लेखक परिचय

वीरेंदर परिहार

वीरेंदर परिहार

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वीरेन्द्र सिंह परिहार

देश के ख्याति-लब्ध अधिवक्ता और भाजपा के राज्यसभा सासंद रामजेठामलानी का गत दिनों का यह कथन काफी तूल पकड़ चुका है कि राम एक बुरे पति थें। गीता में कृष्ण ने कहा है-बड़े लोग जैसा आचरण करते है,आम लोग उसका अनुकरण करते है। अब जहां तक राम के सीता-निष्कासन का प्रश्न है,वह नि:सन्देह प्रजा के आचरण से जुड़ा प्रश्न है। जेठामलानी की यह बात भी तथ्यत: गलत है, कि कुछ मछुआरों के कहने से सीता ने राम को निकाल दिया था। यदयपि तुलसीदास ने अपनी रामचरित मानस में किसी धोबी के द्वारा सीता पर आक्ष्ेाप लगाए जाने से राम द्वारा उनके निष्कासन का प्रश्न सामने आया। पर असलियत यह है कि मर्यादा के चलते तुलसीदास ने बहुत सारी सच्चाइया नहीं लिखी है। जैसे इन्द्र के पुत्र जयंत का ही प्रसंग है, जिसमें उन्होने सीता के चरणों में चाेंच मार कर भागने की बात लिखी है। पर असलियत में बाल्मीक ने रामायण में जैसा लिखा है कि वह सीता के स्तनों में चोंच मार कर भागा था। इसी तरह से सच्चार्इ बाल्मीक ने अपनी रामायण में जो लिखी है, कि असलियत में सीता को लेकर जन-सामान्य में प्रवाद फैला था।प्रसंग कुछ ऐसा है-श्रीराम ने अपने सखा भद्र से पूछा-आजकल किन बातों की चर्चा नगर और राज्य में विशेष रूप से होती हैं। इस पर भद्र ने कहा कि आपके बारे में सदैव अच्छी बाते और रावण-वध संबंधी चर्चा ही अधिक होती है। इस पर राम ने कहा कि ऐसा नहीं-शुभ और अशुभ दोनो ही बातें बताओ, जिसमें मै शुभ को ग्रहण कर सकूं और अशुभ कृत्यों का त्याग कर सकूं। इस पर भद्र ने कहा रावण, सीता को बलपूर्वक लंका में ले गया और उसने सीता को अपने अंत:पुर के क्रीडा-कानन अशोक वाटिका में रखा। इस प्रकार वह राक्षसो के वश में बहुत दिन रही तो भी श्री राम उनसे घृणा क्यों नही करते है?अब हम लोगो को भी सित्रयों की ऐसी बातें सहनी पडे़ंगी, राजा जो करता है, प्रजा भी उसी का अनुकरण करने लगती है।

‘अस्माकमणि दारेषु सहनीयं भविष्यति।

यथा हि कुरूते राजा प्रजस्त मनुवंर्तते।।

राम के पूछने पर वहा उपसिथत सभी सखाओं ने इसका समर्थन किया। तब राम ने भाइयों के समक्ष यह कहा-

पौरापवाद: सुमहांस्तथा जनपदस्प च।

वर्तते मणि वीभत्सा सा में मर्माणि कुन्तति।।

अर्थात इस समय पुरवासियो और जनपद के लोगो में सीता के संबंध में महान अपवाद फैला है। मेरे प्रति भी उनका बड़ा घृणापूर्ण भाव हैं जो मेरे मर्मस्थल को विर्दीण किए देता है। तब राम ने सीता को निकालने का फैसला किया, ओर वह इसलिए कि यदि सीता को राम ने अपने साथ रखा तो प्रजा का आचरण भ्रष्ट होगा, उसका चरित्र पतित होंगा। इसलिए राम ने प्रजा में नैतिक और चारित्रिक मूल्य बनाए रखने और जनांकाक्षा के चलते ऐसा कठोर कदम उठाया। राम राजा होते हुए भी सच्चे जनतांत्रिक थे, लोक आराधक थे। जैसा कि आदि कवि ने लिखा-

‘स्नेहं दया च सौख्यं यदि जानकीउपि ।

लोकराधानय मुच्यते नासित में व्यथा।।

यानी कि स्नेह, दया,मित्र, जानकी सभी कुछ मै लोक आराधना के लिए छोड़ सकता हू। उनका लोकतांत्रिक रूप इन शब्दों में देखा जा सकता है, जब भरे दरबार में राम कहते है।

‘जो अनीति कुछ भाषौ भार्इ।

तो मोंहि बरजहू भय बिसरार्इ।।

जैसा कि गांधी का कहना था कि लोकतंत्र की कसौटी यही है कि जनता अपने शासको के गलत कृत्यों का किस हद तक प्रतिरोध कर पाती है, कुछ ऐसे ही राम की अवधारणा है। बड़ी बात यह कि शासक का पहला कर्तव्य अपनी प्रजा के प्रति है। परिवार, पति-पत्नी के प्रति, पुत्रो के प्रति बाद में है। नि:सन्देह यदि दोनो हितो में टकराव है, तो सर्वप्रथम प्रजा के हित, उनकी आकांक्षा महत्वपूर्ण है। जैसा कि कहा भी गया है कि प्रजासुखे सुखं राज्ञ:, प्रजानां हितै हितम। , कुछ इसी तरह गांधी भी अपने पुत्रों को बढ़ावा नहीं दे पाए, क्योकि उनकी दृषिट में इस देश की करोड़ो-करोड़ो जनता थी। पर जिनकी दृषिट में अपनी औलादे या परिवार था, जिसके चलते वंशवाद का कितना घातक परिणाम इस देश केा भुगतना पड़ रहा है, यह बताने की जरूरत नहीं है। जिन्होने लोकतंत्र का कुछ ऐसा स्वरूप दे-दिए है कि येन-केन प्रकारेण बहुमत पा लेना ही सब कुछ है, आम जन का हित, उसकी आशा-आकांक्षा के कोर्इ मायने नहीं है।

यह भी देखा जाना जरूरी है कि राम क्या समुचित एक बुरे पति थे? क्या इसके दृषिटगत राम ने कभी सीता को प्रताडि़त किया, उनके साथ अत्याचार किया, अथवा उन्हे अपमानित किया? ऐसा तो कोर्इ प्रसंग उपलब्ध है नहीं। यहा तक कि जब रावण सीता का हरण कर लेता है, तो राम की स्थिति कैसी हो जाती है, वह कितने दु:खी हो जाते है, उस समय उनका एक प्रेमी का रूप सामने आता है कि सचमुच पत्नी को किस हद तक प्रेम करना चाहिए। पर राम कोर्इ ऐसे प्रेमी नहीं है, कि वह मात्र रोएं, चीखे-चिल्लाएं बलिक उनका सीता के प्रति उनका प्रेम उन्हे दुर्धष रावण से संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। जेठामलानी के शब्दों में एक बुरा पति त्रैलोक्य-विजयी रावण से समुद्र लांघ कर युद्ध करने पहुंच जाता है।

राम को लेकर महात्मा गांधी का कहना था कि राम हिन्दुओं के लिए ही नहीं, एक महापुरूष के नाते मुसलमानों के भी पूज्य है। वह रामराज्य की इसीलिए बात करते थे, कि राम जैसे राजा या शासक हो, जिनके लिए अपने हितो की तुलना में प्रजा का हित ज्यादा महत्वपूर्ण है। राम अच्छे पति थे कि नहीं, लेकिन इतना तो तय है कि सीता को वन-निष्कासन के पश्चात उन्होने एकाकी जीवन जिया। उनके जीवन में कोर्इ दूसरी स्त्री नहीं आर्इ। यहां तक के अश्वमेध यज्ञ में जब यह कहा गया कि बिना पत्नी के यज्ञ नहीं हो सकता तो राम ने कहा कि इसके लिए सोने की सीता बना ली जाएं। पर राम के जीवन में सीता को छोड़कर दूसरी स्त्री नहीं आ सकती। यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि जब राम ने लक्ष्मण को सीता को लेकर वन में छोड़ने के लिए कहा तो बाल्मीक रामायण के अनुसार उन्होने स्पष्ट रूप से कहा था कि गंगा के उस पार बाल्मीक ऋषि के आश्रम के पास छोड़ना है। यानी एक तरह से उन्होंने सीता को बाल्मीक के आश्रम में भेजा था।

बिडम्बना यह कि राम जेठामलानी जैसे विरासत और अपनी परंपरा से कटे लोगो और अक्ल का जिन्हे अजीर्ण हो गया है,ऐसी बाते कैसे समझ में आ सकती है। बेहतर होता है कि वह पूर्व राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम की इन बातों को समझते-अपने नायकों उनकी शौर्य गाथाओं, साहसों, पराक्रमों और अतीत की विजयों की स्मृति को जीवंत बनाकर देश महान बनता है। फिर भी यदि जेठामलानी जैसे लोग कुछ समझने को तैयार नहीं है, तो अपने नाम के आगे राम क्यों लगाए है?

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7 Comments on "राम बनाम राम जेठामलानी"

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शिवेंद्र मोहन सिंह
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शिवेंद्र मोहन सिंह

जेठमलानी जी के मष्तिष्क में कलयुग की कालिमा भरी हुई है, इससे ज्यादा वो और कुछ सोच समझ नहीं सकते हैं। अन्यथा निरर्थक विचार रखने का कोई औचित्य नहीं है।


सादर,

डॉ. राजेश कपूर
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डा.राजेश कपूर
भावों को समझने के लिये एक भावपूर्ण ह्रिदय की जरूरत होती है. जो स्वयम रेत की तरह शुष्क, रस विहीन हो, वह दूसरे की पीडा व संवेदनाओं को कैसे समझ सकता है ? जेठमलानी बेचारे रेत जैसे रूखे-सूखे व्यक्ती हैं. जीवनभर न्यायालयों में शुष्क तर्क से जूझते रहे. राम और रामायण को समझने के लिये एक भावों से भरे दिल की जरूरत है जो कि उनके पास नहीं है. * एक और बात स्मर्णीय है. कुछ दवायें ऐसी हैं जिन्हे खाने के बाद संवेदनायें मर जाती हैं. करुणा, दया, ममता, प्रेम के भाव सदा के लिये समाप्त हो जाते हैं.… Read more »
parshuramkumar
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भारतीय संस्कृति में समता-समरसता के एक आदर्श आराधक देवता मर्यादा पुरुषोतम राम हैं जो मानव भी है और देवता होने के कारण करोड़ों के आराध्य हैं। सैकड़ों धार्मिक गतिविधियाँ, मान्यताएँ, विश्वास, लोक-कथाएं उनके पावन चरित्र से जुड़ी हैं। जहाँ वह राजा दशरथ और माता कौशल्या के तेजस्वी आज्ञाकारी पुत्र हैं वहीं वह वाल्मीकि के राम हैं। जन-जन के मर्यादा पुरुषोतम, समता-समरसता के प्रतीक, सुशासक राजा राम।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक मा. श्री गोलवलकर जी ने एक स्थान पर लिखा है ‘रामचंद्र के जीवन में मानवता की महानता है, आज देश पर क्षोभ की घटनाएं घिरी है और जनता अनुभव… Read more »
parshuramkumar
Guest
,-भारतीय संस्कृति में समता-समरसता के एक आदर्श आराधक देवता मर्यादा पुरुषोतम राम हैं जो मानव भी है और देवता होने के कारण करोड़ों के आराध्य हैं। सैकड़ों धार्मिक गतिविधियाँ, मान्यताएँ, विश्वास, लोक-कथाएं उनके पावन चरित्र से जुड़ी हैं। जहाँ वह राजा दशरथ और माता कौशल्या के तेजस्वी आज्ञाकारी पुत्र हैं वहीं वह वाल्मीकि के राम हैं। जन-जन के मर्यादा पुरुषोतम, समता-समरसता के प्रतीक, सुशासक राजा राम।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक मा. श्री गोलवलकर जी ने एक स्थान पर लिखा है ‘रामचंद्र के जीवन में मानवता की महानता है, आज देश पर क्षोभ की घटनाएं घिरी है और जनता अनुभव… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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लेखकः “राम अच्छे पति थे कि नहीं, लेकिन इतना तो तय है कि सीता को वन-निष्कासन के पश्चात उन्होने एकाकी जीवन जिया। उनके जीवन में कोइ दूसरी स्त्री नहीं आइ।” उन्हें भी अपार दुःख ही हुआ। और सीता जी भी उसी दुःख को सहती ही रही।उसने जाकर अपने पिता जनक से कोई न्याय दिलवाने के लिए, मांग की। राम एक आदर्श राज धर्म का निर्वाहन कर रहे थे। अन्यथा, करने पर राम को आदर्श शासक के रुप में आज स्मरण ना किया जाता। इससे विपरित इन्दिरा का, अपने बेटे सन्जय के लिए पक्शपात सभी जानते हैं, पर इन्दिरा को राम… Read more »
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