लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

Posted On by &filed under राजनीति.


-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

आरएसएस के सच को जानने के लिए इसके झूठ के तानेबाने को तोड़ना पहला काम है। संघ परिवार मिथकीय हिन्दू छवि का सच, संघ के कार्यकर्ताओं में नहीं सरसंघचालक के विचारों में खोजना चाहिए। संघ परिवार का पहला प्रौपेगैण्डा है कि संघ ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया। तथ्यों से इस दावे की पुष्टि नहीं होती।

उल्लेखनीय है 26 जनवरी 1930 को कांग्रेस ने सारे देश में स्वाधीनता दिवस मनाने की घोषणा की थी। एक प्रतिज्ञापत्र भी पढ़ने का आदेश दिया था। साथ ही चरखा शोभित तिरंगा झंड़ा फहराने की अपील की थी।

राष्ट्रीय स्वयं सेवकसंघ के सरसंघचालक हेडगेवार ने 21 जनवरी 1930 को एक परिपत्रक संघ की शाखाओं के पास भेजा था। यह पत्र ना.ह.पालकर की किताब ‘‘ परम पूज्यनीय डाक्टर हेडगेवार (पत्र रूप व्यक्ति दर्शन)’’ मराठी में है। इस पत्र में हेडगेवार ने खुशी जाहिर की है कि कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित किया है। इसके साथ ही हेडगेवार ने संघ के कार्यकर्ताओं को आदेश दिया कि

वे इस दिन ठीक शाम को 6बजे शाखा स्थान में हाजिर हों किंतु राष्ट्रीय झंड़े की जगह अपना भगवा झंड़ा फहराएं। और आजादी के प्रतिज्ञापत्र की जगह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उद्देश्यों की व्याख्या विशुद्ध रूप से करें।

एक अन्य विवरण से पता चलता है कि 1930 में जब नमक सत्याग्रह आरंभ हुआ था तो उसमें हेडगेवार ने 150 स्वयं सेवकों के साथ सत्याग्रह किया था और जेल गए थे।(ना.ह.पालकर, श्री गुरूजी व्यक्तित्व और कार्य, डा.हेडगेवार भवन, नागपुर, 1956,पृ.75) लेकिन संघ द्वारा प्रकाशित डेडगेवार की चिट्ठियां कुछ और ही हकीकत बयां करती हैं। हेडगेवार ने 18 सितम्बर 1930 को बिलासपुर के संघ चालक को मराठी में एक पत्र लिखा था। इस पत्र से लगता है कि संघ के कुछ स्वयंसेवक इस आंदोलन में हिस्सा लेना चाहते थे।

हेडगेवार ने स्पष्ट लिखा कि कोई भी आदमी संघ के नाम पर इस आंदोलन में हिस्सा नहीं लेगा। व्यक्तिगत तौर पर कोई भी स्वयंसेवक इसमें हिस्सा ले सकता है। लेकिन इसके पहले उसे अपने मालिक से इजाजत लेनी होगी। संघ को कोई भी खास आदमी इसमें हिस्सा नहीं लेगा। किसी को भी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे संघ के अस्तित्व पर खतरा आए अर्थात् उस पर प्रतिबंध लग जाए। अथवा वह सरकार का कोपभाजन बन जाए।

इस आंदोलन से स्वराज न आएगा, सिर्फ जागृति आएगी। इस जागृति का उपयोग संघ की शक्ति बढ़ाने में करना होगा। उन्होने यह भी लिखा कि ‘‘जागृति आए, इसलिए आंदोलन के प्रति संघ की नीति सहयोगात्मक होगी, विरोधात्मक नहीं। फिर भी संघ के अस्तित्व को खतरे में ड़ालकर मदद करने के पक्ष में संघ का मत नहीं है और होना भी नहीं चाहिए।’’ इस बयान से साफ है कि आरएसएस ने 1930-33 के राट्रीय आंदोलन में सांगठनिक तौर पर हिस्सा नहीं लिया था। हो सकता है कुछ स्वयंसेवकों ने निजी तौर पर हिस्सा लिया हो। लेकिन वे मालिकों की अनुमति के बाद ही हिस्सा ले सकते थे।

फासीवादियों की वर्ग की धारणा में आस्था नहीं होती। वे यह भी नहीं मानते कि शोषित और शोषक दो वर्ग हैं। स्वयं संघियों के शब्दों में पढ़ें ‘‘ भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा की छाया श्री गुरू जी को घातक प्रतीत होती है। उनके सिद्धांत अशुभ प्रतीत होने का कारण उनके पीछे खड़ा रूसी प्रभुत्ववाद है।… कम्युनिस्टों की विचार प्रणाली और प्रचारतंत्र भी श्री गुरूजी को सदोष प्रतीत होते हैं। उन्हें वर्गसंघर्ष का सिद्धांत स्वीकार नहीं।’’( पालकर,श्री गुरूजीःव्यक्ति और कार्य,पृ.297)

Leave a Reply

9 Comments on "आरएसएस ने स्वाधीनता संग्राम से दूरी रखी"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
Vinyl Banners
Guest

Great site. Plenty of helpful info here. I¡¦m sending it to several buddies ans additionally sharing in delicious. And of course, thank you to your effort!

डॉ. राजेश कपूर
Guest
प्रिय भाई करतार जी, आपकी प्रकाशित पोस्ट से इतना तो स्पष्ट है की आप उन आम लोगों से बहुत अलग हैं जिन्हें समाज हित से कुछ लेना-देना नहीं है. अपने हितों से ऊपर उठ कर, जन हित में सोचना और अपनी समझ के अनुसार प्रयास करना श्रेष्ठ मानवों की पहचान है और आप उनमें से हैं. सहमती और असहमति तो संवाद के आधारभूत अंग हैं . इनके बिना संवाद संभव ही नहीं. संतोष और प्रस्न्नताकी बात यह है की आप सरीखा संवादकर्ता मिला है जो अपने विचारों को लेकर इमानदार है. पर इतना तो आप मानते हैं न कि हमारे… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
Guest
प्रिय भाई करतार जी, यही तो अंतर है सकारात्मक और नकारात्मक सोच का. पश्चिमी जगत सृष्टि में द्वन्द-संघर्ष, प्रतियोगिता देखता है, शत्रुता देखता है. भारतीय सोच इसके विपरीत प्रकृति में पूरकता, सहयोग, सामजस्य देखती है. घृणा और संघर्ष का कारन पश्चिमी विचारधाराएं हैं न की भारतीय सोच. सच की सच्ची चाहत है तो गहराई से अध्ययन करना ही पड़ेगा, उथली जानकारी के दम पर तो भटकते ही रह जायेंगे, कभी किनारे नहीं लगेंगे. पश्चिम की वामपंथी, दक्षिण पंथी विचारधाराएँ अनास्तिक और अमानवीय हैं. मनुष्य को पशुता की और लेजनेवाली हैं. पर आप इसे नहीं मानेंगे. अतः अछा तो यही होगा… Read more »
Kartar Singh
Guest
डॉ राजेश कपूर , यह बात समझ नहीं आती कि आप पश्चिमी सभ्यता के इतने आलोचक क्यों है . आपको पश्चिमी सभ्यता को भी विश्व की सभ्यता की पूरक के रूप में ही देखना चाहिए न की विरोधी . और फिर सिर्फ अपनी सभ्यता को ही श्रेष्ठ बताना तो मिथ्या दंभ से ज्यादा कुछ भी नहीं है . हर सभ्यता में कुछ अच्छाइयां और बुराइयाँ दोनों हो सकती हैं और यह सब निश्चित करने का व्यापक मानक भी नहीं हो सकता . इसे में आप अपनी सभ्यता को श्रेष्ठ और पाश्चात्य सभ्यता को निकृष्ट क्यों बताते फिरते हैं, क्या सिर्फ… Read more »
GOPA K ARORA
Guest

वामपंथी विचारको को तो हर हाल में राष्ट्र भक्तों को गालिया ही देनी हैं/ नेताजी सुभाषचंद्र बोस को भी इन्होंने “नाजी का कुत्ता” कहा था / डा० राजेश कपूर ने सटीक उत्तर दिया है / लेकिन ऐसे पूर्वाग्रही लोगों के लिए यहाँ भेंस के आगे बीन बजाने के समान ही है

अभिषेक पुरोहित
Guest
“सर्व शक्तिमान परमेश्वर व अपने पुर्वजों का स्मरन कर मैं प्रतीग्या करता हुँ की मैं भारत को स्वतन्त्र कराने और हिन्दु धर्म,हिन्दु सन्स्कृति और हिन्दु समाज कि सर्वांगीण उन्नत्ती के लिये रास्र्टीय स्वयमसेवक संघ का सदश्य बना हुँ।मैं पुर्ण निस्ठा व प्रामनिकता के साथ एस व्रत का आजन्म पालन करुन्गा। भारतमाता की जय॥” यह वो प्रतिग्या हे जो ४७ से पहले हर स्वयंसेवक लेता था,४७ के बाद इसमे से भारत कि स्व्तन्त्र्ता वल शब्द ह्टा दिय गया हैं।हर दिन “नम्सते सदा वत्सले मातॄ भुमे” और भारत माता की जय बोलने वाले देशभक्त है या हर समय रुश कि ओर मुख… Read more »
wpDiscuz