लेखक परिचय

अभिषेक रंजन

अभिषेक रंजन

लेखक कैम्पस लॉ सेन्‍टर, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में एल.एलबी. (द्वितीय वर्ष) के छात्र हैं।

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अभिषेक रंजन

विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश भारत में आम जनता की आवाज़ दबाने की एक बड़ी साजिश चल रही है | आम जनता से जुड़ी बातों से बेखबर और बेपरवाह सरकार अपनी नाकामियों के उजागर होने के भय से अपने ख़िलाफ हो रहे सभी विरोधों का दमन करने पर तुली हुई है | चाहे विषय राजनीतिक अधिकारों की हो या सामाजिक बराबरी की, जो भी मुद्दे सामाजिक सरोकारों से जुड़े तथा आम जन के कल्याण से सम्बंधित होते है उनसे सत्ता अपना कोई लेना देना नहीं रखना चाहती | लुट खसोट में व्यस्त तंत्र अपने ख़िलाफ उठ रहे हर एक आवाज़ को दबाने की हर संभव चालें चल रही है ताकि आमजन के ह्रदय में सुलगते आग अन्दर ही अन्दर दबी रहे | क्यूंकि फूटने पर जिस प्रकार का रूप और रंग आक्रोश की चिंगारी दिखाती है उससे व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लग जाते है |

कुछ इसी प्रकार से अपनी तानाशाही का परिचय सरकार की एक संस्था ट्राई(TRAI) ने आम जनता विशेषकर युवावर्ग की सक्रियता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वालें मोबाइल संदेशों (sms) पर सीमाबंदी(प्रति दिन १०० सन्देश भेजने की सीमा) लगा कर दी है | सुनने में पहले ठीक लगता है कि १०० सन्देश प्रति दिन के हिसाब से काफी है लेकिन यह किसके लिए काफी है? यह तय किये बिना, इसे समझे बिना ,इस सीमाबंदी के पीछे छिपे साजिश को जाने बगैर किसी भी प्रकार से निर्णय पर पहुचना की- सीमाबंदी करने का निर्णय उचित है ,सही नहीं है |

संयुक्त पारिवारिक व्यवस्था में जीनेवालें व्यक्ति जिनका सभी रिश्तेदारों से संपर्क रखना सामाजिक रूप से जरुरी है ,क्या उनके लिए यह निर्णय सही है? विद्यार्थी, जो अपनी क्षमता के दम पर कॉलेज की किसी सोसाइटी का संयोजक बनता है जिसमे उसे किसी भी प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करवाने हेतु 100 से ज्यादा सदस्यों से संपर्क में रहना पड़ता है ,क्या उसके लिए यह सही फैसला है? सामाजिक रूप से संवेदनशील और राजनीतिक दृष्टि से सक्रीय लोगों के लिए, जिन्हें 100 से ज्यादा लोगों से संपर्क रखना ही पड़ता है, क्या उनके लिए यह नीति सही है ? जबाब ढूंढने पर आम राय नहीं के पक्ष में ही होगी |

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है जो लोगों के साथ संवाद स्थापित कर जीवनयापन करता है | सविंधान भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीने की बात करता है | स्वाभाविक है लोगों के साथ मिलनसार स्वभाव के व्यक्ति का एक अच्छा रिश्ता बनता है जिसे जीवन-पर्यंत निभाने की कोशिश लोग करते है | अब जो व्यक्ति सामाजिक होगा उसके मोबाइल में स्वभावतः १०० से ज्यादा लोगों के सम्पर्क सूत्र होंगे जिनसे संवाद का एक सस्ता सुलभ और सुविधाजनक माध्यम मोबाइल मैसेज होते है | परन्तु वर्तमान नीति के कारण अब ये सामजिक प्राणी १०० से ज्यादा लोगों को मैसेज भी नहीं भेज सकते |

सोचने का विषय है कि मोबाइल हमारी, उसमे आने वाले खर्च हमारे जेब से, फिर कितनों को मैसेज भेजेंगे, यह तय करने वाली ट्राई कौन होती है ? अवांछित मैसेज को रोकने के बहाने व इससे होने वाली तथाकथित परेशानी का शिगूफा छोड़कर हमारे अधिकारों के उपर कैंची चलाने की कोशिस, एक बड़ी साजिश की तरफ इशारा करती है | जिस अवांछित मैसेज का बहाना बनाकर अपने तानाशाही इरादे को मैसेज की सीमाबंदी के सहारे हमपर थोपा जा रहा है उसकी वास्तविकता से आम जनता और बुधिजिवियों का बेखबर या जान बुझकर अंजान बने रहना चिंता का विषय है | जिन मैसेजों को अवांछित बताकर रोका जा रहा है वह कुछ लोगों के शिकायतों पर किया गया निर्णय है जिसे कतई भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए | हम इस बात का पुरजोर समर्थन करते है कि लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति की आवाज़ को सुनना और सम्मान देना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना होना चाहिए कि बातों को अधिकांश लोगों के हितों के ख़िलाफ मान ली जाये | यह भी तो हो सकता है कि कुछ लोगों को बेकार लगने वाली मैसेज किसी के लिए फायदेमंद हो | व्यावसायिक हितों की रक्षा खातिर हमारे ही अधिकारों में कटौती करती सरकार की इस निर्णय ने लोकतांत्रिक बहसों को बंद करने का सोचा समझा षड्यंत्र रचा है | बिना जनता की राय लिए और अन्ना व उसके इर्द गिर्द चल रहे बहसों के बीच चुपके से व्यक्तिगत मैसेज की लक्ष्मण रेखा खीच देना बिलकुल तर्कसंगत नहीं है| लोकतंत्र के मजबूत स्तम्भ- सुचना और संपर्क, से जुड़ी मोबाइल मैसेज (sms) की यह सीमाबंदी भ्रष्टाचार, भुखमरी, बेकारी,गरीबी से त्रस्त जनता के अन्दर फुट रहे गुस्से को दबाने की चाल के तहत लगाई गयी है, जिसका पुरजोर विरोध होना चाहिए |

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1 Comment on "मैसेजों की सीमाबंदी के बहाने मौलिक अधिकारों मे कटौती"

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sunil patel
Guest

वाकई यह मेसेज पर पाबन्दी लगाना दुर्भाग्यपूर्ण है.

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