लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस पर विशेष आलेख

chhatit2हर राज्योत्सव पर एक आम प्रवासी की तरह छत्तीसगढ़ के बारे में सोचने एक मिला-जुला अहसाह ही होता है. निस्संदेह किसी राज्य या राष्ट्र की प्रासंगिकता के बारे में सोचते हुए आप खोने और पाने का ही हिसाब लगायेंगे. छत्तीसगढ़ के निर्माता अटल जी के शब्दों में कहूं तो क्या खोया क्या पाया जग में, मिलते और बिछरते मग में, नहीं किसी से कोई शिकायत, लेकिन ठगा गया पग-पग में. पिछले पांच वर्षों से जबरदस्ती शामिल हो गए एक दर्शक के नाते प्रदेश को देखने पर एक विरोधाभाषी तस्वीर सी उभरती है. शायद अंधे के सामने हाथी की तरह ही कि अलग-अलग कोण से देखो तो कई चीज़ें अलग-अलग दिखेंगी.डाकिया की तरह आप भी अपने झोले में आँसू और मुस्कान साथ-साथ ही देखेंगे. हालाकि इस बात से कौन इनकार करेगा कि पिछले नौ वर्षों में प्रदेश ने अपने होने का मतलब साबित किया है. वास्तव में विकास के विभिन्न पैमाने पर इसे एक कीर्तिमान कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. सरकार ने यहाँ की संभावनाओं को जमकर उकेरने का सफल प्रयास किया है.”कूंची” वास्तव में जिन हाथों में है, उन लोगों ने प्रदेश की बेहतर तस्वीर बनाने में अपने भर कुछ भी कसर बाकी नहीं रखा है. नियति द्वारा दी गयी जिम्मेवारियों के सम्यक निर्वहन में छत्तीसगढ़ में अपना बेहतर-तम् लगा देने वालों की फौज आज खड़ी है. समाज का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं बचा जिसके उन्नयन हेतु इमानदार प्रयास करने की कोशिश ना की गयी हो. परिणाम भी सामने है और दस साल पहले गए कोई व्यक्ति प्रदेश में वापस आ कर चमत्कृत ही हो सकता है. बुनियादी ढांचों के विकास समेत समृद्धि के विभिन्न आयामों को अलग से व्यक्त करने की कोई ज़रूरत नहीं है. निस्संदेह विकास ना केवल हो रहा है अपितु दिख भी रहा है. लेकिन विसंगतियों का भी पारावार नहीं. अगर प्रकृति ने इस प्रदेश को ढेर सारे खनिज, प्राकृतिक संसाधन, वनोपज, बहुमूल्य रत्न, भोले-भले, मिहनती मानव संसाधनों से नवाजा है तो अंचल को विरासत में ढेर सारी समस्याएं और चुनौतियां भी मिली है. जन, जंगल और ज़मीन के मामले में आज शायद ही देश का कोई कोना इतना खुशनसीब होगा. लेकिन यही सारी विशेषता इसकी कमजोरी भी बनती जा रही है. कस्तूरी मृग की तरह इसके आँचल की समृद्धि ही इसके हत्यारे को प्रोत्साहन देने की वजह भी बनता जा रहा. आखिरकार नक्सली लुटेरों ने भी तो इसीलिये अपने सारे महत्वकान्क्साओं का केंद्र-बिंदु भी इसी को बना लिया है. इन बहेलियों से निपटने की विशाल चुनौतियों का समाधान किये बिना कहाँ हमारी राज्योत्सव की खुशी संपूर्ण हो सकती है?  जब तक छत्तीसगढ़ महतारी के आँचल का कोई एक कोना भी देश के संविधान में भरोसा नहीं रखने वालों से भरा है,तब तक तो निश्चय ही महतारी की अराधना का यह पर्व अधूरा ही है.

इसी तरह यहाँ के नौजवानों का अपने पेशागत कार्यों के लिए बाहर जाना “पलायन” कहा जाता रहेगा, तब तक यह नहीं माना जाना चाहिए की हमने विकास की सारी दूरी नाप ली है. यूं तो देश के जिस भी कोने में अवसर दिखे वहाँ जाना कही से भी पलायन नहीं है. सही अर्थों में देश की एक-एक इंच भूमि उतनी ही किसी छत्तीसगढिया की है जितनी वहाँ के वासिंदों की. लेकिन बावजूद इस संवैधानिक सच्चाई के प्रदेश से रोजगार की तलाशा में जाने को पलायन से संबोधित इसलिए किया जाता है कि सामान्यतः ये लोग बाहर जा कर शोषित होने को मजबूर होते हैं. इस दिशा में भी बढ़-चढ़ कर काम किये जाने की ज़रूरत है. हो सकता है,सरकार महानगरों में अपना कोई अनुषंग स्थापित करे जो केवल यहाँ से गए लोगों की सुरक्षा एवं उनके मार्गदर्शन का कार्य करे. साथ ही रोज़गार के अधिकतम अवसरों का सृजन किया जाय और स्थानीय लोगों की उनमें जमकर भागीदारी हो ऐसा प्रयास किया भी जा रहा है और ज्यादे किया जाना समीचीन होगा. आखिर जिस प्रदेश की तरफ सारा देश हसरत भारी निगाहों से निहार रहा हो.अपनी-अपनी विशेषज्ञता के साथ लाखों व्यक्ति जहां आ कर अपनी सेवाए या पूजी निवेश करने में अपनी भलाई समझ रहे हों, वहाँ के माटी पुत्रों को आखिर कहीं जाने को मजबूर ही क्यू होना पड़े? कम से कम मजदूरी करने तो बेशक नहीं. सरकार की ढेर सारी कल्याणकारी योजनायें इस दिशा में प्रभावी हैं और हो भी सकती हैं. ख़ास कर सस्ते दामों पर अनाज देने की क्रांतिकारी योजना को जितने मज़बूत तरीके से अमलीजामा पहनाया जाए उतना बेहतर है. आखिर अपने ही माटी के चावल के लिए अपनी ही भूमि पर राशन की कतार में खडा होने में किसी को भी अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा जैसी नहीं लगेगी. बाकी सस्ते मजदूरों को नहीं मिलने का रोना रोने वाले कास्तकारों एवं व्यवसाइयों को यह समझना होगा कि मांग और आपूर्ति का संतुलन हमेशा उनके पक्ष में रहा है और वे सभी इस स्थिति का फायदा भी जम कर उठाते रहे हैं. आज अगर यह संतुलन थोड़ा सा मजदूरों के पक्ष में जाता दिख रहा है तो किसीको कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. अगर आपको अपने कारखानों में काम करने के लिए मजदूरों की चिरौरी करना पड़ रहा हो तो कीजिये और करना भी चाहिए. आखिर समाज के सबसे वंचित रहे तबके को लगे तो की यह उनकी अपनी माटी, अपना राज है. आप निश्चिंत रहे केवल चावल पा कर कोई “निकम्मा” नहीं बनने जा रहा है. पहले जो लोग केवल पेट की आग बुझाने के लिए शोषित होते थे वो अब अपनी बेहतरी के लिए काम करने को प्रेरित होंगे. अगर पेट भर अनाज मिल जाने से ही कोई निकम्मा बन जाता होता तो प्रदेश के सभी धन्ना सेठों के बच्चे आज नालायक हो गए होते. आप भगवान से मनाइए कि गरीबी में जीवन वसर करने वाले लोगों में प्रतिस्पर्द्धा का भाव उत्पन्न हो और वो अपने हुनर का बेहतर प्रतिफल पाने हेतु सौदा कर पाने की स्थिति में हो. उनका भरे हुए पेट के साथ स्वाभिमान से तन कर खड़ा हो जाने में ही इस प्रदेश के निर्माण की प्रासंगिकता निहित है ना कि आपके द्वारा अरबो-खरब का माल स्विस बैंकों में जमा कर लेने में.समूचे देश की तरह यहाँ भी विकराल होती जा रही आर्थिक असमानता को यथा-संभव करते जाना या सबसे अंतिम व्यक्ति को सबसे पहला लाभार्थी बनाने का सन्देश दे कर ही अपनी अधूरी तस्वीर को हम सम्पूर्णता प्रदान कर सकते हैं.

इसी तरह ओद्योगिक विकास के नाम पर बर्बाद होते जा रहे पर्यावरण को संरक्षित करना भी इस प्रदेश की प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए. विश्व भर के पर्यावरणवादियों का सपना जहां दुनिया के एक तिहाई क्षेत्र में वनों का होना है वहाँ छत्तीसगढ़ में ४४ प्रतिशत जंगल है. इसके बावजूद भी अगर आपको इसके राजधानी में सांस लेने में जद्दोजहद करना पड़े, पानी के लिए परेशान होना पड़े तो आपको इस तस्वीर को भी धुंधला होने से बचाने हेतु प्रयास करना ही होगा, कार्बन की इस कालिख को धोना ही होगा. आखिर विकास और पर्यावरण दोनों एक दुसरे का विलोम ना हो कर हमजोली बन सके, ऐसे प्राकृतिक विकास के बारे में भी सोचना और समझना होगा. भ्रष्टाचार के हलाँकि कोई बड़े आरोप साबित नहीं हुए हैं अभी तक, लेकिन लोगों में बात-बात पर किये जाने वाले इस चर्चे पर भी गौर करना ही होगा और अगर पर्यावरण संरक्षन समेत किसी भी प्राकृतिक विकास में अगर भ्रष्टाचार की बू आती हो तो उसपर भी नियंत्रण हेतु प्रयास की ज़रूरत है.

तो किसी नयी सुबह की आस में देश के अलग-अलग, छोटे-छोटे शहरों के भारी बोर दोपहरों से झोला उठाकर आ गए मेरे जैसे लोग भी निस्संदेह यहाँ आने के अपने फैसले पर प्रसन्न ही होंगे. इस प्रदेश के खुशहाली में स्वयं को भी अनामंत्रित मेहमान बना लेने की अपनी रणनीति पर खुश हो जाने वाले इस लेखक जैसे लाखों लोग राज्योत्सव की पूर्व संध्या पर आनंदित हो रहे होंगे. लेकिन प्रदेश के लिए असली आनंद का क्षण तब आएगा जब वास्तव में उपरोक्त वर्णित नक्सलवाद, पलायन, शोषण, प्रदूषण, भ्रष्टाचार आदि सभी चुनौतियों से छत्तीसगढ़ पार पा जाएगा. ऐसा आज ना कल हो के रहेगा इसमें संदेह की गूंजाइश ज्यादे नहीं दिखती. वास्तव में प्रदेश के दो करोड़ लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला कर ही अंचल के विकास की तस्वीर मुकम्मल होगी.

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3 Comments on "तस्वीर बनाता हूँ, तस्वीर नहीं बनती – पंकज झा"

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madhu
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achha hai

Jitendra Dave
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आपने इमानदारी से अपनी बात रखी. साधुवाद. तमाम मुश्किलॊ के बावजूद‌ छत्तीसगढ ने खुद् कॊ साबित किया है. और करता रहेगा.

kishore ghildiyal
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vakai itni va aesi tasveer banana aasaan nahi hain

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