्ट्र के प्रति अपना विशेष योग-दान देते अपने नेतृत्व में देश और देशवासियों को उन्नति के स्तर पर ले जाये सर्वमान्य नेता कहलाता है| उल्लिखित भद्र लोग केवल नए-नवेले गणराज्य के शासन पर विराजमान हुए थे और उनमें कई नए परिवार में पहली संतान की भांति लोकप्रिय भी बने लेकिन उनके तुच्छ योग-दान का विस्तृत भारत पर कभी गहरा प्रभाव नहीं देखा गया| भले ही उन्हें नेता कहा जाता है लेकिन उनकी राजनीति भारतीयों की दीर्घकालीन सामाजिक और आर्थिक स्थिति को उपयुक्त नेत्रित्व कभी नही… Read more »
श्रीराम तिवारी
Guest
जैसा सर्वमान्य नेतृत्व आप चाहते हैं वैसा न तो भारत में और न अमेरिका ,रसिया ,चीन मेंकभी हुआ है और न होने वाला है .और उसकी जरुरत भी नहीं .लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और मजबूत विपक्ष होना जरुरी है .यदि तथाकथित कोई सर्वमान्य नेता मिल भी जाए तो वो ६ महीने में सर्व त्याज्य बन जाएगा .जिनके नाम आपने बताये उनमें से किसी को भी मेने कभी सर्वमान्य होते नहीं देखा.गाँधी जी से जिन्ना नाराज थे ,हिन्दू महासभा वाले नाराज थे .आर एस एस वाले नाराज थे कम्युनिस्ट नाराज थे .आंबेडकर और हरिजकं नाराज थे .कोई भी उनसे खुश नहीं… Read more »
himwant
Guest

बडे खतरनाक होते है ऐसे सर्वमान्य नेता. हिन्दुस्तान की जनता किसी एक व्यक्ति को अपनी अस्मिता का फैसला करने का ठेक्का नही देने वाली. जब जब दिया है, तब ठगे गए है.

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