लेखक परिचय

विनोद बंसल

विनोद बंसल

लेखक इंद्रप्रस्‍थ विश्‍व हिंदू परिषद् के प्रांत मीडिया प्रमुख हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक विषयों पर नियमित लेखन।

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 विनोद बंसल

26 जनवरी 1950 को, जब हमारा संविधान लागू हुआ, तब यह सोचा गया कि यह विश्व के चुनिन्दा देशों के अच्छे संवैधानिक प्रावधानों का सार तत्व है। संविधान सभा का यह मत था कि जिस रूप में यह लागू किया जा रहा है वर्तमान परिस्थितियों में तो सर्वोत्तम है किन्तु, समय-समय पर देश की परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन भी आवश्यक हैं। तब से अब तक विदेशों के संविधानों से नकल किये गये प्रावधानों में अनेक संशोधन तो हुए किन्तु अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आये। गणतन्त्र के मायने हैं गणों का तंत्र अर्थात जनता का शासन। आइये आज हम अपने गणतन्त्र की 63वीं वर्षगांठ पर कुछ विश्लेषण करें।

 

कभी पूरे विश्व के अंदर सोने की चिड़िया एवं विश्वगुरू कहा जाने वाला यह देश आज चारों तरफ जेहादी आतंकवाद, माओवाद, नक्सलवाद, भाषावाद एवं भ्रष्टाचार से जकड़ा हुआ है। अधिकांश राजनेता अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते वोट बैंक की भूख में सभी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय मूल्यों को खोते जा रहे हैं। विडम्बना यह है कि राष्ट्र की युवा शक्ति को भी जो संस्कार, आत्मनिर्भरता व राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाया जाना चाहिये उससे हम कोसों दूर हैं क्योंकि हमारी शिक्षा प्रणाली भी वोट केंद्रित राजनीति के दलदल में फंस गयी है। जहाँ पर मतदाता समूह मंय हैं, उस समूह पर किसी व्यक्ति, संस्था, जाति, मत-पंथ या सम्प्रदाय का बोलबाला है। राजनेता ऐसे समूहों को रिझाने के लिये कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। चाहे वह राष्ट्र विरोधी कदम ही क्यों न हो।

 

राजनैतिक संरक्षण के चलते अपराधियों को या तो पकड़ा ही नहीं जाता और यदि पकड़ भी लिया जाये तो कानूनी पेचीदगियों में उलझा कर सजा नहीं मिल पाती। न्यायालय द्वारा सजा दे दी जाये तो भी हमारे दुष्ट राजनेता राष्ट्रघातियों का संरक्षण जारी रखते हैं। आखिर कौन बचायेगा हमें आतंकवाद से?

 

गणतंत्र के 63वें वर्ष में हमें प्रण कर उपर्युक्त सभी समस्याओं के समाधान हेतु व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे तथा जनता की उसमें राजनैतिक जिम्मेवारी सुनिश्चित करनी होगी।

निम्नांकित बिंदु इस दिशा में कारगर हो सकते हैं:-

 

1. वोट डालने की अधिकार के साथ कर्तव्य का बोध।

2. अनिवार्य मतदान का प्रावधान।

3. यदि चुनाव में खड़े सभी प्रत्याशी अयोग्य हों तो किसी को भी न चुनने हेतु गोपनीय मतदान का अधिकार।

4. चुनाव में खड़े होने के लिये न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता हो।

5. राजनीतिज्ञों के रिटायरमेंट की भी कोई अवधि हो।

6. जाति, मत, पंथ, संप्रदाय, भाषा व राज्य के आधार पर वोट मांगने वालों के खिलाफ कार्यवाही तथा इस प्रकार के आंकडों के प्रकाशन पर रोक।

7. सांसदों व विधायकों द्वारा किये कार्यों का वार्षिक अंकेक्षण (ऑडिट) कर उसे सार्वजनिक करना अनिवार्य हो।

8. संसद व विधान सभाओं/विधान परिषदों से अनुपस्थित रहने वाले नेताओं पर कार्रवाई।

 

यदि राष्ट्र को खुशहाल देखना है तो प्रत्येक मतदाता को सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि जिस प्रकार शरीर के लिये भोजन व प्राणों के लिये वायु की आवश्यकता है उसी प्रकार राष्ट्र को आपके वोट की आवश्यकता है। कोई भी मतदाता अपने मताधिकार से वंचित नहीं रह पाये, इसके लिये हमें समुचित प्रबंध करने होंगे। हालांकि, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के आने से वोट डालना कुछ आसान एवं प्रामाणिक तो हुआ है किंतु इसे अभी और सरल करने की आवश्यकता है। आज कम्प्यूटर का युग है, हमें ऐसी प्रणालियां विकसित करनी होंगी जिससे देश का तथाकथित उच्च वर्ग, जिसमें उद्योगपति, प्रशासनिक अधिकारी, बुद्विजीवी व बड़े व्यवसायी इत्यादि आते हैं, अपनी सुविधानुसार मताधिकार का प्रयोग कर सकें। जहाँ पर एक ओर मतदाताओं को उनके मत की कीमत बतानी होगी, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे प्रावधान भी करने पड़ेंगे जिनसे प्रत्येक मतदाता इस राष्ट्र यज्ञ में अपनी एक आहूति सुनिश्चित कर सके। मतदाता पर यह दबाव न हो कि चुनाव में खड़े हुए किसी न किसी एक प्रत्याशी को चुनना ही है, लेकिन यह दबाव जरूर हो कि उसे वोट डालना ही है। वैलेट पेपर में या वोटिंग मशीन में प्रत्याशियों की सूची के अंत में एक बिंदू यह भी हो ”उपरोक्त में से कोई नहीं,” जिससे कि मतदाता यह बता सके कि सभी के सभी प्रत्याशी मेरे हिसाब से चुनने के योग्य नहीं है। ऐसा होने से देश के कानून निर्माताओं (सांसद/विधायक) की सूची में से गुण्डे, आतंकवादी व राष्ट्रविरोधी मानसिकता वाले लोगों को अलग रखा जा सकेगा।

 

कहीं भी यदि नौकरी की तलाश करनी है या अपना कोई व्यवसाय चलाना है तो पढ़ाई-लिखाई बहुत जरूरी है। साथ ही उसके काम करने की एक अधिकतम आयु भी निश्चित होती है। इसके अलावा बीच-बीच में उसके कार्यों का वार्षिक मूल्यांकन भी होता है। जिसके आधार पर उसके आगे के प्रमोशन निश्चित किये जाते है। आखिर ये सब मापदण्ड हमारे राजनेताओं के क्यों नहीं हो सकते? चुनाव में खड़े होने से पूर्व उनकी न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता, आयु तथा शारीरिक सामर्थ्य की न सिर्फ जांच हो बल्कि रिटायरमेंट की भी आयु सीमा निश्चित हो।

अंग्रेजों ने जाते-जाते देश को साम्प्रदायिक, जातिवाद व भाषावाद में बांट दिया। कहीं जाति पर, कहीं भाषा पर तो कहीं किसी विशेष सम्प्रदाय को लेकर लोग आपस में भिड़ जाते हैं। जो कहीं न कहीं, किसी न किसी राजनेता के दिमागी सोच का परिणाम होता है क्योंकि उन्हें तो किसी खास समुदाय के सहानुभूति वाले वोट चाहिये। ऐसी स्थिति में हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी राजनेता किसी भी हालत में हमें इन आधारों पर न बांट सके। चुनावों के दौरान प्रकाशित ऐसे आकड़ों या समाचारों को भी हमें रोकना होगा जिनमें किसी जाति, भाषा, राज्य, मत, पंथ या सम्प्रदाय का जिक्र हो।

देश की जनता ने जिन प्रतिनिधियों को संसद या विधानसभाओं में भेजा उनकी भी अपनी जनता के प्रति एक जबावदेही होनी चाहिए। जिससे यह तय हो सके कि आखिर करदाताओं के खून-पसीने की कमाई का कहीं दुरुपयोग तो नहीं हो रहा। वैसे भी एक-एक राजनेता पर करोड़ों रुपये प्रत्येक वर्ष खर्च होते हैं। क्षेत्र का विकास एक न्यूनतम मापदंड से कम रहने, आवंटित धन व योजना का समुचित प्रयोग क्षेत्र के विकास में न करने पर या किसी भी प्रकार के दुराचरण में लिप्त पाये जाने पर कुछ न कुछ दण्ड का प्रावधान अवश्य हो।

जनप्रतिनिधियों के कार्य का वार्षिक अंकेक्षण (ऑडिट) अनिवार्य होना चाहिए। जिससे जनता उसके कार्यकलापों को जान सके। इसमें न सिर्फ आर्थिक वही खातों की जांच हो बल्कि वर्ष भर उसके द्वारा किये गये कार्यों की समालोचना भी शामिल हो।

 

आम तौर पर देखा जाता है कि ये जनप्रतिनिधि या तो विधानसभाओं या संसद से लापता रहते हैं या क्षेत्र की आवाज कभी उठाते ही नहीं हैं। ऐसी स्थिति में उनका चुना जाना व्यर्थ ही होता है। जिस प्रकार नौकरी या स्कूल से एक निश्चित अवधि से अधिक अनुपस्थित रहने पर विद्यार्थी/कर्मचारी को निकाल दिया जाता है। उसी प्रकार संसद या विधानसभाओं में भी इस प्रकार के कुछ प्रावधान अवश्य हों।

इस प्रकार जब देश का प्रत्येक नागरिक स्वछंद रूप से राष्ट्रीय जिम्मेदारी समझते हुए एक योग्य व्यक्ति को अनिवार्य रूप से मतदान कर संसद/विधानसभा में भेजेगा तथा जनप्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्र की जनता का समुचित प्रतिनिधित्व कर राष्ट्रोन्नति के कार्य में लगेगा तो क्यों नहीं भारत पुन: सोने की चिड़िया या विश्वगुरू कहलायेगा। जब प्रत्येक जनप्रतिनिधि निर्भय हो बनेगा जनता का सहारा, तब होगा गणतंत्र हमारा।

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1 Comment on "ऐसा हो गणतंत्र हमारा"

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SANDEEP UPADHYAY
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मै आपके बातो से पूरीतरह सहमत हूँ, येसा लगता है की मैंने ही ये लेख लिखा है, बहुत उम्दा लिखा है अपने कही टिपण्णी करने की गुन्जाईस नहीं छोड़ी है मेरे तरफ से बधाई ……….और जय हिंद ! आपको और हमारे पुरे देशवासिओ को.

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