लेखक परिचय

सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”

सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”

विगत २ वर्षो से पत्रकारिता में सक्रिय,वाराणसी के मूल निवासी तथा महात्मा गाँधी कशी विद्यापीठ से एमजे एमसी तक शिक्षा प्राप्त की है.विभिन्न समसामयिक विषयों पे लेखन के आलावा कविता लेखन में रूचि.

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manmohanसिद्धार्थ मिश्र”स्‍वतंत्र”

satisfaction with manmohanjiपिछले कुछ दिनों से चीन के अतिक्रमण के बाद पाकिस्‍तान ने दोहरे हमले कर भारत की  लचर रक्षा  नीति को एक बार दोबारा सतह पर ला दिया है । ज्ञात हो कि पाक समर्थित संगठनों ने पहले जलालाबाद स्थित भारतीय वाणिज्‍य दूतावास पर हमला किया और उसके बाद अब घात लगाकर पांच भारतीय सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया । इसके पूर्व पाक सैनिकों ने भारतीय चौकी पर तैनात सिपाहियों के सिर काट कर मानवता को कलंकित किया था । इसके बाद हुई  भारत सरकार की प्रतिक्रिया से तो हम सभी परिचित हैं । कुछ दिनों बयानबाजी लानत-मलानत भेजने के बाद मामला खत्‍म । यानी पूरी कार्रवाई मात्र जबानी जमाखर्च से ज्‍यादा कुछ भी नहीं । शायद यही वजह है कि भारत अब आतंकियों की सुरक्षित ऐशगाह माना जाने लगा है । यही कारण है कि दुनिया भर के जेहादी यहां को आतुर रहते हैं,क्‍योंकि पहले तो उन्‍हे रक्षा नीति की विफलता पर पूरा भरोसा होता है । दूसरे अगर पकड़े गये तो अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के दबाव से उन्‍हे जेल में बिरयानी और समस्‍त सुविधाएं मिलने की पूरी गारंटी होती है । इस बात को हम कसाब समेत अन्‍य आतंकियों के प्रकरण से समझ सकते हैं । तथ्‍य बताते हैं कि आतंकियों की पैरवी में हमारे घृणित सेक्‍यूलर नेता किसी भी हद तक गिरने से गुरेज नहीं करते । इस बात के साक्ष्‍य हमें बाटला हाउस कांड से मिल जाएंगे जहां पर माननीय दिग्‍विजय जी इस मुठभेड़ को फर्जी बताकर जमकर घड़ियाली आंसू बहाये थे । या ओसामा की मृत्‍यु पर उसे ओसामा जी कहकर अपनी अवसरवादिता प्रकट की थी । क्‍या निकृष्‍टता की इससे उन्‍नत कोई हद हो सकती है ? क्‍या वोटबैंक आज राष्‍ट्रवाद से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण विषय बन चुका है  ? जवाब है हां,क्‍योंकि यदि ऐसा नहीं होता तो किसी भी भारतीय नागरिक को संसद में बैठकर वंदेमातरम का अपमान करने का अधिकार प्राप्‍त नहीं होता । या वर्ग विशेष को अल्‍पसंख्‍यक होने के नाम पर आजाद भारत में पाकिस्‍तानी ध्‍वज लहराने की अनुमति नहीं मिलती । जहां तक अल्‍पसंख्‍यक  का प्रश्‍न है तो देश में बौद्ध,जैन,सिक्‍ख धर्म से संबंधित धर्मावलंबियों को कोई विशेष अधिकार प्राप्‍त नहीं होते । इस तर्क से एक बात स्‍पष्‍ट हो जाती है कि ये विषय अल्‍पसंख्‍यकों की भावनाओं का नहीं अपितु एक संगठित वोटबैंक को काबू में रखने का मामला है ।

 

उपरोक्‍त समस्‍त परिप्रेक्ष्‍यों को देखते हुए सरकार की भूमिका क्‍या होनी चाहीए ? नीतिगत रूप से तो शठे शाठ्यम समाचरेत लेकिन दुर्भाग्‍य से हमारे प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया एक अंतहीन मौन से शुरू होती है,क्‍योंकि वे शांतिप्रिय हैं । जब प्रश्‍न हमारी संप्रभुता का हो तो किस काम की शांतिप्रियता । उनकी कमी की भरपाई हमारे रक्षा मंत्री एके एंटनी ने पाकिस्‍तानी सेना को क्‍लीनचिट देने वाले  अपने बयान से की । हां‍लाकि बाद में दबाव पड़ने के बाद उन्‍होने अपना बयान बदल दिया,लेकिन उनके इस बयान ने उनकी मंशा पूर्णतया स्‍पष्‍ट कर दी है । इस मामले में सबसे वि‍भत्‍स बयान आया बिहार से । जी हां स्‍मरण रखीये ये वही बिहार है जहां के चार बेटों ने देश के लिए अपने प्राण न्‍यौछावर कर दिये । ये बयान दिया सेक्‍यूलर शिरोमणी एवं स्‍वयं सिद्ध विकास पुरूष नीतीश कुमार के नवरत्‍नों में से एक भ्रष्‍टमति मंत्री भीम सिंह ने । अपने बयान में उन्‍होने बताया कि सेना और पुलिस में लोग मरने के ही जाते हैं । इस प्रश्‍न पर एक सीधा प्रतिप्रश्‍न ये बनता है कि सियासत में लोग क्‍यों जाते हैं ? केवल घपले,घोटाले करने अवसरवादिता और राष्‍ट्रद्रोह को प्रमाणित करने के लिए ।  क्‍या यही है सियासत का उद्देश्‍य ? अभी कुछ दिनों पहले बिहार की बेहतरी के लिए विशेष राज्‍य का दर्जा मांगने गये नीतीश की मति पर अब क्‍या पत्‍थर पड़ गये हैं ? किन बिहारियों के विकास की बात करते हैं नीतीश जी ? वो बिहारी जिनकी शहादत पर वे शोक व्‍यक्‍त करना तक उचित नहीं समझते । उपरोक्‍त प्रकरण ने निश्चित तौर पर नी‍तीश कुमार की कलई खोल दी है ।

इस विषय में जहां तक केंद्र सरकार का प्रश्‍न है तो निश्चित तौर पर हम मनमोहन जी से पराक्रम एवं राष्‍ट्रवाद की अपेक्षा नहीं कर सकते । सौभाग्‍यवश मनमोहन जी हमेशा की तरह इस बार भी जन-गण की अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं । स्‍मरण रहे कि अमन प्रिय मनमोहन जी पूर्व में ही पाकिस्‍तान को अनेक प्रकार से एकतरफा छूट देते जा रहे हैं । उदाहरण स्‍वरूप क्रिकेट संबंध सुधारने एवं वीजा नियमों में ढील देने के निर्णय पाकिस्‍तान के प्रति उनकी सद्भावना को प्रदर्शित करते हैं । सीमा पर पाकिस्‍तानी की आक्रामकता उनकी इन्‍ही नीतियों का परिणाम है । बहरहाल इस पूरे प्रकरण में सरकार अपने चिर-परिचित पुराने रूख पर कायम है । वैसे भी ये आम लोकसभा चुनावों के पूर्व का आखिरी वर्ष है ऐसे में मनमोहन जी से किसी कार्रवाई की उम्‍मीद रखना दिवास्‍वप्‍न से ज्‍यादा कुछ नहीं है । उनके अनुसार पाक समर्थित इस प्रकार  की घटना कायरना एवं निंदनीय होती है । किंतु जनता जनार्दन को ये समझना होगा कि अब बात निंदा के स्‍तर से आगे बढ़ चुकी है । ऐसे में आगामी लोकसभा चुनावों एवं अन्‍य विधानसभा चुनावों में अपना मत देने से पूर्व जनता को एक बार अवश्‍य सोचना होगा,कि क्‍या वे मनमोहन जी की शांतिप्रियता से संतुष्‍ट हैं ?

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1 Comment on "क्‍या वे मनमोहन जी की शांतिप्रियता से संतुष्‍ट हैं ?"

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parshuramkumar
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जी हां स्‍मरण रखीये ये वही बिहार है जहां के चार बेटों ने देश के लिए अपने प्राण न्‍यौछावर कर दिये । ये बयान दिया सेक्‍यूलर शिरोमणी एवं स्‍वयं सिद्ध विकास पुरूष नीतीश कुमार के नवरत्‍नों में से एक भ्रष्‍टमति मंत्री भीम सिंह ने । अपने बयान में उन्‍होने बताया कि सेना और पुलिस में लोग मरने के ही जाते हैं । इस प्रश्‍न पर एक सीधा प्रतिप्रश्‍न ये बनता है कि सियासत में लोग क्‍यों जाते हैं ? केवल घपले,घोटाले करने अवसरवादिता और राष्‍ट्रद्रोह को प्रमाणित करने के लिए । क्‍या यही है सियासत का उद्देश्‍य ? अभी कुछ… Read more »
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