लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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women“सिद्धि हेतु स्वामी गए यह गौरव की बात
पर चोरी चोरी गए यही बड़ा व्याघात.
सखी वे मुझसे कह कर जाते”,
—‘यशोधरा’ मैथिलीशरणगुप्त.
” भाई साहिब क्या आप जल्द से जल्द इस अस्पताल में पहुँच सकते हैं?” कोकिला.
मैं तो अवाक रह गया.मेरे फोन पर यह सन्देश मेरी मुंह बोली बहन कोकिला का था,पर यह नंबर तो उनका नहीं है.उनको दूसरे नंबर से क्यों फोन करना पड़ा और फिर यह अस्पताल.यह अस्पताल उनके उस कस्बे से दूर था,जहाँ वह रहती थी.वहां भी इलाज का साधारण प्रबंध था ही,फिर यहाँ क्यों?क्या कोकिला बहन किसी गंभीर बीमारी के चपेट में आ गयी हैं?सोचने के लिए समय नहीं था.मुझे तो हर हालत में वहां जल्द से जल्द पहुंचना हीं था.मैंने उसी नंबर पर फोन किया.दूसरी तरफ से किसी पुरुष की आवाज आई.”कौन महेंद्र बाबू?मैं सुरेश बोल रहाहूँ.” सुरेश नाम मेरा जाना पहचाना लगा,पर अभी उसके बारे में पूछने का समय कहाँथा?
मैंने तुरत पूछा ,” कोकिला बहन को क्या हुआ है? वह अस्पताल में क्यों भर्ती हैं?आपने मुझे पहले क्यों नहीं खबर की ?”.
“उन्होंने हमलोगों को मना किया था “मैंने ज्यादा पूछना उचित नहीं समझा केवल इतना हीं कहा,” उन्हें बता दीजिये कि मैं किसी भी हालत में कल तक वहां अवश्य पहुँच जाऊँगा.”
मैंने कह तो दिया,पर यह इतना आसान नहीं था.एक दिन तो पहुँचने में ही लगना था और उस पर टिकट का प्रबंध.मुझे तो ऐसा महसूस हो रहा था कि मैं शायद हीं उनसे मिल सकूँ,पर मुझे तो वहां पहुँचना हीं था. दफ्तर से पत्नी को फोन किया कि मैं घर आ रहा हूँ.वह घबड़ाई,पर मैंने कहा,”घर पहुँच कर सब बताता हूँ.”
पत्नी ने जब सुना,तो साथ जाने की जिद कर बैठी.वह कोकिला बहन से केवल एक बार मिली थी,जब मेरे साथ वह उनके कस्बे में गयी थी,पर उस दो दिनों के मिलन ने उसको कोकिला बहन के बहुत नजदीक ला दियाथा.उनका स्वभाव भी कुछ ऐसा था कि जो उनसे मिलता था,उनका हो जाता था.मैंने कहा,” देखो टिकट मिलता भी है या नहीं.”
बहुत प्रयत्न के बावजूद वह सन्देश दिखाने पर भी केवल एक टिकट का प्रबंध हो सका.पत्नी मन मसोस कर रह गयी.
जब मैं ट्रेन में बैठा तो बहुत तरह के ख्याल आने जाने लगे.दिल बार बार भर आता था कि मैं कोकिला बहन से मिल पाउँगा कि नहीं.वे मुझे भैया या भाई साहब कहती थी,पर उनके लाख अनुरोध पर भी मैं उनको कोकिला जी या कोकिला बहन ही कहताथा. मैं उन्हें कोकिला या तुम सम्बोधन कभी नहीं कर सका.एक आदर और सम्मान की भावना शायद हमेशा आड़े आती रही.मैं सोच रहा था कि अगर वायुयान से पहुँचने की सुविधा होती,तो मैं आज ही पहुँच जाता,पर सोचा हुआ,हमेशा हो कहाँ पाता है?
तरह तरह के विचार आ जा रहे थे और याद आ रही थी मुझे कोकिला जी से अपनी पहली मुलाक़ात और धीरे धीरे उनके बड़े भाई के आसन तक पहुँचने की कहानी. बीस वर्ष पहले तो मुझे पता भी नहीं था कि कोकिला भट्ट नाम की कोई महिला इस पृथ्वी पर रहती भी हैं,पर इन बीस वर्षों में पता नहीं धीरे धीरे कैसे वे मेरी स्नेह दात्री मुंहबोली बहन बन गयी.थी.फिर भी कहाँ जान पाया था,मैं उनको? उनके आसपास लगता था एक ऐसा रहस्य है ,जिसे वे कभी भी खोलना नहीं चाहती थी.
पत्नी को भी आश्चर्य होता था कि आपस में पहले से किसी प्रकार का संबंध न होते हुए भी कोई किसी के इतना नजदीक कैसे आ सकता है?वह इसे भाई बहन का आदर्श रिश्ता मानती थी.
आज मैं सोच रहा था कि क्या वह महज संयोग था कि मैं प्रकृति के उस प्रांगण में पहुंचा था पता नहीं वह कौन सी प्रेरणा थी,जो बीस वर्ष पहले मुझे प्रकृति के उस सौंदर्य सागर में ले गयी थी.मैं तो उस जगह को देखते ही मुग्ध हो गया था.वह एक छोटा सा क़स्बा या यूं कहिये कि एक बड़ा गांव था.आम गांवों की तुलना में वहां सुविधाएं कुछ अधिक थी,अतः उसे क़स्बा कहना मुझे ज्यादा उपयुक्त लगा था.
सरकारी नौकरी में होते हुए भी अनौपचारिक रूप से मैं एक स्वयं सेवी संस्था से जुड़ा हुआ था.मुझे असुविधा भी नहीं महसूस होती थी,क्योंकि पत्नी भी प्रोत्साहित करती रहती थी इससे जुड़े रहने के लिए. यहाँ पहुंचना भी उसी संस्था के सौजन्य से संभव हो सका था.
याद आ रहा था,वह दिन, जब पहली बार मैं इस क़स्बे में पहुंचा था. उस समय तो मैंने सोचा भी नहीं था कि इस क़स्बे से ऐसा सम्बन्ध बन जाएगा.
क़स्बा सड़क से जुड़ा हुआ था.पर प्रकृति से अलग नहीं हुआ था.सड़क की हालत कोई ख़ास अच्छी नहीं थी,पर मेरा ध्यान तो कहीं और था.
क़स्बा तो आखिर कस्बा हीं था ,शहर तो था नहीं.आवागमन की सुविधा भी कोई खास अच्छी नहीं थी.जैसा हमारे देश में अधिकतर होता है.रेलवे स्टेशन दूर था,पर बस की सुविधा अवश्य थी.वहां एक सरकारी स्कूल और एक छोटा सा अस्पताल भी था.छोटी पहाड़ियों और जंगलों से आच्छादित यह गाँव मेरे जैसे प्रकृति प्रेमी के लिए एक ऐसा आकर्षण था ,जिसे मैं यहाँ से लौट कर भी नहीं भूल पाता था.कोकिला बहन उसी स्कूल में शिक्षिका थीं.स्कूल से सटे हुए स्कूल के क्वार्टर बने हुए थे,उन्ही में से एक में वह अकेली रहती थीं.
उनकी उम्र और मेरी उम्र में शायद तीन चार वर्ष का ही अंतर हो,
मैं जब पहली बार उनसे मिला तभी न जाने क्यों उनके प्रति एक श्रद्धा भाव मन में जगा.उन्होंने जब प्रथम मिलन में हीं महेंद्र भाई साहिब कह कर सम्बोधित किया तो मैं तो निहाल हो गया.उस समय उनके बारे में कुछ खास पता नहीं चला ललाट का सिन्दूर तो यह अवश्य बता रहा था कि वे शादीशुदा हैं,पर मैं उनके अकेली रहने का कारण ही समझ पाया. सोचा हो सकता है कि नौकरी की मजबूरी उन्हें अलग रखे हुए हो.बातचीत से ऐसा कुछ पता नहीं चलता था कि वे इस क़स्बे में रह कर सुखी हैं या दुःखी.यह अवश्य था कि वे अपने कार्य से संतुष्ट नजर आती थीं..मैं कुछ पूछने का भी साहस नहीं जुटा सका था.सच तो यह है कि वह साहस मैं कभी भी नहीं जुटा सका.मैं वहां से लौटा अवश्य पर एक याद दिल में संजोये हुए.भूल नहीं सका मैं प्रकृति के उस प्रांगण को.वहां से लौटने के बाद भी वह अक्सर याद आता हीं रहता था.उसी बीच कभी कभी कोकिला बहन भी याद आ जाती थीं.उनके माथे पर दिखती चिंता की रेखाओं पर भी मेरी नजर पडी थी,पर मैंने उस पर अधिक ध्यान नहीं दिया था.
अधिक अंतराल नहीं हुआ था कि फिर वहां जाने का अवसर आ गया.इसे मैंने अपना सौभाग्य समझा,क्योंकि मैं तो वहां के प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत था हीं.मैंने इसबार पत्नी को भी साथ ले जाने को सोचा.वह तो झटपट तैयार हो गयी.जिस स्वयंसेवी संस्था से मैं जुड़ा हुआ था,उन्हें भी कोई एतराज नहीं था, बल्कि वे तो प्रसन्न थे कि इसतरह मैडम भी शायद दिलचस्पी लेने लगें.ऐसे भी उनको लगता था कि गांव या छोटे शहरों में जो विकास कार्य वे कर रहे हैं,उनमें महिलाओं का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण है.मैं जानता था कि उनका मेरी पत्नी के सम्बन्ध में ऐसा सोचना दिवा स्वप्न की भाँति है,फिर भी इस बार मैं सपत्नीक उस रमणीय स्थल पर पहुंचा.पत्नी को कुछ अटपटा सा लग रहा था.ऐसे भी प्रकृति उसको उतनी लुभावनी नहीं नजर आती.उसका अधिक ध्यान वहां के लोगों की कठिनाइयों की ओर था.उसने कहा भी कि कितनी दिक्कतों में ये लोग जिंदगी गुजारते होंगे.कोकिला जी से मिल कर तो वह चकित रह गयी.वह सोच हीं नहीं सकती थी कि इस वीराने में कोई अकेली महिला भी शिक्षा का ज्ञान वितरित करने कभी आएँगी ,वह भी किसी सुदूर राज्य से.
फिर भी प्रथम दर्शन में वह कोकिला बहन की ओर कोई खास आकृष्ट नहीं हुईं,पर जब बातों का सिलसिला आरम्भ हुआ,तो मुझे ऐसा लगने लगा कि वे एक अरसे से विछुड़ी हुई सहेलियां हैं.रात में मैंने जिज्ञासा भी जाहिर की.पत्नी ने बताया कि ज्यादा तो नहीं पता चला,पर लगता है,कोकिला जी वह नहीं हैं जो दिखती हैं लगता है,कहीं गहरे अंतरमन वे कोई रहस्य छुपाई हुई हैं.फिर भी इतनी मिलनसार महिला मैंने कम ही देखा हैं.पता नहीं यह आपके चलते था या यह उनका स्वभाव ही है.प्रथम मिलन में इतनी आत्मीयता मैंने तो पहले नहीं देखी..
हमलोग दो तीन दिनों तक वहां रहे.ऐसे तो मैं अधिकतर अपने काम में व्यस्त रहा,पर सुबह में पत्नी के साथ वहां का दृश्य देखने का सम्मोहन मैं नहीं भूला.सबेरे का टहलना भी हो जाता था.बाद का समय पत्नी अन्य महिलाओं के साथ बिताती थी.पर उन दो तीन दिनों के प्रवास में स्कूल की छुट्टी के बाद उसका सारा समय कोकिला बहन के साथ ही बीता.स्कूल से निकलते ही कोकिला बहन उसको अपने घर ले जाती थी.फिर न जाने उन दोनों के बीच ऐसी क्या बातें होती थी कि पत्नी को समय का भी ध्यान नहीं रहता था.मुझे वहां उसको लेने जाना पड़ता था.कोकिला बहन से मिल कर मुझे भी हार्दिक आनंद आता था,अतः पत्नी को लाने के लिए वहां जाने में अच्छा ही लगता था.रात्रि बेला में हमलोगों के बीच अन्य विषयों के साथ कोकिला बहन के बारे में चर्चा अवश्य होती थी.यह सिलसिला वहां से लौटने के बाद भी जारी रहा.हमलोग वहां केवल तीन दिन रहे थे,पर पत्नी को वे इस तरह भा गयीं थीं कि उसने कोकिला बहन के साथ बहुत दिनों तक संपर्क बनाये रखा.मैं तो वहां अक्सर जाता रहा,पर घर गृहस्थी के बंधनों में उलझी पत्नी मेरे साथ फिर वहां नहीं जा सकी,पर वह लौटते ही सबसे पहले कोकिला जी के बारे में पूछती रही.कोकिला बहन से मेरा मिलना बदस्तूर जारी रहा.क्योंकि वे वहां की एक ऐसी हस्ती के रूप में विख्यात थीं कि उनका साथ हमलोगों के लिए आवश्यक हो जाता था.वैसे भी वे एक ऐसी स्नेह शील महिला थीं,जिनसे मिल कर हर व्यक्ति प्रसन्नता अनुभव करता था.
फिर आज का यह सन्देश.मैं सोच भी नहीं सकता था कि कभी कोकिला बहन को इस रूप में भी देखना पड़ेगा.ऐसे भी प्रायः एक छुपी भावना दिल में रहतीहै कि जो बाद में आया है,वह बाद में जाएगा,पर ऐसा होता कहाँ है?कोकिला जी से जब मैं पिछली बार मिला था,तो मैं सोच भी नहीं सकता था कि इसके बाद उनसे इस हालत में मिलना होगा.
कोकिला बहन से मिलने मैं सीधे अस्पताल पहुंचा.मुझे देखते हीं उनके मुरझाये चेहरे पर मुस्कान की झलक आ गयी.उन्होंने धीरे से कहा,”मुझे विश्वास था कि आप अवश्य आएंगे.मैं जानती थी कि आप से मिले वगैर मेरा प्राण पखेरू इस नश्वर शरीर को छोड़ कर नहीं उड़ सकता.भाभी को साथ नहीं लाये?”
मैंने पहले तो उनको इस तरह की निराशा जनक बाते करने से मना किया.फिर बयान की,वे अड़चने जिसके चलते चाह कर भी वह नहीं आ सकी बोला मैं,”अगली बार अवश्य लाऊंगा.”मैंने देखा कि इस हालत में भी वे मेरे इस वाक्य पर हंस पडी,”आपको लगता है कि वह अगला समय कभी आएगा?नहीं भाईसाहिब,मेरी जिंदगी की शायद यह आखिरी रात हो.भाभी जी से मिलने की बहुत तमन्ना थी,पर तमन्ना तो जिंदगी में बहुत कुछ पाने की थी,पर वह सब कहाँ हो सका?ऐसे भी भाई साहिब,जिंदगी की तमन्नाएँ पूरी कहाँ हो पातीहैं?”
मैं बोला,”बहन आज आप ऐसी निराशा जनक बातें क्यों कर रही हैं? आप तो लोगों के दिल में हमेशा आशा की किरण जगाया करती थीं.आज यह परिवर्तन क्यों?”
कोकिला जी बोलीं,” बिना कुछ बताये हुए,मुझे परित्याग कर चले तो वे बहुत पहले गए थे ,पर आशा की एक किरण थी ,जो मुझे ज़िंदा रखे हुए हुए थी,आशा की एक डोर थी जिसको पकड़ कर मैं जिंदगी का यह बोझ ढो रही थी.पर अब वह आशा की किरण बुझती हुई नजर आर ही है,वह डोर टूटती हुई नजर आ रही है.”
लग रहा था मेरे सामने कोकिला जी आज अपनी जिंदगी का परत उधेड़ने जा रही थी,पर मैंने महसूस किया कि उन्हें बोलने में तकलीफ हो रही है..मैंने उन्हें बोलने से मना किया.उन्होंने मेरी बात नहीं मानी और बोलीं,”आज मुझे मत रोकिये.मुझे सब कुछ कह लेने दीजिये.डाक्टरों ने मुझे कुछ बताया नहीं है,पर उनके आव भाव से लगता है कि मेरी जीवन ज्योति बुझने ही वाली है.पता नहींआप पति पत्नी से मेरा ऐसा क्या लगाव है कि मैं आपके सामने अपनी जिंदगी के रहस्य का पूरा पर्दा हटा देना चाहती हूँ.”
मुझे अब वातावरण बहुत रहस्यमय मालूम होने लगा.रात्रि बेला में अस्पताल के कमरे में बैठा हुआ मैं अब एक भय भी महसूस करने लगा था.किसी मरणासन्न व्यक्ति के इतने समीप बैठने का यह मेरा पहला अनुभव था.अब उनके हमेशा एकाकी रहने का कारण भी समझ में आ रहा था,पर पता नहीं अभी और कौन रहस्य है,जिस पर से वह आज पर्दा हटाना चाहती हैं?वह भी मेरा चेहरा बड़े ध्यान से देख रही थी.थोड़े विराम के बाद वह फिर बोलने लगी,”यह रहस्यमय जीवन जीते जीते अब मैं बुरी तरह थक चुकी हूँ.”
वह आगे बोली,”आपने शायद ध्यान नहीं दिया.ऐसे भी आप पहली बार यहाँ आये हैं.अस्पताल के बाहर जो सुरक्षा है और जो चहल पहल दिखाई दे रही है,वह मेरे कारण है.”
अब यह तो समझ में आ गया कि मुझे मोबाईल का वह सन्देश दिखाने पर क्यों तुरत प्रवेश मिल गया था.ऐसे भी वह अस्पताल अपने सुरक्षा के इंतजाम के लिए प्रसिद्ध था,अतः उस समय प्रवेश मिलना आसान नहीं था.इस तरफ मेरा ध्यान नहीं गया था.अब तो रहस्य और गहरा हो गया था.आखिर कौन है ये कोकिला बहन?.
उन्होंने आगे कहा,”पिछले कुछ वर्षों में आप उस क़स्बे में भी नहीं आये,नहीं तो आपको यह सब वहाँ भी दीखता.जो लोग मुझे केवल एक शिक्षक के रूप में जानते थे,वे भी चकित रह गए थे,यह सब देख कर”.
मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ.पता नहीं पिछले चार पांच वर्षों में ऐसा क्या हुआ,जिसके चलते शायद सब कुछ बदल गया था.यह एक ऐसा रहस्य था ,जिसे जानने के लिए मेरा मन उतावला हो उठा,पर मैंने इसके लिए उन्हें कष्ट देना उचित नहीं समझा.सोचा बाहर जाकर मैं अपने उन परिचितों से पूछ लूँगा,जो कोकिला जी के साथ ही क़स्बे से यहाँ आये थे.पर लगता है कि कोकिला जी ने मेरे मन का भाव समझ लिया,”भाई साहब,मैंने आपको इसीलिये तो बुलाया है,कि जाने के पहले आपको अपने जीवन के सम्पूर्ण रहस्य से परिचित करा कर जाऊं ”
लग रहा था कि वे पुरानी यादों में खो गयी हैं,
उन्होंने आँखें बंद कर ली थीं.मैंने वहां से उठने का उपक्रम किया.क्योंकि मुझे ऐसा लगा कि वे अब विश्राम करना चाहती हैं.पर जैसे ही मैं हिला,उन्होंने आँखें खोल कर इशारा किया कि मैं बैठा रहूँ.मैं कुछ देर तक यूँही स्थिर बैठा और मन्त्र मुग्ध सा उनकी ओर देखता रहा.अब उनकी आवाज बहुत धीमी हो गयी थी.ऐसा लग रहा था,जैसे वह कहीं दूर से बोल रही हैं,”भाई साहब,आप तो उस रमणीय क़स्बे में आये है.कोई आकर्षण अवश्य था जो बार बार आपको भी वहां खिंच लाता था.पता नहीं मैं भी कहाँ कहाँ भटकती हुई वहां जा पहुंची थी.जिंदगी के अंतिम पड़ाव तक ऐसे मनोरम स्थली में रहना भी मेरे लिए सौभाग्य की बात थी.वहां मुझे इतना प्यार और सम्मान मिला कि मैं अपना कष्ट भी भूल गयी.आपको शायद लग रहा होगा कि ऐसा भी क्या कष्ट था मुझे ?”
नहीं बहन मैंने आपके चेहरे पर चिंता की रेखाएं देखी थी.फिर आपकी ललाट पर सिन्दूर.किसी सधवा का अपने पति से अलग रहना बहुत बड़े संताप और कष्ट का कारण होता है.यह मैने अनुभव किया था.बोला मैं केवल इतना हीं,” बहन,आपके माथे का सिन्दूर और आपका एकाकीपन सब कुछ बता देता था,पर मैं आपसे पूछने का साहस न कर सका.”
कोकिला जी बोली,”मैं उनकी पत्नी हूँ.”
रहस्य से पर्दा उठ गया था.
फिर भी पूछने को तो अभी बहुत था,पर वे स्वतः बताती गयीं.उन्होंने बहुत सी बातें बताई.लगता था आज वह सब कुछ उगल देना चाहती थी,वह पूर्ण रहस्य जो उनके ह्रदय के किसी कोने में छिपा पड़ा था आज सामने आता जा रहा था.बीच बीच में आंसू भी आ जाते थे,जिन्हे वे अपने कमजोर हांथों से पोंछ लेती थीं.बोलते बोलते वे थक जाती थीं .फिर थोड़ा आराम करके बोलने लगती थीं.डाक्टरों ने उनको बोलने से मना किया,पर उनका उत्तर था,”मैं बोलना बंद कर दूँ,तो क्या आप मुझे बचालेंगे? जब एक आध दिनों में मेरा जाना निश्चित है,तो मैं मन का बोझ हल्का करके क्यों न जाऊं?”
मैं जान गया था कि यह एक आध दिन भी शायद दूर की बात हो,क्योंकि उनके रिपोर्ट के अनुसार वे कभी भी दम तोड़ सकती थी.डाक्टरों के लिए यह भी आश्चर्य का विषय था कि इस अवस्था में वे इतनी बातें कैसे कर पा रहीहैं.
वे बहुत देर से बातें कर रही थी,अतः एक बारफिर मैंने भी रोकने का प्रयत्न किया,पर वेबोलीं,” मुझेआज आप मत रोकिये मेरे पास बहुत कम समय है ,पर आज मैं आपको सब कुछ बताकर हीं जाना चाहतीहूँ.”
वे आगे भी बहुत देर तक बोलती रहीं और अब तक की अपनी सम्पूर्ण कहानी सुना कर ही चुप हुईं.मुझे न जाने क्यों लग रहा था कि उनकी यह आखिरी आवाज है ,जो मैंने सुनी.उन्होंने मुझे इशारे से जाने को कहा.रात भी अधिक हो गयी थी.मैं वहां से निकला तो सही,पर अस्पताल के बाहर जाने की हिम्मत नहीं जुटा सका.अस्पताल के ही एक कोने में पड़ा रहा.मैं जान रहा था कि कोकिला जी का अंत बहुत नजदीक है और यही मैंने फोन से पत्नी को भी बता दिया.वह तो रोने लगी और साथ साथ अफ़सोस भी करने लगी कि मैं उनसे मिल भी नहीं सकी.
भोर की बेला में ही कोकिलाजी की आत्मा ने उनका नश्वर शरीर त्याग दिया.मैं दूसरे ही दिन दाह संस्कार के बाद वहां सेलौट आया.
मुझे लगता है कि एक बार उनको, अंत समय में सही,अपने पति के दर्शन हो जाते,तो वह ज्यादा शांति से इस दुनिया से विदा होती. न जाने क्यों मुझे लगता है कि आज भी उनकी आत्मा तड़प रही होगी.

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