लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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-आलोक कुमार-   education

बिहार में सुशासन का प्रचार तो खूब किया जाता है पर बिहार की जमीनी हकीकत ठीक इस प्रचार के विपरीत है। आईए बात की जाए सुशासन के एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू “प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा” की। बिहार में प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा की दिशा और दशा दोनों ठीक नहीं है। माध्यमिक शिक्षा की बदहाल स्थिति को तो खुद बिहार सरकार के आंकड़े साबित करते हैं। आंकड़ों के अनुसार 5500 ग्राम पंचायतों में अब भी एक भी माध्यमिक स्कूल नहीं है। राज्य में 8400 से अधिक ग्राम पंचायत है, जिनमें से 5500 में एक भी माध्यमिक स्कूल (सेकेंडरी) नहीं है। यानि कि 65 प्रतिशत से भी ज्यादा पंचायतों में एक भी माध्यमिक स्कूल नहीं है।

जबकि केन्द्र सरकार सर्वशिक्षा अभियान और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (आरएमएसए) के तहत हजारों करोड़ रुपये राज्यों को मुहैया कराती है। आरएमएसए के तहत 949 मध्य विद्यालयों को उन्नत किया जाना है। केंद्र ने आरएमएसए के तहत पांच किलोमीटर की परिधि में कम से कम एक माध्यमिक स्कूल खोलने का लक्ष्य रखा है। बिहार इन लक्ष्यों की प्राप्ति से कोसों दूर है। बिहार के अधिकतर गांवों में प्राथमिक शिक्षा की बुनियादी सुविधाएं खोजे नहीं मिलती हैं और अगर प्राथमिक शिक्षा का साधन उपल्ब्ध है भी तो वो केवल दिखावे के लिए ही है। प्राथमिक शिक्षा की इस दयनीय स्थिति के बारे में ग्रामीण इलाकों के लोग कहते हैं कि “ सरकार चाहे किसी की भी हो, लालू-राबड़ी की या नीतिश कुमार की, किसी ने भी प्राथमिक शिक्षा की स्थिति सुधारने की तरफ ध्यान नहीं दिया। हमें अब किसी सरकार से कोई उम्मीद नहीं है कि कोई इधर ध्यान देगा ! हमारे यहां सही मायनों में प्राथमिक शिक्षा नाम की कोई चीज नहीं है। इसीलिए हमारे बच्चे अभी भी मजदूरी करने या गाय-गोरू चराने के लिए विवश हैं प्राथमिक शिक्षा की तरफ सरकार की ओर से ध्यान दिया जाता तो हालात कुछ अलग होते।’

बिहार के ज्यादातर इलाकों, विशेषकर ग्रामीण इलाकों, में अशिक्षा का साम्राज्य फैला हुआ है। बिहार में अधिकतर प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की संरचनाएx अपनी बदहाली की व्यथा बयां कर रही हैं। पटना, नालंदा, गया, जहानाबाद और अरवल जिले के लगभग 30 गांवों के भ्रमण, प्राथमिक / माध्यमिक शिक्षा के संरचनाओं के अवलोकन व ग्रामीणों से साक्षात्कार के पश्चात एक चौंकाने वाली बात ऊभर कर आयी कि ज्यादातर गांवों में जो बच्चा सबसे उच्च शिक्षा प्राप्त है वह भी मात्र छठी कक्षा पास है। आज यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है कि आज सरकारी प्राथमिक / माध्यमिक विद्यालय केवल दोपहर के भोजन देने का केन्द्र बनकर रह गए हैं । शिक्षा के इन केन्द्रों में शिक्षा देने के अलावा अन्य सारे कार्य पूरी तन्मयता से किए जाते हैं । बिहार में प्राथमिक / माध्यमिक विद्यालयों पर नजर रखने के लिए प्रखंड संसाधन केन्द्र की की शुरुआत की गई थी परन्तु यह बिहार का दुर्भाग्य ही है कि आज रक्षक ही भक्षक कि भूमिका में है। जिस केन्द्र की स्थापना इस आशा का साथ की गई थी कि यह पूरे प्रखंड के शिक्षकों का पठन पाठन के क्षेत्र में मार्गदर्शक की भूमिका निभायेगा वह केन्द्र आज पूरी तरह से भ्रष्टाचार में आकंठ डूब गया है। इस बात से समस्त बिहार भली-भाँति परिचित है कि आज बिहार में सर्वशिक्षा अभियान अपने लक्ष्य से भटक चुका है। इस भटकाव मे में भ्रष्टाचार की कितनी भूमिका है यह शायद बिहार के शीर्ष- सत्ता से छुपा हुआ नहीं होगा !

लगभग दो -ढाई वर्ष पहले नॉबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री श्री अमर्त्य सेन द्वारा पटना में प्रस्तुत एक सर्वेक्षण -रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में प्राथमिक / माध्यमिक शिक्षा के उत्थान की राह में शिक्षकों और विद्यालय-भवन संबंधी बुनियादी ज़रूरतों का अभाव ही सबसे बड़ी रूकावट है। रिपोर्ट में कहा गया था कि राज्य के विद्यालयों में शिक्षकों के पढ़ाने और छात्रों के सीखने का स्तर अभी भी नीचे है। 76 पृष्ठों की इस रिपोर्ट में आंकड़ों की भरमार थी लेकिन निष्कर्ष में चार मुख्य बातें कही गईं थीं :

१. पहली ये कि सरकारी प्राथमिक / माध्यमिक विद्यालयों में इन्फ्रास्ट्रकचर यानी बुनियादी ज़रूरतों वाले ढांचे का घोर अभाव यहां स्कूली शिक्षा की स्थिति को कमज़ोर बनाए हुए है।

२. दूसरी बात ये कि शिक्षकों और ख़ासकर योग्य शिक्षकों की अभी भी भारी कमी है। जो शिक्षक हैं भी, उनमें से अधिकांश स्कूल से अक्सर अनुपस्थित पाए जाते हैं।

३. निरीक्षण करने वाले सरकारी तंत्र और निगरानी करने वाली विद्यालय शिक्षा समिति के निष्क्रिय रहने को इस बदहाल शिक्षा-व्यवस्था का तीसरा कारण माना गया है।

४. चौथी महत्वपूर्ण बात ये है कि बिहार के स्कूलों में शिक्षकों के पढ़ाने और बच्चों के सीखने का स्तर, गुणवत्ता के लिहाज़ से बहुत नीचे है।

इस रिपोर्ट में कहा गया था कि बिहार सरकार वयस्क साक्षरता, ख़ासकर स्त्री-साक्षरता बढ़ाकर प्राथमिक / माध्यमिक शिक्षा के प्रति ग्रामीण जनमानस में रूझान बढ़ा सकती है। इस रिपोर्ट के प्रस्तुतिकरण को एक साल से ज्यादा हो गए लेकिन प्रदेश की सरकार की तरफ़ से इस में सुझाए गए उपायों पर अमल करने की अब तक कोई पहल नहीं हुई है। विगत वर्ष ही बिहार को लेकर जारी एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार करीब 96.4 प्रतिशत विद्यालयों में शिक्षक-छात्र अनुपात ठीक नहीं है। 52.3 प्रतिशत विद्यालयों में शिक्षक-क्लास रूम का अनुपात ठीक नहीं है। 37 प्रतिशत विद्यालयों में अलग से शौचालय की व्यवस्था नहीं है। 40 प्रतिशत विद्यालयों में पुस्तकालय नहीं है। बच्चों की उपस्थिति में लगातार गिरावट आ रही है। लडकियों की उपस्थिति कम होती जा रही है, क्योंकि न तो विद्यालयों में शौचालय की व्यवस्था है और न पढ़ाई-लिखाई को लेकर ही संतोषजनक माहौल है। एक तरफ़ बिहार का गौरवशाली शैक्षणिक अतीत है और दूसरी तरफ़ आज इस राज्य का शैक्षणिक पिछड़ापन, ये सचमुच बहुत कचोटने वाला विरोधाभास है। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में साक्षरता का प्रतिशत 63.8 तक ही पहुंच पाया है, जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में काफ़ी कम है।

किसी भी राज्य के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण उसके जन-मानस विशेषकर उसके ” भविष्य (बच्चों ) ” का शिक्षित होना है। कभी बिहार पूरी दुनिया में शिक्षा का केंद्र हुआ करता था। लेकिन धीरे – धीरे शिक्षा के क्षेत्र में यह राज्य पिछड़ता चला गया। पिछले कुछ दशकों में यह राज्य शिक्षा के सबसे निचले पायदान पर जा पहुंचा है । वर्तमान सरकार ने भी इसमें सुधार के लिए कोई गंभीर और सार्थक प्रयास नहीं किया है । शायद ” सुशासन की राजनीत में बुनियादी शिक्षा का कोई स्थान नहीं है “ ! प्राथमिक / माध्यमिक शिक्षा को बेहतर बनाने की योजनाएं जमीन से अधिक फ़ाइलों और सचिवालय के कमरों में ही सिमटती नजर आती हैं ।

शिक्षा में गुणवता को लेकर सरकार के दावों की कलई तब खुलती नजर आती है जब यह पता चलता है कि बच्चे दाखिला सरकारी विद्यालयों में कराते हैं, जबकि विधिवत पढाई निजी विद्यालयों में करते हैं । सरकार ने बच्चों के लिए ऐसे शिक्षको की व्यवस्था की है जिसे कायदे से शिक्षक कहा नहीं जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अवस्थित अधिकांश विद्यालयों में आंकड़ों के बाजीगरी के खेल में नामांकन 90 प्रतिशत हो गए हैं, लेकिन आरंभिक शिक्षा से जुडे ग्रामीण क्षेत्रों के 47 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट टयूशन के भरोसे हैं। आधे से अधिक प्राइमरी पास बच्चे कक्षा दो की किताबें नहीं पढ पाते हैं। शिक्षा के अधिकार कानून-2009 के तहत प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा में गुणवत्ता सुनिश्चित करना राज्य सरकार की जिम्मेवारी है, लेकिन बिहार में शिक्षा को लेकर संरचनाओं की उपलब्धता, गुणवत्ता और सभी के लिए समान अवसरों का होना हमेशा से चिन्ता के विषय रहे हैं। हालांकि सुशासन की सरकार ने आँकड़े तो ऐसे प्रस्तुत किए हैं मानो बिहार में शिक्षा को लेकर क्रांति हो गई हो, परन्तु जमीनी सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। विकास को लेकर प्रदेश सरकार भले ही दावे करती रही है , किन्तु शिक्षा को लेकर प्रदेश सरकार की ईमानदारी एवं प्रतिबद्धता सवालों के घेरे में है। पूर्व की ही तरह बिहार में शिक्षा व्यवस्था आज भी अव्यवस्था और भ्रष्टाचार से ही ग्रसित है।

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