लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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आरक्षण के मुद्दे पर,

यों तो सब दल साथ खड़े हैं,

इतनी छीना झपटी देखकर,

हम तो शर्मसार खड़े हैं।

संसद तो बन गया अखाड़ा,

कुश्ती देखो, देखो दंगल,

सारे पहलवान खड़े हैं।

 

जाति आधारित आरक्षण का,

अब कोई आधार नहीं है,

इसके चलते जिनके पू्र्वज,

ऊँची कुर्सी पा चुके हैं,

उन्हीं के वंशज बार बार,

आरक्षण क्यों पा रहे हैं।

 

देखो वो रिक्शेवाला,

हिन्दू है या मुसलमान,

दलित है या सवर्ण,

ख़ून पसीना बहा बहा कर,

अपनी रोटी कमा रहा है,

उसके बेटे को तो हम,

डाक्टर नहीं बना रहे हैं।

 

देखो वो पण्डित बेचारा,

दान दक्षिणा धोती कु्र्ता पाकर,

अपनी रोटी रोज़ी कमा रहा है,

दलित नहीं है इसीलिये,

उसकी बेटी को हम आरक्षण,

नहीं दिला रहे हैं।

अफ़सर नहीं बना रहे हैं।

 

 

आरक्षण की वेदी,

पर कितनी आशायें,

मलीन हुई हैं,

कितने होनहार छात्रों की,

उम्मीदें शहीद हुई हैं,

फिर भी हमारे नेता,

जात पांत मे बाँट बाँट कर,

वोटों का गणित लगा रहे हैं।

इसीलियें बस सारे दल,

इस मुद्दे पर साथ हुए हैं।

 

स्वतन्त्रता के सत्तरवे दशक मे,

जाति आधारित आरक्षण का,

अब कोई औचित्य नहीं है,

फिर भी साल दर साल हम,

आरक्षण का प्रतिशत,

क्यों बढा रहे हैं।

 

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9 Comments on "कविता:आरक्षण की वेदी पर…-बीनू भटनागर"

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अविनेन्द्र
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अविनेन्द्र

जाति तोड़ो सरनेम छोडो आरछण अपने आप मिट जायेगा

Ashok Arya
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ये आरक्षण अंग्रेजो की देंन है | सन 1891 में जब अंग्रेज सरकार थी, तब उस सरकार ने कुछ नौकरिया निकाली | लेकीन अंग्रेज अफसर चालाकी से सारे पदों पर हमेशा अंग्रेजो को रखते थे जिसके खिलाफ भारतीयों ने आवाज उठाई और अंग्रेज सरकार ने भारतीयों के लिए कुछ पद आरक्षित कर दिए |
इस तरह ये प्रणाली अंग्रेजो द्वारा लाई गई है, जिसे आजादी के बाद आंबेडकर ने नया रूप दिया |
ये आरक्षण हटाना ही चाहिए |

Sanjay
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आरक्षण के पक्षधर गौर करें- १ मंडल आयोग के नाम पर आफ़त पैदा करने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह अपना इलाज या तो विदेशों में करवाते थे या इन्द्रप्रस्थ अपोलो में . आरक्षण से बने हुए चिकित्सकों से दूर क्यों रहते थे. (उन्हे गुर्दे की तकलीफ थी. ये बात तत्कालीन अखबार में उनके लेख से पता चली थी ). २ देश में मंडल आयोग की सिफारशें लागू करने वाले प्रधानमन्त्री पी० वी० नरसिम्हाराव अपना इलाज AIIMS में ENDOCRINOLOGY के चिकित्सक डा० टण्डन और डा० शर्मा से करवाते थे यद्यपि आदिवासी मूल के डा० फिलिप उसी विभाग में थे.(मैं उस समय AIIMS… Read more »
binu bhatnagar
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जो हो चुका है उसे न बदला जा सकता है न उसकी भरपाई हो सकती है,पर पीढी दर पीढी आरक्षण मिलने से तो दमित वर्ग के ही ज़रूरतमन्द लोग इसका लाभ नहीं उठा पा रहे हैं जातिवादी आँकड़ो मे मै विश्वास नहीं करती।मै तो एक जातिविहीन समाज चाहती हूँ ,आरक्षण से किसी का भला होना होता तो अब आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं होती स्वतन्त्रता 65 साल बीतने पर। सैपरेट इलैक्टोरेट एकदम बेकार का ख़याल है देश की एकता के लियें ख़तरा है।योग्यता पर भरोसा रखिये तभी कुछ पाने का सुख मिलेगा।तथाकथित सवर्ण वर्ग दलित वर्ग का गले लगाकर स्वागत… Read more »
अविनेन्द्र
Guest
अविनेन्द्र

जाति का कोई मतलब नहीं हैं तो सरनेम का क्या मतलब हैं सरनेम से ही तो जाती का बोध होता हैं

binu bhatnagar
Guest
जो हो चुका है उसे न बदला जा सकता है न उसकी भरपाई हो सकती है,पर पीढी दर पीढी आरक्षण मिलने से तो दमित वर्ग के ही ज़रूरतमन्द लोग इसका लाभ नहीं उठा पायेंगे।जातिवादी आँकड़ो मे मै विश्वास नहीं करती। मै तो एक जातिविहीन समाज चाहती हूँ।आरक्षण से किसी का भला होना होता तो अब आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं होती स्वतन्त्रता 65 साल बीतने पर। सैपरेट इलैक्टोरेट एकदम बेकार का ख़याल है देश की एकता के ख़तरा है।योग्यता पर भरोसा रखिये तभी कुछ पाने का सुख मिलेगा।तथाकथित सवर्ण वर्ग दलित वर्ग का गले लगाकर स्वागत करने को तैयार है,पर… Read more »
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