लेखक परिचय

डॉ. राजीव कुमार रावत

डॉ. राजीव कुमार रावत

सामाजिक, राजनीतिक एवं भारतीय परिवार व्यवस्था, मानवीय संबधों के छुपे सचों को उजागर न कर समझने की, जीने की मजबूरी के विषयों में गहरी रुचि ने विविध विधाओं का अध्ययन कराया और अनुभव समृद्ध किया साथ ही व्यक्तित्व को मुखर बनाया और रोजी-रोटी की तलाश ने बहुत नचाया । हिंदी और राजनीति शास्त्र में परास्नातक. राजनीति शास्त्र में पीएच.डी, मानव संसाधन में एमबीए कर हिंदी- अंग्रेजी अनुवादक, कार्यक्रम संचालक आदि भूमिकाओं में दायित्व निर्वहन के साथ परिवार में टाइमपास के आनंद का गहरा शौक और राजनीतिक, समसामयिक, साहित्यिक, राजभाषा, प्रशासन संबंधी विषयों पर एक समग्र समालोचनात्मक दृष्टि से लेखन एवं विमर्श।

Posted On by &filed under राजनीति.


डॉ. राजीव कुमार रावत

पिछले दिनों लखनऊ में एक मूर्ति तोड़ दी गई और मूर्ति की पथरीली, बेदिली, मानसिकता और मजबूत हो गई। यह पहली बार देखा है कि कोई मूर्ति आनन-फानन में इतनी जल्दी लगा भी दी गई जिससे मूर्ति के समर्थक शांत हो जाएं। अब उन समर्थकों से अथवा मूर्ति से मथुरा की बसों को, जिनमें आग लगा दी गई और प्रदेश में करोड़ों रुपये के सामानों की तोड़-फोड़ की गई, की भी भरपाई की जाए। भाई साधारण सी बात है कि किसी ने मूर्ति तोड़ी-वह लगा दी गई है तो अब आप उस नुकसान की भरपाई करिए जो आपने किया है- दोनों ही कृत्य पागलपन के थे और पागलों के साथ एक सा ही इलाज होना चाहिए, एक सा ही व्यवहार होना चाहिए। मूर्ति के होने न होने से पहले भी कोई फर्क किसी की जिंदगी की वेहतरी अथवा बदहाली में नहीं था, लेकिन जनता को बसों, जीपों, सड़कों, अस्पतालों, पानी, बिजली, स्कूलों आदि के होने न होने से फर्क पड़ता है।

अब सभी नेता, प्रशासनिक अधिकारी, मुख्यमंत्री आदि रटे-रटाए भाषण देंगे एवं प्रलाप करेंगे और कर रहे हैं। सतही वैचारिक द्वंद के पहलवानी खेल होंगे कि मूर्ति क्यों तोड़ी गई, फलां, फलां….। पर एक प्रश्न भय से कोई नहीं उठाएगा कि मूर्ति लगी क्यों थी? क्योंकि जिन्होंने मूर्ति तोड़ी है और जिन्होंने बसें फूंकी हैं, वे दोनों ही किस्म के पागल ऐसे प्रश्न उठाने वाले को दुनिया से उठा देंगे और कुछ लोग उस मृतात्मा की मूर्ति लगा देंगे। हमारा इतिहास गवाह है कि हमने ऐसे ही मूर्तियों का एक बहुत बड़ा बाजार विकसित किया हैं,। हमारी राजनीतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना नें शिक्षा और विकास के साथ ही सुंदर से सुंदर मूर्तियां गढ़ने में महारत हासिल की है और बददिमाग, निर्लज्ज, संवेदनशून्य मदमस्त पाशविक मानसिकता के लोभी, ढोंगी समस्त अवगुणों से सुसज्जित व्यक्तित्व तैयार किए हैं। आपको और कुछ दिखाई ही न दे और आप आंखें बंद करलें इसलिए तो हमने इतने सारे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च, संसद, विधान भवन, राष्ट्रपति भवन, राजनिवासों, मुख्यमंत्री निवासों की ————- की श्रृंखला तैयार की है जिनमें गरीब देश के भाग्यविधाता, धर्मगुरु,——- रहते हैं और अब हम उनकी मूर्तियां बना रहे हैं, तोड़ रहे हैं।

पर हमें दोनों ही प्रश्नों पर बात करने का हक है कि मूर्ति तोड़ी क्यों गई और उससे भी पहले लगाई क्यों गई? पहले बात तोड़ने की- सबने एक दम से मान लिया और शायद सच भी हो कि किसी विरोधी राजनीतिक दल के किसी सिरफिरे ने इस काम को अंजाम दिया हो। अगर ऐसा नहीं है तो वह व्यक्ति हो सकता है उस मूर्ति का ही समर्थक हो और अपनी आशाओं, आकांक्षाओं के पूरा न हो पाने की कुंठा ने उसे निराशा की उस हद तक ला दिया कि उसने वह प्रतीक तोड़ दिया जिससे उसे सबसे ज्यादा आशा थी। आप याद करिए क्या भारतीय फिल्मों में नायक की मां आदि पात्र आशाओं के टूटने पर अपने-अपने भगवानों की मूर्ति नहीं तोड़ते या नास्तिक नहीं हो जाते और ऐसे-ऐसे संवाद बोलते हैं जिन्हें नवयुवक बड़ी शान से घरों, स्कूलों चाय की दुकानों पर सिगरेट हाथ-मुंह में लिए सगर्व दोहराते हैं। इसलिए मेरा मानना है और मुझे मूर्ति लगाने वालों और तोड़ने वालों, दोनों की ही जिद से अलग एक नागरिक के नाते यह हक मुझे है कि मैं क्या मांनू और क्या नहीं, जबतक कि मेरी कोई मान्यता किसी का-किसी भी रुप में, मेरा भी, अहित नहीं कर रही हो- कि क्या मूर्ति न लगाने से कोई फर्क पड़ता, और लगी रहती तो भी कोई फर्क नहीं पड़ने जा रहा था और टूट गई तो भी कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए था, किंतु और नई लगा दी गई इससे बहुत बड़ा फर्क पड़ गया। इस लगा देने से वह लोकतांत्रिक अवसर समाज और देश ने गवां दिया जब मूर्ति लगाने और तोड़ने की जंगली मानसिकता पर, राजशाही और सत्ता के तुगलकी हठों पर और कल्याणकारी उपायों के बजाय मदमस्त सत्ता की निरंकुशता पर कोई सार्थक चर्चा हो सकती थी। यह हमारे खून की खराबी है और मैं भी अपना निर्मम पोस्टमार्टम जब भी करने बैठता हूं तो यही पाता हूं कि हमारे खून में कोई न कोई खराबी जरुर है कि हम आत्ममंथन की चुनौतियों के मौकों पर कबूतर की तरह कायर हो जाते हैं जो बिल्ली के आने पर आंखें बंद कर मान लेता है कि बिल्ली गई और बिल्ली बड़े प्यार से, दया भाव से उसका शिकार कर लेती है।

यदि आज चर्चा होती तो यह होती कि मूर्ति क्यों तोड़ी गई। मानसिकताओं पर बहस होती- मूर्ति पूजा एवं मूर्ति भंजकता दोनों ही निजी विषय हैं- वैचारिक विषमता में लोग घर परिवार के सदस्यों की फोटो हटा देते हैं, तोड़ देते हैं, आस्थाएं बदलने पर धर्मगुरुओं की फोटो, घर का वातावरण, गाड़ी में चलने वाली सीडी बदल जाती हैं, किंतु ये सब हमारे निजी मामले हैं और समाज को इनसे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है इस बात से कि जिन अरबों-खरबों रुपये की बरबादी मूर्तियां लगाने में की गई थी यदि वह और विकास के काम में लगता और प्रदेश की जनता को वह विकास अपने जीवन में दिखता तो शायद वह उस दल को, उसके नेता को वोट भी देती, और विकास करने के लिए सत्ता सौंपती. दिल भी देती और मूर्ति भी लगाती और फिर कोई नहीं तोड़ता। क्या आज तक शास्त्री जी की मूर्ति तोड़ी गई, राजेंद्र बाबू का कहीं अपमान हुआ, सरदार पटेल का चित्र कहीं से हटाया गया………. यह फेहरिस्त बहुत लंबी हो सकती है, आप सब समझते हैं। इस मूर्ति के टूटने-लगने से ज्यादा तो वह खतरनाक है जो विधान सभाओं और संसद में तोड़ा जाता है- जन भावनाओं का विश्वास, जनता के दिल में टूटता है नेताओं का अक्श, मन में खटकती है उनकी अकूत संपत्ति, बैभव और धेले की कमाई नहीं उनकी, न नौकरी न कोई रोजगार फिर भी हर साल संपत्ति में करोड़ों की वृद्दि……. और उस प्रदेश में एक दिन बिताना भी किसी नरक से कम नहीं होता, न बिजली है, न सड़क है, न अस्पताल हैं, न रोजगार है, न प्यार है, न संवेदनाएं हैं, भाई का दिल भाई के लिए नहीं धड़कता है, रोज सैंकड़ों कत्ल, हत्याएं बलात्कार, अपराध पहले भी होते थे आज भी हो रहे हैं और ऐसे में एक बेदिल मूर्ति अगर न भी रही तो क्या इसके प्रति भी इस समाज को, नेतृत्व को, प्रशासन को और उस तथाकथित सिरफिरे को वही उदासीनता नहीं दिखानी चाहिए जो अन्य विकट समस्याओं के प्रति है। देखना अगर वह व्यक्ति वास्तव में वही है जिस पर आरोप लगाए जा रहे हैं तो आगामी वर्षों में वह विधायक, सांसद, मंत्री अवश्य बनेगा–उसका भविष्य इस प्रदेश एवं देश में उज्ज्वल है। अरे जब माननीय फूलन देवी संसद की शोभा बढ़ा सकती हैं—कितनों के नाम लें— तो यह तो उदीयमान सितारा है, यह तो अभी इतिहास रचने के उत्साही, उन्मादी दौर में है।

मूर्ति हमारी आस्था का चरम होती है और उसके प्रति हम कुछ जुनूनी हो जाते हैं, कुछ जुनून जरुरी हैं जीने के लिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम होश खो बैंठें। मूर्ति लगाने का विचार देने वाले कीड़े-मकोड़े भृष्टाचारी चमचे भी इस मूर्ति तोड़ने वाले पागल जुनूनी चमचे से कम दोषी नहीं हैं, क्योंकि दोनों में से ही किसी का भी कोई व्यापक समाज हित का चिंतन नहीं है। उन्हें बस अपनी दुकान चमकानी है- और यह वही मानसिकता है कि सदन में तोड़-फोड़ और हंगामें के बाद वेतन भत्तों के बिल तुरंत पास हो जाते हैं, हॉल में साथ-साथ कॉफी पीते हैं, और अपनी अपनी जीत का जश्न रात को साथ मनाते हैं- और हम मूरख बन जाते हैं और इनकी मूर्तियों के आगे पीछे जीवन स्वाहा कर देते हैं, फैंकी हड्डियों को चबा-चबा कर अपने ही मसूड़ों के खून से अपनी प्यास बुझाते हैं। अरे, भाई हम कब तक ऐसे रहेंगे।

अगर एक कोई सही हिसाब लगाया जाए, हांलाकि मुर्दों के देश में किसी से ऐसी उम्मीद है नहीं- कि जितना खर्चा मंदिर-मस्जिद विवाद के बाद वहां की सुरक्षा में खर्च हो चुका है, उससे प्रदेश में कितना विकास कार्य हो सकता था- और मास्टर स्वर्गीय काशीराम जी तो मूर्तिपूजा एवं धार्मिक कट्टरता के इतने विरोधी थे, कि मुझे याद है उन्होंने एक वक्तव्य दिया था, जिसकी बड़ी आलोचना हुई थी, कि वहां एक सार्वजनिक शौचालय बना दिया जाए। और उनके ही नाम पर उनके उत्तराधिकारियों ने उनकी और जीवित लोगों की मूर्तियां खड़ी कर दीं। यह वही नशे की आदत है जिससे हम हजारों वर्ष गुलाम रखे गए।

जीवित व्यक्ति की मूर्ति लगाने का और कोई उदाहरण शायद इतना विवादास्पद नहीं हुआ। जब व्यक्ति छोटा हो जाता है तो मूर्ति बड़ी बनानी पड़ती है और जीवित व्यक्ति बड़ा हो, संवेदनशील हो, नेतृत्वशील हो तो पत्थर की मूर्ति का होना न होना कहीं आवश्यक नहीं होता। हमें धड़कते इंसानी दिलों की जरुरत है न कि पत्थर दिल मूर्तियों की, जो प्रदेश का विकास करें, बुनियादी सुविधाओं के लिए प्रयास करें, जनता का जीवन खुशहाल हो, वर्ना आज एक मूर्ति टूटी है, फिर लगी है, आने वाले कल में औरों की मूर्तियां लगेंगी और टूटेंगी- और बदहाल प्रदेश के राजनीतिक गुड़ों, बेरोजगार चमचों, बाहुबलियों को एक और रोजगार मिल जाएगा। ये मूर्ति तोड़ने वाले और बनाने वाले आंख और अक्ल दोनों से अंधे होते हैं जिन्हें देश-प्रदेश की बदहाली नहीं दिखती, अपने भगवानों के सुखों, आरामों एवं बढ़ती अकूत संपत्ति नहीं दिखती, आम जनता के खाली पेट और रुखी आंखें नहीं दिखतीं, इन्हें सिर्फ मूर्तियां दिखती हैं, सत्ता रस की टपकी हुई बूंदे अपनी लगती हैं और आने वाले समय में और नए पार्क, नए जानवर, और भृष्टाचार के शीर्ष पर लगने वाली अपनी मूर्तियों में अपना व्यापार दिखता है, और स्वयं मूर्ति मंर होने का इतना भयंकर शौक दिखता है, कि वह वोटर ठगा सा रह जाता है जिसने इन्हें सत्ता दी। इनके क्रूर अट्ठहासों पर, मूर्तियों की विशालता और इनके संवेदी बौनेपन पर उसकी आंखें गीली भी नहीं हो पाती, उनमें पानी भी नहीं उतरता- और वह फिर किसी और मूर्ति की शरण में चला जाता है। इन्हें किसी को गांधी के विचार, जीवन दर्शन नहीं चाहिए, गांधी की मूर्ति और नोट चाहिए। अरे, मूर्ति बनवाने वालो और तोड़ने वालो – आप दोनों ही नहीं जानते कि आप क्या कर रहे हैं- बिल्लियों को लड़ाकर बंदर आनंद ले रहा है। जिनकी मूर्ति के लिए आप लड़ रहे हैं वे सब अंदर से एक हैं, उनमें कोई मतभेद नहीं है, दोनों ही धृतराष्ट्र के दाएं और बाएं बैठे अपनी-अपनी कीमत बढ़ाने में लगे हैं, अपने केस खत्म कराने में लगे हैं-और हमारा आपस का संघर्ष ही उन्हें शक्ति दे रहा है, वे तुम्हें ऐसे ही मूर्तियों और प्रतीकों में उलझाते रहे हैं, उलझा रहे हैं और आगे भी उलझाते रहेंगे- जिससे कि आप उनसे कोई सवाल न करें, उनकी मदमस्त सत्ता को कोई चुनौती न दे दें, उनकी खरबों की संपत्ति को कहीं आपकी नजर न लग जाए, क्यों कि वे तभी तक तो सत्ता में बने रह सकते हैं जब तक कि आप आपस में ही लड़ते , मरते खपते रहेंगे और थक हार कर कोई सस्ता नशा कर सो जाएंगे- अगले दिन फिर जगेंगे सिर्फ लड़ने के लिए- एक मूर्ति बनाने के लिए, दूसरा उसे तोड़ने के लिए। ये उस समझदार आदमी की तरह हैं जिसे अनायास ही जिन्न मिल गया था जो हर समय काम मांगता था और काम न देने पर खा जाने को आतुर हो जाता था, आखिर में उस आदमी ने उसे नारियल के पेड़ पर चढ़ने-उतरने का काम दे दिया, और उसकी सत्ता सुरक्षित हो गई- वह बलवान जिन्न आज भी नारियल के पेड़ पर चढ़-उतर रहा होगा। इन समझदारों ने भी जनता-जिन्न को मूर्तिया बनाने-तोड़ने का काम दे दिया है। इसलिए यहां प्रश्न किसी की भी पत्थर की मूर्ति का नहीं है बल्कि मूर्ति की सी पथरीली मानसिकता का है जो सब तरह से संवेदनशून्य है,जनता के दुख-दर्द से दूर है।

Leave a Reply

5 Comments on "प्रश्न पत्थर की मूर्ति का नहीं, मूर्ति की सी पथरीली मानसिकता का है"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
अखिल भारतीय युवा चारण महासभा
Guest
अखिल भारतीय युवा चारण महासभा
Dr rajiv kumar rawt प्रवक्ता.कॉम पर आपने “अरे चारण भाटो अब तो आँखे खोलो” जो लेख पोस्ट किया है उसमे आपने चारणों की तुलना भाटो से की है। मै अखिल भारतीय युवा चारण महासभा के सदस्य के तौर पर और एक चारण होने के कारण मै आपके लेख का विरोध करता हूँ और आपसे अपने शब्द वापस लेने की मांग करता हूँ । लगता है राजीव जी आपको चारण शब्द का अर्थ भी मालूम नही है वरना ऐसी हिमाकत आप नही करते । वेद कालीन समय से ही सत्य की रक्षार्थ हम चारणों ने कुर्बानियां दी है अपनी जान की… Read more »
इंसान
Guest
मुझे खेद है कि डॉ. राजीव कुमार रावत द्वारा लिखे आलेख “अरे चारण भाटो आँखे खोलो” में “चारण” शब्द के उपयोग के कारण उत्तेजित आपको व्यक्तिगत रूप से ठेस पहुंची है। लेख के साथ संलग्न चित्र में “चारण” शब्द “सामान्य” अथवा जातिवाचक संज्ञा न कि व्यक्तिवाचक संज्ञा का सूचक है। इसी प्रकार “चारण भाटो” में राजनैतिक सन्दर्भ में आधुनिक “भाटों” में “चरण चूमने” की विशेषता देखी गई है न कि चारण और भाटों में किसी प्रकार का संबंध अथवा समानता दिखाई गई है। दूसरी ओर गूगल में मई २०१४को सम्मिलित अखिल भारतीय युवा चारण महासभा द्वारा प्रवक्ता.कॉम पर २०१२ के… Read more »
डॉ राजीव कुमार रावत
Guest
डॉ राजीव कुमार रावत
सभी सुधी पाठकों से निवेदन है कि मैंने अपने लेख में शब्द प्रयोग के विषय में पर्याप्त स्पष्टीकरण संपादक प्रवक्ता को भेज दिए हैं और साथ ही श्री नरेन्द्र बारेठ जी को भी उनकी कापी मेल की है जिसे उन्होंने स्वीकार कर क्षमादान प्रदान करने की उदारता का परिचय दिया है। मेरे लेखन के साथ लेखकीय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं विस्तृत आयाम भाव के पक्षधर श्री इंसान एवं अन्य लेखक बंधुओं का मैं आभारी हूं कि उन्होंने इस कठिन समय में मेरा साथ दिया है क्योंकि मामला कुछ था ही नहीं इसलिए मैने इस शब्द के इतिहास आदि के प्रति… Read more »
MAHENDRA GUPTA
Guest
आईएम मूर्तियों को लगाने ,तोड़ने,फिर लगाने में न तो लगाने और न तोड़ने वालों का पैसा लगा था,जनता का पैसा था,तो जनता को यह सीख लेनी चाहिए की ऐसे सिरफिरे नेताओं को हम चुने या नहीं, आखिर इन बुतों को खड़ा करने का अर्थ ही क्या है,इन्हें लगाकर आप अमर होने का ख्वाब देखते हैं तो अब इन घटनाओं से समझ लेना चाहिए की लोगों के मन में आपके प्रति कितना लगाव है. इतनी जगह पर लगे बुतों को देखकर केवल यही राहत होती है कि ये बुत बेचारे पक्षियों के बैठने उनके विश्राम,मल त्याग का अच्छा केंद्र तो हैं,कितने… Read more »
binu bhatnagar
Guest

बहुत अच्छा लेख काश मूर्ति लगाने वाले और तोडने वाले लोग ये बात समझ पाते।

wpDiscuz