लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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taking_oath_in_hindi-799063करीब सौ साल पहले की बात है. बेल्जियम में बैठे एक पाठक को रामचरित मानस की कुछ पंक्तियों से परिचय होता है. कई अलग-अलग भाषाओँ से होते हुए उनकी भाषा में अनुदित हुए तुलसी के चौपाइयों में छिपी भावनाओं को पढ़ते हुए वह इसा -भक्त मंत्रमुग्ध सा हो जाता है. और अंततः उस पंक्ति के लिखे जाने वाले देश के लिए निकल पड़ता है. अनेक संकटों-समस्यायों का सामना करते हुए वह मनीषी, अपने अराध्य देश भारत पहुचता है, मानस पर शोध करता है. लोग हाथों-हाथ उस तपस्वी को लेते हैं. भारत की मानद नागरिकता उन्हें प्रदान की जाती है. और खुद को “बिहारी” कहलाने में गर्व करने का अनुभव करते हुए वे अपनी पूरी जिन्दगी हिन्दी, हिन्दू और हिंदुस्तान की सेवा में समर्पित कर जाते हैं.”तुलसी के राम” लिख कर अमर हो जाते हैं.

आज जब भारत के ही एक विधान सभा में हिन्दी बोलने के विरोध में जूते-चप्पल चल गए हो. भाई लोगों ने महाराष्ट्र की विधान सभा में थप्पर और स्याही को उछाल कर इस लोकतंत्र के दामन पर एक बार और कालिख मल दी हो तब शायद कामिल बुल्के की आत्मा शायद स्वर्ग में रो रही होगी. सोच रही होगी कि क्या इसी अभागे देश की भाषा और संस्कृति के उन्होंने उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया. बात देश के किसी भाषा से जुड़ी है ही नहीं. राज ठाकरे जैसे लोग अगर मराठी का भी कुछ इतिहास या व्याकरण बता दें तो उसे अस्चर्या ही कहा जा सकता है. आजादी से लेकार अभी तक जो लोग भी साहित्य या भाषा में रूचि रखने वाले विद्वान् हुए हैं उन किसी ने भी कम से कम मराठी को हिन्दी के बरक्श खडा करने का प्रयास नहीं किया है. एक ही लिपि में लिखी जाने वाली दोनों भाषाएँ कभी एक दुसरे के विरोध का कारण हो जाए ऐसा तो सोचा भी नहीं जा सकता. सर्वसम्मति से जिस संविधान ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया उसके निर्माता आंबेडकर खुद महाराष्ट्र के थे. गुजराती मातृभाषा वाले महात्मा गांधी,भोजपुरी बोलने वाले राजेंद्र प्रसाद कश्मीरी मूल के नेहरू, दक्षिण के राधाकृष्णन,बंगाली टैगोर, डॉ. मुखर्जी समेत सभी महापुरुषों विद्वानों ने एकमत से जिस भाषा को अपने राष्ट्रभाषा के रूप में अंगीकार किया है,उसपर प्रश्नचिह्न कोई सरफिरा आ कर लगा दे और उसके लिए सारे संविधान को, संसदीय प्रणाली को कलंकित करने का काम करते रहे,अपने ही देश के विधानसभा में हिन्दी बोलने पर जूते और चप्पल चलाये आखिर क्या कहेंगे उसको?

यहाँ सवाल भाषा विमर्श का है ही नहीं. अतः हिन्दी के पक्ष में कोई तर्क देने का कोई मतलब नहीं है और ना अपने किसी भी क्षेत्रिय भाषा के विरोध का सवाल है. “ड्यूमंड” ने कहा था “जो तर्क को सुने ही नहीं,वह कट्टर है..जो तर्क कर ही नहीं सके वह मुर्ख और जो तर्क करने का साहस ही नहीं कर सके वह गुलाम है”. तो राज ठाकरे हो, अबू आजमी,मुलायम या लालू या कोई अन्य साम्प्रदायिक या क्षेत्रिय क्षत्रप, किसी को इन मुद्दों से वास्तव में कोई लेना देना है ऐसी तो बात ही नहीं है. निश्चित ही अलगाव चाहे भाषा के आधार पर हो या जाति.क्षेत्र,सम्प्रदाय या लिंग के आधार पर. हर तरह के अलगाव में राजितिकों को अपना वोट बैंक का हित साधता दिखता है और ये सारी कवायद इसी के लिए है. लेकिन इन सभी मुद्दों की कितनी और कैसी कीमत चुकानी पड़ेगी लोकतंत्र को इसकी किसी को भी फिकर नहीं है. तो अपने-अपने स्वार्थ की रोटी सेंकते इन दुकानदारों के आगे किसी भी भाषा या क्षेत्र, राष्ट्र संबन्धी तर्कों का कोई मतलब नहीं है. मुर्ख, कट्टर और अपने वोट बैंक के स्वार्थों के गुलाम ये लोग इसी तरह अपने हरकतों से कमजोर करते रहेंगे देश को. तो इनसे शिकायत की कोई ज़रूरत ही नहीं है. लेकिन सवाल तो इन लोगों को मिल जाने वाले जन समर्थन का है. चुनाव के दौरान महाराष्ट्र जाने का अवसर मिला था. देख कर अफ़सोस हुआ था कि हर जाति और वर्ग के लोगों में क्षेत्रियता की भावना उफान पर थी. आप किसी से भी इन मुद्दों को छेड़ कर देख लें, लगता कि जैसे बस फट पड़ने को तैयार ही बैठे हैं सब. आप किसी बाहरियों ख़ास कर बिहारियों की बात शुरू कर दीजिये बस गाली के साथ ही संबोधन सुनने को मिलेगा. त्रयम्बकेश्वर से शनि शिगनापुर तक की करीब २०० किलोमीटर की यात्रा के दौरान यह लेखक कही हिन्दी की एक लाइन भी देखने को तरस गया जबकि अंग्रेजी में लिखे ढेर सारे बोर्ड आपको भले ही दिख जायेंगे. यही तो हुआ विधान सभा में भी. कई सदस्यों ने अंग्रेजी में शपथ ली लेकिन उससे किसी को कोई ऐतराज़ नहीं था लेकिन हिन्दी बवाल का बहाना हो गया.

अगर केवल जन-समर्थन नहीं हो इन नेताओं के पास,मतदाता थोड़ी बुद्धिमत्ता का परिचय दें, तब तो चिंता की कोई बात ही नहीं है. आखिरकार गुंडों-मवालियों से निपटने की पर्याप्त ताकत है देश के पास. लेकिन अगर मतदाता भी उनके साथ हो, तब आप क्या कर सकते हैं? फिर तो एक भयावह ही तस्वीर उभर कर सामने आती है. ऐसी ही भद्दे तस्वीर खीची थी वहाँ इस लेखक के साथ बातचीत में साथ चल रहे टैक्सी चालक ने. उसके अनुसार तब की कांग्रेस-एनसीपी युति सरकार बहुत ही खराब थी. बकौल वो चालक इस चुनाव में वह सरकार को हर तरह से सबक सिखाने को तैयार था. लेकिन वोट वो “राज साहब” को ही देने की बात करता था. अब आप उसको कन्विंस करने में सफल नहीं हो पायेंगे कि मनसे को वोट देने से वोटों का बटवारा होगा और अंततः वही सरकार चुनकर आयेगी जिसे वो अभी तक जुल्मी और भ्रष्टाचारी कह रहा था. तो आप समझ सकते हैं कि इस तरह के अलगाव से आखिर किसको फायदा हो रहा है. और जब ऐसा तात्कालिक फायदा हो ही रहा है तो फिर ऐसे विभेद को ख़त्म करने का घाटे का सौदा कौन करे?

जब हर राजनीतिक दलों के पास वोटों की फसल के लिए ज़हर बोना ही उचित लगता हो. सदभाव एवं भाईचारे की बात कर सकारात्मक समर्थन प्राप्त करने की रूचि, थोड़े लम्बे रास्ते तय करने की इच्छा अगर किसी में नहीं हो तो आखिर किया ही क्या जा सकता है. तब तो इसी तरह कोई राज ठाकरे मुट्ठी भर वोटों के बदौलत ही पूरे के पूरे राजनीति पर कब्ज़ा करने में सफल होगा, जैसा की हुआ भी है. किसी विचारक ने कहा है कि जब ठिगने लोगों की परछाई बड़ी दिखने लगे तो समझ लीजिये की सूर्यास्त का समय निकट है. पता नहीं शायद इस देश का सूर्यास्त देश के पश्चिमी कोने -मुंबई- में ही होना बदा हो. महात्मा गाँधी ने कहा था कि “कायर व्यक्ति प्रेम प्रर्दशित करने में असमर्थ होता है,यह तो बहादुरों का विशेषाधिकार है”. तो हमारा लोकतंत्र आखिर उपरोक्त वर्णित इन ठिगने लोगों के बीच से प्यार की भाषा बोलने वाले बहादुर एवं समर्थ लोगों को कहाँ से खोज कर लाये?

यह आलेख लिखते-लिखते बर्लिन की दीवार तोड़े जाने की बीसवीं वर्षगाँठ मनाये जाने की खबर आ रही है. डायचे वेले के एक लेखक ने एक अखबार में बहुत भावप्रवण तरीके से उस दीवार पर पहले हथौडा पड़ने से लेकर, दीवार के दोनों तरफ के लोगों की भंगिमाओं-भावनाओं का शब्द चित्र खीचने का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया है. लेकिन पता नहीं जब वैश्वीकरण के इस जमाने में जब पूरी दुनिया का सिमट कर एक गाँव का रूप लेती जा रही हो, सूचना क्रांति संस्कृतियों के सम्मिलन का रोज नए-नए उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हो, तकनीक जहां समाज के मध्य एक पूल का काम कर रहे हों, हम राज ठाकरे जैसे दीवार बनाने वाले लोगों के रहते इस तेज़ी से बदलती एवं विकसित होती दुनिया के साथ कितना कदमताल कर पायेंगे.

-पंकज झा.

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5 Comments on "पुल के बदले दीवार बनाते लोग."

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MANAV
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लेखक और बहुत लोगोंको राज ठाकरे का सिर्फ कुछ अंशभर ही पता है ! और राज ठाकरे के खिलाफ जगह जगह जहर उगला जा रहा है ! मुंबई में सबसे ज्यादा हिंदी भाषा बोली जाती है सबसे ज्यादा हिंदी सिनेमा देखे जाते है ! यहाँ तक एक मराठी दुसरे मराठीको भी हिन्दीमे ही बात करता नजर आयेगा ! रही बात राज ठाकरे की उसका हिंदी को विरोध इसलिए है की सरकार पोलिसी ये है की मराठी भाषा का अनादर करना और यहांके लोगोंको नौकरी नादेखकर पर प्रन्तियो को दी जाती है ! बड़े मोंल ,होटल , बेस्ट , और एयर… Read more »
Sudhir Kumar Jha
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हम लोग अपने देश में राजनेताओं की अलगाववादी राजनीती से एक लम्बे अरसे से परेशां हैं और हर वर्ग की ओर से इसकी बात लगातार होती आ रही है हर मंच पर, फिर भी अपने को हम सब बहुत बेबस/ लाचार/ मजबूर ही समझते आ रहे हैं अभी तक…… आखिर क्यों??????? हम सभी ने पढ़ा है/ सुना है की ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है’, और शायद अब samay आ gaya है इस kahaawat को चरितार्थ karne का!!!

dhiru singh
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राजनीति है और कुछ नही . राज ठाकरे और अबु आसिम आज़मी अन्दर से एक ही है . ना उन्हे मराठी से मतलब है ना इन्हे हिन्दी से . नकारातम्क प्रचार से फ़ायदा उठा रहे है .

rashmi prabha
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भाषा.धर्म,जाति………किसी भी विषय पर आजकल कुछ भी न्यायसंगत नहीं,विचार देना भी न्यायसंगत नहीं………कौन सुनेगा? राजनीति है,कहीं कोई दिमाग नहीं !

दिनेशराय द्विवेदी
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लगता है मराठी जैसी सुसंकृत भाषा को राज जूतों की भाषा बनाने पर तुले हैं।

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